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Tuesday, March 1, 2011

उसका एक दिन






डिंपा की मां सिर्फ़ छह महीने नौकरी कर पाई। छोड़कर घर बैठना पड़ा। अस्पताल में बताने तक नहीं जा पाई कि क्या हो गया है और क्यों उसे नौकरी छोडऩी पड़ रही है।

लंबे समय के बाद उसके जीवन में ऐसी दोपहर आई थी। जब से वह जॉब करने लगी थी, उसकी दोपहर घर में नहीं होती थी। अस्पताल में ड्यूटी पालियों में होती थी, लेकिन उसे एक घंटे ट्रेन का सफर करना होता है और घर में छोटा बच्चा है, यह कहकर उसने मोहलत ले ली थी कि वह सिर्फ दिन में ही काम कर पाएगी। संडे घर में रहती थी। डिंपा के बाप से ज़्यादातर शाम या सुबह ही मुलाकात हो पाती थी। बहुत दिनों से वह कुछ नहीं बोल रहा था, पर एक दिन डिंपा के बाप ने सुबह उसे लोकल नहीं पकडऩे दी। 

वे ऐसे दिन थे, जब डिंपा की मां कहीं से काली नहीं थी। उसका साहिब घंटों उससे बात करता और उसका रंग नीला हो जाता। छुअन के कुछ लम्हों में वह आईने में देखती, तो गुलाबी टपक रही होती। निश्चित ही वे सफेद दिन थे, जब हर वजूद पर बर्फ पड़ी हुई थी। उससे फैल रही हल्की ठंड थी। धूप थोड़ी देर से आई थी। वह बरामदे में गीले कपड़े डाल रही थी। चिडिय़ां खूब बोल रही थीं। वह डिंपा को बुलाकर चिडिय़ों को शोर करता दिखा रही थी। कभी एक चिडिय़ा उड़कर कुर्सी के पास आ जाती, तो अचानक कई सारी चिडिय़ां उड़कर ऊपर की ओर जातीं। डिंपा उन्हें देख चिल्ला रहा था- चिऊताई... चिऊताई... ये माझ्या घरात... चिऊताई... चिऊताई... ये तुला मी तांदूळ देईन.... 

तभी धड़धड़ाता हुआ डेविड आया। आते ही सनक गया।
'तू दिन में खाना कहां खाती है?'
'अस्पताल में। डब्बा लेकर जाती हूं न मैं।'
'अस्पताल में किसके साथ?'
'अरे, स्टाफ रहता है साथ में। कैंटीन है।'
'नहीं, कस्बेकर के साथ खाती है तू।'
'वो तो एक ही दिन खाया था। उसका डब्बा नहीं आया था घर से, इसलिए मैंने पूछ लिया कि खाओगे क्या? बोला हां, तो उधर ही बैठकर खा लिया।'
'एक ही दिन? रोज़ खाती है तू उसके साथ। तेर्को क्या लगता है, मेर्को कुछ भी मालूम नहीं पड़ेगा क्या?'

और उसके बाद दोनों में फिर हो गई। ऐसे माहौल में संवादों का कोई महत्व नहीं होता। किसी भी भाषा में कहे जाएं, सबका असर एक-सा पड़ता दिखता है। दोनों की ज़ुबान लाल मिर्च की नोंक जैसी हो गईं। उस दिन जो लड़ाई हुई कि बाप रे बाप! अक्खी कॉलोनी सहम गई। उनके घर की दीवारें उड़ गईं। दरवाज़े टूटकर बिखर गए। दीवार पर लगा पलस्तर पपडिय़ों में तब्दील होकर फर्श पर झरने लगा। पहले चूना फैला, फिर मिट्टी और उसके बाद बहुत तेज़ हवा आई, जिसमें पहले उनकी छत उड़ी, फिर फर्श पर पड़ी मिट्टी और उसके बाद पूरी फर्श ही उड़ गई। वह ज़मीन इतनी बेतरतीब और नालायक़ लग रही थी कि वहां अरसे से कुछ रहा ही न हो। लादियों पर बने गुलाबी फूल सूख गए। एक-एक पंखुड़ी बहकर पूरी कॉलोनी में फैल गई। खिड़कियों के पल्ले पहले ज़ोर-से टकराए, फिर ऐसे लड़े जैसे किसी ने पीछे से गरदन पकड़ उन्हें भिड़ा दिया हो। फिर अचानक खिड़की उछलकर दूर जा गिरी। दरवाज़े खौफ में दीवारों और चौखटों का साथ छोड़ भागे। चार-आठ दीवारों के पीछे जो कुछ बंद था, दीवारों के हट जाने के कारण एक अजीब-सी नंगई में आ गया। 

जैसे पानी के फव्वारे उछलते हैं और आसमान को छूने की जि़द करते हैं, गालियां निकल रही थीं और आसमान की ओर बड़े फूहड़ तरीके से दौड़ रही थीं। हर गाली, पिछली से आगे निकलने की होड़ में थी। 

एक बार फिर डिंपा की मां पस्त होकर ज़मीन पर पड़ी थी। डेविड के हाथ में कैंची थी। वह उसे डिंपा की मां की आंख में भोंक देना चाहता था। उसके पेट में डाल देना चाहता था। उससे उसके शरीर के खास अंगों को चीर कर दो फांक कर देना चाहता था। डिंपा की मां बार-बार बच रही थी। डेविड ने उसके कमर तक लहराते बालों के बीच कैंची खुभो दी और झटके से बाहर खींची। एक बड़ा-सा गुच्छा ज़मीन पर बिखर गया। डेविड की कैंची चलती रही। ज़मीन बालों से पट गई। डिंपा की मां के बाल कट गए। इतने छोटे कि वह खुद भी आईने में अपना चेहरा देखे, तो न पहचान पाए। कहीं से छोटे, कहीं से बड़े। कहीं सिर की चमड़ी झलकती, तो कहीं कानों तक लटकती लट झूल रही होती। जैसे तूफान के बाद दांतों में धूल का आभास होता है, आंखों में किरकिर कुछ बजता रहता है, कानों की लौ मिट्टी में सराबोर होती है, और उंगलियां आपस में रगड़ो, तो कणों की खरखराहट रूह को खरोंच जाती है, वैसे ही डिंपा की मां के पूरे शरीर में होने लगा। उसे लगा, वह बाल-झड़े खजुआ कुत्ते की तरह हो गई है, जिसके शरीर के बचे-खुचे बाल दूसरे कुत्तों के साथ लड़ाई के कारण जगह-जगह से नुंच गए हैं। उसके पीछे से ज़ख्म झांक रहे हैं और उन पर मक्खियों ने बुरी तरह हमला कर दिया है। उसके शरीर में इतनी भी ताकत नहीं बची कि पूंछ हिलाकर मक्खियों को भगा सके।

उस घर में दीवारें नहीं बची थीं। दरवाज़े, खिड़कियां नहीं बचे थे। छत और फर्श भी नहीं थीं। सोफे, पलंग, मटके, टेबल, गिलास और थाली की आड़ में ही जाना था। डिंपा की मां उठ नहीं पा रही थी। उसने महसूस किया, उसका पेटीकोट गीला हो चुका था। गीलेपन ने उसके दर्द को और बढ़ा दिया। उसे लगा, न केवल दीवार-दरवाज़े, बल्कि शरीर का हर कपड़ा उड़कर दूर जा गिरा है। पूरी कॉलोनी उसी को घूरे जा रही है। वह अपने कटे हुए बालों की आड़ लेकर छुपने की कोशिश करने लगी। वह घुटने दबाकर अपना जिस्म मोड़ रही थी, जैसे गोलकर सिर और घुटने के बीच सरका देगी। उसका पूरा शरीर कांप रहा था। बचपन में उसने एक मरती हुई गौरैया पर मग्गे से पानी डाल दिया था। वह ऐसे ही कांप रही थी उस वक्त। गौरैया की आंख से चींटियों की पूरी कतार बाहर निकल रही थी। हमारी आंखों में भी चींटियां रहती हैं। जब हम गीले होकर मर जाते हैं, तो चींटियां हमारी आंखों से निकल कर चली जाती हैं, किन्हीं और आंखों की तलाश में। डिंपा की मां की आंखों में खुजली होने लगी। उसे ज़मीन पर कतार बांधकर चलती चींटियां साफ दिख रही थीं।

डेविड की कैंची दूर छिटकी पड़ी थी। वह आसपास कहीं नहीं था। डिंपा की मां के नथुनों में उसकी बदबू बसी हुई थी। दरवाज़े पर जहां तोरण टंगे हुए थे, वे वहां नहीं थे। वहां गालियां किसी धागे में गूंथकर टंगी हुई थीं। डेविड ने सिलबट्टे के बीच रखकर डिंपा की मां को पीस दिया था। उससे जो रस निकला था, उसकी अल्पना बनाकर उसने द्वार की सजावट की थी। जो रस बच गया था, उसे कॉलोनी की तरह उलीच दिया था। 

पीछे दूसरे कमरे के दरवाज़े के पास खड़ा डिंपा रो रहा था। वह बुरी तरह डरा हुआ था। वह किसी श्मशान में पड़ी थी। आसपास दुखी पिशाचिनियों की सिसकियां थीं बस, जो कानों तक आने से पहले मद्धम हो जाती थीं। 

(कहानी साहिब है रंगरेज़ से)


Monday, November 29, 2010

उसका आना तय था बहुत पहले से



जब मैं छोटा था, तो सोचता था, बड़ा होकर किताब बनूंगा। लोगों को चींटियों की तरह मारा जा सकता है, एक लेखक को मारना भी मुश्किल नहीं, लेकिन किताबों को नहीं मारा जा सकता। उन्हें नष्ट करने की कितनी भी कोशिश की जाए, यह संभावना हमेशा रहती है कि दुनिया के किसी निर्जन कोने में, किसी लाइब्रेरी के किसी खाने में, उसकी एक प्रति तब भी बची रह जाए।
- अमोस ओज़  (अ टेल ऑफ लव एंड डार्कनेस)



बूढ़े की कहानी-3

पेंसिल उसे परेशान करती है। छीलते-छीलते जब लगता है कि खासी नुकीली हो गई है, ठीक उसी समय जाने क्या हो जाता है कि नोंक टूट जाती है और शार्पनर में अटक जाती है। किसी तरह ठोंक-ठाककर वह नोंक निकालता है और पेंसिल को नए सिरे से छीलना शुरू करता है।

दीवार के सहारे पीठ टिकाकर अधलेटे बसरमल की जांघों पर ड्राइंग बुक है। बूढ़े और कांपते हाथों से वह उस पर पेंसिल बिछा देता है। आड़ा-तिरछा हिलाकर कुछ लकीरें बनाता है।

मंगण मां धीमे कदमों से बाहर आती है। उसके हाथ में पानी से भरा मग्गा है, जो छलक रहा है और दूसरे हाथ में प्लास्टिक का गुड्डा है। मग्गे के पानी में साबुन का झाग है। गुड्डे को पानी में डाल, तल्लीनता से उंगलियों से रगड़-रगड़कर उसे धो रही है।

बसरमल कुर्सी पर बैठी मंगण मां की तस्वीर बनाने लगता है। सबसे पहले कुर्सी की पीठ बनाता है। फिर उस पर टिकी हुई मंगण मां की पीठ। फिर कुर्सी की सीट बनाता है। फिर उससे सटी हुई मंगण मां की सलवार। फिर सलवार से बाहर निकले उसके पैर।

एक आकृति-सी बन गई है। सलवार को देखकर लग रहा है कि यह मंगण मां है। बस, इससे ज़्यादा नहीं बनाना उसे। पता नहीं, कितने साल पहले, उसने मंगण मां से कहा था, ‘यह समझ में आ जाए कि आप क्या सोच रहे हैं और क्या बनाना चाहते हैं, तो उसके बाद नहीं बनाना चाहिए।’

याद नहीं, उस समय मंगण मां ने क्या कहा था।

वह फिर वही बात उससे कहता है। उसका गुड्डा पानी में डूबा हुआ है। उसकी उंगलियां भी वहीं पर है। वह पानी में ही हाथ डाले-डाले उसकी ओर देखती है। इस तरह, जैसे सुन ना पाई हो। वह अपनी बात दुहराता है। मंगण मां का चेहरा फिर वैसा ही है। जैसे चाहती हो, एक बार और कही जाए वही बात, उसी तरह। कुछ पल पहले की तरह, कुछ बरस पहले की तरह।

वह उठकर चली जाती है। भीतर से वाश बेसिन में पानी गिरने की आवाज़ आती है। उसने गुड्डे को अब साफ पानी से धो दिया है।

बसरमल अपनी ड्राइंगबुक के पिछले पन्नों को देखता है। वहां कई पन्नों से मंगण मां नहीं है। उसने बहुत दिनों बाद उसकी देह और आकृति पर पेंसिल फिराई है। वह उस पर आहिस्ता से उंगली फिराता है। याद नहीं, आखिरी बार कब उसने मंगण मां की देह पर उंगलियां फिराई थीं। वह तस्वीर के बगल में सिंधी में लिखता है- 'जालो’। फिर रबर से मिटा देता है। फिर अंग्रेज़ी में लिखता है- 'शी’। फिर उसे भी मिटा देता है। फिर वह अंग्रेज़ी में ही लिखता है- 'मेलन्कली’।

अमरूद की खुशबू पूरे कमरे में फैल जाती है। इतनी बारीक होती है वह खुशबू कि कई बार नाकों की पकड़ में नहीं आती। पर बसरमल उस महक को मीलों दूर से भी पहचान लेता है। वह एक पुराने पन्ने की ओर जाता है। वहां एक पीठ है, और उस पर एक लंबी चोटी लहरा रही है। उसके पीछे एक पन्ने पर किसी बच्चे के पैर हैं और एक फुटबॉल। उसके किनारे लिखा है-

उसका आना तय था बहुत पहले से
वह आज भी इंतज़ार कर रही है

वह उन पैरों के आसपास दो जोड़ी पैर और बनाता है। एक ने पैंट और बूट पहने हैं, दूसरे ने सलवार और चप्पल। फैमिली पूरी हुई।

मंगण मां भीतर से लंबी पाइप लेकर निकली। रबर की पीली पाइप, जो करीब चालीस फुट की होगी। उसने उसका एक सिरा वॉश बेसिन के नल में लगाया है और दूसरा सिरा पकड़कर खींच रही है। वह उसे बाहर लेकर जाएगी। सामने की सड़क धोएगी।

'सड़क को क्यों धोना भई? वैसे ही वहां से पब्लिक निकलती है।’

मंगण मां फिर बसरमल की तरफ उसी तरह देखती है, जैसे सुनी हुई बात को एक बार और सुनने की इच्छा हो। कमर झुकाए धीरे-धीरे बाहर निकल जाती है।

बसरमल ड्राइंग की किताब में और पीछे जाता है। वहां एक खिड़की बनी है। जैसे पूरा पन्ना एक दीवार हो और उस पर एक खिड़की। अधूरी-सी। उसमें एक ही पल्ला है। दूसरा कहीं गिर गया या बनाया नहीं गया। खिड़की पर जाली है, जिस पर बड़े-बड़े फूल बने हैं। वह जाली के बीच बची सफेद जगह पर तिरछी पेंसिल से पतली-पतली लकीरें भरने लगता है। थोड़ी देर बाद एक पन्ने पर जाकर रुक जाता है। वहां किताबों की रैक है, जिसमें किताबें नहीं हैं। वे नीचे फर्श पर बिखरी हुई हैं। उसके किनारे लिखा है,

एक डॉट यानी फुल स्टॉप
तीन बार डॉट डॉट डॉट यानी
चीज़ें अभी खत्म नहीं हुईं
जिंदगी जारी है

किताबों की बगल में वह एक बोरी बनाता है। उसकी बगल में एक और बोरी। फिर एक और। फिर एक कुदाल। फिर कुछ ईंटें। ईंटें, ईंटों जैसी नहीं दिखतीं। वह उन्हें मिटा देता है। फिर वह बोरियों को मिटा देता है। फिर कुदाल को। फिर रैक को। फिर किताबों को। वह सब कुछ मिटा देता है। पूरे पन्ने को फिर से सादा बना देता है।

दराज़ से वह नया इरेज़र निकालता है और पूरी ड्राइंग बुक को सादा करने पर जुट जाता है।

उसे नहीं याद, यह आदत उसमें कब और क्यों आई। वह एक ड्राइंग बुक लेता है, उसमें कुछ समय तक तस्वीरें बनाता है और कुछ समय बाद सबको मिटा देता है। फिर उन्हीं पन्नों पर कुछ और बनाता है। तब तक, जब तक कि वे पन्ने इस लायक बचे रहें।

वह एक पेंसिल बन जाना चाहता है, ताकि इस दुनिया की आकृति में कुछ ज़रूरी रेखाएं जोड़ दे।

वह एक इरेज़र बन जाना चाहता है, ताकि इस दुनिया की आकृति से कुछ फालतू रेखाएं मिटा दे।

या एक खिड़की। या एक गेंद। या एक बच्चा। या एक स्त्री। वह बसरमल बनना छोड़ बाकी कुछ भी बन जाना चाहता है।

बाहर आकर मंगण मां के पास बैठ जाता है। वह पानी के फव्वारा से सड़क धो रही है। उसकी धोई हुई सड़क से फटफट करती एक मोटरसाइकल गुज़रती है। मंगण मां बुदबुदाने लगती है। मेहनत का ज़ाया होना उसे बुरा लगता है।

बसरमल कहता है, 'उसका फोन फिर आया था। वही सारी बातें। पर मैं नहीं बेचना चाहता।’

मंगण मां उसकी तरफ नहीं देखती।

वह उसके हाथ से पानी की पाइप ले लेता है और खुद भी वहीं बैठकर सड़क धोने लगता है।

(कहानी सिमसिम का एक अंश)