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Tuesday, April 22, 2008

मैंने हिटलर को मारा था

अभी कुछ दिनों पहले मंगलेश डबराल जी से बात हो रही थी, तो अचानक पोलिश कवि एडम ज़गायेव्स्की का जि़क्र हो आया। तब से ज़गायेव्स्की ‍की कविताएं ज़ेहन में आ रही थीं। दरअसल, मंगलेश जी हर साल नीदरलैंड में होने वाले रॉटरडम कविता महोत्सव में इस साल भारत की ओर से जाने वाले हैं। ज़गायेव्स्की वहां पोलैंड का प्रतिनिधित्व करेंगे। मैंने उन्हें बताया कि ज़गायेव्स्की मेरे प्रिय कवि हैं। उन्होंने भी यही बात कही. और तब हमने टेलीफोन पर ही इस कविता को याद किया. यह ज़गायेव्स्की के शुरुआती दिनों की कविता है, जब वह बहुत तीखे तेवर वाले कवि थे। वह अब दर्शन की ओर मुड़ गए हैं।

ख़ैर, यह कविता पढ़ें। इसके कई पाठ हैं। यह साधारण को असाधारण तरीक़े से व्यक्त करती है. बुराई को समाप्त करने के पॉपुलर तरीक़े को ख़ारिज करती हुई. और ऐसे समय में तो इसे पढ़ना और भी ज़रूरी है, जब सभ्यता, संस्कृति और मनुष्यता पर हिटलर से ज़्यादा बारीक हमले हो रहे हों. जब तानाशाह और अत्याचारी के पास अपनी कोई शक्ल न हो और वह हर पड़ोसी की शक्ल में आपके सामने हो, अभेद्य कुटिल मुस्कान के साथ स्वागत करता हुआ. व्यक्ति और प्रवृत्ति के बीच की कुटिलताओं का फ़र्क़ बताता हुआ.
आप पढ़ें और इसका विश्लेषण ख़ुद ही करें। यह ज़गायेव्स्की के कविता संग्रह 'सेलेक्टेड पोएम्स' से ली गई है.

मैंने हिटलर को मारा था

अब तो काफ़ी समय गुज़र गया : मैं अब बूढ़ा हो गया हूं। मुझे बता देना चाहिए कि 1937 की गर्मियों में हेस्से नाम के छोटे से क़स्बे में क्या हुआ था। मैंने हिटलर का क़त्ल कर दिया था.

मैं एक डच हूं, बुकबाइंडर, कुछ बरसों से रिटायर। तीस की उम्र में मैं उस समय की त्रासद यूरोपीय राजनीति में गहरी दिलचस्पी रखता था। लेकिन मेरी पत्नी यहूदी थी और राजनीति में मेरी दिलचस्पी बहुत अकादमिक कि़स्म की नहीं थी। मैंने तय किया कि हिटलर का सफ़ाया मैं ही करूंगा, किसी निशानची के सधे निशाने के साथ, उसी तरह जैसे किसी किताब को किया जाता है बाइंड। और मैंने किया भी।

मुझे पता था कि हिटलर गर्मियों में अपने एक छोटे-से झुंड के साथ तफ़रीह करना पसंद करता है, ख़ासकर बिना सुरक्षाकर्मियों के, और फिर वह छोटे-छोटे गांवों में रुकता है, ख़ासकर पेड़ों की छांव में बने खुले रेस्तराओं में। ज़्यादा गहराई में क्या जाना। मैं सिर्फ़ इतना कहूंगा कि मैंने उसे गोली मार दी और वहां से भागने में कामयाब रहा।

वह उमस-भरा रविवार था, तूफ़ान आधे रास्ते में था और मधुमक्खियां लड़खड़ाते भटक रही थीं, जैसे उन्होंने पी रखी हो.

विशाल पेड़ों के नीचे ढंका-तुपा था रेस्तरां। ज़मीन को गिट्टियों-कंकड़ों से ढांप रखा गया था।

लगभग अंधेरा हो चुका था, और माहौल इतना उनींदा और बोझिल था कि ट्रिगर दबाने में भी काफ़ी मशक़्क़त करनी पड़ी। शराब की एक बोतल लुढ़क गई थी और सफ़ेद काग़ज़ के मेज़पोश पर ख़ून का लाल धब्बा फैल रहा था।

उसके बाद मैं अपनी छोटी-सी कार में किसी हैवान की तरह भागा। हालांकि मेरे पीछे कोई नहीं पड़ा था। अब तक तूफ़ान आ चुका था, तेज़ बरसात होने लगी।

रास्ते में पड़ी कंटीली झाडि़यों में मैंने अपनी बंदूक़ फेंक दी। मैंने दो बगुलों को भी मारके बहा दिया, जो छोटे-छोटे क़दमों से भाग रहे थे, अजीब तरीक़े से। ज़्यादा तफ़्सील में क्यों जाना?

मैं विजयी होकर घर लौटा। मैंने विग को फाड़कर फेंक दिया, अपने कपड़ों को जला दिया, अपनी कार धो डाली।

और यह सब कुछ बिना मतलब के, क्योंकि अगली सुबह कोई दूसरा, हूबहू उसके जैसा, नखशिख वैसा ही, उसकी जगह बैठ गया, जो शायद उससे भी ज़्यादा क्रूर था, जिसे मैं मार आया था।

अख़बारों ने कभी उस क़त्ल का जि़क्र तक नहीं किया। एक आदमी साफ़ हो गया था, दूसरा प्रकट हो गया था।

उस दिन बादल पूरी तरह काले थे, खांड की तरह चिपचिपे।
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