Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Thursday, June 28, 2012

निशास्‍वर



जाग, दो निद्राओं के बीच का पुल है, जिस पर मैं किसी थके हुए बूढ़े की तरह छड़ी टेकता गुज़र जाता हूं. दिन की किसी ऊंघ में जब यह पुल कमज़ोर होता है, मैं छड़ी की हर थाप पर अपने क़दम रखता हूं. आवाज़ पायदान होती है. पदचाप की ध्‍वनि पैरों के होंठों से निकली सीटी है.

दिन कुछ कंकड़ों की तरह आते हैं. उनका आकार तय नहीं होता. कई बार इतनी दूर बैठकर मैं अपने दिनों को देखता हूं कि भारी चट्टान-से एक दिन को कंकड़ मानने की भूल कर बैठता हूं.

चट्टान की चोट को कितना भी दूर खड़े होकर देखो, कंकड़ की चोट जैसी नहीं दिखेगी. ध्‍यान रखना कि

छल जिन लोगों का बल है, उनकी पेशानी पर ठंडे पानी की पट्टियां रखना. वहां मेरे नाम के बल बुख़ार की तरह पड़ते हैं.

तुम्‍हारा चेहरा जब-जब भी मैं हथेली में थामता हूं, मुझे लगता है, मैं अपनी सारी स्‍मृतियों को अपने प्रेम की अर्घ्‍य दे रहा. तुम मेरे आंसुओं से आचमन करती हो. खिलखिलाते हुए पानी का प्रदेश बन जाती हो.

सारी रात मैं अंधेरे के सिरहाने बैठता हूं और सीली माचिसों को कोसता हूं. इस समय दिन अतीत है. सूरज अतीत की उपस्थिति था. गर्मी अतीत की एक घटना. इस समय इस कमरे में जितनी भी उमस है, वह अतीत की उमस है.

जबकि दिन मैंने अतीत में जाकर नहीं गुज़ारा था.

किसी ने पूछा था, तुम गुनहगार हो, जो तुम्‍हें नींद नहीं आती? गुनहगारों को जागती हुई रातें मिलें, यह उनका अव्‍वल नसीब होगा. जो मुतमईन सोते हैं, वे भी बेगुनाह नहीं हैं.

आंसू में नमक हो न हो, नहीं पता, उनमें गोंद ज़रूर होती है. वह अपनी जीभ की गरम नोंक पर रोपती थी मेरा हर आंसू और आसमान में सितारा बनाकर चिपका देती थी. सितारे टिमटिमाते हैं, क्‍योंकि वे मुझसे नज़रें नहीं मिला पाते. मुझे हर सितारे की कहानी पता है.

चौंधियाना, दृश्‍य को भंग करना है.

छोटे बादलों की ये क़तारें आसमान में पड़ी सिलवटें हैं. मेरी रातें गठरी से बाहर निकले कपड़ों की तरह मुड़ी-तुड़ी हैं. उमस का पसीना श्रम का मख़ौल है.

आत्‍मा इस देह के भीतर उतनी ही अजनबी है
जैसे बड़े शहर के बड़े बाज़ार की बड़ी भीड़ के बीच अजनबी हूं मैं

सुनो, तुम थोड़ा ज़ोर से गाया करो
झींगुर मेरी रातों को धीरे-धीरे कुतर रहे हैं

काजल आंख का सपना है. तुम्‍हारी बाईं आंख से थोड़ा काजल जो फैल गया है, तुम उसकी फि़क्र कभी मत करना. सपनों की कालकोठरी से भला कोई बेदाग़ निकला है?

* * *

एक अनाम रात, जिससे चांद की कलाएं भी नितांत अपरिचित हैं, जिसे पड़ोसन रातें भी नहीं पहचानतीं, रोज़मर्रा की रातों के गुच्‍छे में अचानक उग आई. उस रात के अभिवादन में बुनी गई शब्‍दों की एक देह. साथ लगी पेंटिंग सिद्धार्थ की है. 


Saturday, June 9, 2012

मंत्रोच्‍चार






तुम्‍हारा नाम तुम्‍हारी उपस्थिति के पाठ का शीर्षक है

नींद के पहले स्‍वप्‍न होते हैं
सो जाने के बाद किसी स्‍वप्‍न का कोई अर्थ नहीं
हमारे भीतर का अंधेरा हमारी कंखौरी तले चिपका होता है
किसी-किसी रात हम जुगनू भी नहीं होते

फाउंटेन पेन को मैं साध नहीं पाता
दस मिनट खुला रख दो तो सूख जाती है स्‍याही
मित्रों जैसी एक निब सूखकर शत्रुओं की तरह काग़ज़ से रगड़ खाती
थोड़ा ज़ोर से हिल जाए अगर जेब के ही भीतर
तो वैसे ही छलकती
जैसे कड़वी रातों को तुम्‍हारे आंसू छलके थे

कोई कपड़ा देह को दाग़ से नहीं बचा पाता
कोई देह आत्‍मा को खुरच से नहीं बचा पाती

इससे बुरा क्‍या
अगर आंख की पुतली ही आंख की किरकिरी बन जाए
कुछ नदियां ताउम्र ज़मीन के नीचे ही बहती हैं

तुममें विसर्जन तुम्‍हारा सर्जन है

तुम पूरी थी तुममें से टूटकर निकला मैं
मैं भी पूरा हूं बिल्‍कुल अधूरा नहीं
देखो, टूटने से भी पूरा हो सकते हैं हम

हम हमेशा उसी से प्रेम करते हैं
हम जिसके बस के नहीं होते

शालीनता अतिभंगुर है
नूह, अपनी नौका में तुम रोज़ उसे रखना

दुख का शौर्य रणभूमि से बाहर खड़ा होता है

घास दृश्‍य पर टंका हरा फुटनोट है
अनुपस्थिति जीवन में घास की तरह उगती है असीमित

नये निष्‍कर्षों को पुराने ब्रह्मसत्‍यों में सीमित कर देना
यात्राओं की सरासर अवहेलना है
फूहड़ मंत्रोच्‍चार है


(बीते दिनों की कविता. साथ लगी पेंटिंग वीएस गायतोंडे की है.)


Friday, March 16, 2012

आंसू चांद की आंखों से नहीं, उसके थन से निकलते हैं दूध बनकर



Iwona Siwek-Front, Polish Artist.



मछली होना दुखद है
गहरे तैरती है फिर भी थाह नहीं पाती

पेड़ को अदृश्‍य हवा हिला देती है
मेरे हाथ नहीं हिला पाते

अथाह और अदृश्‍य में दुख की आपूर्ति है

मैं यहां नहीं होता तो सड़क का एक लैंप पोस्‍ट होता
मेरी आत्‍मा अगर मुझमें नहीं होती
तो जंगल के बहुत भीतर अकेले गिरता झरना होती

बारिश मुझसे ज़्यादा मेरी छतरियों को भाती है
पैदल चलना नृत्‍य की कामना है

छोटा ईश्‍वर दिन में सोता है
सारी रात ति‍तलियों का पीछा करता है

*  *  *

अतीत मातृभूमि है
वर्तमान मेरा निर्वासन
कोई सड़क कोई हवा मेरी मातृभूमि तक नहीं जाती
मैं अनजानी जगहों पर रहता है
श्रेष्‍ठतम रहस्‍य अपनी मासूम दृष्टि से मेरी पीठ पर घावों की भुलभुलैया रचते हैं

तुम्‍हारे जितने अंग मैं देखूंगा
उतनी कोमलता उनमें बरक़रार रहेगी
मेरी दृष्टि गीला उबटन है

जुलाई की बारिश मेरी नींद की गंगा है

पुरानी फ़र्शों पर पड़ी दरारें उनकी प्रतीक्षा हैं
जिन्‍होंने नयेपन में उनसे प्रेम किया था

हर दरार के भीतर कम से कम एक अंधेरा रहता है

पेंसिल का छिलका फूल बनने का हुनर है
टूटी हुई नोंक टूटे सितारों की सगेवाली है

छोटा ईश्‍वर हर अंग से बोलता है
उसके होंठ उपजाऊ हैं चुप का बूटा वहीं हरा खिलता है

*  *  *

मृत्‍यु सबसे शक्‍ितशाली चुंबक है
अपनी कार मैं नहीं चलाता
गंतव्‍य उसे अपनी ओर खींच लेता है

पुरानी छत की खपरैल पर तुम्‍हारे साथ बैठा मैं
दूर से तुम्‍हारी ओर झुके गुंबद की तरह दिखता हूं

नीमरोशनी में अधगीली सड़क पर पानी का डबरा
नदी का शोक है
तुम्‍हारे पदचिह्न ईंट हैं जिन्‍हें जोड़कर मैं अपना घर बनाऊंगा

भाषा के भीतर कुछ शब्‍द मुझे बेतहाशा गुदगुदी करते हैं
तुम्‍हारा संगीत हमेशा मेरी त्‍वचा पर बजता है
तुम्‍हारी आवाज़ के अश्‍व पर बैठ मैं रात के गलियारों से गुज़रता हूं

तुम्‍हें जाना हो तो उस तरह जाना
जैसे गहरी नींद में देह से प्राण जाता है
मौत के बाद भी थिरकती मुस्‍कान शव का सुहाग है

छोटा ईश्‍वर ताउम्र जीने का स्‍वांग करेगा
उम्र के बाद वह तुम्‍हारी गोद में खेला करेगा

*  * *

इमारतें शहरों की उदासी हैं
मैं इस शहर की सबसे ऊंची इमारत की छत पर टहलता हूं
आंसू चांद की आंखों से नहीं, उसके थन से निकलते हैं दूध बनकर
रात का उज्‍ज्‍वल रुदन है चांदनी

धरती और आकाश के बीच बिजली के तार भी रहते हैं

उबलते पानी के भीतर गले रहे चीनी के दाने त्‍वचा की तरह दिखते हैं
बालाखिल्‍य की तरह मैं अपनी भाषा से उल्‍टा लटका हूं
मेरी उम्‍मीदें गमले में उगे जंगल की तरह थीं
मिट्टी में जड़ की तरह धंसा मैं तुममें
जड़ होकर भी मैं चेतन था
इसीलिए चौराहों पर तुम्‍हें दिशाभ्रम होना था

ढलान पर खिला जंगली गुलाब अपने कांटों के बीच कांपता है
मेरी आत्‍मा कांपती है झुटपुटे में प्रकाश की तरह
कुछ दृश्‍यों को मैं सुंदर-सा नहीं बना पाता
चित्रकला की कक्षा में मैं बहुधा अनुपस्थित रहा

अकूत और अबूझ में पीड़ा का बहनापा है

घाव लगने पर छोटा ईश्‍वर सिगरेट सुलगाता है
अ-घाव के दिनों में कंकड़ों का चूरा बना पानी में बहाता है.


*  *  *

('छोटा ईश्‍वर' सीरिज़ की ये कविताएं नीत्‍शे के प्रति मेरा आदर है. आदर अनंत है. सीरिज़ अनादि है.
साथ में लगी पेंटिंग मेरी प्रिय पोलिश चित्रकार इवोना सिवेक-फ्रंट Iwona Siwek-Front की है.) 

Wednesday, March 7, 2012

तुम्हारा नाम उच्चारना तुम्हें हमेशा के लिए त्याग देना है





बेई दाओ मेरे प्रिय कवि हैं. 1989 में चीन से निर्वासित होने के बाद दुनिया के कई हिस्‍सों में रह-भटक कर कविता करने वाले बेई दाओ अब हांगकांग में रहते हैं और कविता के भीतर अपनी आत्‍मा की कैलीग्राफ़ी करते हैं. पहली नज़र में गूढ़ लगने वाले बेई दाओ को राजनीतिक कवि माना जाता है. पिछले कुछ बरसों से नोबेल पुरस्‍कार के दावेदार हैं, इस क़दर, जो कि उनके क़रीबी दोस्‍त बताते हैं, कि हर साल नोबेल की घोषणा के आसपास वह अपना फ़ोन बंद कर देते हैं, क्‍योंकि घोषणा से पहले यार-दोस्‍त-मीडियावाले-मुंहलगे पाठकगण इस तरह का फ़ोन कर-करके परेशान कर देते हैं कि देखना, इस बार तुम्‍हें ही मिलेगा. फिर घोषणा के बाद यह कह-कहकर कि अरे, इस बार भी नहीं. अगली बार तो पक्‍का मिलेगा, यक़ीन है. अकेला रहने वाला कवि ऐसे फोन कॉल्‍स से घबरा जाता है.

लेकिन अपने आप में यही एक बड़ा उदाहरण है कि उनके पाठकों को उन पर और उनकी कविता पर कितना यक़ीन है.

मैंने बेई दाओ की 36 कविताओं का हिंदी अनुवाद किया है. साथ में एक विस्‍तृत लेख भी है उन पर, और कविता के उपकरणों पर. सबद पर 'सबद पुस्तिका 7' के रूप में प्रकाशित हुआ है. नीचे दिए लिंक पर जाइए, कविताएं पढि़ए. एक विराट कवि के वैभव को देखिए.

हर बार की तरह यह सबद पुस्तिका भी पीडीएफ़ फॉर्मेट में डाउनलोड करने के लिए उपलब्‍ध्‍ा है. नीचे दिए 'सबद' के लिंक पर जाने के बाद 48 पेज की इस पुस्तिका को आप डाउनलोड कर सकते हैं, प्रिंट निकालकर पढ़ सकते हैं, और फ़ाइल में सुरक्षित रख सकते हैं.



नमक
(चिन सान लान्ग के साल्टवर्क नामक फोटोग्राफ़ को देखने के बाद)


निगेटिव पर काली रात का कोयला
लोगों के रोज़मर्रा के नमक में तब्दील हो जाता है
एक चिडिय़ा नई ऊंचाइयों को छूती है
छत पर लगे पैबंद
पृथ्वी को ज़्यादा दुरुस्त बनाते हैं

धुआं पेड़ों से भी ज़्यादा ऊंचाई पर पहुंचता है
यह जड़ों की स्मृति से निकलता है
भारी बर्फ़बारी की नक़ल करता हुआ
समय अपनी अमीरी का प्रदर्शन करता है
रोज़गार के अंधे कुएं
सुबह के दुख पर छलक-छलक जाते हैं

कांपती हुई चहारदीवारी पर चलती हुई शराबी हवा
सड़क पर गिर जाती है
कोहरे के भीतर कोई घंटी गूंजती है -
ऐसे कि बस धड़कता रह जाता है काग़ज़ का हृदय*


शीर्षकहीन-2

दुर्घटनाओं से भी ज़्यादा अपरिचित
मलबों से भी ज़्यादा संपूर्ण

तुम्हारा नाम उच्चारना
तुम्हें हमेशा के लिए त्याग देना है

यौवन के कीचड़ पीछे छूट गए हैं
घड़ी के भीतर कहीं
*

बेई दाओ 


Saturday, January 7, 2012

इन दिनों





पिछले दिनों कुछ कविताएं हुई हैं. 2010 में 'उभयचर' के बाद मैंने कोई कविता नहीं लिखी थी. 2011 के मध्‍य और आखि़री महीनों में  कुछ हुई हैं. अगस्‍त में जो कुछ लिखा गया था, उनमें से कुछ सबद पर आया था, कुछ -लोकमत' और 'नवभारत टाइम्‍स' के दिवाली विशेषांकों में.

बीते दिनों जो कविताएं हुईं, उनमें से कुछ 'समालोचन' पर प्रका‍शित हैं. नीचे दिए गए लिंक पर जाकर वे कविताएं पढ़ी जा सकती हैं.

समालोचन - पांच नई कविताएं - गीत चतुर्वेदी



Wednesday, December 21, 2011

आषाढ़ पानी का घूंट है






तुम्‍हारी परछाईं पर गिरती रहीं बारिश की बूंदें

मेरी देह बजती रही जैसे तुम्‍हारे मकान की टीन
अडोल है मन की बीन

झरती बूंदों का घूंघट था तुम्‍हारे और मेरे बीच
तुम्‍हारा निचला होंठ पल-भर को थरथराया था

तुमने पेड़ पर निशान बनाया
फिर ठीक वहीं एक चोट दाग़ी
प्रेम में निशानचियों का हुनर पैबस्‍त था

तुमने कहा प्रेम करना अभ्‍यास है
मैंने सारी शिकायतें अरब सागर में बहा दीं

धरती को हिचकी आती है
जल से भरा लोटा है आकाश
वह एक-एक कर सारे नाम लेती है
मुझे भूल जाती है
मैं इतना पास था कि कोई यक़ीन ही नहीं कर सकता
जो इतना पास हो वह भी याद कर सकता है

स्‍वांग किसी अंग का नाम नहीं

आषाढ़ पानी का घूंट है
छाती में उगा ठसका है पूस.



Sunday, October 2, 2011

समकोण : एक नई कविता





आना इमेस, स्‍पैनिश फोटोग्राफर की एक छवि, अनवर्सो


मैं अवलंब था तुम्‍हारा ऐसे ही खड़ा होता तुम पर जैसे समकोण
तुम जगह थी छूट जाए जो तो अधर का अभिशाप है
मेरी मृत्‍यु के बाद भी बने रहना मेरे जीवन में
बही हुई मेरी अस्थियों में स्‍मृतिपुष्‍पों की तरह उगना और नदियों के पानी को सुव‍ासित कर देना
खंभे के नीचे बिछी घास में पाषाणयुगीन अंधड़ों से बनी झुक अब भी बची है जैसे
मोत्‍सार्ट की सिंफनी आइंस्‍टीन की खोज की तरह
सेब तोड़ने बढ़े आदम की देह की उचक की तरह न्‍यूटन के गिरते सेब की तरह
जिस सितारे से प्रेम किया था वर:मिहिर ने और आकलन के कलह में
उसके वास्‍ते एक सटीक नाम न खोज पाया था उसकी तरह
चले जाने के बाद भी चलते ही जाना
ईश्‍वर ने तुम्‍हें मेरी पसलियों से बनाया था
तुम जब भी खिसियाती थीं अवलंबित तुम पर इस आत्‍मा को नोंचती थीं
इस पर तुम्‍हारे नाख़ूनों की खुरच के लंबवत निशान हैं
मेरी आंखों के भीतर रहती हैं तुम्‍हारे साथ बीतीं अनगिन रातें
एक दिन तुमने मुझे ढूंढ़ा ताकि मैं लापता हो जाऊं
तुम वेग हो गांगेय और मैं भी
उतना ही जटिल हूं जितना शिव की जटा
तुम्‍हें थामा, रोपा और धार के पौधे की तरह अपने मस्‍तक पर उगाया
जितना प्रहारोगी मुझे उतना ही खोओगी वेग तुम अपना
बूंद-बूंद धारा-धारा विखंडित हो विसर्जित होगी तुम मुझमें
कितना भी सहेजूं एक दिन तुम्‍हें मैदानों की तरफ़ जाना ही था
जब तक नहीं जाना था तुम्‍हें तुम्‍हारी ओर बहा था महानद की तरह
जैसे ही जाना तुरत कतराया
अबोध दिवसों में ही क्‍यों होता है आनंद का अतुल्‍य खुशी का भंडार
एक दिन एक काग़ज़ पर लिखा -- जान चुका
आईने में उसका प्रतिबिंब बना  -- चुक जाना.



Saturday, February 26, 2011

अलौट व अन्‍य कविता






Photo- Ana Himes

अलौट

अब कभी तुम उतनी मासूम नहीं दिख सकोगी, जितनी पंद्रह साल पहले की एक तस्‍वीर में
हमारे चेहरे की, और दिल की भी, मासूमियत सुखा देने के लिए कम नहीं होता एक पल भी
परिभाषा बदलकर सुंदरता को फिर पाया जा सकता है
मासूमियत को तो किसी पड़ोसी समार्थी तक से भय नहीं होता
इतनी निश्चिंत होती है कि जानती है जाने के बाद लौटकर आना नहीं इस देस


अस्थिरता की आराधना

जिस वक़्त वह जा रही थी, मैं अपनी टेबल पर बैठा एक कविता में खोया हुआ था। अभी-अभी मैं जिन सारी अस्थिरताओं से गुज़रा हूं, उन्हें इस कविता में पकड़ लेना चाहता हूं, इससे पहले कि वे सब उड़ जाएं। ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ है। सोचता हूं कि इसे याद रखूंगा, स्थिर होते ही यह सब लिख डालूंगा। वे सारी स्मृतियां अस्थिरता की होती हैं। और उन्हें अभिशाप है कि स्थिर होते ही वे कपूर की तरह उड़ जाती हैं। सो, जब भी मैं उन्हें लिखने बैठता, वे खो चुकी होतीं। 

अब मैंने स्थिरता की प्रतीक्षा बंद कर दी है। मैं अस्थिरता की आराधना में डूब जाता हूं। पता नहीं, वह कौन-सा शब्द था, जिसे मैं लिख रहा था, तभी उसने कहा, 

मेरे कवि प्रेमी, एक दिन मैं तुम्हारी एक कविता बन जाऊंगी, तुम्हें हज़ार किस्म की दिक़्क़तों में डालूंगी, तुम तड़पकर उसे लिखोगे, और उस दिन तुम्हें मेरी क़ीमत का अहसास होगा।

जब वह दरवाज़े से बाहर निकल रही थी, मैं उसी तरह बेचैन हो रहा था, जैसे स्थिर क्षणों के बीच अस्थिर स्मृतियों के खो जाने और उन्हें काग़ज़ पर न लिख पाने के अफ़सोस के बीच बेचैन रहता था।


Sunday, January 2, 2011

पांच कविताएं

Tracy Emin - My Bed
अधिकार से असुरक्षा आती है और असुरक्षा एक राजनीतिक औजार होती है

हर पलंग के पास एक बुरा सपना होता है। कमर टिकाते ही जकड़ ले।

हर घर में कुछ बूढ़ी रूहें होती हैं, जो नींद या जाग में, सफ़ेद साड़ी पहने इस कोने से उस कोने तक जाती दिख जाती हैं। रात को जब दरवाज़ों की किर्र-किर्र आठवें सुर की तरह रहस्यमयी लगती है, तभी किचन में गिरी कॉफ़ी की बोतल उठाने में अचानक पीठ पर वे आ लदती हैं। अकबकाकर पीछे मुड़ने पर दीवार में जाकर खोता एक लंबा ख़ालीपन नज़र आता है, जिसे सांस की हवा भर देती है।

हर नींद में एक ग़फ़लत होती है और हर ग़फ़लत अपने साथ एक विशेष कि़स्म का भय ले आती है।

सपना चाहे जैसा भी हो, सच होने का बीज भी उसमें छिपा होता है। (या नींद की ग़फ़लत का एक और भय है यह।) शायद इसी कारण पलंग पर चित पड़े पैर अचानक हिलता है और लगता है, एक अछोर खाई में गिर रहे हैं। बेनियाज़ी में पैर की पोजीशन बदल जाती है।

एक कामयाब नींद क्‍या होती है? उसमें प्रवेश कर लेना या उसमें से सही-सलामत निकल आना? मेरी जाग क्‍या है? उसमें से सही-सलामत निकल नींद में पहुंच जाने की क्‍या गारंटी?

सच कहूं, मुझे लगता है कि मेरी जाग एक नियंत्रित नींद है।

बीते कई दिनों का फ़साना है। जागते हुए भी लगता है, सो रहा हूं और सोने जाता हूं, तो लगता है, नींद दुनिया की सबसे निरर्थक चीज़ है। अगर नींद नाम की यह चीज़ मेरे दफ़्तर में काम कर रही होती, तो अब तक मैं इसकी छंटनी कर चुका होता।
*** 



प्रसन्न रहना इच्छा से ज़्यादा मौक़ापरस्ती है

यह जीवन ऐसा है, जहां आप निरंतर एक भय में रहते हैं। भय यह कि जाने किस पल, किस तरीक़े आपका अपमान हो जाए। आप जीत की ख़ुशी में बल्लियों उछल रहे हों और अचानक बता दिया जाए कि आप जीते नहीं, बल्कि हारे हुए हैं।

उस जीवन को धिक्‍कारना ही चाहिए, जो हार और जीत जैसे दो ध्रुवों के बीच झूलता हो।

हार और जीत का फ़लसफ़ा सत्‍ताओं ने अपने फ़ायदे के लिए बनाया था। हम जो इस धरती का जल हैं, सिर्फ़ पिये जाने या उलीच दिए जाने के लिए यहां आते हैं।

फिर भी मैं अपनी कामयाबियों पर इतराता फिरा। मैंने रातों की नींद और दिन का श्रम उन्हें दिया। अपने दिमाग़ के सुंदरतम विचार उन्हें सौंप दिए। अपनी त्वचा के छिलके निकालकर उनके लिए ग़लीचे बनाए। जब मैं यह सब करता, वे तालियां बजाते, जिनसे मैं ख़ुश होता था।

कुछ समय बाद वे मेरी नींद मुझे लौटा देते। मैं पाता, एक पवित्र नींद जब उनके पास से वापस लौटती, उसके पंख नुंचे हुए होते। वह नींद किसी भी उड़ान की संभावना से निरस्त और निराश होती। जब मेरा श्रम लौटकर आता, वह मधुमक्खियों के चुसे हुए छत्‍तों की तरह दिखता। वे मेरे विचारों को भी लौटा देते, तब मैं सोचा करता कि क्‍या ये मेरे ही विचार हैं? मैं धूर्त, मक्‍कार और सयाना नहीं था। अचरज है कि जब मैं बोलने खड़ा होता, मुझे इन्हीं में से एक मान लिया जाता।

एक दिन उन्होंने मेरी त्वचा के छिलके भी लौटा दिए। वे मेरी त्वचा की तरह नहीं थे। उनमें मेरी कोशिकाओं का मानचित्र नहीं था। किसी दरी की तरह भी नहीं कि घर बिछा लेता। वह पता नहीं, क्‍या थी।

मैं सीधे को सीधा और टेढ़े को टेढ़ा कहना चाहता था, पर मेरी दराज़ में इ€कीसवीं सदी के बेस्टसेलर लेखकों की किताबें न जाने किसने डाल दी थीं। उनमें हर टेढ़े को सीधा जानने का हुनर था।

वे कभी किसी को मृत्युदंड नहीं देते, डांट भी नहीं लगाते, बस, उसकी नींद छीन लेते हैं। मैं अनुभव से बताऊं, यह मृत्यु से भी भयावह होता है। जिन व्यक्तियों, संस्कृतियों और देशों को नींद नहीं आती, वे अपना मूल खो देने को अभिशप्‍त हो जाते हैं।

मैं इन सबसे ख़ाइफ़ हूं। बिल्कुल कांपता हुआ-सा।

मैं कमरे में छोटे बच्चे के साथ खेलता हूं। सड़क पर सुंदर स्त्रियों को देख मुस्कराता हूं। पार्क में फुटबॉल से खेलते वृद्ध दंपति को देख ख़ुश होता हूं। मैं पेड़ों और घास को देख प्रकृति की उदारता महसूस करता हूं। पर अचानक मुझे यह दुनिया दिख जाती है, जहां हर सुंदरता के पीछे मुस्कराती हुई बदबू है। किसी अंडर-वर्ल्‍ड की तरह। मैं सकपकाकर वापस अपने भीतर घुस जाता हूं। हैरान गौरैया की तरह गर्दन टेढ़ी कर चारों ओर चकबक देखता हूं।

मैं प्रसन्न रहना चाहता हूं, पर पाता हूं, ज़्यादातर समय सिर्फ़ सन्न हूं।
***



Gillian Wearing - Lily
भ्रम कोई मनोदशा नहीं, एक राजनीतिक विचारधारा है, जिसमें पत्थर पर काई की तरह विचार अटके रहते हैं; नहीं मंज़ूर, तो मत मानिए, पर मन तो मत मारिए…

एक क्षण के भीतर न जाने कितने क्षण रहते हैं। परमाणु का विखंडन किया जाए, तो उसमें उससे भी ज़्यादा ताक़तवर, ज़्यादा रहस्यमयी कणों का निवास मिलता है। उनकी गति और दिशा उस परमाणु की चौहद्दी में सीमित रहते हैं, वैसे ही कणों की गति और दिशा भी उसी क्षण की दुनिया में सीमित होती है। उन पर बाहरी क्षणों का दबाव पड़ता हो, लेकिन प्रभाव न पड़ता होगा।

परमाणुओं के टूटने पर विस्फोट होता है। जब एक क्षण टूटता है, तो कोई ध्वनि नहीं होती। उसके बुरादे हवा में उड़ जाते हैं, दूसरे कई क्षणों के साथ संसर्ग करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें कहीं प्रवेश नहीं मिलता।

मुझे लगता है, मैं वह क्षण हूं, जिसे एक सनक गए वैज्ञानिक ने ग़फ़लत में तोड़ दिया। मैं बुरादे में बदल गया और उड़ गया। मैं उन सारे कणों की तलाश में हूं, जिनसे वापस अपना साबुत रूप पा सकूं।

देखिए न, हम सूरज के चारों ओर घूम रहे हैं। घूमते सौरमंडल से बाहर एक मिल्की-वे है, वह भी घूम रही है। उसके पार घूमती हुई आकाशगंगाएं हैं, जो किसी दूसरे आकाशगंगा परिवार का हिस्सा हैं। वह परिवार भी घूम रहा है, लेकिन हमारी तरह उसके पास कोई सूरज नहीं। वे एक अंधेरे के चारों ओर घूम रही हैं।

इस तरह सब कुछ घूम रहा है।

तो हम जो सूरज की परिक्रमा कर प्रकाश का आभार जताते हैं, दरअसल, बृहत्‍तर रूप में अंधेरे की परिक्रमा करते हैं।

और साफ़ बोलूं- मैं जिसकी परिक्रमा करता रहा, वह अंधेरा निकला। मैंने परिक्रमाओं को हमेशा पवित्र माना और उसमें लगने वाले श्रम का सम्‍मान किया। सामाजिक, पारिवारिक, शारीरिक, भावनात्मक या किसी भी कि़स्म का श्रम। प्रेम हो या शत्रुता, सब श्रम के ही पर्यायवाची हैं। एक दिन मैं सारा श्रम उतारकर अलग़नी पर टांग दूंगा और ख़ुद को हवा में एक पंख की तरह छोड़ दूंगा। एक निस्पृह कण की तरह।

एक दिन मैं पाऊंगा कि अंधेरा ही हमारे जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। हमें रोशनी के लिए बाह्य माध्यम की ज़रूरत पड़ती है, अंधेरे के लिए नहीं। प्रकाश संभवत: अंधेरे का सबसे विरल या डाइल्यूटेड रूप है। उसे अत्यधिक सांद्र कर दें, तो वह अंधेरे-सा प्रभाव डालता है। अंधेरा ही हमारी इच्छाओं का सबसे हिंसक और वेगवान उद्भासक है। (इतनी मेहनत से की गई मेरी खोज फिर भी नई कहां होगी?  क्‍या जीवन ही पुराना जीता आया)

हम सब एक अंधेरे से निकलते हैं, दुबारा उसी में प्रविष्ट हो जाने के लिए। क्षण से लघु, लघुतर, लघुतम क्षण होते हुए टूटकर उसके बुरादे में बदल जाते हैं और अपने लिए महज़ एक दरवाज़ा खोजते हैं।

ऐसे में लगता है, भ्रम महज़ मानसिक अवस्था नहीं, एक राजनीतिक विचारधारा होता है।

क्‍या हम श्रम के राग पर भ्रम का गीत गाते हैं?
*** 



Angela Bulloch
संस्कृतियां एक-दूसरे-सी हो जाती हैं, मनुष्य और उनका हाल भी, पर इसका बहुवचन ‘हालात’ बदलता है, तो ‘हालातों’ बनकर अशुद्ध क्‍यों हो जाता है?

पानी बनना सबसे बड़ी चुनौती है। पानी में पैर डालकर बैठना, अपनी ही देह में प्रविष्ट हो कुछ खोजने जैसा है। पानी की मांसपेशियां लहराती हैं, जैसे आत्मा झिलमिलाती है। पानी को भी पानी से ही धोना चाहिए, जैसे एक आत्मा, दूसरी से रगड़ खाती है और सब कुछ स्वच्छ हो जाता है।

हम हमेशा दूसरी आत्मा की तलाश में भटकते हैं और घबराते हैं, कंटीली झाडि़यों की खुरच कहीं दाग़ न बन जाएं। हर दाग़ कुछ बुरी स्मृतियों को जगा देता है। एक दिन हम पाते हैं कि हमारी आत्मा के हर हिस्से पर दाग़ लग गए हैं।

फिर हम तलाश छोड़ देते हैं और समय का इंतज़ार करने लगते हैं। ऐसी ही किसी संधि पर मुझे लगता है, मैं समय को नहीं, समय मुझे गुज़ार रहा है।

मैं जाती हुई कई पीठ देखता हूं, लेकिन कब वह चेहरा थी, कब मुड़ गई, नहीं देख पाया। वे पीठें इतनी तेज़ी से चली गईं कि अभी भी वहीं खड़ी दिखती हैं। मैं उन तक इस तरह जाता हूं कि लगता है, कभी न पहुंचने के लिए ही चल रहा हूं।

मैं उतना ही थमा हूं, जैसे एक प्रार्थना हूं।

मुझसे व्याकरण के स्वर खो गए, व्यंजनों का क्रम बदल गया, एक दिन मेरे शब्‍दों के पास न ध्वनि थी, न अर्थ। जैसे तार पर टंगे कपड़ों से पानी उड़कर कहीं चला गया। भाग्य कि तुम्‍हें पानी का पता मिल गया। मैंने कभी कपड़ों को सूखने नहीं देना था। दुर्भाग्‍य कि मैं जीवन का जल नहीं सहेज पाया।

मैं तुम्‍हें अपना नाम देता हूं और ख़ुद तु्हारा नाम ले लेता हूं। सच बताओ, हमने पहचान खोई या एक-दूसरे को नई पहचान दे दी?

या इन्हीं शब्‍दों में पहचान छीन लेने का दोष भी है?

कभी सोचा है, तब क्‍या होगा, जब चंद्रमा, सूर्य की तरह महसूस करे;  एक सुबह अंतरिक्ष में लटका बुध पाए कि वह शुक्र में तब्‍दील हो गया है;  गुरु जब आईना देखे, तो उसे अपने चारों ओर शनि के वलय दिखें…

मैं अभी-अभी सौरमंडल से लौटा हूं। देख आया हूं कि वहां का हाल ठीक यही है। सब हैरान-हलाकान। और सब ही जानते हैं, इस तरह बदल जाना एक पुरानी इच्छा थी, जो अपने रहस्यमयी विस्तार में

जितना दोष दिखती है,  उतना ही पारितोष।
*** 



Yayoi Kusama -
Ascension of polka dots on the trees
.
युद्ध के लिए किसी कारण की ज़रूरत नहीं होती, लेकिन विनाश हमेशा एक ही कारण से होता है; करुणा, मौज का पर्यायवाची शब्द है या विलोमार्थी?

जो युद्ध में लड़कर दूसरों को मार देते हैं, वे जांबाज़ होते हैं। मारे गयों पर करुणा नहीं, गर्व किया जाता है। मुझे यही सिखाया गया है, चाहे दुनिया के किसी भी हिस्से, किसी भी संस्कृति से पलकर आया होऊं मैं।

मुझे प्रेम विरासत में मिला, यह मेरी मनुष्यता की लाखों वर्ष पुरानी परंपरा है। मैंने अपने देवताओं से छल सीखा, इतिहास से संहार। बादशाहों ने मुझे क्रूरता व घृणा सिखाई और माताओं ने स्नेह। मौक़ा देखकर भाषा भूल जाने की मासूमियत मैंने तीन साल के बच्चे ‘क्‍का‘ से सीखी। राज्य ने मुझे उदासीनता सिखाई, कोतवालों ने दबंगई और क़ैदियों की आंखों से मैंने भय सीखा। जनजातियों और क़बीलों से मैंने श्रम और न्यायपद्धति सीखी। ऐसी बहुत सारी शिक्षाओं के साथ एक दिन मैं एक देश बन गया।

मैंने पाया, हर रिश्ता एक राजनयिक संबंध होता है, एक सामाजिक नौकरी। चाहें, तो रिश्तों में भी पिंक स्लिप दे सकते हैं। हर संभव जगह युद्ध के मैदान में बदल जाती है। इस पर भी युद्ध संभव है कि मैंने तुमसे ज़्यादा प्रेम किया, तुम उतना क्‍यों नहीं लौटा पाए?

पेड़ अगर आग में जल गया, तो आग को अपराधी मानूं? और यह कहूं कि ये न्यायालय नहीं, महज़ निर्णयालय हैं, तो सच बताओ,  मुझ पर मुक़दमा कर देंगे न जज साब?

सृष्टि का कई बार अंत हो चुका है, कुछ नहीं बचता, पर क्‍या हर बार यही बचता है कि हम कुछ भी समझ नहीं पाए? कोई तो होगा, जो सृष्टि के हर चक्र की समीक्षा कर क्‍वार्टर्ली रिपोर्ट बनाता हो।

वह अंत किसकी विजय है? या किसकी मौज है?

कहीं पढ़ा था यह शेर, निदा फ़ाज़ली का

मैदां की जीत-हार
तो मुक़द्दर की बात है
टूटी है
किसके हाथ में तलवार,
देखना
…………………
…………………
*** 


(ये पांचों कविताएं मेरी कहानी 'पिंक स्लिप डैडी' में उसका हिस्‍सा बनकर छपी हैं, उसके बाद कविता के रूप में 'संबोधन' के विशेषांक और 'प्रतिलिपि' में छपीं.)


Friday, October 1, 2010

अब्‍बू ख़ां की बकरी





यह बहुत पुरानी कविता है, इतनी कि लंबे समय तक यह याद भी नहीं रहा था कि ऐसी कोई कविता लिखी थी. पुराने काग़ज़ों की सफ़ाई करते वक़्त मिली. सफ़ाई तो पहले भी की है, लेकिन मिली अबकी. इसके नीचे तारीख़ है 8 सितंबर 98. यह पूरी होने की तारीख़ है. तब मैं कविता के नीचे पूरी होने की तारीख़ डाला करता था, शुरुआत की नहीं. इसलिए यह नहीं याद कि शुरू कब हुई थी. कुछ ही समय बाद यह गोरखपुर की पत्रिका 'दस्‍तावेज़' में छपी थी. उसके बाद का कुछ नहीं याद. जैसे कभी यह सब लिखा ही न था. मेरे पास वे पत्रिकाएं कभी नहीं होतीं, जिनमें मेरी चीज़ें छपी होती हैं. ऐसा कोई अंक नहीं है, किसी भी पत्रिका का. 2007 में इस कविता की याद नागपुर से कवि-मित्र बसंत त्रिपाठी ने दिलाई. उनसे पहली बार फ़ोन पर बात हो रही थी, और उसी दौरान उन्‍होंने इसका जि़क्र छेड़ा. उन्‍होंने तब पढ़ी थी. उस समय याद आया कि हां, ऐसी एक कविता लिखी थी, पर वह कहां गई, नहीं पता. उस समय भी मैंने इसे खोजा था. बाद के दिनों में भी कुछ और दोस्‍तों ने इस कविता को याद किया. मैं बार-बार याद करता कि उस कविता में मैंने लिखा क्‍या था, कुछ विचारधाराओं-प्रतीकयोजनाओं के आधार पर इसकी सिलाई की थी, इससे ज़्यादा कुछ याद न आता. यही कारण था कि यह न संग्रह में रही, न बातचीत में, न डायरियों में, न ही ऑनलाइन डाटा में. कल शाम मिल ही गई आखि़र. जब इसे नहीं खोज रहा था तब. यही नहीं, कुछ और भूल चुकी कविताएं भी मिली हैं. एकाध को पढ़कर मुझे समझ ही न आया कि ये किन मन:स्थितियों में लिखी गई थीं और इनका अर्थ क्‍या है (जो लोग मुझसे मेरी कविताओं का अर्थ पूछते हैं, उन्‍हें ख़ुश होना चाहिए). 

मुझे ऐसा लगता है कि उस समय मुझे उत्‍तर-आधुनिकता के बारे में कुछ संपट नहीं पड़ा होगा, क्‍योंकि हाशिए पर एक नोट में उसे भी इसमें शामिल करने का निर्देश लिखा हुआ है. संपट होती, तो पता नहीं क्‍या लिखता. अभी भी यही सोच रहा हूं कि क्‍या लिखा है. पुरानी, विस्‍मृत रचनाओं को देखकर हम हमेशा ऐसा सोचते हैं कि इसे आज लिखा होता, तो ये-ये, वो-वो दुरुस्‍त कर देता. दुरुस्‍त कर लेने वाला भाव ही शायद आपका क्रमिक विकास होता हो. 

ख़ैर, बारह साल पहले भूली जा चुकी यह कविता पढ़ें. इसे यहां लगाने से पहले मैं इसे कवि बसंत त्रिपाठी को ही समर्पित करता हूं.     
***



अब्‍बू ख़ां की बकरी


अब्‍बू ख़ां एक परंपरा है
अब्‍बू ख़ां की बकरी एक मुहावरा

सबसे पहले हमें कुछ बुनियादी बातों पर सोचना चाहिए
अब्‍बू ख़ां कौन था
वह बकरियां क्‍यों पालता था
उसने कितनी बकरियां पाली थीं
उसकी बकरियां बार-बार उसके पास से भाग क्‍यों जाती थीं
उसकी बकरियों को खा जाने वाला भेडि़या कौन था
जब उसने धीरे-धीरे सारी बकरियां खा डालीं
तो क्‍या अब्‍बू ख़ां ने बकरियां पालना छोड़ दिया

मार्क्‍सवादी पद्धति से इस पर सोचा जाए
तो अब्‍बू ख़ां मेहनतकश वर्ग का था जिसे
सर्वहारा कहा जाना चाहिए
अय्यप्‍प पणिक्‍कर की एक कविता खुजली और बंबई में
प्रचलित शब्‍द खुजली के आशयों के अनुसार
उसे बकरी पालने की खुजली थी
या उसके पेट में भूख नाम की एक पिशाचिनी रहती थी
जो उससे बकरी पलवाती थी
और उसका दूध निकलवाती थी
यानी बकरी उसके लिए उत्‍पादन का साधन थी
जिसे दुहकर वह एक तरह से दूध का उत्‍पादन करता था
इस तरह देखा जाए तो
उत्‍पादन के उस साधन पर अब्‍बू ख़ां की मिल्कियत थी
अब्‍बू ख़ां दूध निकालने में मेहनत भी करता था
अर्थात वह मेहनतकश भी था
अर्थात उत्‍पादन के साधन पर मेहनतकश का स्‍वामित्‍व था
तो इस तर्क के आधार पर हम यह कैसे कह सकते हैं
कि अब्‍बू ख़ां सर्वहारा था
लेकिन उसकी माली हालत इतनी अच्‍छी भी नहीं थी कि
उसे नेशनल बूर्ज्‍वाजी का नाम दे सकें
उसे हम मध्‍यवर्ग या निम्‍न(मध्‍य)वर्ग में ले सकते हैं
जो श्रम करता है और वस्‍तुत: भूख का श्रमिक होता है

दूसरी तरफ़ इसे थोड़ा अस्तित्‍ववादी मोड़ दिया जाए
तो अब्‍बू ख़ां एक स्‍वतंत्र व्‍यक्ति था
और उसकी एक निरपेक्ष्‍ा इच्‍छा थी कि बकरी पाली जाए
अस्तित्‍वाद में व्‍यक्ति के पास इच्‍छा का होना ज़रूरी है
इसमें ऐसा नहीं कि भूख मर जाती है
बल्कि भूख मिटाने की इच्‍छा का होना महत्‍व का है
व्‍यक्तिनिष्‍ठ तरीक़े से वह एक व्‍यक्ति था
जिसके पास एक व्‍यक्तिगत भूख होती है
जिसे वह व्‍यक्तिगत या सार्वजनिक माध्‍यम से पूरा करता है
उसकी बकरियों की भी एक निहायत व्‍यक्तिगत इच्‍छा होती है
मुक्ति की जिसे आध्‍यात्मिक शब्‍दों में
अब्‍बू ख़ां से मुक्ति पूरी दुनिया से मुक्ति पा मोक्ष की तलाश
कह सकते हैं
जबकि मार्क्‍सवादी शब्‍दों में बकरी सर्वहारा नहीं है
क्‍योंकि उसके पास खोने के लिए बेडि़यां और पाने के लिए सबकुछ के ठीक उलट
खोने के लिए बेडि़यों के साथ सुरक्षा और प्‍यार और पाने के लिए भेडि़ये से संघर्ष और मौत है
हालांकि मार्क्‍सवाद नियतिवाद में विश्‍वास नहीं करता

अस्तित्‍ववादी परंपरा और रेनेसां की प्रतीकयोजना के मुताबिक़ यह भी संभव है कि
अब्‍बू ख़ां भारत का एक आम व्‍यक्ति हो
और उसके पास कोई बकरी ही न हो
यानी अब्‍बू ख़ां के दिमाग़ के कुछ अंधेरे पहलू हों
और उनमें कुछ बकरियां निवास करती हों
बकरियां ज़रूरी नहीं कि बकरी की तरह ही हों
बकरियां नादान होती हैं सीधी-सादी होती हैं
सो बकरियां दिमाग़ के नादान सुविचार भी हो सकती हैं
और भेडि़या भी दिमाग़ में ही निवास करता हो
किसी भयानक कुविचार की तरह
अब्‍बू ख़ां के दिमाग़ की बकरियां जब-जब हरे-भरे मैदानों में तफ़रीह करना चाहती हों
यानी अब्‍बू ख़ां के नादान सुविचार उससे मुक्‍त हो अमल में आना चाहते हों
या अभिव्‍यक्‍त हो सार्वजनिक हो जाना चाहते हों
ठीक उसी समय धर दबोचता हो उन्‍हें कुविचार का भेडि़या
अब्‍बू ख़ां की बकरी को हम देश के हर आदमी के दिमाग़ के अंधेरे पहलुओं में
चल रहे सुविचार-कुविचार के संघर्ष के रूप में देख सकते हैं
पर चूंकि यह वैदिक-ऐतिहासिक धर्म-अधर्म का संघर्ष नहीं
सो इसमें बकरी रूपी धर्म अर्थात कमज़ोर नादान सुविचारों की ही जीत हुई हो
इतिहास में ऐसा कभी दर्ज नहीं हो पाया

यह भी संभव है कि अब्‍बू ख़ां अपनी बकरियों और भेडि़ये और अपनी पूरी कहानी समेत हमारे दिमाग़ में रहता हो, लड़ाई चलती ही रहती हो और वह हमारे बहुत सारे निर्णयों को प्रभावित भी करता हो 

आजकल के टाइम का एक व्‍यावहारिक सिद्धांत यह भी है
बतर्ज लड़की अगर मिनी स्‍कर्ट पहनेगी तो रेपिस्‍ट तो आएगा ही कि
बकरी जब देर रात घने जंगल में अकेले घूमेगी
तो भेडि़या तो उसे खाएगा ही
इसमें दोष बकरी का ही था
क्‍योंकि बकरी ही बार-बार आज़ाद होने के लिए अब्‍बू ख़ां के पास से भाग जाती थी
और भेडि़ये के इलाक़े में पहुंच जाती थी
फुक्‍कट में भेडि़ये को दोष कायको देना
उसके पास भी भूख है और पारिस्थितिकी के अनुसार उसका आ‍हार बकरियां हैं
सवाल यह है कि बकरियां अब्‍बू ख़ां से आज़ादी क्‍यों चाहती थीं
क्‍या मेहनतकश अब्‍बू ख़ां शोषक अब्‍बू ख़ां भी था
क्‍या अब्‍बू ख़ां की पालना में रहना अब्‍बू ख़ां की कष्‍टकर ग़ुलामी में रहना था
वे अब्‍बू ख़ां के पास घास खाने, दूध देने, छोटी-छोटी लेंडियां करने और
जब-तब में-में करने के सिवाय करती ही क्‍या थीं
अब्‍बू ख़ां में कोई लाड़-प्‍यार भी था जो बकरियों का दिमाग़ फिरा देने को काफ़ी था
और उन बकरियों की भूख नामक मूलभूत ज़रूरत पूरी तरह संतुष्‍ट थी
क़ायदे की बात है कि जब पेट भरा हुआ होता है
तो आज़ाद होने की बात ख़याल आती है
(देश की आज़ादी का पूरा संघर्ष ही भरे पेट वाले लोगों की अगुआगिरी में हुआ था)

अब यहां कलावादी उचककर सवाल करते हैं
लेकिन हर चीज़ आकर भूख पर ही क्‍यों टिक जाती है
और भी ग़म हैं ज़माने में भूख के सिवाय

ये तो आप जानते ही हैं कि ऐसा कौन कहेगा कि
भेडि़या हिंदू था और मुसलमान (की) बकरियों को ही खाना प्रिफ़र करता था

क़ानून की बात कि अब्‍बू ख़ां ने अपनी बकरियों की सुरक्षा का इंतज़ाम कैसा किया था
अलेक्‍ज़ेंडर ब्‍लोक के प्रतीकवाद और मायकोवस्‍की के बाद के भविष्‍यवाद पर आएं
और अब्‍बू ख़ां की बकरियों को अब्‍बू ख़ां की बेटियों के रूप में देखें तो
लड़कियों के बार-बार भेडि़यों द्वारा खा लिये जाने की अनंत दारुण कथा समझ में आती है
तब भेडि़ये को कैसे लें
जवान लड़कियों को सुनहरी सपने दिखा खींच लेने वाला प्रलोभन
एक ऐसा चुंबक जिसे पता है मिट्टी और लोहे के बुरादों का फ़र्क़
फिर बकरियों को क्‍यों नहीं पता अब्‍बू ख़ां और भेडि़ये का फ़र्क़

जब-जब कोई बकरी मारी जाती है
तब-तब अब्‍बू ख़ां ख़ुद को भयंकर असुरक्षित और एकाकी महसूस करता है
जब-जब हमारे दिमाग़ में कोई पराजय होती है दुख सिर उठाता है
हम अब्‍बू ख़ां की गति को प्राप्‍त होने लग जाते हैं
उपभोक्‍तावाद में बकरी हमारी संस्‍कृति बन जाती है और भेडि़या बाज़ार आक्रांता
हम एक-एक करके अपनी बकरियां खोते जा रहे हैं अलग-थलग होते जा रहे हैं
पूंजीवाद अपने विध्‍वंसक रूप के प्रभावों से व्‍यक्ति को लगातार आत्‍मकेंद्रित
अलग-थलग और एकाकी बनाता जाता है

ज़रा फिर मार्क्‍सवादी-समाजवादी संदर्भों में लौटें
भुवनेश्‍वर, सर्वेश्‍वर से लेकर विमल कुमार की कविताओं का भेडि़या कितने रूप बदल चुका है
क्‍या अब्‍बू ख़ां की बकरियों के प्रतिकूल परिस्थिति का निर्माण करने की प्रवृत्ति ही भेडि़या है
अगर बकरी अब्‍बू ख़ां का श्रम है तो उसे बेमोल पचा ले जाता है
उसके उत्‍पादन का एक अंग तो लगान की तरह वसूल ले जाता है
अब्‍बू ख़ां लाख सिर पटकता है
बकरी उसके पास टिकती नहीं
पालतू ग़ाफि़ल हो बार-बार भग जाती है
घात लगाये भेडि़या दबोच लेता है
अब्‍बू ख़ां रोता है
अकेले में बूढ़ा होता है

अब्‍बू ख़ां एक परंपरा है
अब्‍बू ख़ां की बकरी एक कहावत-मुहावरा
भेडि़या परंपराओं-कहावतों से रूढ़ एक नंगी असलियत
(फिन देक के लो न भिड़ू, कविता को परंपराओं-मुहावरों से बचाने का है,
बोले तो काय-काय चीज़ से बचाने का है, समझ के लो न)


Friday, June 11, 2010

जाना सुना मेरा जाना

अर्थ बचा रहे इसके लिए ज़रूरी है कि लिपि में शब्दों के बीच दूरी बनी रहे
दोनों पैर एक साथ बढ़ाता हूं तो गिर जाता हूं उछलना पड़ता है इसके लिए
चल सकूं अपने पैरों को बारी-बारी आगे बढ़ाता हूं
सड़क से मुहब्बत का यह आलम है उसे चोट नहीं देना चाहता
फिर क्यों तुमको बार-बार सड़क मानने से कतराता
इस दुनिया में कोई चीज़ अगर हर वक़्त गर्भवती है तो
समय है वह क्या-क्या नहीं जन्म लेता यहां से हर समय
इतना विशाल गर्भाशय कि गर्भाशय का कैंसर हो गया तो कौन ठीक करेगा
जो था वह था ही नहीं रहता है भी हो जाता है
जो नहीं था वह भी है हो जाने को अकुलाता है
कुछ चीज़ों की वृद्धि उनके छोटे होते जाने में रही फिर भी
बिना पेंसिल उठाए हंसते चेहरे का चित्र बना लेने वालों के हुनर से हमेशा घबराया
इतिहास में ऐसे मौक़े ज़्यादा आए जब ग़लत चीज़ों पर एकमत रहा बहुमत; उन मौक़ों पर मैं किस तरफ़ रहा?
जिन लोगों के बीच रहा उनकी अपेक्षाएं नहीं रहीं कभी बहुत ही
इसीलिए बहुत कुछ पाया भी नहीं उन्होंने कभी      वे सब व्यवस्था के कारकून बोले तो अव्यवस्था के मसीहा
इस जहां में जहां जहां जाना है उन्हें पाना है उस जहां में भी जहां जहां
मेरी नसों को नश्तरों से खोलेंगे फिर ख़ून में तैरेंगे ख़ून को खोजते हुए
फिर एक दिन कह देंगे ख़ून है नहीं रहा ही नहीं इन नसों में कभी
नसों की दीवारों पर बने चित्रों को आदिम गुफ़ाओं की परंपरा का कहेंगे
और वहां पर्यटन की संभावना पर बैठक होगी
मेरे शरीर में नेअनडरठाल रहते हैं यह कितना दिलचस्प शोध होगा
बहुत अकेले छितराए हुए थे नेअनडरठाल बिखरे हुए जब उनकी प्रजाति नष्ट हुई थी
वे इतिहास के सबसे कुरूप लोग थे शिकारी थे बावजूद योद्धा न थे
आकांक्षाएं योद्धाओं को आकर्षित करती हैं आकर्षित जो होते हैं वे योद्धा बन जाते हैं
आंसू के बिना कोई प्रार्थना लिखी ही नहीं गई इस दुनिया में कभी
कम न हो आत्मबल मनोबल मुंह के बल गिरने पर भी बल के मुंह को धो-पोंछ संवार लेना
इतना बूढ़ा न होना कि ख़ुद को जवान न कह सकना
इतना संपन्न हमेशा रहना कि कुछ भी लुट जाने से डर न लगे
इतना निष्फिकिर भी कभी नहीं कि फ़क दिस वर्ल्‍ड विद योर मिडिल फिंगर
सुंदरताएं भी क्रूर होती हैं कई बार अनिवार्य रूप से क्रूर
उसके बाद भी वे सुंदर होती हैं यह उनकी क्रूरता को थोड़ा कम करता है
सितारे आसमान में, अपनी दूरी-क़ुरबत से, जो आकृतियां बनाते हैं वे दरअसल
न पढ़ी गई लिपियों के अक्षर होते हैं पढ़े जाने के सुराग़
क्या फ़रक़ पड़ता है कि दीवार पर लिखे गए स्क्रीन पर मन पर मचलते तन पर कितौ आसमान पर ही लेकिन
काग़ज़ भी तो अंकल मुहब्बत की शै होती है
अकेला होकर भी चंद्रमा कभी अल्पमत में नहीं होता आसमान पर काग़ज़ के टुकड़े-सा चिपका हुआ
कौन मूल है क्लोन कौन है
इस युग में जितनी तेज़ी है अचरज मत करना इस पर अगर कहीं यह पता चले कि
क्लोन पहले पैदा हुआ था मूल से, एक अधिभौतिक भूल से
पचीस-पचास-पांच सौ साल पहले दुनिया में आकर कोई तीर नहीं मार लिया उनने
बड़े-बुज़ुर्गों की इज़्ज़त करने से बेहतर है उन चीज़ों की इज़्ज़त करना
जो आधी रात तुमको अचक्के जगा जाती हैं जब जगते हो तो पाते हो
टूटा घड़ा रात-भर में इतना टपका कि ख़ालीपन से भर गया
ऐसी हवा चली कि तुम्हारे प्रिय पेड़ के सारे पत्ते आंगन में गिर गए गिर कर कूड़ा बन गए
ऐसी तमाम चीज़ों को मुश्किल पाता हूं बहुत
पाने जाता हूं इन सबको आती हैं और भी मुश्किलें
देने के लिए मेरे पास सिर्फ़ प्रेम है और, इज़्ज़त, मुझे लगता है,
एक निहायत सामंती परंपरा है जिसके धागों से ओढऩे-बिछाने के कपड़े बने सबके
एक दिन जिनका तार-तार हो जाना निहायत अनिवार्य है
पर यह कितना अजीब है कि कुछ हत्याओं का कारण प्रेम को माना गया कुछ का इज़्ज़त को
कि घृणा करने के सारे गुर प्रेम ही सिखाता है
कुछ हथियार ऐसे होते हैं जो हाथ बदलते ही अपनी ताक़त खो बैठते हैं
जबकि दुनिया में कोई शै ऐसी नहीं जिसके लिए लड़ा जाए
जबकि दुनियाओं का विस्तार अन्वेषणों से कम हुआ आक्रमणों से ज़्यादा
एक ऐसा दरवाज़ा जिसे सदियों से खटकाया जाता है न खुलता है न ही भहराकर टूटता है जो
एक खिड़की जिसमें से निकलती है एक हरी लता जो कभी बढ़ती नहीं छंटती भी नहीं
उसमें से जो सुगंध निकलती है उसके स्थगन से पैदा होती है
इतना जाना सुना है मेरा जाना कि सब कुछ को देखना सब कुछ के साथ रुका होना है
इतना अ-जाना अ-सुना है मेरा अ-जाना कि जाने से पहले ही लगता है जा चुका हूं
लौटने से पहले से लौटता रहा हूं बाद भी जैसे रॉकेट की पूंछ से निकलता धुआं एक विलंबित लौट के अभ्यास में
बहुत देर तक बहुत बहुत देर तक दिखता है खो जाने के बाद भी दिखता ही रहता है स्थिरता में अपनी
मैं पूर्व में जाता था जबकि सारी दुनिया पश्चिम जा रही
पश्चिम वाले और पश्चिम और पश्चिम एक ने कहा जापान, अमेरिका के पश्चिम में है
सो एक तरफ़ से ही मानो दिशाएं क्या बताऊं मेरा पूर्व दिशा नहीं है
जैसे तीसरी आंख दरअसल आंख नहीं जैसे पांचवां सिर दरअसल सिर नहीं जैसे तीसरी दुनिया कोई दुनिया ही नहीं
जैसे हर धर्म में होती है एक पवित्र भूमि, एक प्रॉमिस्ड लैंड
उसकी आकांक्षा कितना गौरवान्वित करती है हमेशा के लिए खो जाने की इस प्रक्रिया को बामुराद
इतने नए सिरे से आई है यह गुमशुदगी अनिश्चित अप्रत्याशित
इतना अंधेरा है और मैं इतना निश्चिंत कि धीरे-धीरे हाथ डुलाते उन दिनों को याद करता हूं
जब मैं गर्भाशय में था
पैर को थोड़ा-सा हिलाकर किसी को ख़ुशी दे देता हुआ
गुम हो जाना बिना हाथ हिलाए विदा हो जाना है
जब बर्दाश्त से बाहर हो जाएगी भूख हम अपना भविष्य खा लेंगे



Tuesday, January 12, 2010

मध्‍य-वर्ग का मर्म-गीत

यह श्री गुरु गोबिंद सिंह हिंदी प्राइमरी स्‍कूल में पढ़ाई जाने वाली राइम्‍स में से है
अम्‍मा-बाबा-दादी टाइप के संबोधनों वाले बूढ़ों के ज़माने के कांपते गीतों में से
किसी की मौज या शग़ल है ताल-बेताल-क़दमताल
ओह, देखो-देखो, अब भी वही सिंदूर तिलकित भाल
या पूरे इतिहास को दिखा दे ताक़त के खेल की ताक़त है
पूरब के मेटा-फि़जि़क्‍स का मोटा फ़ार्मूला है - के एक दिन तय है सबका मरना
मेरा कर्मा... कर्मा... कर्मा... तू... मेरा धर्मा... धर्मा... धर्मा
ऊप्‍स! तीनों में से कोई फ़ुक्‍कट में नहीं मरा, काम करते-करते मरा,
जिनके लिए शहीद जैसा कोई शब्‍द क्‍यों नहीं, ऐसा प्‍लकार्ड लिए अभी गुज़रे थे स्‍वामी वर्ग-चैतन्‍य कीर्ति-आकांक्षी 1008
भुजंग की तरह मैं भी पूछ बैठा - शिवाकाशी का बचपना क्‍यों नहीं जाता...
आईक्‍यू जितना कम होगा, कविता उतनी अच्‍छी होगी; जीवन भी
मैं कहता हूं, जहां रहना है वहां से संन्‍यास ले लीजिए; इसमें डुप्‍लेक्‍स रिहाइश का मज़ा है :-)
नको बाबा
कक्षा 1ली वर्ग अ और वर्ग ब का संघर्ष नहीं, बहुत जटिल है जितना कि विचित्र मेरा वर्ग-मानचित्र है
जो है उसे वैसे ही पेश करना रिवायतों के खि़लाफ़ है
तो जैसे मैं घर की बरमूडा और टी-शर्ट पहने ही दफ़्तर आ गया
उसी तरह इस पेशकश में पेश्‍ट करता हूं
ग़ौर से पढि़ए, यह मेरे मध्‍य-वर्ग का मर्म-गीत है :
राजा मरा लड़ाई में
रानी मरी कड़ाही में
बच्‍चे मरे पढ़ाई में...


(अगस्‍त 2009 में लिखी गई  कविता. इधर, प्रतिलिपि के ताज़ा अंक में चेस्‍वाव मिवोश की एक कविता पर कुछ लिखा है. यहां पढ़ सकते हैं.)  

Friday, November 27, 2009

सेल्फ पोर्ट्रेट


एडम ज़गायेवस्‍की की एक और कविता


कंप्‍यूटर, पेंसिल और एक टाइप राइटर के बीच
गुज़र जाता है मेरा आधा दिन। एक दिन गुज़र जाएगी आधी सदी।
मैं एक अजनबी शहर में रहता हूं और कई बार
अजनबियों से ऐसे मुद्दों पर बात करता हूं जो ख़ुद मेरे लिए अजीब होते हैं।
मैं संगीत बहुत सुनता हूं : बाख़, मालर, शोपां, शोस्‍ताकोविच।
मैं संगीत में तीन चीज़ें देखता हूं : कमज़ोरी, ताक़त और दर्द।
चौथी चीज़ का कोई नाम नहीं।
मैं जीवित या मर चुके कवियों को पढ़ता हूं जो मुझे सिखाते हैं
दृढ़ता, आस्‍था और गौरव। मैं बड़े दार्शनिकों को
समझने की कोशिश करता हूं- लेकिन अमूमन उनके
बेशक़ीमती विचारों की खुरचन तक ही पहुंच पाता।
मुझे पेरिस की गलियों में देर तक चलना पसंद है
और साथ के लोगों को देखना जो ईर्ष्‍या
क्रोध और अनगिनत इच्‍छाओं के कारण रफ़्तार बढ़ा लेते हैं
चांदी के सिक्‍के को देखना
जो एक हाथ से दूसरे हाथ में जाता है और धीरे-धीरे
अपना गोल आकार खो देता है (उस पर से मिट जाता है सम्राट का चेहरा)
पास ही होते हैं पेड़ जो कुछ कहते नहीं
सिवाय हरियाली के, अद्वितीय संपूर्णता में
काली चिडि़यां नाप लेती हैं खेतों को
स्‍पैनी विधवाओं की तरह सब्र से करती हैं किसी का इंतज़ार
मैं अब जवान नहीं रहा, लेकिन कोई हमेशा मुझसे उम्र में बड़ा रहा
मुझे पसंद है गहरी नींद, जब लेता हूं अपने अस्तित्‍व से विराम
गांव की सड़कों पर तेज़ रफ़्तार में चलाना मोटरसाइकिल
जब खिले हुए दिनों में काले पीपल और मकान ऊंचे होकर घुल जाते हैं आसमान में
म्‍यूजि़यम में कभी-कभार पेंटिंग्‍स मुझसे बात करती हैं
और विडंबनाएं अचानक खो जाती हैं ।
मुझे पसंद है निहारना पत्‍नी का चेहरा।
हर रविवार फ़ोन करता हूं पिता को।
हर दूसरे हफ़्ते मिलता हूं दोस्‍तों से
और इस तरह जताता हूं वफ़ादारी।
मेरे देश ने ख़ुद को एक दानव से मुक्‍त कर लिया। मैं सोचता हूं
दूसरी आज़ादी भी मिले जल्‍द ही।
मैं इस बारे में कुछ कर सकता हूं ? मुझे नहीं पता।
यक़ीनन मैं समंदर का बेटा नहीं
जैसा कि अंतोनियो मचादो ने अपने बारे में लिखा है
लेकिन बेटा हूं हवा, पुदीने और संगीत के साज़ों का
ऊंची दुनिया के सारे रास्‍ते नहीं कटते
चौराहों की तरह मेरी जिंदगी के रास्‍तों से
मेरी जिंदगी जो अब तक मेरी ही है


Thursday, November 26, 2009

वर्मीर

यान वर्मीर की पेंटिंग और एडम ज़गायेवस्‍की की कविता



वर्मीर की नन्‍ही लड़की जो अब काफ़ी प्रसिद्ध हो गई है
मुझे देखती है. एक मोती देखता है मुझे.
वर्मीर की नन्‍ही लड़की के होंठ
सुर्ख़, नम और चमकीले हैं

ओह वर्मीर की नन्‍ही लड़की, ओह मोती
नीली पगड़ी : तुम पूरी तरह रोशनी हो
और मैं बना परछाइयों से
रोशनी नीचे देखती है परछाई को
पुरखों की तरह, शायद तरस खाते हुए.

***

Monday, July 27, 2009

तुम्‍हारा शुक्रवार


तुमने कहा था कि तुम पेड़ इसलिए नहीं हो
कि तुमने कभी पत्‍ते नहीं पहने
फिर भी मैं तुम्‍हारी छांव में बैठा
और तुम्‍हारे पत्तों से ढंका अंधेरा देखा

मैं तुम्‍हारी तस्वीर कभी नहीं बना सकता
कुछ आकार मैंने इससे पहले कभी नहीं जाने
इतने ज़्यादा कोण मिल जाएं
तो सिर्फ़ वृत्त बनता है

जो हमने साथ गुज़ारा
इस पूरे दिन को भविष्य में प्रवेश के लिए
एक छद्म नाम चाहिए होगा

*

हम अपनी देह एक-दूसरे से छिपा ले जाएंगे
किसी दिन हम अपने शब्‍दों से बनाएंगे
एक-दूसरे का रूप
और बिना बताए अपने पास रख लेंगे

तुम हर सुबह मेरी आवाज़ सुनोगी
जो मैंने तुम्‍हारे कानों तक नहीं भेजी
एक दिन तुम्‍हारे पास अपनी कोई देह न होगी
सिर से पांव तक मेरी लहराती हुई फुसफुसाहट होगी वह देह
मेरी आवाज़ की गूंज से बनी मीनार होगी तुम्‍हारी आत्‍मा

हम कभी नहीं मिले फिर भी
जो हमने साथ गुज़ारा
इस पूरे दिन को भविष्‍य में प्रवेश के लिए
भविष्‍य की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी

जैसे तुममें समाने के लिए तुम्‍हारी ज़रूरत भी कहां पड़ी थी मुझे

इस धरती पर तुम कहीं नहीं रहती, सिवाय मेरी बातों के
और मैं भी कहीं नहीं हूं सिवाय तुम्‍हारी बातों के
हम दोनों ने ही घर बदल लिया है.

*






Monday, March 9, 2009

सेब का लोहा

पत्थर भी अपने भीतर थोड़ी मोम बचा कर रखता है
ख़ुद आग में होता है बुझ जाने का हुनर
जब वह अपने आग होने से थक जाती है
गिरते हुए कंकड़ को अभय दे
अंगुल भर खिसक जाता है समुद्र एक दिन
सबसे हिंसक पशु की आंखों की कोर पर एक गीली लकीर
धीरे-धीरे काजल की तरह दिखने लगती है
सबसे क्रूर इंसान भी रोता है
और प्रार्थना में एक दिन उठाता है हाथ

पत्थर आग पानी और जानवर अभिनय नहीं जानते
मैं जानता हूं

मुझे सेब की फांक पर उग आया लोहा कह लो
या पहिए और पटरी के बीच से कभी फ़ुरसत से निकली चिंगारी
या तमाम माफि़यों से भरी वह प्रार्थना जिसका मसौदा सदियों से अपनी जेब में रखते आया
पढ़े जाने के माकूल वक़्त का इंतज़ार करते

जो कुछ छोड़े जा रहा हूं
क्‍या उसके बदले सिर्फ़ एक माफ़ी काम की होगी
जिसे पढ़ना होगा पुरखों नहीं संततियों के आगे
बताना होगा कि मेरी हथेलियां बहुत छोटी थीं
छिटकते समय को सहेज लेने के वास्ते

सिर्फ़ एक रास्ता काफ़ी नहीं इस जगह से घर को
सिर्फ़ एक जड़ से नहीं मिला छतनार को जीवन
सिर्फ़ एक बार नहीं बना था परमाणु बम
सिर्फ़ एक अर्थ से नहीं चलता रोज़गार शब्‍दों का
सिर्फ़ नीयत ही काफ़ी नहीं होती हर बार
बिना चले गठिया का पता नहीं चलता

मैं भय विनाश भूख और त्रासदी से निकला हूं
सिर्फ़ एक अनुभव से नहीं समझा जा सकता जिन्हें
सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाक़ू नहीं बनता

कोई आता है हांक लगाता पुकारता मेरा नाम
एक उबासी से करता हूं उसका स्वागत फिर ढह जाता हूं
एक दिन वह बना लेता है उपनिवेश
मेरी देह और दिमाग़ के टू-रूम फ़्लैट में
फिर छिलके-सा उतार दिया जाता हूं
किसी आरोप या बिना किसी आरोप के

मेरी राजनीतिक उदासीनता राजनीतिक नासमझी में बदल जाती है
हर इच्छा एक नागरिक उदासीनता की तरफ़ ले जाती है

शरीर में लोहे की कमी है सड़कों और खदानों में नहीं
इसीलिए अपने हिस्से का सेब कभी नहीं फेंकता मैं
थोड़ा-सा मनुष्य भी है मुझमें
जो सदियों पुरानी धुनों पर गाता है भ्रम के गीत

कोई और रहता है मेरे भीतर
जो लिखता है कविता या गाता है
जब वह मेरे सामने आता
मिलता नहीं कोना जहां अकेले बैठ थोड़ी देर सचमुच रो सकूं मैं
अभिशप्‍त भटकता हूं
जैसे लिखे जाने से पहले खो गई किसी पंक्ति की तलाश में
तभी झमाझम बरसती हैं स्मृतियां
भूल जाता हूं पिछली बार कहां रख छोड़ा था छाता

शब्‍द के उच्चारण या नाद से निकली सृष्टि में
क्‍यों बार-बार भूल जाना कि
इतिहास से पहले भी जीवन था
बोली जाने वाली भाषा से पहले समझी जाने वाली
उससे भी पहले एक आंसू उससे भी पहले एक पीड़ा
उन्हीं के अवशेषों की भाषा लिखता हूं

मुझको पढ़ना बार-बार पढ़ी जा चुकी किताब-सा आसान नहीं
मेरा हर व्यवहार एक विचार है
हर हरकत एक इशारा
मैं आधी समझी गई पंक्ति हूं
अभी आधा काम बाक़ी है तुम्‍हारा

(पूर्वग्रह में प्रकाशित)

Tuesday, December 9, 2008

माउथ ऑर्गन

भूले को फिर याद करने के सिलसिले में
याद करता ढंग से माउथ ऑर्गन बजाना
देर तक की पीं-पीं
सुनता भाषा सीखने के क्रम में
ता-ता करते बच्चे की कोशिश जैसे
कैलेंडर पर गोले लगे दिनों को
छोटे-छोटे छेदों से पार कर दूं
ऐसे कि लय की गांठ में बांधूं इलेक्ट्रॉनों-सी भटक-भवानी याददाश्त

बूढ़े के कमज़ोर फेफड़े बताते माउथ ऑर्गन के बारे में
टेप में लपेट लीं मैंने वे धुनें
सीधा-साफ़ जिन्हें छोड़ आया था वह तैरता हवा में
सुन जिन्हें याद आ जाती कोई बिसरेली हिचकी
पलट-पलट देखता पलटते रास्तों को
जिनकी दुर्गमता की सिंफनी बातों में कंपोज़ करता
हवा में कुछ लिखती अरैंजर उंगलियों से

कहता टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलते लगा हमेशा
सीधे बिल्कुल सीधे
चला जा रहा सीधमसीधे

बार-बार चूमता अपने पैर वह आज
कहता हर नोटेशन पैर की तरह दिखता है
जिस पर सभ्‍यता के धड़ ने की है यह यात्रा
सिंथ के सारे बटनों पर अचानक फिराता उंगली
महज़ एक तार या बटन होता है गड़बड़
सदियां सरक जाती हैं उस तक पहुंचने में
बाक़ी सारे बटन तो महज़ बाक़ी बटन होते हैं

पीड़ा-भय को नहीं, छालों को दो मान्यता
महलों को नहीं मिस्त्री हाथों को
राम को मत दो शिवधनुष तोड़ने का श्रेय
विदेह शारंग को देख सको ऐसी दृष्टि पाओ
सुरों से नहीं असुरों से समझना
मिथिहास के सारे विदेह कोप नहीं क्यों
दैवीय षड्यंत्रों के भाजन हैं

जिसे वह बूझ नहीं सकता
धुएं से आचमन करता है उसके आगे

एक काला बिलौटा अचानक सड़क बीच
भौंचक तकता है दौड़ती गाडि़यों को
उसके दिमाग़ का नहीं पता मुझे
शरीर का संतुलन वह खो रहा है
इस गाड़ी के नीचे आ जाएगा अभी
अभी एक टायर धमका गया है

भौंचक है बिलौटा भौंचक है
रफ़्तार के आगे बेबस है

भीतर और बाहर की देहरी पर बैठा मैं
रोक देता हूं माउथ ऑर्गन बजाना
टेढ़े रास्ते हर किसी को नहीं लगते सीधे
शंख में फूंकी हर वायु ध्वनि नहीं बनती
फिर लगातार बजाता हूं माउथ ऑर्गन तब तक
उस पार सलामत पहुंच जाए बिलौटा

अबूझ के समक्ष प्रार्थना का एक और पद है यह

जिससे लड़ना मुश्किल है
कैसे निभ सकती है मित्रता उससे
माउथ भी क्या है सिवाय एक ऑर्गन के
शत्रु हैं जो मेरे कभी नहीं दिखते
हर छेद से निकली फूंक उसे खोजा करती बस

लौट आने के इंतज़ार में हम भूल जाते जिसकी दग़ाबाज़ी
त्वचा के मोम को बाल देखता छालों-विदेहों को
उसके प्रकाश में
अंतिम निर्वासन का पाथेय जमा करता है
पोटली में गठियाता है उन शब्दों को
जिन्हें चबाएं तो देह में
उगल दें तो सड़क पर ख़ून बहा करता है
कितना समस्यामूलक है सरलीकरण यह
एक ही वक़्त में एक ही शख़्स नायक होता है खलनायक भी

देहरी पर बैठा मैं बजा रहा माउथ ऑर्गन
वह जो दिखता नहीं, बिलाया जाने किस तल में
कैसे पहुंचूं उस तक पहले बूझ तो लूं
ज़रूरी है लाऊं? वे प्रैक्टिकल किताबें बेस्टसैलर
इक्कीसवीं सदी के मैनेजमेंट गुरुओं की
जिनमें हो टेढ़े को सीधा जानने का हुनर साफ़मसाफ़

***

Wednesday, October 8, 2008

जैसे सांस

धूप के कटोरे में पड़ी पानी की बूंदें
भाप बन जाती हैं जैसे
हवा बन जाते हैं मेरे शहर के लोग

शहर एक बुरी हवा था
मुहल्ले-पाड़े जैसे आंच के थपेड़े
बुख़ार के फेफड़ों से निकली
उसांसें थीं गलियां

इन गलियों में
जीवाणुओं की तरह रहते थे लोग
जिनकी आबादी का पता
दंगों, भूकंपों और बम-विस्फोटों में मारे गयों
की तादाद से चलता था

बरामदों में टंगे कपड़े
कपड़े नहीं मनुष्य थे दरअसल
सूखते हुए
इसी तरह जोड़े से छूट गई अकेली चप्पलों, टूटी साइकिलों, बुझ चुकी राहबत्तियों
सेंगदाने की पुल्लियों, गिरकर आकार खो चुके टिफिन बक्सों, उड़ते हुए पुर्जों
चलन खो चुके शब्दों-सिक्कों
और अपने गिरने को बार-बार स्थगित करते
अनाम तारों को भी
मनुष्य मानना चाहिए

सुने जाने के इंतज़ार में हवा में भटकती सिसकियों को भी

इस तरह करें मर्दुमशुमारी
तो उन लोगों की तादाद कहीं ज़्यादा है
जिन्हें हमें मनुष्य मानना है

जितने लोग मरते थे
उतने ही पैदा हो जाते
आम बोलचाल में इसे उम्मीद का
समार्थी कहा जाता

पर जैसा कि मैंने बताया
शहर एक बुरी हवा है
(पानी का जि़क्र तो मैंने किया ही नहीं
पाड़े के नलके पर सिर फूटा करते हैं पानी पर
वो अलग
भले उसे सूखकर हवा बन जाना हो एक दिन
अच्छी, बुरी जैसी भी)

जाने कौन सदी से बह रही है ये हवा
जिसमें ऐसे उखड़ते हैं लोग
जैसे सांस उखड़ती है.

Friday, September 12, 2008

नकार का कोबेन, निराशा का रीज़्झी


कर्ट कोबेन और बोरिस रीज़्झी में क्या समानता है?

रीज़्झी नए रूस का कवि था. वह रूस, जो अपने बिखरे हुए सपनों, कटे हुए डैनों के साथ लाल चौक के बाहर एक पेड़ की फुनगी पर लटका हुआ था, गिरने-गिरने को. और गिरने से बड़ी विडंबना कि इस गिरने से वह हुलस रहा था. अपने सपनों को इतिहास की सबसे फूहड़ गालियां देता हुआ. रीज़्झी उस रूस की नई पीढ़ी का प्रतिनिधि था. आंख झपकते इस पीढ़ी की हुलसित होहराहट अवसाद से भरी बड़बड़ाहट में बदल गई. दूसरे के अंगों पर फेंकी गई गालियां रपटकर अपने ही अंगों पर आन गिरीं. निराशा, नकार (नेगेशन फॉर नेगेशन वाला तो क़तई नहीं) अराजकता और अपराध की अंधेरी काली बस्तियों में यह पीढ़ी शरण लेती है. रीज़्झी उस पीढ़ी की कविता लिखता है. जिस सदी के शुरुआती बरसों में रूस में मायकोवस्की उम्मीद की कविता लिख रहे थे, उसी सदी के आखि़री बरसों में उसी देश का एक नौजवान अंधेरे को सबसे खुरदुरी आवाज़ दे रहा था. वह सारी चीज़ों को नकार रहा था, लेकिन उसे नहीं पता था कि हामी किसकी भरी जाए. 2001 में रीज़्झी ने जब आत्महत्या की, तो उसकी उम्र 26 साल थी. सामाजिक-पारिवारिक असफलताएं और उससे उपजे अवसाद उसे ड्रग्स की तरफ़ ले गए, और ड्रग्स अवसाद के चरम पर.

कर्ट कोबेन नए अमेरिका का गायक था. 1994 में उसने 27 की उम्र में आत्महत्या कर ली थी, जिस समय वह अपनी प्रसिद्धि के चरम पर था. इसकी मौत के प्रत्यक्ष कारण भी ड्रग्स और अवसाद ही थे. वह जॉन बॉन जॉवी, गन्स एन रोजेस, मैटेलिका और एरोस्मिथ का दौर था. कर्ट कोबेन अपने बचपन के दोस्तों के साथ हार्ड रॉक बैंक `निर्वाना´ लेकर आया, जिसने रॉक और मेटल संगीत का पूरा चेहरा ही बदल दिया. कोबेन ने अपने संगीत को `ग्रूंज रॉक´ कहा. उसका संगीत तीखी धुनों, ग़ुस्सैल इलेक्ट्रिक गिटार और असमंजस के शोर से बनता है. उसमें बीच-बीच में आई चुप्पी एक नाकाम तलाश और अनुत्तरित दस्तक के बाद घुटने मोड़कर बैठ जाने की स्थिति है और फिर सनक कर, बौखलाहट में उछाली गई गाली है. ऐसी अंट-शंट अवस्था में ज़रूरी नहीं होता कि कहा गया हर शब्द अपने साथ एक निश्चित कि़स्म का अर्थ ढोता हो. यह अमेरिका की वह पीढ़ी है, जिसकी झेरॉक्स प्रतियां दूसरे देशों में एक्सपोर्ट की जाती हैं. इसका दहकता हुआ लिबीडो, नायकों की तलाश में दर-द भटकते तीसरी दुनिया टाइप के देशों के दुर्बल, हीन नौजवानों को पुचकार-पुचकार पुकारता है. रॉक संगीत अनियंत्रित और निरुद्देश्य विरोध का संगीत है. कोबेन का संगीत भी नकार का संगीत है, लेकिन रीज़्झी की तरह (और हमारे पढ़े-देखे-सुने कई अल्हड़ क्रांतिकारी प्रोटोटाइप-से) ही कोबेन भी कभी नहीं जान पाया कि आखि़र हामी किसके लिए भरी जाए. जब वह चीख़कर कहता है, `अ मुलैट्टो, एन अल्बीनो, अ मस्कीटो, माय लिबीडो´, तो यह कोई प्रतीक नहीं, उसकी पूरी पीढ़ी के निरर्थक भटकाव का शोर होता है.

नौजवान देशों को अपनी नौजवानी और सपनों पर हमेशा फख़्र होता है, लेकिन उन्हें कभी इसकी चिंता नहीं होती कि नौजवानी की इस नवऊर्जा को परनालों में बहने से कैसे रोका जाए. कोबेन और रीज्‍झी दोनों को ही भटका हुआ युवा माना गया था. भटके हुए युवा अपराध करते हैं, लेकिन ये भटके हुए दो युवा संगीत रचते हैं, कविता करते हैं. तो क्‍या संगीत और कविता अपराध हैं ?  अगर नहीं, तो फिर यह किस्‍म का भटकाव है ? क्‍या यह एक भटकी हुई दुनिया के बीच अपनी राह खोजने का रचनात्‍मक भटकाव है, जिसका कला में विस्‍फोट होता है ? और एक दिन यह अहसास होता है कि हमारी इस खोज को यह भटकी हुई दुनिया कोई मान्‍यता ही नहीं दे रही, तब आत्‍मघात होता है? कलाकार का आत्‍मघात समूची दुनिया को दी गई चेतावनी होती है कि देख लो, तुम भटकी हुई हो. तुम मुझे सहेज ही नहीं पाई. जब कोई अपने आप ख़ुद को ख़ारिज करता है, तो वह दरअसल, ख़ुद के अलावा सबको ख़ारिज कर रहा होता है.

बहरहाल, कविता और संगीत की दो बड़ी प्रतिभाओं (जिनका बड़ा हिस्सा अब हमेशा अनएक्सप्लोर्ड ही रहेगा) की झलक देखिए. पहले रीज़्झी की कविता `ट्राम´ और नीचे निर्वाना का गीत `स्मेल्स लाइक टीन स्पिरिट´.


ट्राम : बोरिस रीज़्झी

अतीत में जाना है तो
बेहतर है एक ट्राम पकड़ लो
जो घंटियां बजाती चलती है
जिसकी पटरी पर
कोई बेवड़ा, गंदला स्कूली बच्चा
सनक गई लड़की और
पोपलर की पत्तियां बिछी होती हैं

पांच या छह स्टॉप्स के बाद
हम 1980 में पहुंच जाते हैं
जहां बाईं ओर मार कारख़ाने हैं
दाईं ओर मार कामगार
अरे उतर कर देख भी लो लल्लू
चिंता मत करो
क्या बुदबुदा रहे हो तुम, शकी हो,
ऐसा जो भी कुछ है हमने नबोकोव से पाया है
वह ज़मींदार का बेटा था
हम लोग तो जूठन हैं
ये क्या, तुम्हारे चेहरे पर आंसू
अरे छोड़ो भी, मुस्कराओ यार

हमारा स्टॉप ये है-
जहां देखो वहां पोस्टर, बैनर
नीला आसमान, लाल नेकटाई
किसी की शोकयात्रा है, साजि़ंदे बजा रहे हैं
उनके साथ तुम भी गुनगुनाओ सीटी बजाते हुए
और उस ख़ूबसूरत आवाज़ में खो जाओ
खो जाओ अपने लैदर जैकेट में,
उसकी जेबों में हाथ डाले
उस रास्ते पर जहां अलगाव कभी ख़त्म नहीं होता
उदासी कभी ख़त्म नहीं होती जिस सड़क पर
जो जाती है उस घर तक
जहां तुम पैदा हुए थे
सूर्यास्त, अकेलेपन, नींद और
पत्तियों के झड़ने के बीच पिघलते हुए
लौटना किसी मारे जा चुके सिपाही की तरह.

स्‍मेल्‍स लाइक टीन स्पिरिट : निर्वाना (नेवरमाइंड से)

Sunday, August 31, 2008

काज़ुको शिराइशी की दुनिया में


जापानी कविता पढ़ चुके लोगों के लिए काज़ुको शिराइशी नाम नया नहीं होगा. 1931 में कनाडा के वैं‍कूवर में जन्‍मी शिराइशी को मां-बाप द्वितीय विश्‍वयुद्ध के ठीक पहले जापान ले गए. सत्रह की उम्र से कविताएं लिखनी शुरू कीं. कविताएं एलेन गिंसबर्ग से गहरे तक प्रभावित. 'न्‍यू डायरेक्‍शंस' से छपे इनके संग्रह के बैक कवर पर टिप्‍पणी में इन्‍हें 'जापान की एलेन गिंसबर्ग' कहा गया है.

1973 में आयोवा यूनिवर्सिटी के राइटिंग प्रोग्राम में एक साल तक रहने के बाद उनकी कविता में कई बदलाव आए. 78 में 'सीज़न्‍स ऑफ सैक्रेड लस्‍ट' छपकर आया, जिसने उन्‍हें अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर स्‍थापित कर दिया. उनकी कविताएं गहरे अमूर्तन की कविताएं हैं, भीतर के संघर्षों की. कविता के भीतर जीवन के एक नए दर्शन की तलाश. मार्च 88 में वह भारत भवन में हुए 'कविता एशिया' के लिए भोपाल आई थीं.


वह आदमी

वह आदमी कभी नहीं रुकेगा
पता नहीं कब से भागना शुरू किया है उसने
अभी एक पल को किसी इमारत की खिड़की से
झांक रहा था उसका सिर
वह दीवार पर दौड़ता है
वह सड़क पर दौड़ता है
सड़क जब समंदर में जाकर ख़त्‍म हो जाती है
वह पानी पर दौड़ने लगता है

ये जो आदमी दौड़ता जाता है दौड़ता जाता है
और जो कभी रुकेगा नहीं
उसे रखती हूं मैं
अपनी कॉपियों में
अपनी दराज़ में
अपने अंधेरे में
और मरते रहते हैं मेरे दिन
और ख़त्‍म नहीं होतीं मेरी रातें.



गली

तब की बात है जब हम भीतर त्‍वचा तक गीले
चल रहे थे रहस्‍य से भरे एक क़स्‍बे की अंधेरी गली में
बारिश. बेहद ठंडा मौसम.
हमारे पास रेनकोट थे और एक काला छाता.
कितनी तेज़ी से झोंका ख़ुद को टैक्‍सी पकड़ लेने के लिए
कोई मतलब नहीं, वे रुकी ही नहीं
अंतत: हमने पैदल चलना शुरू किया
भीगे हुए भीतर तक कस कर चिपके हुए
और सोचते रहे भविष्‍य ने कैसे दिन छिपा रखे हैं हमारे वास्‍ते

हालांकि मैंने
उस गर्म होटल, ताप को साझा करती हमारी देह
बेशुमार शब्‍दों और प्‍यार के तरीक़ों के बारे में
कभी कुछ याद नहीं किया.


फुटबॉल का खिलाड़ी


वह फुटबॉल का खिलाड़ी है
गेंद को किक मारता है हर रोज़
एक रोज़

उसने किक मारकर प्‍यार को ऊपर आसमान में पहुंचा दिया
वह वहीं रह गया
चूंकि वह कभी नीचे नहीं आया
लोगों को लगा यह सूरज है
या चांद या फिर कोई नया सितारा

मेरे भीतर एक गेंद है
जो कभी नीचे नहीं आती
लटकी रहती है आसमान के बीचोबीच
आप देख सकते हैं उसे लपट बनते हुए
प्‍यार या सितारा बनते हुए




तोता

मैंने कहा- मैं तुमसे प्‍यार करती हूं
तुमने जवाब दिया- मैं तुमसे प्‍यार करता हूं
मैंने कहा- मैं नफ़रत करती हूं तुमसे
तुमने जवाब दिया- मैं नफ़रत करता हूं तुमसे
मैंने पूछा- अब हम अलग हो जाएं क्‍या?
तुम तोता ही रहे हमेशा
दोहराते रहे मेरे शब्‍दों को जस का तस
इसीलिए ऐसा आया एक समय
जब हमें तलाक़ लेना पड़ा.

(सारी कविताएं 'सीज़न्स ऑफ सैक्रेड लस्‍ट' से)