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Saturday, May 3, 2008

वे आए तब उनके हाथों में थी बाइबल...

तीन बजे रात को जब फोन की घंटी बजती थी, तो पूरा घर गूंज उठता था। पैरेलल था। एक चिंघाड़े, तो दूसरा भी चुप कैसे रह सकता था। नींद में डूबे पूरे घर को समझ में आ जाता था कि किसका फोन होगा। फोन मेरे कमरे में नहीं था। मैं किसी किताब में खोया रहता और उसे खोह से निकल हॉल की तरफ़ दौड़ता। नहीं चाहता कि फोन और देर तक चिल्‍लाए, कोई और जाकर उसे उठाए और नींद की अशिष्टता में सामने वाले को हड़का न दे। उस पार एक गूंजती हुई आवाज़ होती, जो बहुत ठहर- ठहर कर बार-बार मेरा नाम लेती। मैं कहता, हां भुजंग, बोलो, मैं ही हूं। वह भुजंग मेश्राम का फोन होता। उसके फोन रात के तीन बजे ही आते थे। कभी दस मिनट जल्‍दी, तो कभी दस मिनट देर से। पर दिन में तीन बजे, सुबह दस बजे, शाम को आठ बजे उसका फोन कभी नहीं आया। पूरे घर को पता थी यह बात। और घर वूं भी मेरे दोस्तों से परेशान रहता था। कोई रात को दो बजे दरवाज़े पर खड़ा होकर नाम पुकार रहा है, तो कोई सीटी बजा रहा है. घंटी कोई नहीं बजाता. उन्हें लगता है, घंटी बजाने से घर के दूसरे लोग जाग जाएंगे. जबकि उनके चिल्लाने से पूरा मोहल्ला जाग जाए, उन्हें परवाह नहीं. दिन के दोस्त अलग थे, रात के अलग. जो रात को दरवाज़े पर आवाज़ देते थे, वे वेताल थे, असुरों की प्रजाति के, निशाचर. उनमें से कोई अहिरावण जैसा दिखता, कोई महिरावण जैसा.

भुजंग मेश्राम उनमें से ही था। 97-98 का समय था. मेरी उम्र 19-20 की थी। कविताएं लिखता था। पढ़ता था। भुजंग मराठी कविता का प्रतिष्ठित और स्थापित नाम था। उसके चारों ओर ग्लैमर भी फैला रहता था। हम वैसे भी प्रसन्न रहते थे कि हमारे दोस्तों में भुजंग भी है। यह उस दौर की ख़ुशी थी, जब हमारी (स्पष्ट कर दूं हम यानी मैं, संजय भिसे, कुमार वीरेंद्र, गुरुदत्त पांडेय आदि) कुछ कविताएं ही छपी थीं, हम मार हुड़दंग करते थे, मुंबई के सीनियर लेखकों की नाक में दम किए रहते थे और एक अलग ही रोमान में जिया करते थे। यह रोमान हर युवा के जीवन में रहता है। हम साहित्यिक प्रोग्राम करते थे और कभी अध्‍यक्ष या मुख्य वक्ता की कमी से नहीं जूझते थे. भुजंग था न. हमसे उम्र में दोगुना, पर हम उससे तू-तड़ाक में बात करते थे।

तो रात तीन बजे आने वाला फोन सुबह पांच-छह बजे तक चलता रहता। हफ़्ते में दो-तीन बार उसका फोन आ ही जाता। वह बदनाम था, रात इसी समय फोन करने के लिए। उसने हिंदी के कई बड़े लेखकों को इस तरह नींद से जगाया था। मराठी में दिलीप चित्रे, चंद्रकांत पाटील आदि को लगभग ऐसे ही समय फोन करता था। और कभी माफ़ी नहीं मांगता था। बोलवचन में उस्ताद था। बोलता- कवि को रात-भर जागरण करना चाहिए, और रोना चाहिए, कबीर के माफिक। और वह रोता भी था. जिस दिन ग़ालिब को पढ़ ले, मुक्तिबोध या रघुवीर सहाय को पढ़ ले. डेरेक वाल्‍कॉट या चिनुआ अचेबे या गैब्रियल ओकारा या न्‍गुगी वा थ्यांगो को पढ़ ले। उन्हीं दिनों उसने थ्यांगो की 'डीकोलोनाइजिंग द माइंड' पढ़ी थी और फोन पर उसके हिस्से सुनाया करता था. बाद में वह किताब हमने उससे झटक ली थी.

शराब बहुत पीता था। ग़ुस्से से भरा रहता था। इतिहास को ख़ुर्दबीन लगाकर पढ़ा करता था और पढ़ी हुई चीज़ों को हमेशा शक की निगाह से देखता था। कहता था- महान खोजें उन लोगों ने ही की, जिन्हें शक करने की आदत थी. सुबह पांच-छह बजे तक दारू पीते हुए फोन करने के बाद सुबह दस बजे ऑफिस के लिए निकल भी जाता था. उन दिनों वह ठाणे जिले के एक आदिवासी तालुके में बड़ा अफसर था. घर से स्टेशन तक रोज़ ऑटो रिजर्व करके जाता. उस समय शायद सौ-डेढ़ सौ लग जाते थे एक बार के. हम उसे टोकते, ये कैसी अय्याशी. तो कहता, टिपिकल मुंबइया में, तुम लोग हाथी-घोड़े पर चलते थे, मेरे पुरखों को तुम तपती रेत पर भी नंगे चलाते थे और रास्ते में पानी तक नहीं पीने देते थे. ऑटो में मैं नहीं चलता, मेरे पुरखे चलते हैं, हज़ार-दो हज़ार साल बूढ़े लोग. और कविता कभी रुक-रुक कर , सांस ले-लेकर नहीं पढ़ता था. कहता, वह कविता पढ़ने की ब्राह्मणी सामंती शैली है. आदिवासी कवि एक सांस में कविता पढ़ता है, जैसे एक घूंट में समंदर पीना, एक फूंक से तूफ़ान लाना, एक हुंकार से इंक़लाब लाना. फिर वह ऐसे ग्राम देवताओं के बारे में बताता, जिन्होंने लोक-इतिहास में ऐसे कारनामे किए थे।

भुजंग के बारे में लिखने को बहुत सारी बातें हैं। धीरे-धीरे। कुछ दिन पहले उसकी एक कविता पढ़ रहा था, जो उसके पहले संग्रह 'उलगुलान' में थी. इसका हिंदी अनुवाद मित्र कवि संजय भिसे ने किया है, जो प्रस्तुत है. पर एक बात ज़रूरी है- कविता का हिंदीकरण किया गया है, क्योंकि भुजंग को मराठी में भी सीधे-सीधे नहीं पढ़ा जा सकता. उसकी भाषा मुंबइया, गोंडी, हिंदी, मराठी और कई आदिवासी बोलियों के मिश्रण से बनती है। जिस इतिहास की बात वह करता था, वह इस कविता में दिखता है. और वह इतिहास किसके हाथ में है, यह भी.

ग्रैंडफादर

'वे आए
तब उनके हाथों में थी बाइबल
और हमारे हाथों में थी ज़मीन
परमेश्‍वर नहीं मानता काले-गोरे का भेद
आओ, आंखें बंद कर प्रार्थना करें'

खुश हुए हम
आंखें अपने आप बंद हो गईं
बड़ी उम्‍मीद से खुलीं जब आंखें
तो उनके हाथों में थी ज़मीन, हमारे हाथों में बाइबल।

नाती-पोतों को सुनाने के लिए
इसके अलावा कोई दूसरी परीकथा नहीं है हमारे पास
ऐसे समय दादाजी को अक्कल सिखाना बहुत मुश्किल।
फिर भी मैं करना चाहता हूं साहस
पच्चीस साल ख़ुद से बातें करने के बाद
इधर आए आप
पुकार‍ते हुए आदिमों के नायक
क्या आपको देखना है आदिवासी भारत?

गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर आदिम कला
नाचती है राजधानी में
संस्कृति महलों में करती है कैबरे उस वक़्त
उसकी पालकी और हमारा जुलूस
चलता है एक ही राजमार्ग से
मज़ा आता है।

ये जंगल की जेल अब सभी को प्यारी है
पेड़ों को ख़त्म करना होता है न क्‍योंकि।

खांडव वन ख़त्म नहीं होता
इस बनवास को नकारा नहीं जा सकता।

आपका स्वागत किया जाता है
मंडल को हटाया जाता है
दिखाया जाता है राजघाट ताजमहल लाल कि़ला
छुपा लिया जाता है
बस्तर बेलखेड़ा ज्योतिबा और बाबा
इस अभिनंदन के जवाब में आप देते हैं अपना बयान

'हम दिन-भर एक-दूसरे से लड़ते हैं
शाम को परमेश्वर से माफ़ी मांगते हैं
चर्च में प्रार्थना करते हैं'
समूचा हॉल तालियों से गूंजता है

ग्रैंडफादर, तुम्‍हें बताने जैसा कुछ भी नहीं है
'वे आए तब उनके पास थी भटकन
और हमारे पास इतिहास'
वे बोले
'हम हर चीज़ की करेंगे अदला-बदली
और इस तरह बदल देंगे यह दुनिया।'
हमने किया यक़ीन
अब उनके पास है इतिहास और हमारे पास भटकन।

ग्रैंडफादर, आप बुद्ध को जानते हैं या नहीं?
***

Wednesday, April 16, 2008

कवि मरता नहीं, वह अपना जीना स्थगित कर देता है...

बहुत शुक्रिया सभी मित्रों का. जो यहां आए, और इन कविताओं के साथ थोड़ा वक़्त गुज़ारा. जगदीप भाई, आप लोगों के क़ाफि़ले में आने की प्रेरणा आप लोगों से ही मिली. शेषनागजी, बहुत बरसों के बाद आपको देखकर अच्‍छा लगा.
प्रत्यक्षा, अशोक जी, अल्‍पना जी और उड़न तश्‍तरी जी का आभार. यक़ीनन, हौसला बढ़ता है. कविता लिखना अकेले होते जाना है, वो भी ऐसे भयानक समय में, जब भाषा को इतना चबा-चबाकर बोला जा रहा है कि वह पराई लगने लगती है. भाषा के बीच चल रही तमाम गलाज़तों के बीच एक कवि भाषा में ही ज़रा-सा अटका हुआ बचा रहता है. जैसे शमशेर की पीली शाम में एक पत्ता सांध्‍य तारक-सा अतल में अटका होता है. जैसे आंख की कोर पर एक आंसू ताउम्र अटका हुआ-सा. किनारे पर अटकी एक सूख रही नदी. नदी जिस-सा बन जाने की इच्छा हम सबकी होती है.
जोशिम और अतुल का भी आभार. जैसा कि वृंदावनी ने लिखा, पेंटिंग यक़ीनन हज़ार बांहों वाली है. पोस्ट करते समय मैं क्रेडिट देना भूल गया. यह एक मित्र कलाकार सिद्धार्थ की पेंटिंग है. रविकुमार जी, आपने मेल करने को कहा है, पर आपका आईडी नहीं है मेरे पास. और अनुवादों के लिए शुक्रिया. अरे हां, अबू ख़ां की बकरी को अच्छा याद दिलाया आपने. मेरी स्मृति से निकल गई थी वह कविता. दुर्भाग्य से कोई प्रति नहीं है उस कविता की मेरे पास. यह नौ-दस साल पहले छपी थी, जब शुरुआत की थी मैंने. कुछ दिनों पहले नागपुर से कवि बसंत त्रिपाठी भी वह कविता मांग रहे थे. एक पुरानी कविता स्मृति का इम्तेहान लेने के लिए ही आती होगी. इसी तरह बैंडिट क्वीन पर लिखी एक कविता भी उस समय बहुत पसंद की गई थी. एक पुरस्कार भी मिला था उस पर. लेकिन उसकी भी कोई प्रति नहीं. न छपी हुई, न रफ़ लिखी. पिछले छह-सात बरसों में इतने शहरों में इतनी बार रहा हूं कि बहुत कुछ खो बैठा हूं. एक शायर अपने खोई और छूटी हुई चीज़ों में ही रहता है हमेशा.
जैसे पाकिस्तान के शायर ज़ीशान साहिल अपनी खोई हुई स्‍पेस को तलाशते रहे; और दो दिन पहले अचानक इस धरती को छोड़ दिया. कल ही पता चला. कराची के एक अस्पताल में सांस लेने में दिक़्क़त होने पर भरती हुए और कुछ घंटों में कूच कर गए. यह पूरे बर्रे-सग़ीर की शायरी को लगा ऐसा झटका है, जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं. वह कितना अज़ीज़ और आला दर्जे का शायर था, इस ब्लॉग पर मेरी पहली पोस्ट से पता चल जाएगा. कविताओं की अपनी डायरी में मैंने पहले सफ़े पर उसकी नज़्म लिखी है, उसी तरह ब्लॉग पर पहली नज़्म उसकी रखना चाहता था मैं.
ज़ीशान से जब मैंने बात की थी, तो मक़सद था पहल के लिए फोन पर उनका एक लंबा इंटरव्यू करना. उन्होंने कहा था, सवाल भेज दो, तब तक थोड़ी संभल जाएगी तबियत. उनके लिए कई सवाल लिखे, पर बिना जवाब दिए गए चले गए वह. एक शायर अपने पीछे कितने अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है....
पिछले दिनों मृत्यु सूचना के रूप में बहुत तेज़ी से आई है मुझ तक. कुछ महीनों पहले मुंबई में कवि भुजंग मेश्राम नहीं रहे. मराठी आदिवासी कविता को उन्होंने एक नया स्वर दिया था. एक पका हुआ स्वर. 45 के आसपास था वह. पहल में चंद्रक्रांत पाटील ने उसे याद किया है. ऋतुराज को जब पहल सम्मान मिला, तो कार्यक्रम की सदारत ज्ञानरंजन जी ने भुजंग से ही कराई थी. एक वरिष्ठ कवि का सम्मान एक युवा कवि के हाथ से.
भुजंग के कुछ ही दिनों बाद मुंबई में ही मराठी कवि अरुण काळे का निधन. भुजंग और अरुण दोनों मराठी कविता के पाये थे. उखड़ गए. नाम्‍या ढसाळ की परंपरा के शायर. जिनके लिए कविता कान में उंगली डालकर नाक से सूंघने का बायस नहीं थी. पिछले पखवाड़े मराठी के ही महान कथाकार बाबुराव बागुल का भी निधन हो गया. 80 के आसपास थे. हिंदी वाले दलित साहित्य के नाम पर दया पवार और लक्ष्‍मण गायकवाड़ को पढ़कर धन्य होते हैं, पर शुरुआत तो बागुल से हुई थी. उनको तो हिंदी में आने ही नहीं दिया गया. भाषा की राजनीति बहुत सारे स्तरों पर काम करती है. भाषा के मैदान में एक लेखक को मारना सबसे सरल होता है. बागुल यानी हमारे आबा ने माटुंगा की रेलवे कॉलोनी से मज़दूरी शुरू की थी. वह मज़दूरी ही करते रहे हमेशा. नौ साल पहले हम उनसे मिलने नासिक गए थे- हम यानी भुजंग, संजय भिसे और मैं. अरुण काळे भी वहीं मिला था पहली बार. गांव के एक छोटे-से झोंपड़नुमा घर में रह रहे आबा के पास बिजली कनेक्शन नहीं था. शायद बिल नहीं भरे जाने के कारण काट दी गई थी. शाम होने पर मोमबत्ती और लालटेन से रोशनी मांगनी पड़ी. पूरी उम्र आबा को आंख और हाड़ फोड़ने पड़े, परिवार का पेट भरने लायक़ कमा लें, इसके लिए, साथी लेखकों और संस्कृतिपुरुषों ने कोई क़सर नहीं छोड़ी थी इस बात में कि आबा टूट कर बिखर जाए. पर आबा कभी नहीं टूटा. अपना हल उसने अपने कांधे के ज़ोर से ही खींचा. उसी आबा को उसी महाराष्ट्र सरकार ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी. बंदूक़ें दग़ रही थीं. नासिक की हर सड़क पर आबा के बड़े-बड़े कटआउट्स लगे थे, पोस्‍टर और होर्डिंग थीं. ऐसा लगा, महाराष्ट्र सरकार आबा की मौत का जश्न मना रही हो. व्यवस्था के लिए अत्यंत ख़तरनाक एक लेखक की मौत का जश्न. वह साहसी थे, इसीलिए सुंदर भी. कुछ मनुष्यों, कुछ स्मृतियों की बहादुरी पहले देखनी चाहिए, उनकी सुंदरता बाद में.
आबा, भुजंग और काळे पर जल्द ही और कुछ. ये सब रुलाते रहते हैं. उनमें ज़ीशान भी शामिल हो गया अब.
ज़ीशान एक साधारण आदमी का नाम नहीं था. उसकी तस्वीरें देखिए यहां पर. हां, वह सिर्फ़ 47 का था... http://www.t2f.biz/zeeshan/index.html
आज महान अभिनेता चार्ली चैपलिन का जन्मदिन भी है. ज़ीशान और चैपलिन के सरोकार भी एक-से थे. दोनों पर कुछ पोस्ट्स जल्‍द ही. अभी तो मैं अपने अख़बार में ज़ीशान पर एक पूरा पेज निकालने की तैयारी कर रहा हूं...