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Tuesday, June 12, 2012

नेरूदा और मातील्‍दा - एक प्रेमकथा

नेरूदा और मातील्‍दा, इस्‍ला नेग्रा के पीछे तट पर. 

पाब्‍लो नेरूदा और मातील्‍दा उर्रूतीया की प्रेमकथा, उनका संग-साथ, उनके संस्‍मरण, नोंकझोंक आदि मुझे बहुत आकर्षित करते हैं. दोनों के बारे में कुछ भी मिले, मैं खोज-खोजकर पढ़ता हूं. इनके प्रेम के उन्‍माद के किस्‍से, नेरूदा की कविताओं के कई अनछुए पहलओं की ओर ले जाते हैं.

निर्वासन के दिनों में पाब्‍लो मेक्सिको में थे और वहां उनकी तबीयत बिगड़ गई. चूंकि उनके शत्रु बहुत थे, उनके दोस्‍तों ने उनकी मिज़ाजपुर्सी के लिए किसी अत्‍यंत विश्‍वस्‍त को उनके साथ रखने का फ़ैसला किया. चिली का तानाशाह पाब्‍लो के पीछे पड़ा था और उसकी सा़जि़श पाब्‍लो के भोजन में ज़हर मिला देने की थी. ऐसे में पाब्‍लो के साथ किसी विश्‍वासपात्र का होना ज़रूरी था. उनका एक दोस्‍त एक संघर्षशील गायिका को जानता था, जो अगर पाब्‍लो के साथ रहे, तो तानाशाह को भनक भी न लगेगी. वह थी चिली की ही मातील्‍दा. साथ रहने के दौरान दोनों में प्रेम हो गया. मातील्‍दा मेक्सिको में ही बस गईं. लेकिन ठीक होने के बाद नेरूदा को मेक्सिको से भी भागना पड़ा. वह यूरोप पहुंच गए.

काफ़ी समय बाद उन्‍होंने किसी तरह व्‍यवस्‍था की कि मातील्‍दा भी यूरोप आ जाएं. उन्‍होंने मातील्‍दा को बर्लिन के पुस्‍तक मेले में बुलाया. नेरूदा, सारी व्‍यवस्‍था किसी ख़ुफि़या एजेंट की तरह करवाते थे. यानी एअरपोर्ट से एक गाड़ी मातील्‍दा को लेगी, रास्‍ते में उसे बदल दिया जाएगा, पहले वह दूसरी जगह पहुंचेंगी, वहां से तीसरी जगह और उसके बाद पहली जगह यानी जहां मुलाक़ात होनी थी. मातील्‍दा उत्‍साहित थीं. जब वहां पहुंचीं, तो नेरूदा और उनके दोस्‍तों को देख आतंकित हो गईं. नेरूदा ने उनकी मुलाक़ात तुर्की कवि नाजि़म हिकमत से कराई. नाजि़म, पाब्‍लो के उस प्रेम के बारे में जानते थे. वह मातील्‍दा को देर तक देखते रहे. अचानक छह फीट ऊंचे नाजि़म ने छोटी-सी मातील्‍दा को गोद में उठा लिया, उनका माथा चूमते हुए कहा, 'आय अप्रूव !'

मातील्‍दा दंग रह गईं. जिस रिश्‍ते को छिपाए रखने के लिए वह अपनी हर अभिव्‍यक्ति को नियंत्रित रखती थीं, उस रिश्‍ते के बारे में पाब्‍लो अपने दोस्‍तों से बेहिचक बात करते थे. थोड़ी देर बाद क्‍यूबा के कवि निकोलास गीयेन टहलते हुए आए और पाब्‍लो से कहा, 'तो यह है मातील्‍दा.' और रहस्‍यमय तरीक़े से मुस्‍कराते रहे. मातील्‍दा किताबों और दोस्‍तों में भटकती रही, नेरूदा अपने कार्यक्रमों में उलझे रहे.

शाम होने पर नेरूदा ने मातील्‍दा से कहा, 'गाड़ी तुम्‍हें होटल तक छोड़ देगी. जल्‍दी पहुंच जाओ. वहां तुम्‍हारे लिए एक तोहफ़ा रखा हुआ है.' दिन-भर के अनुभव से हैरान मातील्‍दा सोच में पड़ गईं कि उन्‍हें यूरोप रुकना चाहिए या लौट जाना चाहिए. जैसे ही वह होटल के अपने कमरे में पहुंची, भीतर नेरूदा और नाजि़म पहले से मौजूद थे. मातील्‍दा को हैरान देख दोनों ठहाका मारकर हंस पड़े. नाजि़म ने नाटकीय अंदाज़ में नेरूदा की ओर उंगली से इशारा किया और बोले, 'मैडम, ये है आपका तोहफ़ा. हमारे समय का सर्वश्रेष्‍ठ कवि.' और हंसते हुए ख़ुद कमरे से बाहर चले गए.

मातील्‍दा ने मेक्सिको में जिस नेरूदा को जाना था, वह जान बचाने की ख़ातिर सबसे छिपे बैठे बीमार नेरूदा थे. असली नेरूदा यहां बैठे थे. मुसीबत के सबसे गाढ़े पलों में भी गगनभेदी ठहाके लगाने वाले और अक्‍सर क़रीबी दोस्‍तों को इसी तरह चौंका देने वाले नेरूदा. अगले कुछ दिन दोनों ने यूरोप में साथ घूमते हुए बिताए. दोनों रोमानिया में जिस मकान में ठहरे थे, उसकी केयरटेकर एक रोमानियन महिला थी, जो बहुत स्‍वादिष्‍ट खाना बनाती थी. ये उसकी भाषा न समझ पाते, न ही वह इनकी भाषा समझ पाती. फिर भी वे आपस में बात करते, और बातों को संगीत की तरह सुनते. एक सुबह नाश्‍ते के दौरान पाब्‍लो ने केयरटेकर से अंडे उबालने के लिए कहा. अंडों की संख्‍या बताने के लिए उन्‍होंने दो उंगलियां उठाकर इशारा किया. केयरटेकर मुस्‍कराई और थोड़ी देर बाद ग्‍यारह उबले अंडों के साथ लौटी. उनके यहां दो उंगलियों का अर्थ दो नहीं, ग्‍यारह होता था. वे जितने दिन वहां रहे, नेरूदा उस केयरटेकर को देखते ही ठहाके लगाने लगते थे.

मेक्सिको में मातील्‍दा, नेरूदा के बच्‍चे की मां बनने वाली थीं, लेकिन स्‍वास्‍थ्‍य ख़राब हो जाने के कारण तीन माह का गर्भपात हो गया. उसके बावजूद मातील्‍दा, नेरूदा के साथ कोई लंबा भविष्‍य नहीं देख रही थीं. उनके लिए पाब्‍लो एक बहुत अच्‍छे दोस्‍त थे, जिससे बेशुमार चुहल की जा सकती है. जिसकी कविताओं को रोते हुए पढ़ा जा सकता है और किताब तकिए के नीचे रखकर सोया जा सकता है. उन शुरुआती दिनों के रिश्‍ते, अगंभीरता, व्‍यथा और तेज़ आकर्षण को नेरूदा के संग्रह 'द कैप्‍टन्‍स वर्सेस' की कविताओं में देखा जा सकता है. नेरूदा ने ये कविताएं मातील्‍दा के साथ यूरोप में बिताए समय में ही लिखी थीं. वह कविता लिखते, मातील्‍दा को उसकी पुर्जी थमाकर कहते, जब कोई भी पास न हो, तब पढ़ना. मातील्‍दा अपने कमरे में रात-रात भर एक ही कविता पढ़ती रहतीं. लेकिन वह डरने भी लगीं. उन्‍हें लगता था कि यह छिपा हुआ रिश्‍ता ज़्यादा नहीं चलेगा. एक दिन नेरूदा हमेशा के लिए चले जाएंगे. ऐसे किसी दुख को वह दूर से ही भगा देना चाहती थीं. कई दिनों की उथलपुथल के बाद उन्‍होंने घोषणा कर दी कि वह नेरूदा के साथ नहीं रहेंगी, मेक्सिको लौट जाएंगी. नेरूदा ने उन्‍हें मनाने की कोशिश की. उनके क़रीबी दोस्‍त गीयन ने इस बारे में मातील्‍दा से बात करनी चाही, लेकिन मातील्‍दा ने किसी की सुनने से इंकार कर दिया. 

एक दिन दोनों अलग हो गए. मातील्‍दा पेरिस आ गईं, उस मकान में जिसे नेरूदा ने उन्‍हीं के लिए किराये पर लिया था. वहां से उन्‍हें मेक्सिको रवाना होना था. नेरूदा यूरोप में भटकते रहे. उन्‍हें कुछ-कुछ दिनों में जगह छोड़नी होती थी. तमाम कोशिशों के बाद भी मातील्‍दा मेक्सिको का टिकट ख़रीदने की हिम्‍मत न जुटा पाईं. पेरिस में ही एक महीने रहीं. पीड़ा, अवसाद, दुख और उहापोह के बीच वह प्रतीक्षा करती रहीं कि शायद नेरूदा उन्‍हें एक तार कर दें, कोई चिट्ठी लिख दें या फिर किसी दिन फ़ोन ही कर दें. ऐसा कुछ न होता देख वह हताश हो गईं. उन्‍हें लौट जाने का अपना फ़ैसला ग़लत लग रहा था, लेकिन जितनी बेरुख़ी से वह नेरूदा को छोड़ आई थीं, उनकी हिम्‍मत नहीं हो रही थी कि वह ख़ुद ही अपने दुख को स्‍वीकार कर सकें और नेरूदा को खोजकर यह कह सकें कि तुम्‍हारे बिना नहीं रहा जा रहा.

जिस दिन उन्‍होंने मेक्सिको का टिकट ख़रीदा, उसी शाम उन्‍हें नेरूदा का फ़ोन आया. उनकी आवाज़ सुनते ही वह खिल उठीं. लेकिन नेरूदा ने रूखी सी आवाज़ में कट-टु-कट सिर्फ़ एक लाइन कही, 'कल दोपहर कहीं मत जाना. तुम्‍हारे नाम एक पार्सल भेजा है.' मातील्‍दा को लगा कि नेरूदा की नई किताब 'कान्‍तो जनरल' आने वाली थी, उन्‍होंने वही भिजवाई है. फिर भी नेरूदा का फ़ोन पाकर उन्‍हें बेतहाशा ख़ुशी हुई. उन्‍हें अच्‍छा लगा कि पाब्‍लो ने अभी तक उन्‍हें अपने जीवन से बाहर नहीं किया है. वह अगली दोपहर का इंतज़ार करने लगीं. शाम हो गई, कुछ नहीं आया. रात को अचानक दरवाज़े की घंटी बजी, मातील्‍दा ने लपककर दरवाज़ा खोला, तो सामने नेरूदा की एक प‍त्रकार मित्र खड़ी थी, जिससे इनकी भी अच्‍छी बनती थी. वह प्राग से, शाम वाली फ़्लाइट से आ रही थी.

थोड़ी देर बात करने के बाद मातील्‍दा ने पूछा, 'मेरा कोई पार्सल आने वाला था, क्‍या तुम्‍हीं लाई हो?'

दोस्‍त ने कहा, 'मैं ही तुम्‍हारा पार्सल हूं. मुझे पाब्‍लो ने ही भेजा है, अपने आप नहीं आई हूं.'

फिर दोस्‍त ने कहना शुरू किया, नेरूदा बीमार हो गए हैं. दुबले और क्‍लांत हैं. उनका मन नहीं लगता, वह चिड़चिड़े हो गए हैं. सारे दोस्‍त अब उनसे दूर भागने लगे हैं. उनसे बात करने जाओ, तो काटने को दौड़ते हैं. आज सुबह उनका फ़ोन आया. मुझे नींद से जगा दिया और कहा, तुम्‍हारा टिकट तैयार है. एअरपोर्ट पर मिल जाएगा. सीधे पेरिस पहुंचो और मातील्‍दा को मेरे पास ले आओ.

मातील्‍दा को यह सब सुन अच्‍छा लगा, लेकिन वह जताने लगीं कि उन्‍हें लौटना है. उन्‍होंने टिकट भी ख़रीद लिया है. वह पाब्‍लो के प्रस्‍ताव के बारे में सोचेंगी और मेक्सिको पहुंचकर उन्‍हें चिट्ठी लिख देंगी.

यह सुनकर दोस्‍त ज़ोर से हंसी और बोली, 'लगता है, तुम पाब्‍लो को अब भी नहीं जान पाई. इतना समय नहीं होता उसके पास. यह सुबह की टिकट है, हम दोनों की. सुबह हम जिनेवा पहुंच रहे हैं. वहां एअरपोर्ट के बाहर एक कैफ़े में पाब्‍लो हमारा इंतज़ार कर रहा होगा. और हां, सुन लो, ऐसे नहीं चलोगी, तो मुझे मजबूरन पेरिस से ही अपने कुछ और दोस्‍तों को बुलाना होगा. फिर हम सब तुम्‍हें जबर्दस्‍ती उठा ले जाएंगे. ऐसा पाब्‍लो ने ही कहा है. उसने सबको तैयार रहने को कहा है. बस, उन्‍हें बुलाने की देर है.'

मातील्‍दा वहीं सुबकने लगीं. अगली सुबह जिनेवा के उस कैफ़े में दोंनो प्रेमी तरुणों की तरह चिपके हुए थे और देर तक रोते रहे थे.


Wednesday, March 7, 2012

तुम्हारा नाम उच्चारना तुम्हें हमेशा के लिए त्याग देना है





बेई दाओ मेरे प्रिय कवि हैं. 1989 में चीन से निर्वासित होने के बाद दुनिया के कई हिस्‍सों में रह-भटक कर कविता करने वाले बेई दाओ अब हांगकांग में रहते हैं और कविता के भीतर अपनी आत्‍मा की कैलीग्राफ़ी करते हैं. पहली नज़र में गूढ़ लगने वाले बेई दाओ को राजनीतिक कवि माना जाता है. पिछले कुछ बरसों से नोबेल पुरस्‍कार के दावेदार हैं, इस क़दर, जो कि उनके क़रीबी दोस्‍त बताते हैं, कि हर साल नोबेल की घोषणा के आसपास वह अपना फ़ोन बंद कर देते हैं, क्‍योंकि घोषणा से पहले यार-दोस्‍त-मीडियावाले-मुंहलगे पाठकगण इस तरह का फ़ोन कर-करके परेशान कर देते हैं कि देखना, इस बार तुम्‍हें ही मिलेगा. फिर घोषणा के बाद यह कह-कहकर कि अरे, इस बार भी नहीं. अगली बार तो पक्‍का मिलेगा, यक़ीन है. अकेला रहने वाला कवि ऐसे फोन कॉल्‍स से घबरा जाता है.

लेकिन अपने आप में यही एक बड़ा उदाहरण है कि उनके पाठकों को उन पर और उनकी कविता पर कितना यक़ीन है.

मैंने बेई दाओ की 36 कविताओं का हिंदी अनुवाद किया है. साथ में एक विस्‍तृत लेख भी है उन पर, और कविता के उपकरणों पर. सबद पर 'सबद पुस्तिका 7' के रूप में प्रकाशित हुआ है. नीचे दिए लिंक पर जाइए, कविताएं पढि़ए. एक विराट कवि के वैभव को देखिए.

हर बार की तरह यह सबद पुस्तिका भी पीडीएफ़ फॉर्मेट में डाउनलोड करने के लिए उपलब्‍ध्‍ा है. नीचे दिए 'सबद' के लिंक पर जाने के बाद 48 पेज की इस पुस्तिका को आप डाउनलोड कर सकते हैं, प्रिंट निकालकर पढ़ सकते हैं, और फ़ाइल में सुरक्षित रख सकते हैं.



नमक
(चिन सान लान्ग के साल्टवर्क नामक फोटोग्राफ़ को देखने के बाद)


निगेटिव पर काली रात का कोयला
लोगों के रोज़मर्रा के नमक में तब्दील हो जाता है
एक चिडिय़ा नई ऊंचाइयों को छूती है
छत पर लगे पैबंद
पृथ्वी को ज़्यादा दुरुस्त बनाते हैं

धुआं पेड़ों से भी ज़्यादा ऊंचाई पर पहुंचता है
यह जड़ों की स्मृति से निकलता है
भारी बर्फ़बारी की नक़ल करता हुआ
समय अपनी अमीरी का प्रदर्शन करता है
रोज़गार के अंधे कुएं
सुबह के दुख पर छलक-छलक जाते हैं

कांपती हुई चहारदीवारी पर चलती हुई शराबी हवा
सड़क पर गिर जाती है
कोहरे के भीतर कोई घंटी गूंजती है -
ऐसे कि बस धड़कता रह जाता है काग़ज़ का हृदय*


शीर्षकहीन-2

दुर्घटनाओं से भी ज़्यादा अपरिचित
मलबों से भी ज़्यादा संपूर्ण

तुम्हारा नाम उच्चारना
तुम्हें हमेशा के लिए त्याग देना है

यौवन के कीचड़ पीछे छूट गए हैं
घड़ी के भीतर कहीं
*

बेई दाओ 


Saturday, February 26, 2011

अलौट व अन्‍य कविता






Photo- Ana Himes

अलौट

अब कभी तुम उतनी मासूम नहीं दिख सकोगी, जितनी पंद्रह साल पहले की एक तस्‍वीर में
हमारे चेहरे की, और दिल की भी, मासूमियत सुखा देने के लिए कम नहीं होता एक पल भी
परिभाषा बदलकर सुंदरता को फिर पाया जा सकता है
मासूमियत को तो किसी पड़ोसी समार्थी तक से भय नहीं होता
इतनी निश्चिंत होती है कि जानती है जाने के बाद लौटकर आना नहीं इस देस


अस्थिरता की आराधना

जिस वक़्त वह जा रही थी, मैं अपनी टेबल पर बैठा एक कविता में खोया हुआ था। अभी-अभी मैं जिन सारी अस्थिरताओं से गुज़रा हूं, उन्हें इस कविता में पकड़ लेना चाहता हूं, इससे पहले कि वे सब उड़ जाएं। ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ है। सोचता हूं कि इसे याद रखूंगा, स्थिर होते ही यह सब लिख डालूंगा। वे सारी स्मृतियां अस्थिरता की होती हैं। और उन्हें अभिशाप है कि स्थिर होते ही वे कपूर की तरह उड़ जाती हैं। सो, जब भी मैं उन्हें लिखने बैठता, वे खो चुकी होतीं। 

अब मैंने स्थिरता की प्रतीक्षा बंद कर दी है। मैं अस्थिरता की आराधना में डूब जाता हूं। पता नहीं, वह कौन-सा शब्द था, जिसे मैं लिख रहा था, तभी उसने कहा, 

मेरे कवि प्रेमी, एक दिन मैं तुम्हारी एक कविता बन जाऊंगी, तुम्हें हज़ार किस्म की दिक़्क़तों में डालूंगी, तुम तड़पकर उसे लिखोगे, और उस दिन तुम्हें मेरी क़ीमत का अहसास होगा।

जब वह दरवाज़े से बाहर निकल रही थी, मैं उसी तरह बेचैन हो रहा था, जैसे स्थिर क्षणों के बीच अस्थिर स्मृतियों के खो जाने और उन्हें काग़ज़ पर न लिख पाने के अफ़सोस के बीच बेचैन रहता था।


Friday, October 1, 2010

अब्‍बू ख़ां की बकरी





यह बहुत पुरानी कविता है, इतनी कि लंबे समय तक यह याद भी नहीं रहा था कि ऐसी कोई कविता लिखी थी. पुराने काग़ज़ों की सफ़ाई करते वक़्त मिली. सफ़ाई तो पहले भी की है, लेकिन मिली अबकी. इसके नीचे तारीख़ है 8 सितंबर 98. यह पूरी होने की तारीख़ है. तब मैं कविता के नीचे पूरी होने की तारीख़ डाला करता था, शुरुआत की नहीं. इसलिए यह नहीं याद कि शुरू कब हुई थी. कुछ ही समय बाद यह गोरखपुर की पत्रिका 'दस्‍तावेज़' में छपी थी. उसके बाद का कुछ नहीं याद. जैसे कभी यह सब लिखा ही न था. मेरे पास वे पत्रिकाएं कभी नहीं होतीं, जिनमें मेरी चीज़ें छपी होती हैं. ऐसा कोई अंक नहीं है, किसी भी पत्रिका का. 2007 में इस कविता की याद नागपुर से कवि-मित्र बसंत त्रिपाठी ने दिलाई. उनसे पहली बार फ़ोन पर बात हो रही थी, और उसी दौरान उन्‍होंने इसका जि़क्र छेड़ा. उन्‍होंने तब पढ़ी थी. उस समय याद आया कि हां, ऐसी एक कविता लिखी थी, पर वह कहां गई, नहीं पता. उस समय भी मैंने इसे खोजा था. बाद के दिनों में भी कुछ और दोस्‍तों ने इस कविता को याद किया. मैं बार-बार याद करता कि उस कविता में मैंने लिखा क्‍या था, कुछ विचारधाराओं-प्रतीकयोजनाओं के आधार पर इसकी सिलाई की थी, इससे ज़्यादा कुछ याद न आता. यही कारण था कि यह न संग्रह में रही, न बातचीत में, न डायरियों में, न ही ऑनलाइन डाटा में. कल शाम मिल ही गई आखि़र. जब इसे नहीं खोज रहा था तब. यही नहीं, कुछ और भूल चुकी कविताएं भी मिली हैं. एकाध को पढ़कर मुझे समझ ही न आया कि ये किन मन:स्थितियों में लिखी गई थीं और इनका अर्थ क्‍या है (जो लोग मुझसे मेरी कविताओं का अर्थ पूछते हैं, उन्‍हें ख़ुश होना चाहिए). 

मुझे ऐसा लगता है कि उस समय मुझे उत्‍तर-आधुनिकता के बारे में कुछ संपट नहीं पड़ा होगा, क्‍योंकि हाशिए पर एक नोट में उसे भी इसमें शामिल करने का निर्देश लिखा हुआ है. संपट होती, तो पता नहीं क्‍या लिखता. अभी भी यही सोच रहा हूं कि क्‍या लिखा है. पुरानी, विस्‍मृत रचनाओं को देखकर हम हमेशा ऐसा सोचते हैं कि इसे आज लिखा होता, तो ये-ये, वो-वो दुरुस्‍त कर देता. दुरुस्‍त कर लेने वाला भाव ही शायद आपका क्रमिक विकास होता हो. 

ख़ैर, बारह साल पहले भूली जा चुकी यह कविता पढ़ें. इसे यहां लगाने से पहले मैं इसे कवि बसंत त्रिपाठी को ही समर्पित करता हूं.     
***



अब्‍बू ख़ां की बकरी


अब्‍बू ख़ां एक परंपरा है
अब्‍बू ख़ां की बकरी एक मुहावरा

सबसे पहले हमें कुछ बुनियादी बातों पर सोचना चाहिए
अब्‍बू ख़ां कौन था
वह बकरियां क्‍यों पालता था
उसने कितनी बकरियां पाली थीं
उसकी बकरियां बार-बार उसके पास से भाग क्‍यों जाती थीं
उसकी बकरियों को खा जाने वाला भेडि़या कौन था
जब उसने धीरे-धीरे सारी बकरियां खा डालीं
तो क्‍या अब्‍बू ख़ां ने बकरियां पालना छोड़ दिया

मार्क्‍सवादी पद्धति से इस पर सोचा जाए
तो अब्‍बू ख़ां मेहनतकश वर्ग का था जिसे
सर्वहारा कहा जाना चाहिए
अय्यप्‍प पणिक्‍कर की एक कविता खुजली और बंबई में
प्रचलित शब्‍द खुजली के आशयों के अनुसार
उसे बकरी पालने की खुजली थी
या उसके पेट में भूख नाम की एक पिशाचिनी रहती थी
जो उससे बकरी पलवाती थी
और उसका दूध निकलवाती थी
यानी बकरी उसके लिए उत्‍पादन का साधन थी
जिसे दुहकर वह एक तरह से दूध का उत्‍पादन करता था
इस तरह देखा जाए तो
उत्‍पादन के उस साधन पर अब्‍बू ख़ां की मिल्कियत थी
अब्‍बू ख़ां दूध निकालने में मेहनत भी करता था
अर्थात वह मेहनतकश भी था
अर्थात उत्‍पादन के साधन पर मेहनतकश का स्‍वामित्‍व था
तो इस तर्क के आधार पर हम यह कैसे कह सकते हैं
कि अब्‍बू ख़ां सर्वहारा था
लेकिन उसकी माली हालत इतनी अच्‍छी भी नहीं थी कि
उसे नेशनल बूर्ज्‍वाजी का नाम दे सकें
उसे हम मध्‍यवर्ग या निम्‍न(मध्‍य)वर्ग में ले सकते हैं
जो श्रम करता है और वस्‍तुत: भूख का श्रमिक होता है

दूसरी तरफ़ इसे थोड़ा अस्तित्‍ववादी मोड़ दिया जाए
तो अब्‍बू ख़ां एक स्‍वतंत्र व्‍यक्ति था
और उसकी एक निरपेक्ष्‍ा इच्‍छा थी कि बकरी पाली जाए
अस्तित्‍वाद में व्‍यक्ति के पास इच्‍छा का होना ज़रूरी है
इसमें ऐसा नहीं कि भूख मर जाती है
बल्कि भूख मिटाने की इच्‍छा का होना महत्‍व का है
व्‍यक्तिनिष्‍ठ तरीक़े से वह एक व्‍यक्ति था
जिसके पास एक व्‍यक्तिगत भूख होती है
जिसे वह व्‍यक्तिगत या सार्वजनिक माध्‍यम से पूरा करता है
उसकी बकरियों की भी एक निहायत व्‍यक्तिगत इच्‍छा होती है
मुक्ति की जिसे आध्‍यात्मिक शब्‍दों में
अब्‍बू ख़ां से मुक्ति पूरी दुनिया से मुक्ति पा मोक्ष की तलाश
कह सकते हैं
जबकि मार्क्‍सवादी शब्‍दों में बकरी सर्वहारा नहीं है
क्‍योंकि उसके पास खोने के लिए बेडि़यां और पाने के लिए सबकुछ के ठीक उलट
खोने के लिए बेडि़यों के साथ सुरक्षा और प्‍यार और पाने के लिए भेडि़ये से संघर्ष और मौत है
हालांकि मार्क्‍सवाद नियतिवाद में विश्‍वास नहीं करता

अस्तित्‍ववादी परंपरा और रेनेसां की प्रतीकयोजना के मुताबिक़ यह भी संभव है कि
अब्‍बू ख़ां भारत का एक आम व्‍यक्ति हो
और उसके पास कोई बकरी ही न हो
यानी अब्‍बू ख़ां के दिमाग़ के कुछ अंधेरे पहलू हों
और उनमें कुछ बकरियां निवास करती हों
बकरियां ज़रूरी नहीं कि बकरी की तरह ही हों
बकरियां नादान होती हैं सीधी-सादी होती हैं
सो बकरियां दिमाग़ के नादान सुविचार भी हो सकती हैं
और भेडि़या भी दिमाग़ में ही निवास करता हो
किसी भयानक कुविचार की तरह
अब्‍बू ख़ां के दिमाग़ की बकरियां जब-जब हरे-भरे मैदानों में तफ़रीह करना चाहती हों
यानी अब्‍बू ख़ां के नादान सुविचार उससे मुक्‍त हो अमल में आना चाहते हों
या अभिव्‍यक्‍त हो सार्वजनिक हो जाना चाहते हों
ठीक उसी समय धर दबोचता हो उन्‍हें कुविचार का भेडि़या
अब्‍बू ख़ां की बकरी को हम देश के हर आदमी के दिमाग़ के अंधेरे पहलुओं में
चल रहे सुविचार-कुविचार के संघर्ष के रूप में देख सकते हैं
पर चूंकि यह वैदिक-ऐतिहासिक धर्म-अधर्म का संघर्ष नहीं
सो इसमें बकरी रूपी धर्म अर्थात कमज़ोर नादान सुविचारों की ही जीत हुई हो
इतिहास में ऐसा कभी दर्ज नहीं हो पाया

यह भी संभव है कि अब्‍बू ख़ां अपनी बकरियों और भेडि़ये और अपनी पूरी कहानी समेत हमारे दिमाग़ में रहता हो, लड़ाई चलती ही रहती हो और वह हमारे बहुत सारे निर्णयों को प्रभावित भी करता हो 

आजकल के टाइम का एक व्‍यावहारिक सिद्धांत यह भी है
बतर्ज लड़की अगर मिनी स्‍कर्ट पहनेगी तो रेपिस्‍ट तो आएगा ही कि
बकरी जब देर रात घने जंगल में अकेले घूमेगी
तो भेडि़या तो उसे खाएगा ही
इसमें दोष बकरी का ही था
क्‍योंकि बकरी ही बार-बार आज़ाद होने के लिए अब्‍बू ख़ां के पास से भाग जाती थी
और भेडि़ये के इलाक़े में पहुंच जाती थी
फुक्‍कट में भेडि़ये को दोष कायको देना
उसके पास भी भूख है और पारिस्थितिकी के अनुसार उसका आ‍हार बकरियां हैं
सवाल यह है कि बकरियां अब्‍बू ख़ां से आज़ादी क्‍यों चाहती थीं
क्‍या मेहनतकश अब्‍बू ख़ां शोषक अब्‍बू ख़ां भी था
क्‍या अब्‍बू ख़ां की पालना में रहना अब्‍बू ख़ां की कष्‍टकर ग़ुलामी में रहना था
वे अब्‍बू ख़ां के पास घास खाने, दूध देने, छोटी-छोटी लेंडियां करने और
जब-तब में-में करने के सिवाय करती ही क्‍या थीं
अब्‍बू ख़ां में कोई लाड़-प्‍यार भी था जो बकरियों का दिमाग़ फिरा देने को काफ़ी था
और उन बकरियों की भूख नामक मूलभूत ज़रूरत पूरी तरह संतुष्‍ट थी
क़ायदे की बात है कि जब पेट भरा हुआ होता है
तो आज़ाद होने की बात ख़याल आती है
(देश की आज़ादी का पूरा संघर्ष ही भरे पेट वाले लोगों की अगुआगिरी में हुआ था)

अब यहां कलावादी उचककर सवाल करते हैं
लेकिन हर चीज़ आकर भूख पर ही क्‍यों टिक जाती है
और भी ग़म हैं ज़माने में भूख के सिवाय

ये तो आप जानते ही हैं कि ऐसा कौन कहेगा कि
भेडि़या हिंदू था और मुसलमान (की) बकरियों को ही खाना प्रिफ़र करता था

क़ानून की बात कि अब्‍बू ख़ां ने अपनी बकरियों की सुरक्षा का इंतज़ाम कैसा किया था
अलेक्‍ज़ेंडर ब्‍लोक के प्रतीकवाद और मायकोवस्‍की के बाद के भविष्‍यवाद पर आएं
और अब्‍बू ख़ां की बकरियों को अब्‍बू ख़ां की बेटियों के रूप में देखें तो
लड़कियों के बार-बार भेडि़यों द्वारा खा लिये जाने की अनंत दारुण कथा समझ में आती है
तब भेडि़ये को कैसे लें
जवान लड़कियों को सुनहरी सपने दिखा खींच लेने वाला प्रलोभन
एक ऐसा चुंबक जिसे पता है मिट्टी और लोहे के बुरादों का फ़र्क़
फिर बकरियों को क्‍यों नहीं पता अब्‍बू ख़ां और भेडि़ये का फ़र्क़

जब-जब कोई बकरी मारी जाती है
तब-तब अब्‍बू ख़ां ख़ुद को भयंकर असुरक्षित और एकाकी महसूस करता है
जब-जब हमारे दिमाग़ में कोई पराजय होती है दुख सिर उठाता है
हम अब्‍बू ख़ां की गति को प्राप्‍त होने लग जाते हैं
उपभोक्‍तावाद में बकरी हमारी संस्‍कृति बन जाती है और भेडि़या बाज़ार आक्रांता
हम एक-एक करके अपनी बकरियां खोते जा रहे हैं अलग-थलग होते जा रहे हैं
पूंजीवाद अपने विध्‍वंसक रूप के प्रभावों से व्‍यक्ति को लगातार आत्‍मकेंद्रित
अलग-थलग और एकाकी बनाता जाता है

ज़रा फिर मार्क्‍सवादी-समाजवादी संदर्भों में लौटें
भुवनेश्‍वर, सर्वेश्‍वर से लेकर विमल कुमार की कविताओं का भेडि़या कितने रूप बदल चुका है
क्‍या अब्‍बू ख़ां की बकरियों के प्रतिकूल परिस्थिति का निर्माण करने की प्रवृत्ति ही भेडि़या है
अगर बकरी अब्‍बू ख़ां का श्रम है तो उसे बेमोल पचा ले जाता है
उसके उत्‍पादन का एक अंग तो लगान की तरह वसूल ले जाता है
अब्‍बू ख़ां लाख सिर पटकता है
बकरी उसके पास टिकती नहीं
पालतू ग़ाफि़ल हो बार-बार भग जाती है
घात लगाये भेडि़या दबोच लेता है
अब्‍बू ख़ां रोता है
अकेले में बूढ़ा होता है

अब्‍बू ख़ां एक परंपरा है
अब्‍बू ख़ां की बकरी एक कहावत-मुहावरा
भेडि़या परंपराओं-कहावतों से रूढ़ एक नंगी असलियत
(फिन देक के लो न भिड़ू, कविता को परंपराओं-मुहावरों से बचाने का है,
बोले तो काय-काय चीज़ से बचाने का है, समझ के लो न)


Monday, August 11, 2008

भाषा के मानचित्र में एक निर्वासित कवि का देश.



महमूद दरवेश समकालीन अरबी दुनिया के सबसे बड़े कवि थे. एक ऐसे देश के कवि, जिसका अस्तित्‍व सिर्फ़ शब्‍दों और भाषा में है. हज़ारों लेखों, भाषणों में उन्‍हें फ़लीस्‍तीन की दिलो-जु़बां कहा गया. वह अपने देश की लड़ाई लड़ते रहे, अपनी ज़मीन को अपना कह सकने की लड़ाई. कुछ उनके साथ रहे, कुछ उनके खि़लाफ़. संबंधों का विकेंद्रीकरण ऐसे ही होता है. एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था, जीते-जी अपने लिए एक राष्‍ट्र नहीं पा सका मैं, सिर्फ़ इसका सुकून है कि मैंने अपनी भाषा में अपने लिए एक राष्‍ट्र बनाया, अपनी मातृभूमि के सीवान उसी भाषा में पहचाने. कई बरस जेल में गुजारने के बाद उन्‍हें निर्वासित होना पड़ा. और वह इतना लंबा चला, कि एक कविता में उन्‍होंने लिखा- अब निर्वासन की लत लग गई है. वह मूलत: लिरिकल कवि थे. प्रेम और विद्रोह के गीत गाते. उनकी कई कविताएं, मसलन रीता और राइफल, मैं जहां से आया, मेरे शब्‍द आदि अरबी दुनिया में बाक़ायदा गाए और गुनगुनाए जाते हैं. लोकप्रियता इतनी कि उनकी कविता या भाषण सुनने के लिए अस्‍सी हज़ार की भीड़ इकट्ठी हो जाए. मेरे पास एक वीडियो था, जिसमें वह नेरूदा पर बोल रहे हैं, उनकी कविताओं को अरबी अनुवाद सुना रहे हैं और एक लाख के क़रीब भीड़ हर चौथी लाइन पर तालियों के शोर में तब्‍दील हो रही है.

उनकी कविताएं बाग़ी तेवर की हैं, लेकिन 90 के बाद की कविताएं मिस्टिक या रहस्‍यवादी प्रवृत्ति की हैं. निर्वासन के दिनों में उन्‍होंने अंग्रेज़ी और फ्रेंच सीखी और इनसे जुड़े मिथक उनकी कविता में तेज़ी से आए. आलोचकों ने उन पर भटकने का आरोप लगाया, पर उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई. उनका कहना था, मैं ख़ुद की आलोचना करता हूं और हमेशा ख़ुद को एक सीढ़ी ऊपर उठाना चाहता हूं. लेकिन इसका मतलब यह क़तई नहीं कि मैंने पहले जो कविताएं लिखीं, उनके लिए मुझमें कोई अफ़सोस या क्षमायाचना का भाव हो. वह स्‍वर मेरी कविता की टेक है, जो नई कविताओं में भी बरक़रार है. अच्‍छा कवि वही होता है, जो बहुत ज़्यादा पढ़े और समय-समय पर दूसरों से प्रभावित भी हो.

कल उनके निधन पर कबाड़ख़ाना में कुछ कविताएं लगाई गई थीं. आज यहां प्रस्‍तुत है एक कविता और डायरी से एक पीस. कविता उनकी शब्‍दयात्रा का आख्‍यान है और जबकि डायरी ख़ूबसूरत गद्य का नमूना. उस पीस में आया मच्‍छर क्‍या है, वे लोग भली-भांति समझ जाएंगे, जिन्‍होंने सत्‍ता के असली रूपों को बहुत क़रीब से देखा हो. आप अपना ब्‍लडग्रुप बदलवा लें, सत्‍ता आपको नहीं काटेगी. यह पीस अनुवाद करते समय मुझे मायकोवस्‍की की वह कविता बार-बार याद आई (जो उन्‍होंने आखि़री दिनों में सोवियत व्‍यवस्‍था में फैली और निर्णायक रूप से घातक साबित हुई भ्रष्‍ट अफ़सरशाही पर लिखी थी), '... शार्क मछलियों को मैंने छका दिया, फलां-फलां ख़तरनाक जानवरों से मैं बच निकला, पर जिन्‍होंने मुझे मारा, वे खटमल थे.'


मेरे शब्‍द

जब मिट्टी थे मेरे शब्‍द
मेरी दोस्‍ती थी गेहूं की बालियों से

जब क्रोध थे मेरे शब्‍द
ज़ंजीरों से दोस्‍ती थी मेरी

जब पत्‍थर थे मेरे शब्‍द
मैं लहरों का दोस्‍त हुआ

जब विद्रोही हुए मेरे शब्‍द
भूचालों से दोस्‍ती हुई मेरी

जब कड़वे सेब बने मेरे शब्‍द
मैं आशावादियों का दोस्‍त हुआ

पर जब शहद बन गए मेरे शब्‍द
मक्खियों ने मेरे होंठ घेर लिए.


मच्‍छर और आपका ब्‍लडग्रुप

मच्‍छर, मेरी भाषा में हमेशा स्‍त्रीलिंगी है और गॉसिप से ज़्यादा जानलेवा है. वह न केवल आपका ख़ून चूसती है, बल्कि एबसर्डिटी के खि़लाफ़ आपको एक लड़ाई में झोंक देती है. और बुख़ार की तरह हमेशा अंधेरे में आती है. किसी जंगी जहाज़ की तरह वह झिन-झिन, घुं-घुं करती है, जिसे आप निशाने पर उसके हमले के बाद सुन पाते हैं. निशाना आपका ख़ून है. आप उसे खोजने के लिए बत्‍ती जला देते हैं और वह आपकी हैरानी की सबसे ऊंची अटारी पर जाकर खो जाती है. वहां किसी दीवार पर बैठ वह सुस्‍ता रही होती है, सुरक्षित, शांतिपूर्ण, स्‍वीकार्य. आप उसे अपने जूते से मार देना चाहते हैं, पर वह याचना करती है, बचकर भाग निकलती है, और फिर एक आत्‍महंता जि़द के साथ दुबारा आप तक आ जाती है. आप फिर कोशिश करते हैं, और फिर हार जाते हैं. चीख़-चीख़कर उसे बददुआएं देते हैं, वह कान तक नहीं धरती. आप मीठी ज़बान में उससे शांतिवार्ता करते हैं: तुम सो जाओ, उसके बाद मैं भी सो जाऊंगा. आपको लगता है कि आपने उसे मना लिया है, बत्‍ती बुझाकर आप सो जाते हैं. भले उसने आपको ढेर सारा ख़ून चूस रखा हो, वह फिर अपनी झिन:झिन, घुं-घुं शुरू कर देती है, अगले हवाई हमले की घोषणा में. और आपको अनिद्रा के साथ एक दूसरी लड़ाई में झोंक देती है. एक बार फिर आप बत्‍ती जलाते हैं और कोई किताब पढ़ने लगते हैं, ताकि अनिद्रा और उससे, दोनों से लड़ा जा सके. वह खुले हुए पन्‍ने पर आकर बैठ जाती है और आप पुलक उठते हैं कि चलो, अब ये फंसी जाल में. आप ज़ोर-से किताब बंद करते हैं. मैंने उसे मार डाला... मैंने उसे मार डाला. जीत का जश्‍न मनाने के लिए जब आप किताब दुबारा खोलते हैं, तो पाते हैं, वहां न तो मच्‍छर है, और न ही शब्‍द. पन्‍ना पूरी तरह सफ़ेद और ख़ाली है. मेरी भाषा में हमेशा स्‍त्रीलिंगी अभिव्‍यक्ति पाने वाली मच्‍छर कोई रूपक नहीं है, बल्कि एक कीट है, जो आपके ख़ून से प्‍यार करता है. वह बीस मील दूर से भी आपके ख़ून को सूंघ सकती है, और उससे युद्धविराम का सिर्फ़ एक ही रास्‍ता है, आप अपना ब्‍लडग्रुप बदलवा लें.

Wednesday, April 16, 2008

कवि मरता नहीं, वह अपना जीना स्थगित कर देता है...

बहुत शुक्रिया सभी मित्रों का. जो यहां आए, और इन कविताओं के साथ थोड़ा वक़्त गुज़ारा. जगदीप भाई, आप लोगों के क़ाफि़ले में आने की प्रेरणा आप लोगों से ही मिली. शेषनागजी, बहुत बरसों के बाद आपको देखकर अच्‍छा लगा.
प्रत्यक्षा, अशोक जी, अल्‍पना जी और उड़न तश्‍तरी जी का आभार. यक़ीनन, हौसला बढ़ता है. कविता लिखना अकेले होते जाना है, वो भी ऐसे भयानक समय में, जब भाषा को इतना चबा-चबाकर बोला जा रहा है कि वह पराई लगने लगती है. भाषा के बीच चल रही तमाम गलाज़तों के बीच एक कवि भाषा में ही ज़रा-सा अटका हुआ बचा रहता है. जैसे शमशेर की पीली शाम में एक पत्ता सांध्‍य तारक-सा अतल में अटका होता है. जैसे आंख की कोर पर एक आंसू ताउम्र अटका हुआ-सा. किनारे पर अटकी एक सूख रही नदी. नदी जिस-सा बन जाने की इच्छा हम सबकी होती है.
जोशिम और अतुल का भी आभार. जैसा कि वृंदावनी ने लिखा, पेंटिंग यक़ीनन हज़ार बांहों वाली है. पोस्ट करते समय मैं क्रेडिट देना भूल गया. यह एक मित्र कलाकार सिद्धार्थ की पेंटिंग है. रविकुमार जी, आपने मेल करने को कहा है, पर आपका आईडी नहीं है मेरे पास. और अनुवादों के लिए शुक्रिया. अरे हां, अबू ख़ां की बकरी को अच्छा याद दिलाया आपने. मेरी स्मृति से निकल गई थी वह कविता. दुर्भाग्य से कोई प्रति नहीं है उस कविता की मेरे पास. यह नौ-दस साल पहले छपी थी, जब शुरुआत की थी मैंने. कुछ दिनों पहले नागपुर से कवि बसंत त्रिपाठी भी वह कविता मांग रहे थे. एक पुरानी कविता स्मृति का इम्तेहान लेने के लिए ही आती होगी. इसी तरह बैंडिट क्वीन पर लिखी एक कविता भी उस समय बहुत पसंद की गई थी. एक पुरस्कार भी मिला था उस पर. लेकिन उसकी भी कोई प्रति नहीं. न छपी हुई, न रफ़ लिखी. पिछले छह-सात बरसों में इतने शहरों में इतनी बार रहा हूं कि बहुत कुछ खो बैठा हूं. एक शायर अपने खोई और छूटी हुई चीज़ों में ही रहता है हमेशा.
जैसे पाकिस्तान के शायर ज़ीशान साहिल अपनी खोई हुई स्‍पेस को तलाशते रहे; और दो दिन पहले अचानक इस धरती को छोड़ दिया. कल ही पता चला. कराची के एक अस्पताल में सांस लेने में दिक़्क़त होने पर भरती हुए और कुछ घंटों में कूच कर गए. यह पूरे बर्रे-सग़ीर की शायरी को लगा ऐसा झटका है, जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं. वह कितना अज़ीज़ और आला दर्जे का शायर था, इस ब्लॉग पर मेरी पहली पोस्ट से पता चल जाएगा. कविताओं की अपनी डायरी में मैंने पहले सफ़े पर उसकी नज़्म लिखी है, उसी तरह ब्लॉग पर पहली नज़्म उसकी रखना चाहता था मैं.
ज़ीशान से जब मैंने बात की थी, तो मक़सद था पहल के लिए फोन पर उनका एक लंबा इंटरव्यू करना. उन्होंने कहा था, सवाल भेज दो, तब तक थोड़ी संभल जाएगी तबियत. उनके लिए कई सवाल लिखे, पर बिना जवाब दिए गए चले गए वह. एक शायर अपने पीछे कितने अनसुलझे सवाल छोड़ जाता है....
पिछले दिनों मृत्यु सूचना के रूप में बहुत तेज़ी से आई है मुझ तक. कुछ महीनों पहले मुंबई में कवि भुजंग मेश्राम नहीं रहे. मराठी आदिवासी कविता को उन्होंने एक नया स्वर दिया था. एक पका हुआ स्वर. 45 के आसपास था वह. पहल में चंद्रक्रांत पाटील ने उसे याद किया है. ऋतुराज को जब पहल सम्मान मिला, तो कार्यक्रम की सदारत ज्ञानरंजन जी ने भुजंग से ही कराई थी. एक वरिष्ठ कवि का सम्मान एक युवा कवि के हाथ से.
भुजंग के कुछ ही दिनों बाद मुंबई में ही मराठी कवि अरुण काळे का निधन. भुजंग और अरुण दोनों मराठी कविता के पाये थे. उखड़ गए. नाम्‍या ढसाळ की परंपरा के शायर. जिनके लिए कविता कान में उंगली डालकर नाक से सूंघने का बायस नहीं थी. पिछले पखवाड़े मराठी के ही महान कथाकार बाबुराव बागुल का भी निधन हो गया. 80 के आसपास थे. हिंदी वाले दलित साहित्य के नाम पर दया पवार और लक्ष्‍मण गायकवाड़ को पढ़कर धन्य होते हैं, पर शुरुआत तो बागुल से हुई थी. उनको तो हिंदी में आने ही नहीं दिया गया. भाषा की राजनीति बहुत सारे स्तरों पर काम करती है. भाषा के मैदान में एक लेखक को मारना सबसे सरल होता है. बागुल यानी हमारे आबा ने माटुंगा की रेलवे कॉलोनी से मज़दूरी शुरू की थी. वह मज़दूरी ही करते रहे हमेशा. नौ साल पहले हम उनसे मिलने नासिक गए थे- हम यानी भुजंग, संजय भिसे और मैं. अरुण काळे भी वहीं मिला था पहली बार. गांव के एक छोटे-से झोंपड़नुमा घर में रह रहे आबा के पास बिजली कनेक्शन नहीं था. शायद बिल नहीं भरे जाने के कारण काट दी गई थी. शाम होने पर मोमबत्ती और लालटेन से रोशनी मांगनी पड़ी. पूरी उम्र आबा को आंख और हाड़ फोड़ने पड़े, परिवार का पेट भरने लायक़ कमा लें, इसके लिए, साथी लेखकों और संस्कृतिपुरुषों ने कोई क़सर नहीं छोड़ी थी इस बात में कि आबा टूट कर बिखर जाए. पर आबा कभी नहीं टूटा. अपना हल उसने अपने कांधे के ज़ोर से ही खींचा. उसी आबा को उसी महाराष्ट्र सरकार ने पूरे राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी. बंदूक़ें दग़ रही थीं. नासिक की हर सड़क पर आबा के बड़े-बड़े कटआउट्स लगे थे, पोस्‍टर और होर्डिंग थीं. ऐसा लगा, महाराष्ट्र सरकार आबा की मौत का जश्न मना रही हो. व्यवस्था के लिए अत्यंत ख़तरनाक एक लेखक की मौत का जश्न. वह साहसी थे, इसीलिए सुंदर भी. कुछ मनुष्यों, कुछ स्मृतियों की बहादुरी पहले देखनी चाहिए, उनकी सुंदरता बाद में.
आबा, भुजंग और काळे पर जल्द ही और कुछ. ये सब रुलाते रहते हैं. उनमें ज़ीशान भी शामिल हो गया अब.
ज़ीशान एक साधारण आदमी का नाम नहीं था. उसकी तस्वीरें देखिए यहां पर. हां, वह सिर्फ़ 47 का था... http://www.t2f.biz/zeeshan/index.html
आज महान अभिनेता चार्ली चैपलिन का जन्मदिन भी है. ज़ीशान और चैपलिन के सरोकार भी एक-से थे. दोनों पर कुछ पोस्ट्स जल्‍द ही. अभी तो मैं अपने अख़बार में ज़ीशान पर एक पूरा पेज निकालने की तैयारी कर रहा हूं...