तीन बजे रात को जब फोन की घंटी बजती थी, तो पूरा घर गूंज उठता था। पैरेलल था। एक चिंघाड़े, तो दूसरा भी चुप कैसे रह सकता था। नींद में डूबे पूरे घर को समझ में आ जाता था कि किसका फोन होगा। फोन मेरे कमरे में नहीं था। मैं किसी किताब में खोया रहता और उसे खोह से निकल हॉल की तरफ़ दौड़ता। नहीं चाहता कि फोन और देर तक चिल्लाए, कोई और जाकर उसे उठाए और नींद की अशिष्टता में सामने वाले को हड़का न दे। उस पार एक गूंजती हुई आवाज़ होती, जो बहुत ठहर- ठहर कर बार-बार मेरा नाम लेती। मैं कहता, हां भुजंग, बोलो, मैं ही हूं। वह भुजंग मेश्राम का फोन होता। उसके फोन रात के तीन बजे ही आते थे। कभी दस मिनट जल्दी, तो कभी दस मिनट देर से। पर दिन में तीन बजे, सुबह दस बजे, शाम को आठ बजे उसका फोन कभी नहीं आया। पूरे घर को पता थी यह बात। और घर वूं भी मेरे दोस्तों से परेशान रहता था। कोई रात को दो बजे दरवाज़े पर खड़ा होकर नाम पुकार रहा है, तो कोई सीटी बजा रहा है. घंटी कोई नहीं बजाता. उन्हें लगता है, घंटी बजाने से घर के दूसरे लोग जाग जाएंगे. जबकि उनके चिल्लाने से पूरा मोहल्ला जाग जाए, उन्हें परवाह नहीं. दिन के दोस्त अलग थे, रात के अलग. जो रात को दरवाज़े पर आवाज़ देते थे, वे वेताल थे, असुरों की प्रजाति के, निशाचर. उनमें से कोई अहिरावण जैसा दिखता, कोई महिरावण जैसा.
भुजंग मेश्राम उनमें से ही था। 97-98 का समय था. मेरी उम्र 19-20 की थी। कविताएं लिखता था। पढ़ता था। भुजंग मराठी कविता का प्रतिष्ठित और स्थापित नाम था। उसके चारों ओर ग्लैमर भी फैला रहता था। हम वैसे भी प्रसन्न रहते थे कि हमारे दोस्तों में भुजंग भी है। यह उस दौर की ख़ुशी थी, जब हमारी (स्पष्ट कर दूं हम यानी मैं, संजय भिसे, कुमार वीरेंद्र, गुरुदत्त पांडेय आदि) कुछ कविताएं ही छपी थीं, हम मार हुड़दंग करते थे, मुंबई के सीनियर लेखकों की नाक में दम किए रहते थे और एक अलग ही रोमान में जिया करते थे। यह रोमान हर युवा के जीवन में रहता है। हम साहित्यिक प्रोग्राम करते थे और कभी अध्यक्ष या मुख्य वक्ता की कमी से नहीं जूझते थे. भुजंग था न. हमसे उम्र में दोगुना, पर हम उससे तू-तड़ाक में बात करते थे।
तो रात तीन बजे आने वाला फोन सुबह पांच-छह बजे तक चलता रहता। हफ़्ते में दो-तीन बार उसका फोन आ ही जाता। वह बदनाम था, रात इसी समय फोन करने के लिए। उसने हिंदी के कई बड़े लेखकों को इस तरह नींद से जगाया था। मराठी में दिलीप चित्रे, चंद्रकांत पाटील आदि को लगभग ऐसे ही समय फोन करता था। और कभी माफ़ी नहीं मांगता था। बोलवचन में उस्ताद था। बोलता- कवि को रात-भर जागरण करना चाहिए, और रोना चाहिए, कबीर के माफिक। और वह रोता भी था. जिस दिन ग़ालिब को पढ़ ले, मुक्तिबोध या रघुवीर सहाय को पढ़ ले. डेरेक वाल्कॉट या चिनुआ अचेबे या गैब्रियल ओकारा या न्गुगी वा थ्यांगो को पढ़ ले। उन्हीं दिनों उसने थ्यांगो की 'डीकोलोनाइजिंग द माइंड' पढ़ी थी और फोन पर उसके हिस्से सुनाया करता था. बाद में वह किताब हमने उससे झटक ली थी.
शराब बहुत पीता था। ग़ुस्से से भरा रहता था। इतिहास को ख़ुर्दबीन लगाकर पढ़ा करता था और पढ़ी हुई चीज़ों को हमेशा शक की निगाह से देखता था। कहता था- महान खोजें उन लोगों ने ही की, जिन्हें शक करने की आदत थी. सुबह पांच-छह बजे तक दारू पीते हुए फोन करने के बाद सुबह दस बजे ऑफिस के लिए निकल भी जाता था. उन दिनों वह ठाणे जिले के एक आदिवासी तालुके में बड़ा अफसर था. घर से स्टेशन तक रोज़ ऑटो रिजर्व करके जाता. उस समय शायद सौ-डेढ़ सौ लग जाते थे एक बार के. हम उसे टोकते, ये कैसी अय्याशी. तो कहता, टिपिकल मुंबइया में, तुम लोग हाथी-घोड़े पर चलते थे, मेरे पुरखों को तुम तपती रेत पर भी नंगे चलाते थे और रास्ते में पानी तक नहीं पीने देते थे. ऑटो में मैं नहीं चलता, मेरे पुरखे चलते हैं, हज़ार-दो हज़ार साल बूढ़े लोग. और कविता कभी रुक-रुक कर , सांस ले-लेकर नहीं पढ़ता था. कहता, वह कविता पढ़ने की ब्राह्मणी सामंती शैली है. आदिवासी कवि एक सांस में कविता पढ़ता है, जैसे एक घूंट में समंदर पीना, एक फूंक से तूफ़ान लाना, एक हुंकार से इंक़लाब लाना. फिर वह ऐसे ग्राम देवताओं के बारे में बताता, जिन्होंने लोक-इतिहास में ऐसे कारनामे किए थे।
भुजंग के बारे में लिखने को बहुत सारी बातें हैं। धीरे-धीरे। कुछ दिन पहले उसकी एक कविता पढ़ रहा था, जो उसके पहले संग्रह 'उलगुलान' में थी. इसका हिंदी अनुवाद मित्र कवि संजय भिसे ने किया है, जो प्रस्तुत है. पर एक बात ज़रूरी है- कविता का हिंदीकरण किया गया है, क्योंकि भुजंग को मराठी में भी सीधे-सीधे नहीं पढ़ा जा सकता. उसकी भाषा मुंबइया, गोंडी, हिंदी, मराठी और कई आदिवासी बोलियों के मिश्रण से बनती है। जिस इतिहास की बात वह करता था, वह इस कविता में दिखता है. और वह इतिहास किसके हाथ में है, यह भी.
ग्रैंडफादर
'वे आए
तब उनके हाथों में थी बाइबल
और हमारे हाथों में थी ज़मीन
परमेश्वर नहीं मानता काले-गोरे का भेद
आओ, आंखें बंद कर प्रार्थना करें'
खुश हुए हम
आंखें अपने आप बंद हो गईं
बड़ी उम्मीद से खुलीं जब आंखें
तो उनके हाथों में थी ज़मीन, हमारे हाथों में बाइबल।
नाती-पोतों को सुनाने के लिए
इसके अलावा कोई दूसरी परीकथा नहीं है हमारे पास
ऐसे समय दादाजी को अक्कल सिखाना बहुत मुश्किल।
फिर भी मैं करना चाहता हूं साहस
पच्चीस साल ख़ुद से बातें करने के बाद
इधर आए आप
पुकारते हुए आदिमों के नायक
क्या आपको देखना है आदिवासी भारत?
गणतंत्र और स्वतंत्रता दिवस पर आदिम कला
नाचती है राजधानी में
संस्कृति महलों में करती है कैबरे उस वक़्त
उसकी पालकी और हमारा जुलूस
चलता है एक ही राजमार्ग से
मज़ा आता है।
ये जंगल की जेल अब सभी को प्यारी है
पेड़ों को ख़त्म करना होता है न क्योंकि।
खांडव वन ख़त्म नहीं होता
इस बनवास को नकारा नहीं जा सकता।
आपका स्वागत किया जाता है
मंडल को हटाया जाता है
दिखाया जाता है राजघाट ताजमहल लाल कि़ला
छुपा लिया जाता है
बस्तर बेलखेड़ा ज्योतिबा और बाबा
इस अभिनंदन के जवाब में आप देते हैं अपना बयान
'हम दिन-भर एक-दूसरे से लड़ते हैं
शाम को परमेश्वर से माफ़ी मांगते हैं
चर्च में प्रार्थना करते हैं'
समूचा हॉल तालियों से गूंजता है
ग्रैंडफादर, तुम्हें बताने जैसा कुछ भी नहीं है
'वे आए तब उनके पास थी भटकन
और हमारे पास इतिहास'
वे बोले
'हम हर चीज़ की करेंगे अदला-बदली
और इस तरह बदल देंगे यह दुनिया।'
हमने किया यक़ीन
अब उनके पास है इतिहास और हमारे पास भटकन।
ग्रैंडफादर, आप बुद्ध को जानते हैं या नहीं?
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