Thursday, May 19, 2011
नेह-नृत्य
Tuesday, May 3, 2011
प्रेम, कविता और शोपां
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| शोपां पियानो |
Sunday, April 24, 2011
दर्द के सुर में सबसे मधुर गीत
Thursday, December 30, 2010
Democracy Don’t Rule the World
बॉब डिलन ने यह गाना 27 साल पहले लिखा था. तीन-चार दिन से मेरे मन में गूंज रहा है. डिलन कहते हैं- एक बात बहुत अच्छी तरह अपने भेजे में घुसा लो, इस दुनिया पर लोकतंत्र का राज नहीं है, बल्कि हिंसा का है. पूंजीवाद सारे क़ानूनों से ऊपर है. डिलन उस दिन को भी देख रहे हैं, जब घर में बग़ीचा बनाना भी क़ानून का उल्लंघन करने जैसा ही होगा. यह डिलन की प्रॉफ़ेसी है, एक कवि, एक गायक, एक संगीतकार की. एक भयानक डिस्टोपिया है. साकार दिख रहा है.Union Sundown
- Bob Dylan
Union Sundown
Well, my shoes, they come from Singapore
My flashlight’s from Taiwan
My tablecloth’s from Malaysia
My belt buckle’s from the Amazon
You know, this shirt I wear comes from the Philippines
And the car I drive is a Chevrolet
It was put together down in Argentina
By a guy makin’ thirty cents a day
Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way
Well, this silk dress is from Hong Kong
And the pearls are from Japan
Well, the dog collar’s from India
And the flower pot’s from Pakistan
All the furniture, it says “Made in Brazil”
Where a woman, she slaved for sure
Bringin’ home thirty cents a day to a family of twelve
You know, that’s a lot of money to her
Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way
Well, you know, lots of people complainin’ that there is no work
I say, “Why you say that for
When nothin’ you got is U.S.–made?”
They don’t make nothin’ here no more
You know, capitalism is above the law
It say, “It don’t count ’less it sells”
When it costs too much to build it at home
You just build it cheaper someplace else
Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way
Well, the job that you used to have
They gave it to somebody down in El Salvador
The unions are big business, friend
And they’re goin’ out like a dinosaur
They used to grow food in Kansas
Now they want to grow it on the moon and eat it raw
I can see the day coming when even your home garden
Is gonna be against the law
Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way
Democracy don’t rule the world
You’d better get that in your head
This world is ruled by violence
But I guess that’s better left unsaid
From Broadway to the Milky Way
That’s a lot of territory indeed
And a man’s gonna do what he has to do
When he’s got a hungry mouth to feed
Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way
Copyright © 1983 by Special Rider Music
Tuesday, November 9, 2010
कैट्स इन द क्रैडल
लिखने कुछ और बैठा था, लेकिन मन इस पुराने गाने में अटक गया है. कुछ गाने लगातार आपके साथी बन जाते हैं, कुछ धुनें भी. वे आपके भीतर इस क़दर बस जाती हैं कि कब आपके मुंह से निकल पड़ें, आपको अंदाज़ा भी नहीं होता. कई बार आपकी पहचान भी उसी धुन से ही बन जाती है. वह उस धुन में ऐसे खो जाता है कि कब उस धुन को फेरबदल कर अपनी धुन बना लेता है, उसे भी नहीं पता चलता. जैसे मैंने अपने पिताजी को आज तक सिर्फ़ एक ही गाना गुनगुनाते हुए सुना है- मुबारक बेगम का 'कभी तनहाइयों में यूं हमारी याद आएगी'. वह अब भी जब तल्लीन होकर कुछ कर रहे होते हैं, तो यही गुनगुनाते हैं. मैंने कई बार पूछा है कि वे किसकी तनहाइयों में जाकर अपनी याद दिला आना चाहते हैं, हमेशा की तरह वह हा-हा-हा कर देते हैं. वह बहुत अच्छी बांसुरी बजाते हैं, तबला बजाते हैं, माउथ ऑर्गन भी. हैं कहूं या था, क्योंकि आखि़री बार उनसे यह सब सुने हुए भी दस से ज़्यादा साल होने को आए. किसी ज़माने में सितार पर उनका अच्छा हाथ था, यह भी जानने वालों से ही सुना है, उन्हें बजाते हुए नहीं सुना. वह संगीत में डूबे हुए धुनी इंसान थे, पर अब गाने की (या किसी भी कि़स्म की) ज़रा-सी ऊंची आवाज़ भी उनका ब्लडप्रेशर बढ़ा देती है. फिर भी कभी-कभार मुबारक बेगम उनके होंठों पर आ जाती है. कितना अचरज भरा लगता है कि एक इंसान किसी एक धुन के सहारे, एक गीत के सहारे अपना ज़्यादातर जीवन गुज़ार दे.
Friday, September 12, 2008
नकार का कोबेन, निराशा का रीज़्झी
रीज़्झी नए रूस का कवि था. वह रूस, जो अपने बिखरे हुए सपनों, कटे हुए डैनों के साथ लाल चौक के बाहर एक पेड़ की फुनगी पर लटका हुआ था, गिरने-गिरने को. और गिरने से बड़ी विडंबना कि इस गिरने से वह हुलस रहा था. अपने सपनों को इतिहास की सबसे फूहड़ गालियां देता हुआ. रीज़्झी उस रूस की नई पीढ़ी का प्रतिनिधि था. आंख झपकते इस पीढ़ी की हुलसित होहराहट अवसाद से भरी बड़बड़ाहट में बदल गई. दूसरे के अंगों पर फेंकी गई गालियां रपटकर अपने ही अंगों पर आन गिरीं. निराशा, नकार (नेगेशन फॉर नेगेशन वाला तो क़तई नहीं) अराजकता और अपराध की अंधेरी काली बस्तियों में यह पीढ़ी शरण लेती है. रीज़्झी उस पीढ़ी की कविता लिखता है. जिस सदी के शुरुआती बरसों में रूस में मायकोवस्की उम्मीद की कविता लिख रहे थे, उसी सदी के आखि़री बरसों में उसी देश का एक नौजवान अंधेरे को सबसे खुरदुरी आवाज़ दे रहा था. वह सारी चीज़ों को नकार रहा था, लेकिन उसे नहीं पता था कि हामी किसकी भरी जाए. 2001 में रीज़्झी ने जब आत्महत्या की, तो उसकी उम्र 26 साल थी. सामाजिक-पारिवारिक असफलताएं और उससे उपजे अवसाद उसे ड्रग्स की तरफ़ ले गए, और ड्रग्स अवसाद के चरम पर.
कर्ट कोबेन नए अमेरिका का गायक था. 1994 में उसने 27 की उम्र में आत्महत्या कर ली थी, जिस समय वह अपनी प्रसिद्धि के चरम पर था. इसकी मौत के प्रत्यक्ष कारण भी ड्रग्स और अवसाद ही थे. वह जॉन बॉन जॉवी, गन्स एन रोजेस, मैटेलिका और एरोस्मिथ का दौर था. कर्ट कोबेन अपने बचपन के दोस्तों के साथ हार्ड रॉक बैंक `निर्वाना´ लेकर आया, जिसने रॉक और मेटल संगीत का पूरा चेहरा ही बदल दिया. कोबेन ने अपने संगीत को `ग्रूंज रॉक´ कहा. उसका संगीत तीखी धुनों, ग़ुस्सैल इलेक्ट्रिक गिटार और असमंजस के शोर से बनता है. उसमें बीच-बीच में आई चुप्पी एक नाकाम तलाश और अनुत्तरित दस्तक के बाद घुटने मोड़कर बैठ जाने की स्थिति है और फिर सनक कर, बौखलाहट में उछाली गई गाली है. ऐसी अंट-शंट अवस्था में ज़रूरी नहीं होता कि कहा गया हर शब्द अपने साथ एक निश्चित कि़स्म का अर्थ ढोता हो. यह अमेरिका की वह पीढ़ी है, जिसकी झेरॉक्स प्रतियां दूसरे देशों में एक्सपोर्ट की जाती हैं. इसका दहकता हुआ लिबीडो, नायकों की तलाश में दर-द भटकते तीसरी दुनिया टाइप के देशों के दुर्बल, हीन नौजवानों को पुचकार-पुचकार पुकारता है. रॉक संगीत अनियंत्रित और निरुद्देश्य विरोध का संगीत है. कोबेन का संगीत भी नकार का संगीत है, लेकिन रीज़्झी की तरह (और हमारे पढ़े-देखे-सुने कई अल्हड़ क्रांतिकारी प्रोटोटाइप-से) ही कोबेन भी कभी नहीं जान पाया कि आखि़र हामी किसके लिए भरी जाए. जब वह चीख़कर कहता है, `अ मुलैट्टो, एन अल्बीनो, अ मस्कीटो, माय लिबीडो´, तो यह कोई प्रतीक नहीं, उसकी पूरी पीढ़ी के निरर्थक भटकाव का शोर होता है.
नौजवान देशों को अपनी नौजवानी और सपनों पर हमेशा फख़्र होता है, लेकिन उन्हें कभी इसकी चिंता नहीं होती कि नौजवानी की इस नवऊर्जा को परनालों में बहने से कैसे रोका जाए. कोबेन और रीज्झी दोनों को ही भटका हुआ युवा माना गया था. भटके हुए युवा अपराध करते हैं, लेकिन ये भटके हुए दो युवा संगीत रचते हैं, कविता करते हैं. तो क्या संगीत और कविता अपराध हैं ? अगर नहीं, तो फिर यह किस्म का भटकाव है ? क्या यह एक भटकी हुई दुनिया के बीच अपनी राह खोजने का रचनात्मक भटकाव है, जिसका कला में विस्फोट होता है ? और एक दिन यह अहसास होता है कि हमारी इस खोज को यह भटकी हुई दुनिया कोई मान्यता ही नहीं दे रही, तब आत्मघात होता है? कलाकार का आत्मघात समूची दुनिया को दी गई चेतावनी होती है कि देख लो, तुम भटकी हुई हो. तुम मुझे सहेज ही नहीं पाई. जब कोई अपने आप ख़ुद को ख़ारिज करता है, तो वह दरअसल, ख़ुद के अलावा सबको ख़ारिज कर रहा होता है.
बहरहाल, कविता और संगीत की दो बड़ी प्रतिभाओं (जिनका बड़ा हिस्सा अब हमेशा अनएक्सप्लोर्ड ही रहेगा) की झलक देखिए. पहले रीज़्झी की कविता `ट्राम´ और नीचे निर्वाना का गीत `स्मेल्स लाइक टीन स्पिरिट´.
ट्राम : बोरिस रीज़्झी
अतीत में जाना है तो
बेहतर है एक ट्राम पकड़ लो
जो घंटियां बजाती चलती है
जिसकी पटरी पर
कोई बेवड़ा, गंदला स्कूली बच्चा
सनक गई लड़की और
पोपलर की पत्तियां बिछी होती हैं
पांच या छह स्टॉप्स के बाद
हम 1980 में पहुंच जाते हैं
जहां बाईं ओर मार कारख़ाने हैं
दाईं ओर मार कामगार
अरे उतर कर देख भी लो लल्लू
चिंता मत करो
क्या बुदबुदा रहे हो तुम, शकी हो,
ऐसा जो भी कुछ है हमने नबोकोव से पाया है
वह ज़मींदार का बेटा था
हम लोग तो जूठन हैं
ये क्या, तुम्हारे चेहरे पर आंसू
अरे छोड़ो भी, मुस्कराओ यार
हमारा स्टॉप ये है-
जहां देखो वहां पोस्टर, बैनर
नीला आसमान, लाल नेकटाई
किसी की शोकयात्रा है, साजि़ंदे बजा रहे हैं
उनके साथ तुम भी गुनगुनाओ सीटी बजाते हुए
और उस ख़ूबसूरत आवाज़ में खो जाओ
खो जाओ अपने लैदर जैकेट में,
उसकी जेबों में हाथ डाले
स्मेल्स लाइक टीन स्पिरिट : निर्वाना (नेवरमाइंड से)
Tuesday, August 26, 2008
ख़ालीपन को निराश करने के कुछ निजी टोटके
किसी कॉलेज के कैंपस में ऊपर से बरसती बारिश और नीचे से उछलते कीचड़ के बीच, प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठकर, छूट गई छुअन का ताप कंधे पर महसूस करते खिंचवाई तस्वीर को देखकर ख़ुश होने की कोशिश भी 'नो' के डिब्बे की तरफ़ ले जाती है और कॉलरा का फ्लोरेंतीनो दिखाई पड़ता है, जिसने अपने कंधे आज तक उचका रखे हैं, क्योंकि जब पहली बार वह छुअन उसके कंधे पर आकर बैठी थी, तो विस्मय, हर्ष और स्वीकार की कोमलता में उसके कंधों का वही पहला रिस्पॉन्स था। लगातार सफ़ेद होती मूंछ बताती है कि उम्र एक अंधेरी सुरंग है महज़. बेरंग, बदरंग।

एक बेपरवाह फुसफुसाहट औचक आती है, कहती है कि सच हमेशा बेआरामी से भरा होता है और सिर झुकाकर अंगूठे से फ़र्श को खोदते रहने की क्रिया हमेशा ख़ुशी से ख़ाली रहती है। पैरों को अपराधबोध होता है कि वे चलने तक से मना कर देते हैं, नाचना तो दूर की बात है।
Thursday, May 15, 2008
एक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत...
यौवन की ऋतु में जो भी मरता है,

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
सूरत उसदी परियां वरगी
गुमियां जन्म जन्म हन ओए
नज़र मेरी हर ओंदे जांदे
वेहल थकावट बेचैनी जद
हर छिन मैंनू इयें लगदा है
इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
- यही गीत ख़ुद शिव की आवाज़ में यहां से सुनिए.
- शिव का इंटरव्यू हिंदी में यहां सुनिए.
- नुसरत की आवाज़ में एक गीत यहां .
Friday, April 4, 2008
आज महान गायक कुंदनलाल सहगल का जन्मदिन है...
उन्हें हिंदी सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा गया। पाकिस्तानी शायर अफ़ज़ाल अहमद सैयद से शब्द उधार लें, तो कह सकते हैं, जैसे काग़ज़ मराकशियों ने ईजाद किया था, हुरूफ़ फिनिशियों ने, सुर गंधर्वों ने, उसी तरह सिनेमा का संगीत सहगल ने ईजाद किया। दुनिया में कई रहस्य हैं। चुनौती देते। चुनौती सहगल भी दे गए हैं। फ़क़ीरों-सा बैराग, साधुओं-सी उदारता, मौनियों-सी आवाज़, हज़ार भाषाओं का इल्म रखने वाली आंखें, रात के पिछले पहर गूंजने वाली सिसकी जैसी ख़ामोशी, और पुराने वक़्तों के रिकॉर्ड की तरह पूरे माहौल में हाहाकार मचाती एक सरसराहट... बता दो एक बार, ये सब क्या है? वह कौन-सी गंगोत्री है, जहां से निकल कर आती है सहगल की आवाज़? पता कर लो, कहां से आता है सहगल का दर्द, जो सीने में हूक, आंखों में नमी और कंठ में कांटे दे जाता है? क्यों एक रुलाहट आंखों पर दस्तक देती है और बिना कुछ कहे तकती हुई-सी लौट जाती है? यह सुबह या दुपहरी की नहीं, सांझ के झुटपुटे की आवाज़ है, जिसका असर रात के साथ गहरा होता जाता है। अगर आप दिल से कमज़ोर हैं, आधी रात को सहगल मत सुनिए। उन्हें सुनना भाषा में तमीज़ को जीना है। आंख में आंसू का सम्मान करना है। दुख जो दिल के क़गार पर रहता है, उसे बीचो-बीच लाकर महल में जगह देनी है। दुख को जियो, तो जीने का शऊर आ जाता है।
सहगल चमचमाती हुई कामयाबी का नाम नहीं है, राख और धुएं का नाम है। बर्बादी का जश्न है, जो सूखते हुए पत्ते को नम हो जाने का मंत्र देता है। वह तपती हुई रेत है, जिस पर तलवे रखने से मज़बूती हासिल होती है। वह क़तरा-क़तरा अपनी मौत में घुसता है और अपनी अंजुरी में भरकर सूर्य को सुरों का अर्घ्य देता है। वह अपना घर जलाता है और सितारों को रोशनी का दान देता है। वह शरत् का देवदास है- असली देवदास, जिसमें बचाने के लिए, ख़त्म हो जाने का साहस है। देवदास हर दिल में रहता है। पारो हर लड़की में रहती है। सहगल हर नब्ज़ में बहता है। हर कंठ में कांटों की शक्ल में रहता है, हर उस हथेली में चुभन बनकर बसता है, जो किसी पुराने स्पर्श की याद में बिसूर रही होती है।
सहगल के बारे में कुछ खास बातें
1- सहगल की उदारता के कई कि़स्से मिलते हैं। कहते हैं कि न्यू थिएटर्स के ऑफिस से उनकी सैलरी सीधे उनके घर पहुंचाई जाती थी, क्योंकि अगर उनके हाथ में पैसे होते, तो आधा वह शराब में उड़ा देते, बाक़ी ज़रूरतमंदों में बांट देते। एक बार उन्होंने पुणे में एक विधवा को हीरे की अंगूठी दे दी थी।
2- सहगल बिना शराब पिए नहीं गाते थे। 'शाहजहां' के दौरान नौशाद ने उनसे बिना शराब पिए गवाया, और उसके बाद सहगल की जि़द पर वही गाना शराब पिलाकर गवाया। बिना पिए वह ज़्यादा अच्छा गा रहे थे। उन्होंने नौशाद से कहा, 'आप मेरी जि़ंदगी में पहले क्यों नहीं आए? अब तो बहुत देर हो गई।
3- सहगल को खाना बनाने का बहुत शौक़ था। मुग़लई मीट डिश वह बहुत चाव से बनाते थे और स्टूडियो में ले जाकर साथियों को भी खिलाते थे। यही नहीं, आवाज़ की चिंता किए बग़ैर वह अचार, पकोड़ा और तैलीय चीज़ें भी ख़ूब खाते थे। सिगरेट के भी ज़बर्दस्त शौक़ीन थे।
4- सहगल ने ग़ालिब की क़रीब बीस ग़ज़लों को अपनी आवाज़ का सोज़ दिया। ग़लिब से इसी मुहब्बत के कारण उन्होंने एक बार उनके मज़ार की मरम्मत करवाई थी।
5- सहगल पहले गायक थे, जिन्होंने गानों पर रॉयल्टी शुरू की। उस वक़्त प्रचार और प्रसार की दिक़क़्तों के बावजूद श्रीलंका, ईरान, इराक़, इंडोनेशिया, अफ़ग़ानिस्तान और फिजी में सुने जाते थे। आज भी 18 जनवरी को कई देशों में सहगल की याद में संगीत जलसे होते हैं।
6- वह विग लगाकर एक्टिंग करते थे। अभिनेत्री कानन देवी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, 'साथी की शूटिंग के दौरान हवा के झोंके से उनकी विग उड़ गई और उनका गंजा सिर दिखने लगा। लेकिन सहगल अपनी धुन में मगन शॉट देते रहे। इस पर दर्शक हंस पड़े। सहगल झेंपने की जगह लोगों के ठहाकों में शामिल हो गए।
7- सहगल की क़द्र भारत से ज़्यादा पाकिस्तान में नज़र आती है। वहां जि़ला स्तर पर सहगल यादगार कमेटियां बनी हैं। सहगल की बरसी पर आम प्रशंसा बाक़ायदा लंगर लगाते हैं।
8- लता मंगेशकर सहगल की बड़ी भक्त हैं। वह चाहती थीं कि सहगल की कोई निशानी उनके पास हो। वह उनकी स्केल चेंजर हारमोनियम अपने पास रखना चाहती थीं, पर सहगल की बेटी ने उसे अपने पास रखते हुए सहगल की रतन जड़ी अंगूठी लता को दी। लता के पास आज भी वह निशानी है। कहते हैं कि कमउम्र में लता ने सहगल की एक फिल्म देखने के बाद उनसे शादी करने का ख्याल ज़ाहिर किया
9- रेडियो सीलोन पर हर सुबह 7:57 बजे सहगल के गाने चलते थे। जालंधर के पुश्तैनी मकान में जिस वक्त सहगल की मौत हुई थी, उस वक्त सुबह के 7:57 ही बजे थे। जिस्म चला गया था, फि़ज़ा में तैरती उनकी आवाज़ बाक़ी रह गई थी।






