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Thursday, May 19, 2011

नेह-नृत्य






जब कोई नाचता है, तो उसके भीतर क्या नाचता है? बुल्ला कहता था, उसकी देह कभी नहीं नाचती, नाचती तो रूह है। जैसे पृथ्वी के भीतर समंदर नाच पड़े, तो पृथ्वी भी तो नाचती हुई ही जान पड़ेगी। सो भीतर का नाच ही बाहर का नाच होता है। शकीरा को नाचते हुए देखें, तो लगता है कि मुर्शद को मनाने वाला बुल्ला नाच रहा है, शम्स के सामने रूमी नाच रहा है, स्कार्फ हिलाकर जीवन के तमाम अबूझ का अभिवादन करती इज़ाडोरा डंकन नाच रही है, थोड़ा-सा तुम नाच रही हो, थोड़ा-सा मैं नाच रहा हूं। एक देह में कितने सारे लोग लोग नाच रहे हैं। यह देह का नहीं, नेह का नृत्य है। नाचती देह है, नचाता नेह है।


दुनिया के सारे नेह को इकठ्ठा  किया जाए, एक जगह रख दिया जाए, तो वह उतना ही होगा, जितना एक व्यक्ति के भीतर होता है। यानी एक के भीतर का नेह, सारी दुनिया में समाए नेह जितना होता है। इसीलिए उसके नेह से हम इतनी जल्दी जुड़ जाते हैं। नेह में क्षिप्त होकर किया गया नृत्य इसीलिए कदमों को ताल की सौगात देने से रोक नहीं पाता। संभव है कि यह किसी व्यक्ति के लिए किया गया नेह न हो, बल्कि अ-व्यक्ति के लिए हो। जो व्यक्त है, वह व्यक्ति है। अ-व्यक्त भी बहुधा व्यक्ति ही है। नृत्य का नेह अ-व्यक्त के व्यक्ति बन जाने का नेह है। बुल्ला को तब तक यह पता नहीं था कि उसके भीतर का अ-व्यक्त क्या है, जब तक कि उसने नृत्य न किया। वह नाचा, इसीलिए वह अपने भीतर छिपे हुए खुद को जान पाया।


आप कितना भी प्रेम में डूबे हुए हों, हर समय आपके भीतर एक शख्स ऐसा रहता है, जिसे आप नहीं जानते। आप न तो खुद के सामने और न ही किसी और के सामने, उसे व्यक्त कर पाते हैं। उसके सामने भी नहीं, जो पूरी तरह व्यक्त और व्यक्ति बनकर आपके जीवन में बैठा हुआ है। यही अ-व्यक्ति प्रेम को बढ़ाते रहने का काम करता है। आप एक व्यक्ति से प्रेम कर रहे होते हैं, उसी के साथ-साथ एक अ-व्यक्ति से भी प्रेम कर रहे होते हैं। 


'इश्क दी नवियों नवी बहारमें बुल्ला कहता है कि हीर को रांझा मिल गया, फिर भी हीर खोई-खोई रहती है, वह रांझा को अपने भीतर खोजती रहती है। उसे सुध ही नहीं है कि रांझा उसके ठीक पास है। अगर व्यक्ति रांझा ठीक पास है, तो हीर किसमें खोई हुई है? कीनन, रांझा के अ-व्यक्ति में। यानी वह रांझा के उस हिस्से में खोई हुई है, जो अभी तक हीर की देह पर, आत्मा पर व्यक्त नहीं हुआ है। यानी रांझा या प्रेम की महा-कल्पना, जो रांझा की हकीकत से कहीं आगे हैं, उससे कहीं विशाल है। शाम के समय पडऩे वाली परछाईं की तरह, जिसमें वस्तु तो बहुत छोटी होती है, लेकिन जब रोशनी के बीच आती है, तो वस्तु के आकार से कई गुना लंबी परछाईं बना देती है। इसमें ज़ोर रोशनी पर है। भीतर की रोशनी अ-व्यक्त की एक विशालकाय परछाईं का निर्माण करती है।


तो हीर एक साथ दो से प्रेम करती जान पड़ती है- अपने जीवन में रांझा की व्यक्त उपस्थिति से और अपने मन में रांझा की अ-व्यक्त उपस्थिति से भी। यही अ-व्यक्त उपस्थिति ही प्रेम की उसकी प्यास और तलाश है। यह उसके जीवन से प्रेम को कभी समाप्त नहीं होने देगी। यह मन ही मन किया गया प्रेम हीर को नचाता है। यही बुल्ला को नचा देता है। यही रूमी को, मीरा को, यही माइकल जैक्सन, शकीरा और डंकन को भी। अ-व्यक्त से प्रेम के बिना कोई नृत्य संभव ही नहीं। इन सबमें अ-व्यक्त प्रेम, नेह के झरने की तरह रहता होगा।


 माइकल की डायरी का एक हिस्सा याद आता है- 'महाचेतना हमेशा सृजन के ज़रिए $खुद को अभिव्यक्त करती है। यह दुनिया विधाता का नृत्य है। नर्तक आते हैं, चले जाते हैं, लेकिन नृत्य हमेशा रहता है। जब मैं नाचता हूं, तो लगता है, कोई बहुत पवित्र चीज़ मुझे छूकर गुजरी है। मेरी आत्मा बहुत हल्की हो जाती है। लगता है, मैं ही चांद और सितारे हूं। मैं ही मुहब्बत हूं, मैं ही महबूब हूं। मैं ही मालिक हूं, मैं ही गुलाम हूं। मैं ही ज्ञान हूं और ज्ञानी भी मैं ही हूं। मैं नाचता जाता हूं और एक समय सृष्टि का शाश्वत नृत्य बन जाता हूं। सर्जक और सृष्टि आनंद के ऐक्य में विलुप्त हो जाते हैं। तब भी जो बचता है, वह सिर्फ नृत्य होता है।


यही नृत्य है, तो प्रेम भी यही है। यह जो नृत्य है, वही देह के भीतर नेह बनकर रहता है। प्रेम व्यक्त से ज्यादा अ-व्यक्त में वास करता है। इसीलिए तो आप कभी नहीं बता पाते कि प्रेम है, तो कितना है? बस, बहुत है। बहुत मतलब बहुत।



Tuesday, May 3, 2011

प्रेम, कविता और शोपां





शोपां पियानो
18 जनवरी 2010
मोत्सार्ट के संगीत के बारे में कई विद्वानों का कहना है कि यह बहुत सोच-समझकर रचा गया संगीत है, दिमाग की सारी जटिलताओं को रूपायित करता हुआ; वहीं बीथोफन के संगीत के बारे में राय अलग है- कहा जाता है, वह संगीत बीथोफन के दिल से निकलता है और सीधे सुनने वालों के दिलों में समा जाता है। मुझे लगता है- बीथोफन का दिल जब आखिरी बार धड़का होगा, तब उसने थोड़ा-सा रक्त बरसों बाद आने वाले शोपां के दिल को नज़र किया होगा। शोपां को, देर रात, देर तक सुनने के बाद ऐसा ही महसूस होता है।

रूबीन्स्टीन का पियानो, शोपां का नॉक्टर्न। अगर श्रीकृष्ण ने बांसुरी के वेस्टर्न नोट्स बनाए होते, तो वे शोपां के नॉक्टर्न की तरह ही होते। (यह ख्याल ही कितना एब्सर्ड है कि बांसुरी को पियानो के नोट्स पर बजाया जाए।) 

नॉक्टर्न यानी रात के समय बजने वाला संगीत। अंधेरे में डूबा हुआ एक बगीचा। पत्तों की आवाज़ से हवा के चलने को महसूस करना। ज़मीन पर तारों की परछाईं देखना और आसमान में जो आकृतियां बनी हों, उन्हें ज़मीन पर उगे पेड़-बूटों की परछाईं की तरह महसूस करना। जब पैदल चलना, तो पत्तों की खदड़-खदड़ आवाज़ आना। कोई भी आवाज़ आने से पहले खुद को श्श्श्श् कहकर चुप करा देती है। वहीं बगीचे में थोड़ी सी गुंजाइश खोज लेना कि एक समंदर भी बन जाए। उसकी आवाज़ के भीतर उतरना। उसमें मिली एक-एक नदी को रेशे-रेशे की तरह अलग करना। उन्हें पहचाने बिना उन्हें फिर एक-दूसरे में मिला देना। वहीं एक टापू बना लेना और उसमें अकेले होने के विरुद्ध आवाज़ का एक बूटा रोपना। 

ये शोपां है।
मैं तुम्हारे पास हूं। तुम्हारी हथेली में उगली फंसाए।
तुम सबके पास हो।
पर मैं सबके पास नहीं
सिर्फ तुम्हारे पास हूं।
यही शोपां है।

वह बीजगणित के ‘माना कि एक्स बराबर वाय' को नकार देता है और बताता है कि अनुभूति और संगीत का कोई सिद्धांत नहीं होता। जो संगीत में भी सिद्धांतों और व्याकरणों का पालन करते हैं, वे दरअसल, किसी भी नए से घबराते हैं, वे पुराने से भी आतंकित हैं, वे मेड़ों से बंधे खेत में अनंत की खोज करते हैं।

नियमों को तोडऩा बहुधा एक नया नियम बन जाया करता है।

शोपां इससे दूर रहना सिखाता है।

‘मैंने अपने लिए नए नियम बनाए' यह कहने से बेहतर है यह कहना, ‘मैंने नियमों को ध्वस्त कर दिया और खुद को भी नियमों से आज़ाद रखा।'

शोपां अराजक नहीं है। बहुत अनुशासित और मापा हुआ है, फिर भी उसमें वह बनैलापन है, जो आपको उसके अनुशासन पर यकीन नहीं करने देता। 

दो परस्पर विरोधी चीज़ों को साध लेने वाले कलाकार हमेशा मुझे आकर्षित करते हैं।

कई बार मुझे लगता है कि यह दक्षिणोत्तर जैसी किसी नई दिशा की तलाश कर लेने जैसा है।

दो सौ साल पहले उसे पोलैंड से भागना पड़ा था। वह पेरिस में रहा। सारा संगीत उसने वहीं रचा। पर उसका दिल लगातार पोलैंड के लिए धड़कता। उसने कहा कि जब मैं मर जाऊं, तो मेरे दिल को मेरे शरीर से निकाल लेना और उसे पोलैंड में दफनाना। 39 साल की उम्र में जब वह मरा, तो उसकी इच्छा का सम्मान किया गया। उसका शरीर पेरिस में दफनाया गया, लेकिन उसका दिल निकालकर पोलैंड ले जाया गया। वह वहां दफन हुआ।

उस दिल से ऐसा संगीत न निकलता, तो कैसा निकलता? वह इस ख्याल को भी कितने म्यूज़िकल तरीके से खारिज करता है कि वह तब तक ही सुना जाएगा, जब तक वह गूंज रहा है।





21 जनवरी 2010
शोपां को सुनना सिर्फ शोपां को सुनना होता है। मोत्जार्ट को आप दूर बैठकर सुन सकते हैं, बीथोफन को सुनते हुए आप खुद ही धीरे-धीरे हर किस्म की ध्वनि से दूर होते जाते हैं। शोपां को मैं दूर से नहीं सुन पाता। उसमें इतनी बारीकियां हैं, इतनी छोटी-छोटी हरकतें हैं कि उसकी आवाज़ के पास अपने कान ले जाने होते हैं। इसीलिए मैं उसके लिए हेडफोन लगाता हूं। मैं उसका हर स्वर कानों से सुनना चाहता हूं। पहले कान सुनें, फिर वे तरंगें देह और आत्मा से लिपटें। संगीत अंग से भी ग्रहण होता है और अनंग से भी। 

शिव ने कामदेव को भस्म कर अनंग बना दिया था- वह विदेह हो गया था। फिर भी पार्वती जब भी संगीत बजाती थीं, वे दोनों महसूस करते थे कि अनंग कहीं पास ही है। देह खोने के बाद भी अनंग ने अपना व्यवहार नहीं खोया था। वह कैलाश के आसपास ही भटकता था। इसीलिए पार्वती को उस पर रहम आया था और वह शिव से आग्रह करती रहीं कि वह कामदेव के अनंग-शाप को वापस ले लें। पर शिव कहते, वह अनंग है, इसीलिए मनोज है। इसीलिए वह हर अंग का ओज है। वह विदेह है, इसीलिए हर देह से संयुक्त है।
कई बार मुझे लगता है कि पुराणों में जरूर कोई कथा ऐसी भी होगी, जिसमें संगीत को सशरीर उपस्थिति कहा गया होगा। और किसी शाप में उसने भी अपना रूप खो दिया होगा। जैसे कामदेव ने खोया, जैसे दक्ष ने खोया, जैसे शारंग ने खोया, जैसे आठों चिरंजीवियों ने खो दिया। हालांकि मैं अभी तक ऐसी किसी कथा तक नहीं पहुंच पाया हूं।

संगीत भी अनंग है, इसीलिए हर अंग में उसकी व्याप्ति है। पर मैं उसकी व्याप्ति को दिशा देना चाहता हूं। क्यों? मैं उसे एक मार्ग दिखाना चाहता हूं कि तुम यहां से प्रविष्ट हो और यहां जाओ। संगीत कभी आज्ञा नहीं मानता। और ग्राहक यानी उसे ग्रहण करने वाला अपनी पद्धति से बाहर नहीं निकलता।

इतालवी में प्रेम की एक परिकल्पना है, जिसे 'फीनो अमोरे' कहा जाता है यानी संपूर्ण प्रेम। यह दान्ते अलीगियेरी की रचनाओं से आया। ऐसा प्रेम, जिसमें शरीर का कोई अर्थ नहीं होता, अभिव्यक्ति और स्मृति का भी कोई अर्थ नहीं होता। आप जिससे प्रेम करते हैं, संभव है कि उसे आपने कभी देखा भी न हो, उससे कुरबत तो दूर की चीज़ है। न उससे बातें की हों, न ही कोई व्यवहार। पर उससे प्रेम करते हों। वह एक उपस्थिति हो, किंतु आपके भीतर। यह सिर्फ मन में किया जाने वाला प्रेम है। बाहर उसकी अभिव्यक्ति कैसे भी संभव है, लेकिन इसकी मौजूदगी केवल आपके भीतर है। यह प्रेम को भक्ति भी बना देता है। अपने यहां मीरा के रूप में ऐसे प्रेम का उदाहरण है।

संगीत से किया जाने वाला प्रेम फीनो अमोरे ही होता होगा। यह सिर्फ आपके भीतर रहता है। आप संगीत की देह को नहीं छू पाते, लेकिन वह आपकी आत्मा और देह को छूता रहता है। शोपां इसी तरह एक अनुपस्थित उपस्थिति में आता है। बहुत बारीक स्वरों, हल्की बुनावटों, छोटे-छोटे वाल्ट्ज और मादक नाक्टर्न्‍स में। उसे लोग 'पियानो का कवि' कहते हैं। बहुत ज्यादा चीजों का इस्तेमाल नहीं करता। प्रेम भी शायद ऐसा ही होता है। बजने के लिए ज्यादा साजों का प्रयोग नहीं करता। एक अकेली तान से ही बड़ा ऑर्केस्ट्रा खड़ा कर देता है। अकेली तान वाला ऑर्केस्ट्रा। उसी तरह कविता को भी दूरी से नहीं समझा जा सकता। आपको उसे समझने के लिए, उसके बहुत करीब, झुककर, निहुरकर जाना होता है। उसमें भी अकेली तान से बड़ा ऑर्केस्ट्रा बनता है। शोपां के पास भी इसी तरह जाना होता है। झुककर, निहुरकर, बहुत करीब। प्रेम, कविता और शोपां- तीनों एक ही गोत्र से निकले होंगे।

(मेरी डायरी के हिस्‍से. पहला हिस्‍सा कथादेश अक्‍टूबर '10 में 
और दूसरा हिस्‍सा दैनिक भास्‍कर में 3 मई '11 को प्रकाशित.) 



Sunday, April 24, 2011

दर्द के सुर में सबसे मधुर गीत





वह एक कांपती हुई आवाज़ थी. झरना नहीं, उससे फूटकर अलग हुई एक पतली-सी धार थी, जिसकी पोशाक मख़मल की थी. वह आवाज़ अवध की तहज़ीब थी. वैसी ही मिठास, वैसा ही नफ़ासत भरा दर्द. कई दुख छत पर खड़े होकर हल्‍ला करते हैं, कुछ दुख सिगड़ी में रखे अंगारे की तरह तपते रहते हैं. जो पास आता है, उसे जलाते नहीं, जिंदगी जी सकने लायक़ तपिश देते हैं. तलत महमूद का दर्द शालीन है. वह ख़ामोशी से आंखों से निकलकर दूर होता आंसू है. वह आपके घावों को सहलाता है और कहता है, 'महसूस करो, दर्द का स्‍वाद मीठा होता है.' (हैं सबसे मधुर वो गीत, जिन्‍हें हम दर्द के सुर में गाते हैं.) यही वह तपन है, जिसने तलत को तपन कुमार सिन्‍हा नाम भी दिया था. 

विरह से बड़ा कोई राग नहीं होता. सुर के सारे सोते इसी से फूटते हैं. एक हंसती हुई धुन आपके पैरों को थिरका सकती है. एक पनीली धुन आपके दिल के भीतर घुसती है और दिल के पैरहन की सारी सलवटों को साफ़ करती है-- रेशम के बुहारन से. संगीत के शब्‍दकोश को पलटकर खंगाल लें, वहां रेशम का अर्थ तलत लिखा हुआ मिलेगा. इस आवाज़ को खींचकर आप गगनचुंबी इमारत नहीं बना सकते, इस आवाज़ में आप हाई-पिच सुरंग भी नहीं सेंध सकते. उनकी आवाज़ पगडंडी है- पतली, तमाम हरियालियों के बीच रास्‍ते का आभास देती हल्‍की-सी लकीर. यह लकीर दुनिया के तमाम राजमार्गों से ज़्यादा भव्‍य है. अगर आप तलत को दिल से सुनते हैं, तो गर्व आपकी आंखों का सुरमा होगा. 

तलत का दर्द इंतज़ार का दर्द है. आपका कोई आपसे दूर है. आपका दिल मार डूबा जा रहा है. तलत को सुनिए. वह इलाज हैं. वही दर्द हैं. वही दवा हैं. शामे ग़म की क़सम खाइए और वे गीत ढूंढ़ लाइए, जिनके लिए आंखों के दिए जलते हैं. वह आपको दुनिया के भीड़-भड़क्‍के से निकाल ले जाएंगे, उस जगह जहां कोई न हो. जहां दर्द तलत बन जाता है, इश्‍क़ तो है ही तलत. जहां ख़ामोशी एक ग़ज़ल का क़ाफि़या बन जाती है, इंतज़ार उसकी बहर. तलत की आवाज़ हमारे भीतर के इसी इंतज़ार को हौसला देती है. 

(24 फरवरी 2007 को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित)



Thursday, December 30, 2010

Democracy Don’t Rule the World





बॉब डिलन ने यह गाना 27 साल पहले लिखा था. तीन-चार दिन से मेरे मन में गूंज रहा है. डिलन कहते हैं- एक बात बहुत अच्‍छी तरह अपने भेजे में घुसा लो, इस दुनिया पर लोकतंत्र का राज नहीं है, बल्कि हिंसा का है. पूंजीवाद सारे क़ानूनों से ऊपर है. डिलन उस दिन को भी देख रहे हैं, जब घर में बग़ीचा बनाना भी क़ानून का उल्‍लंघन करने जैसा ही होगा. यह डिलन की प्रॉफ़ेसी है, एक कवि, एक गायक, एक संगीतकार की. एक भयानक डिस्‍टोपिया है. साकार दिख रहा है.

यह हिंसा कौन-सी है? लोकतंत्र का राज क्‍यों नहीं है? यह पोस्‍टर देख लीजिए, समझ में आ जाएगा. 

क्‍या भारत, क्‍या पाकिस्‍तान, क्‍या अमेरिका! क्‍या बिनायक, क्‍या असांजे. डिलन का यह गाना सारी दुनिया के लिए है. देश का नाम बदल दीजिए, देश के नेता की तस्‍वीर बदल दीजिए, तब भी क्‍या यह तस्‍वीर बदली हुई लगेगी?

Union Sundown
- Bob Dylan



Union Sundown

Well, my shoes, they come from Singapore
My flashlight’s from Taiwan
My tablecloth’s from Malaysia
My belt buckle’s from the Amazon
You know, this shirt I wear comes from the Philippines
And the car I drive is a Chevrolet
It was put together down in Argentina
By a guy makin’ thirty cents a day

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Well, this silk dress is from Hong Kong
And the pearls are from Japan
Well, the dog collar’s from India
And the flower pot’s from Pakistan
All the furniture, it says “Made in Brazil”
Where a woman, she slaved for sure
Bringin’ home thirty cents a day to a family of twelve
You know, that’s a lot of money to her

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Well, you know, lots of people complainin’ that there is no work
I say, “Why you say that for
When nothin’ you got is U.S.–made?”
They don’t make nothin’ here no more
You know, capitalism is above the law
It say, “It don’t count ’less it sells”
When it costs too much to build it at home
You just build it cheaper someplace else

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Well, the job that you used to have
They gave it to somebody down in El Salvador
The unions are big business, friend
And they’re goin’ out like a dinosaur
They used to grow food in Kansas
Now they want to grow it on the moon and eat it raw
I can see the day coming when even your home garden
Is gonna be against the law

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Democracy don’t rule the world
You’d better get that in your head
This world is ruled by violence
But I guess that’s better left unsaid
From Broadway to the Milky Way
That’s a lot of territory indeed
And a man’s gonna do what he has to do
When he’s got a hungry mouth to feed

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Copyright © 1983 by Special Rider Music


Tuesday, November 9, 2010

कैट्स इन द क्रैडल





लिखने कुछ और बैठा था, लेकिन मन इस पुराने गाने में अटक गया है. कुछ गाने लगातार आपके साथी बन जाते हैं, कुछ धुनें भी. वे आपके भीतर इस क़दर बस जाती हैं कि कब आपके मुंह से निकल पड़ें, आपको अंदाज़ा भी नहीं होता. कई बार आपकी पहचान भी उसी धुन से ही बन जाती है. वह उस धुन में ऐसे खो जाता है कि कब उस धुन को फेरबदल कर अपनी धुन बना लेता है, उसे भी नहीं पता चलता. जैसे मैंने अपने पिताजी को आज तक सिर्फ़ एक ही गाना गुनगुनाते हुए सुना है- मुबारक बेगम का 'कभी तनहाइयों में यूं हमारी याद आएगी'. वह अब भी जब तल्‍लीन होकर कुछ कर रहे होते हैं, तो यही गुनगुनाते हैं. मैंने कई बार पूछा है कि वे किसकी तनहाइयों में जाकर अपनी याद दिला आना चाहते हैं, हमेशा की तरह वह हा-हा-हा कर देते हैं. वह बहुत अच्‍छी बांसुरी बजाते हैं, तबला बजाते हैं, माउथ ऑर्गन भी. हैं कहूं या था, क्‍योंकि आखि़री बार उनसे यह सब सुने हुए भी दस से ज़्यादा साल होने को आए. किसी ज़माने में सितार पर उनका अच्‍छा हाथ था, यह भी जानने वालों से ही सुना है, उन्‍हें बजाते हुए नहीं सुना. वह संगीत में डूबे हुए धुनी इंसान थे, पर अब गाने की (या किसी भी कि़स्‍म की) ज़रा-सी ऊंची आवाज़ भी उनका ब्‍लडप्रेशर बढ़ा देती है. फिर भी कभी-कभार मुबारक बेगम उनके होंठों पर आ जाती है. कितना अचरज भरा लगता है कि एक इंसान किसी एक धुन के सहारे, एक गीत के सहारे अपना ज़्यादातर जीवन गुज़ार दे.

मुबारक बेगम का वह गीत कब मेरे भी पसंदीदा गीतों में शामिल हो गया, मुझे नहीं पता. यहां उसका चर्चा तो पिताजी के संदर्भ में आ गया, उस गीत को याद करने का काम मेरे दोस्‍तों राजकुमार केसवानी और यूनुस ख़ान के जि़म्‍मे, पर जिस गीत में मेरा मन अटका हुआ है, वह है अग्‍ली किड जो का कैट्स इन द क्रैडल. 1992 में जब अमेरिकाज़ लीस्‍ट वांटेड रिलीज हुआ था और इसके दो गाने बिजी़ बी और कैट्स इन द क्रैडल ने एमटीवी पर धूम मचा दी थी, तो मैंने ठाणे पश्चिम में स्‍टेशन से बिल्‍कुल लगी हुई, म्‍यूजि़क की उस समय की सबसे बड़ी दुकान, गणेशा म्‍यूजि़क सेंटर से तुरंत यह कैसेट ख़रीदा था. क़ीमत थी 95 रुपए. अब वह कैसेट मेरे पास नहीं है, लेकिन उसका कवर, उसकी मोटाई, उसे सुनते समय हुए अनुभव और उसके गानों के शब्‍द अब तक याद हैं. और 'कैट्स इन द क्रैडल' तो अब तक का साथी बना हुआ है. 

यह गाना ओरिजिनली अग्‍ली किड जो  का नहीं है, हैरी चैपिन का है. बहुत समय बाद जाकर यू-ट्यूब पर चैपिन वाला वर्शन सुना, लेकिन मैं दुनिया के उन बहुतेरे लोगों में शुमार हूं, जो यह मानते हैं कि किड्स ने चैपिन के सुंदर गाने को और सुंदर बना दिया. उसे एकदम से नया कर दिया. शायद मेरे ऐसा मानने के पीछे यह कारण हो कि मैंने बहुत लंबे समय तक सिर्फ़ किड्स वाला वर्शन ही सुना था और मेरे दिल के क़रीब वो ज़्यादा है. दिल तो दिल है, क़ुरबत बिना किसी शर्त के कर लेता है. यह एक पिता की तरफ़ से गाया गया गाना है, जो अपने बेटे को समय नहीं दे पाता. और एक दिन पाता है कि अब बेटा भी उसे समय नहीं दे पाता. 

मेरे पिताजी ने मुझे भरपूर समय दिया, भरपूर प्‍यार दिया, लेकिन फिर भी इसे सुनते हुए हर बार उनकी याद आ जाती है. यह गाना आप ही के लिए, डैड! 



Cats in the cradle
Ugly Kid Joe

My child arrived just the other day
came to the world in the usual way
but there were planes to catch
and bills to pay
he learned to walk while I was away
he was talking for a minute
and as he grew
he'd say I'm gonna be like you Dad
you know I'm gonna be like you

And the cats in the cradle
and the silver spoon
little boy blue and the
man on the moon
when you comin' home Dad
I don't know when
we'll get together then
you know we'll have
a good time then

Well my son turned ten
just the other day
he said thanks for the ball Dad
come on let's play
can you teach me to throw
I said not today - I got a lot to do
he said that's o.k.
and he walked away and he
smiled and he said
you know I'm gonna be like him yeah
you know I'm gonna be like him

And the cats in the cradle ...

Well he came from college
just the other day
so much like a man I just had to say
I'm proud of you could you
sit for a while
he shook his head
and he said with a smile
what I'd really like Dad
is to borrow the car keys
see you later can I have them please

And the cats in the cradle ...

I've long since retired
my son's moved away
I called him up just the other day
I'd like to see you if you don't mind
he said
I'd love to Dad
if I could find the time
you see my new job's hassle
and the kids have the flu
but it's sure nice talking to you Dad
it's been sure nice talking to you
and as I hung up the phone
I occured to me
he'd grown up just like me
my boy was just like me

And the cats in the cradle ...

And the cats in the cradle ...


Friday, September 12, 2008

नकार का कोबेन, निराशा का रीज़्झी


कर्ट कोबेन और बोरिस रीज़्झी में क्या समानता है?

रीज़्झी नए रूस का कवि था. वह रूस, जो अपने बिखरे हुए सपनों, कटे हुए डैनों के साथ लाल चौक के बाहर एक पेड़ की फुनगी पर लटका हुआ था, गिरने-गिरने को. और गिरने से बड़ी विडंबना कि इस गिरने से वह हुलस रहा था. अपने सपनों को इतिहास की सबसे फूहड़ गालियां देता हुआ. रीज़्झी उस रूस की नई पीढ़ी का प्रतिनिधि था. आंख झपकते इस पीढ़ी की हुलसित होहराहट अवसाद से भरी बड़बड़ाहट में बदल गई. दूसरे के अंगों पर फेंकी गई गालियां रपटकर अपने ही अंगों पर आन गिरीं. निराशा, नकार (नेगेशन फॉर नेगेशन वाला तो क़तई नहीं) अराजकता और अपराध की अंधेरी काली बस्तियों में यह पीढ़ी शरण लेती है. रीज़्झी उस पीढ़ी की कविता लिखता है. जिस सदी के शुरुआती बरसों में रूस में मायकोवस्की उम्मीद की कविता लिख रहे थे, उसी सदी के आखि़री बरसों में उसी देश का एक नौजवान अंधेरे को सबसे खुरदुरी आवाज़ दे रहा था. वह सारी चीज़ों को नकार रहा था, लेकिन उसे नहीं पता था कि हामी किसकी भरी जाए. 2001 में रीज़्झी ने जब आत्महत्या की, तो उसकी उम्र 26 साल थी. सामाजिक-पारिवारिक असफलताएं और उससे उपजे अवसाद उसे ड्रग्स की तरफ़ ले गए, और ड्रग्स अवसाद के चरम पर.

कर्ट कोबेन नए अमेरिका का गायक था. 1994 में उसने 27 की उम्र में आत्महत्या कर ली थी, जिस समय वह अपनी प्रसिद्धि के चरम पर था. इसकी मौत के प्रत्यक्ष कारण भी ड्रग्स और अवसाद ही थे. वह जॉन बॉन जॉवी, गन्स एन रोजेस, मैटेलिका और एरोस्मिथ का दौर था. कर्ट कोबेन अपने बचपन के दोस्तों के साथ हार्ड रॉक बैंक `निर्वाना´ लेकर आया, जिसने रॉक और मेटल संगीत का पूरा चेहरा ही बदल दिया. कोबेन ने अपने संगीत को `ग्रूंज रॉक´ कहा. उसका संगीत तीखी धुनों, ग़ुस्सैल इलेक्ट्रिक गिटार और असमंजस के शोर से बनता है. उसमें बीच-बीच में आई चुप्पी एक नाकाम तलाश और अनुत्तरित दस्तक के बाद घुटने मोड़कर बैठ जाने की स्थिति है और फिर सनक कर, बौखलाहट में उछाली गई गाली है. ऐसी अंट-शंट अवस्था में ज़रूरी नहीं होता कि कहा गया हर शब्द अपने साथ एक निश्चित कि़स्म का अर्थ ढोता हो. यह अमेरिका की वह पीढ़ी है, जिसकी झेरॉक्स प्रतियां दूसरे देशों में एक्सपोर्ट की जाती हैं. इसका दहकता हुआ लिबीडो, नायकों की तलाश में दर-द भटकते तीसरी दुनिया टाइप के देशों के दुर्बल, हीन नौजवानों को पुचकार-पुचकार पुकारता है. रॉक संगीत अनियंत्रित और निरुद्देश्य विरोध का संगीत है. कोबेन का संगीत भी नकार का संगीत है, लेकिन रीज़्झी की तरह (और हमारे पढ़े-देखे-सुने कई अल्हड़ क्रांतिकारी प्रोटोटाइप-से) ही कोबेन भी कभी नहीं जान पाया कि आखि़र हामी किसके लिए भरी जाए. जब वह चीख़कर कहता है, `अ मुलैट्टो, एन अल्बीनो, अ मस्कीटो, माय लिबीडो´, तो यह कोई प्रतीक नहीं, उसकी पूरी पीढ़ी के निरर्थक भटकाव का शोर होता है.

नौजवान देशों को अपनी नौजवानी और सपनों पर हमेशा फख़्र होता है, लेकिन उन्हें कभी इसकी चिंता नहीं होती कि नौजवानी की इस नवऊर्जा को परनालों में बहने से कैसे रोका जाए. कोबेन और रीज्‍झी दोनों को ही भटका हुआ युवा माना गया था. भटके हुए युवा अपराध करते हैं, लेकिन ये भटके हुए दो युवा संगीत रचते हैं, कविता करते हैं. तो क्‍या संगीत और कविता अपराध हैं ?  अगर नहीं, तो फिर यह किस्‍म का भटकाव है ? क्‍या यह एक भटकी हुई दुनिया के बीच अपनी राह खोजने का रचनात्‍मक भटकाव है, जिसका कला में विस्‍फोट होता है ? और एक दिन यह अहसास होता है कि हमारी इस खोज को यह भटकी हुई दुनिया कोई मान्‍यता ही नहीं दे रही, तब आत्‍मघात होता है? कलाकार का आत्‍मघात समूची दुनिया को दी गई चेतावनी होती है कि देख लो, तुम भटकी हुई हो. तुम मुझे सहेज ही नहीं पाई. जब कोई अपने आप ख़ुद को ख़ारिज करता है, तो वह दरअसल, ख़ुद के अलावा सबको ख़ारिज कर रहा होता है.

बहरहाल, कविता और संगीत की दो बड़ी प्रतिभाओं (जिनका बड़ा हिस्सा अब हमेशा अनएक्सप्लोर्ड ही रहेगा) की झलक देखिए. पहले रीज़्झी की कविता `ट्राम´ और नीचे निर्वाना का गीत `स्मेल्स लाइक टीन स्पिरिट´.


ट्राम : बोरिस रीज़्झी

अतीत में जाना है तो
बेहतर है एक ट्राम पकड़ लो
जो घंटियां बजाती चलती है
जिसकी पटरी पर
कोई बेवड़ा, गंदला स्कूली बच्चा
सनक गई लड़की और
पोपलर की पत्तियां बिछी होती हैं

पांच या छह स्टॉप्स के बाद
हम 1980 में पहुंच जाते हैं
जहां बाईं ओर मार कारख़ाने हैं
दाईं ओर मार कामगार
अरे उतर कर देख भी लो लल्लू
चिंता मत करो
क्या बुदबुदा रहे हो तुम, शकी हो,
ऐसा जो भी कुछ है हमने नबोकोव से पाया है
वह ज़मींदार का बेटा था
हम लोग तो जूठन हैं
ये क्या, तुम्हारे चेहरे पर आंसू
अरे छोड़ो भी, मुस्कराओ यार

हमारा स्टॉप ये है-
जहां देखो वहां पोस्टर, बैनर
नीला आसमान, लाल नेकटाई
किसी की शोकयात्रा है, साजि़ंदे बजा रहे हैं
उनके साथ तुम भी गुनगुनाओ सीटी बजाते हुए
और उस ख़ूबसूरत आवाज़ में खो जाओ
खो जाओ अपने लैदर जैकेट में,
उसकी जेबों में हाथ डाले
उस रास्ते पर जहां अलगाव कभी ख़त्म नहीं होता
उदासी कभी ख़त्म नहीं होती जिस सड़क पर
जो जाती है उस घर तक
जहां तुम पैदा हुए थे
सूर्यास्त, अकेलेपन, नींद और
पत्तियों के झड़ने के बीच पिघलते हुए
लौटना किसी मारे जा चुके सिपाही की तरह.

स्‍मेल्‍स लाइक टीन स्पिरिट : निर्वाना (नेवरमाइंड से)

Tuesday, August 26, 2008

ख़ालीपन को निराश करने के कुछ निजी टोटके

ख़ुश होना कोई टोटका होता है, या कोई कोशिश, जिसमें बार-बार 'नो' के डिब्बे में सही का निशान लगाना होता है। और कभी छल से निहुरकर 'यस' के डिब्बे की तरफ़ देखें, तो पाते हैं कि वह उसी तरह काग़ज़ से गिर गया है, जैसे अंतोनियोनी की किसी फिल्म में बारीकी से अतल में गिरता गुलाब का कोई टुकड़ा। मन करता है, वेनिस के पानी में छपाकें मारने का, तो इल्म होता है किसी रोमन मिथ का, कि प्रेम की देवी को जब पहली बार विरह का शाप मिला, तो वह इस क़दर रोई कि शहर पनीले हो गए।


किसी कॉलेज के कैंपस में ऊपर से बरसती बारिश और नीचे से उछलते कीचड़ के बीच, प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठकर, छूट गई छुअन का ताप कंधे पर महसूस करते खिंचवाई तस्वीर को देखकर ख़ुश होने की कोशिश भी 'नो' के डिब्बे की तरफ़ ले जाती है और कॉलरा का फ्लोरेंतीनो दिखाई पड़ता है, जिसने अपने कंधे आज तक उचका रखे हैं, क्योंकि जब पहली बार वह छुअन उसके कंधे पर आकर बैठी थी, तो विस्मय, हर्ष और स्वीकार की कोमलता में उसके कंधों का वही पहला रिस्पॉन्स था। लगातार सफ़ेद होती मूंछ बताती है कि उम्र एक अंधेरी सुरंग है महज़. बेरंग, बदरंग।


या कि वान गॉग का आर्ल्स का कमरा देखते रहें, जहां पीले के बीच उभरा हुआ हरा भी बेनूरी में थककर पीला हो जाता है, जहां पलंग पर एक ख़ालीपन रहता है, गोकि यह उसी की पलंग हो और कमरे में एक ख़ालीपन विचरता है गोकि यह उसी का कमरा हो, और बग़ल की मेज़ पर बिसूरती दवा की बोतल जैसे जानती हो कि यह उसकी मेज़ नहीं है। दीवार पर लटकी तस्वीरें, कपड़े, तौलिए बारहा कोशिश करते हैं कि वे ख़ालीपन को निराश कर दें। पर एक तस्वीर क्या होती है ख़ालीपन को निराश करने वाली? एक मैं क्या होता हूं? भरे-भरे का अस्तित्व तो इसीलिए है कि ख़ालीपन कहीं ढंका-तुपा रह जाए।


एक बेपरवाह फुसफुसाहट औचक आती है, कहती है कि सच हमेशा बेआरामी से भरा होता है और सिर झुकाकर अंगूठे से फ़र्श को खोदते रहने की क्रिया हमेशा ख़ुशी से ख़ाली रहती है। पैरों को अपराधबोध होता है कि वे चलने तक से मना कर देते हैं, नाचना तो दूर की बात है।

वैसे, अपराधबोध से भरा होना भी एक तरह से ख़ालीपन ही होता है. क्‍या ये ख़ालीपन को निराश करने लायक़ हो सकता है?


जॉर्ज माइकल की केयरलेस व्हिस्‍पर.

Thursday, May 15, 2008

एक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत...





यौवन की ऋतु में जो भी मरता है,
वह या तो फूल बन जाता है या तारा।
यौवन की ऋतु में आशिक़ मरता है
या फिर करमों वाला।

हमारे यहां बहुत उम्‍दा कवि हुए हैं, लेकिन ऐसे कम ही हैं, जिन्‍हें लोगों का इतना प्यार मिला हो। हिंदी में बच्चन को मिला, उर्दू में ग़ालिब और फ़ैज़ को. अंग्रेज़ी में कीट्स को. स्पैनिश में नेरूदा को. पंजाबी में इतना ही प्यार शिव को मिला. शिव कुमार बटालवी. शिव हिंदी में कितना आया, यह अंदाज़ नहीं है. पंजाब आने से पहले मैंने सिर्फ़ शिव का नाम पढ़ा था. इतना जानता था कि कोई मंचलूटू गीतकार था. पर शिव सिर्फ़ मंच नहीं लूटता. उसकी साहित्यिक महत्ता भी है. उसे पढ़ने, सुनने के बाद यह महसूस होता है. वह अकेला कवि है, जिसकी कविता मैंने अतिबौद्धिक अभिजात अफ़सरों के मुंह से भी सुनी है और साइकिल रिक्शा खींचने वाले मज़दूर के मुंह से भी. ऐसी करिश्माई बातें हम नेरूदा के बारे में पढ़ते हैं. पंजाब में वैसा शिव है.

1973 में जब शिव की मौत हुई, तो उसकी उम्र महज़ 36 साल थी। उसने सक्रियता से सिर्फ़ दस साल कविताएं लिखीं. इन्हीं बरसों में उसकी कविता हर ज़बान तक पहुंच गई. 28 की उम्र में तो उसे साहित्य अकादमी मिल गया था. प्रेम और विरह उसकी कविता के मूल स्वर हैं. वह कविता में क्रांति नहीं करता. मनुष्य की आदत, स्वभाव, प्रेम, विरह और उसकी बुनियादी मनुष्यता की बात करता है. वह लोककथाओं से अपनी बात उठाता है और लोक को भी कठघरे में खड़ा करता है. जिस दौर में लगभग सारी भारतीय भाषाओं में कविता नक्‍सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित थी, शिव बिना किसी वाद में प्रवेश किए एक मेहनतकश आदमी की संवेदनाओं और भावनात्मक विश्वासों की बात कर रहा था. इसीलिए पंजाबी कविता के प्रगतिशील तबक़े ने शिव को सिरे से ख़ारिज कर दिया. हालांकि उसकी कविता इतनी ताक़तवर है कि अब तक लोकगीतों की तरह सुनी-गाई जाती है. कहते हैं, एक बार पाश ने शिव का गला पकड़ लिया था, किसी मंच पर. पाश को शिव की कविता पसंद नहीं थी. ख़ैर.

शिव की बरसी पिछले सप्ताह ही बीती है। यहां शिव की एक कविता प्रस्तुत है, जो पंजाबी में ही है. शिव बहुत सुंदर था. नाम था. कविताओं की गूंज थी. कहते हैं, एक वरिष्ठ साहित्यकार की बेटी उस पर फिदा हो गई. नाराज़ होकर बाप ने लड़की को लंदन भेज दिया. तो उस 'खो गई लड़की' के लिए शिव ने यह कविता लिखी थी, जिसका असली शीर्षक है इश्तेहार. सरल-सी यह कविता सरल-सी पंजाबी में है. 

एक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी
लम्म सलम्मी सरूं क़द दी
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
पर नैणां दी गल्ल समझदी

गुमियां जन्म जन्म हन ओए
पर लगदै ज्यों कल दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों अज्ज दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों हुण दी गल्ल है
हुणे ता मेरे कोल खड़ी सी
हुणे ता मेरे कोल नहीं है
इह की छल है इह केही भटकण
सोच मेरी हैरान बड़ी है

नज़र मेरी हर ओंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है
ओस कुड़ी नूं टोल रही है
सांझ ढले बाज़ारां दे जद
मोड़ां ते ख़ुशबू उगदी है

वेहल थकावट बेचैनी जद
चौराहियां ते आ जुड़दी है
रौले लिप्पी तनहाई विच
ओस कुड़ी दी थुड़ खांदी है
ओस कुड़ी दी थुड़ दिसदी है

हर छिन मैंनू इयें लगदा है
हर दिन मैंनू इयों लगदा है
ओस कुड़ी नूं मेरी सौंह है
ओस कुड़ी नूं आपणी सौंह है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौंह है
ओस कुड़ी नूं रब्ब दी सौंह है
जे किते पढ़दी सुणदी होवे
जिउंदी जां उह मर रही होवे
इक वारी आ के मिल जावे
वफ़ा मेरी नूं दाग़ न लावे
नई तां मैथों जिया न जांदा
गीत कोई लिखिया न जांदा

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है।

Friday, April 4, 2008

आज महान गायक कुंदनलाल सहगल का जन्‍मदिन है...

सहगल एक तलाश का नाम है- अपने भीतर किसी चीज़ की तलाश। जैसे कस्तूरी की तलाश करता है मृग, वैसी ही बेचैनी। सहगल का वक्त देख लें। घड़ी में तूफ़ान आया लगता है। रात यहां हैं, सुबह वहां हैं, दिन में कहां होंगे, किसे पता है। भटकन है। फिसलन है। कभी जम्मू में हैं, कभी जालंधर, शिमला, मुरादाबाद, कानपुर, कलकत्ता, मुंबई, पुणे। सहगल दौड़ रहे हैं। चीज़ें हाथ से फिसल रही हैं। दर्द का दरिया ठाठें मार रहा है। सुर गले में कांटे पैदा कर रहे हैं। बड़ी ख़लिश है। इस तपिश को किस बुख़ार का नाम दिया जाए? उस शख़्स के दुख को समझा जाए, जिसे अपनी तलाश का इल्म नहीं। जिसे पता नहीं कि दिल में बेचैनी का बगूला आखि़र क्यों उठता है? दर्द कहां से आता है? पीर क्यों परबत-सी हो जाती है? ग़म की गंगा किस आकाश से आती है? दिल का हुड़दंग अंत में सितार के तार में सुरों से बंध जाता है। चुभन हारमोनियम के बटन में पनाह पाती है। संगीत के महादेव! खोलो अपनी जटाएं। थाम लो ग़म की इस गंगा को, जो सारे बंध तोड़ती हज़ारों मील ऊंचे आसमान से गिर रही है- लटपटाती हुई, ख़ब्तुलहवास! कुंदन, आ जाओ और थाम लो दुखों को। देखो, तुम्हारे जाने को बाद से वीरान है मौसीक़ी का मयकदा, ख़ुमो-सागर उदास है...

उन्हें हिंदी सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा गया। पाकिस्तानी शायर अफ़ज़ाल अहमद सैयद से शब्द उधार लें, तो कह सकते हैं, जैसे काग़ज़ मरा‍कशियों ने ईजाद किया था, हुरूफ़ फिनिशियों ने, सुर गंधर्वों ने, उसी तरह सिनेमा का संगीत सहगल ने ईजाद किया। दुनिया में कई रहस्य हैं। चुनौती देते। चुनौती सहगल भी दे गए हैं। फ़क़ीरों-सा बैराग, साधुओं-सी उदारता, मौनियों-सी आवाज़, हज़ार भाषाओं का इल्म रखने वाली आंखें, रात के पिछले पहर गूंजने वाली सिसकी जैसी ख़ामोशी, और पुराने वक़्तों के रिकॉर्ड की तरह पूरे माहौल में हाहाकार मचाती एक सरसराहट... बता दो एक बार, ये सब क्या है? वह कौन-सी गंगोत्री है, जहां से निकल कर आती है सहगल की आवाज़? पता कर लो, कहां से आता है सहगल का दर्द, जो सीने में हूक, आंखों में नमी और कंठ में कांटे दे जाता है? क्यों एक रुलाहट आंखों पर दस्तक देती है और बिना कुछ कहे तकती हुई-सी लौट जाती है? यह सुबह या दुपहरी की नहीं, सांझ के झुटपुटे की आवाज़ है, जिसका असर रात के साथ गहरा होता जाता है। अगर आप दिल से कमज़ोर हैं, आधी रात को सहगल मत सुनिए। उन्हें सुनना भाषा में तमीज़ को जीना है। आंख में आंसू का सम्मान करना है। दुख जो दिल के क़गार पर रहता है, उसे बीचो-बीच लाकर महल में जगह देनी है। दुख को जियो, तो जीने का शऊर आ जाता है।

सहगल चमचमाती हुई कामयाबी का नाम नहीं है, राख और धुएं का नाम है। बर्बादी का जश्न है, जो सूखते हुए पत्ते को नम हो जाने का मंत्र देता है। वह तपती हुई रेत है, जिस पर तलवे रखने से मज़बूती हासिल होती है। वह क़तरा-क़तरा अपनी मौत में घुसता है और अपनी अंजुरी में भरकर सूर्य को सुरों का अर्घ्य देता है। वह अपना घर जलाता है और सितारों को रोशनी का दान देता है। वह शरत् का देवदास है- असली देवदास, जिसमें बचाने के लिए, ख़त्म हो जाने का साहस है। देवदास हर दिल में रहता है। पारो हर लड़की में रहती है। सहगल हर नब्ज़ में बहता है। हर कंठ में कांटों की शक्ल में रहता है, हर उस हथेली में चुभन बनकर बसता है, जो किसी पुराने स्पर्श की याद में बिसूर रही होती है।

सहगल के बारे में कुछ खास बातें
1- सहगल की उदारता के कई कि़स्से मिलते हैं। कहते हैं कि न्यू थिएटर्स के ऑफिस से उनकी सैलरी सीधे उनके घर पहुंचाई जाती थी, क्योंकि अगर उनके हाथ में पैसे होते, तो आधा वह शराब में उड़ा देते, बाक़ी ज़रूरतमंदों में बांट देते। एक बार उन्होंने पुणे में एक विधवा को हीरे की अंगूठी दे दी थी।

2- सहगल बिना शराब पिए नहीं गाते थे। 'शाहजहां' के दौरान नौशाद ने उनसे बिना शराब पिए गवाया, और उसके बाद सहगल की जि़द पर वही गाना शराब पिलाकर गवाया। बिना पिए वह ज़्यादा अच्छा गा रहे थे। उन्होंने नौशाद से कहा, 'आप मेरी जि़ंदगी में पहले क्यों नहीं आए? अब तो बहुत देर हो गई।

3- सहगल को खाना बनाने का बहुत शौक़ था। मुग़लई मीट डिश वह बहुत चाव से बनाते थे और स्टूडियो में ले जाकर साथियों को भी खिलाते थे। यही नहीं, आवाज़ की चिंता किए बग़ैर वह अचार, पकोड़ा और तैलीय चीज़ें भी ख़ूब खाते थे। सिगरेट के भी ज़बर्दस्त शौक़ीन थे।

4- सहगल ने ग़ालिब की क़रीब बीस ग़ज़लों को अपनी आवाज़ का सोज़ दिया। ग़लिब से इसी मुहब्बत के कारण उन्होंने एक बार उनके मज़ार की मरम्मत करवाई थी।

5- सहगल पहले गायक थे, जिन्होंने गानों पर रॉयल्टी शुरू की। उस वक़्त प्रचार और प्रसार की दिक़क़्तों के बावजूद श्रीलंका, ईरान, इराक़, इंडोनेशिया, अफ़ग़ानिस्तान और फिजी में सुने जाते थे। आज भी 18 जनवरी को कई देशों में सहगल की याद में संगीत जलसे होते हैं।

6- वह विग लगाकर एक्टिंग करते थे। अभिनेत्री कानन देवी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, 'साथी की शूटिंग के दौरान हवा के झोंके से उनकी विग उड़ गई और उनका गंजा सिर दिखने लगा। लेकिन सहगल अपनी धुन में मगन शॉट देते रहे। इस पर दर्शक हंस पड़े। सहगल झेंपने की जगह लोगों के ठहाकों में शामिल हो गए।

7- सहगल की क़द्र भारत से ज़्यादा पाकिस्तान में नज़र आती है। वहां जि़ला स्तर पर सहगल यादगार कमेटियां बनी हैं। सहगल की बरसी पर आम प्रशंसा बाक़ायदा लंगर लगाते हैं।

8- लता मंगेशकर सहगल की बड़ी भक्त हैं। वह चाहती थीं कि सहगल की कोई निशानी उनके पास हो। वह उनकी स्केल चेंजर हारमोनियम अपने पास रखना चाहती थीं, पर सहगल की बेटी ने उसे अपने पास रखते हुए सहगल की रतन जड़ी अंगूठी लता को दी। लता के पास आज भी वह निशानी है। कहते हैं कि कमउम्र में लता ने सहगल की एक फिल्म देखने के बाद उनसे शादी करने का ख्‍याल ज़ाहिर किया

9- रेडियो सीलोन पर हर सुबह 7:57 बजे सहगल के गाने चलते थे। जालंधर के पुश्तैनी मकान में जिस वक्त सहगल की मौत हुई थी, उस वक्त सुबह के 7:57 ही बजे थे। जिस्म चला गया था, फि़ज़ा में तैरती उनकी आवाज़ बाक़ी रह गई थी।

(नवरंग, दैनिक भास्कर 18 जनवरी 2007 से)