Friday, September 12, 2008

नकार का कोबेन, निराशा का रीज़्झी


कर्ट कोबेन और बोरिस रीज़्झी में क्या समानता है?

रीज़्झी नए रूस का कवि था. वह रूस, जो अपने बिखरे हुए सपनों, कटे हुए डैनों के साथ लाल चौक के बाहर एक पेड़ की फुनगी पर लटका हुआ था, गिरने-गिरने को. और गिरने से बड़ी विडंबना कि इस गिरने से वह हुलस रहा था. अपने सपनों को इतिहास की सबसे फूहड़ गालियां देता हुआ. रीज़्झी उस रूस की नई पीढ़ी का प्रतिनिधि था. आंख झपकते इस पीढ़ी की हुलसित होहराहट अवसाद से भरी बड़बड़ाहट में बदल गई. दूसरे के अंगों पर फेंकी गई गालियां रपटकर अपने ही अंगों पर आन गिरीं. निराशा, नकार (नेगेशन फॉर नेगेशन वाला तो क़तई नहीं) अराजकता और अपराध की अंधेरी काली बस्तियों में यह पीढ़ी शरण लेती है. रीज़्झी उस पीढ़ी की कविता लिखता है. जिस सदी के शुरुआती बरसों में रूस में मायकोवस्की उम्मीद की कविता लिख रहे थे, उसी सदी के आखि़री बरसों में उसी देश का एक नौजवान अंधेरे को सबसे खुरदुरी आवाज़ दे रहा था. वह सारी चीज़ों को नकार रहा था, लेकिन उसे नहीं पता था कि हामी किसकी भरी जाए. 2001 में रीज़्झी ने जब आत्महत्या की, तो उसकी उम्र 26 साल थी. सामाजिक-पारिवारिक असफलताएं और उससे उपजे अवसाद उसे ड्रग्स की तरफ़ ले गए, और ड्रग्स अवसाद के चरम पर.

कर्ट कोबेन नए अमेरिका का गायक था. 1994 में उसने 27 की उम्र में आत्महत्या कर ली थी, जिस समय वह अपनी प्रसिद्धि के चरम पर था. इसकी मौत के प्रत्यक्ष कारण भी ड्रग्स और अवसाद ही थे. वह जॉन बॉन जॉवी, गन्स एन रोजेस, मैटेलिका और एरोस्मिथ का दौर था. कर्ट कोबेन अपने बचपन के दोस्तों के साथ हार्ड रॉक बैंक `निर्वाना´ लेकर आया, जिसने रॉक और मेटल संगीत का पूरा चेहरा ही बदल दिया. कोबेन ने अपने संगीत को `ग्रूंज रॉक´ कहा. उसका संगीत तीखी धुनों, ग़ुस्सैल इलेक्ट्रिक गिटार और असमंजस के शोर से बनता है. उसमें बीच-बीच में आई चुप्पी एक नाकाम तलाश और अनुत्तरित दस्तक के बाद घुटने मोड़कर बैठ जाने की स्थिति है और फिर सनक कर, बौखलाहट में उछाली गई गाली है. ऐसी अंट-शंट अवस्था में ज़रूरी नहीं होता कि कहा गया हर शब्द अपने साथ एक निश्चित कि़स्म का अर्थ ढोता हो. यह अमेरिका की वह पीढ़ी है, जिसकी झेरॉक्स प्रतियां दूसरे देशों में एक्सपोर्ट की जाती हैं. इसका दहकता हुआ लिबीडो, नायकों की तलाश में दर-द भटकते तीसरी दुनिया टाइप के देशों के दुर्बल, हीन नौजवानों को पुचकार-पुचकार पुकारता है. रॉक संगीत अनियंत्रित और निरुद्देश्य विरोध का संगीत है. कोबेन का संगीत भी नकार का संगीत है, लेकिन रीज़्झी की तरह (और हमारे पढ़े-देखे-सुने कई अल्हड़ क्रांतिकारी प्रोटोटाइप-से) ही कोबेन भी कभी नहीं जान पाया कि आखि़र हामी किसके लिए भरी जाए. जब वह चीख़कर कहता है, `अ मुलैट्टो, एन अल्बीनो, अ मस्कीटो, माय लिबीडो´, तो यह कोई प्रतीक नहीं, उसकी पूरी पीढ़ी के निरर्थक भटकाव का शोर होता है.

नौजवान देशों को अपनी नौजवानी और सपनों पर हमेशा फख़्र होता है, लेकिन उन्हें कभी इसकी चिंता नहीं होती कि नौजवानी की इस नवऊर्जा को परनालों में बहने से कैसे रोका जाए. कोबेन और रीज्‍झी दोनों को ही भटका हुआ युवा माना गया था. भटके हुए युवा अपराध करते हैं, लेकिन ये भटके हुए दो युवा संगीत रचते हैं, कविता करते हैं. तो क्‍या संगीत और कविता अपराध हैं ?  अगर नहीं, तो फिर यह किस्‍म का भटकाव है ? क्‍या यह एक भटकी हुई दुनिया के बीच अपनी राह खोजने का रचनात्‍मक भटकाव है, जिसका कला में विस्‍फोट होता है ? और एक दिन यह अहसास होता है कि हमारी इस खोज को यह भटकी हुई दुनिया कोई मान्‍यता ही नहीं दे रही, तब आत्‍मघात होता है? कलाकार का आत्‍मघात समूची दुनिया को दी गई चेतावनी होती है कि देख लो, तुम भटकी हुई हो. तुम मुझे सहेज ही नहीं पाई. जब कोई अपने आप ख़ुद को ख़ारिज करता है, तो वह दरअसल, ख़ुद के अलावा सबको ख़ारिज कर रहा होता है.

बहरहाल, कविता और संगीत की दो बड़ी प्रतिभाओं (जिनका बड़ा हिस्सा अब हमेशा अनएक्सप्लोर्ड ही रहेगा) की झलक देखिए. पहले रीज़्झी की कविता `ट्राम´ और नीचे निर्वाना का गीत `स्मेल्स लाइक टीन स्पिरिट´.


ट्राम : बोरिस रीज़्झी

अतीत में जाना है तो
बेहतर है एक ट्राम पकड़ लो
जो घंटियां बजाती चलती है
जिसकी पटरी पर
कोई बेवड़ा, गंदला स्कूली बच्चा
सनक गई लड़की और
पोपलर की पत्तियां बिछी होती हैं

पांच या छह स्टॉप्स के बाद
हम 1980 में पहुंच जाते हैं
जहां बाईं ओर मार कारख़ाने हैं
दाईं ओर मार कामगार
अरे उतर कर देख भी लो लल्लू
चिंता मत करो
क्या बुदबुदा रहे हो तुम, शकी हो,
ऐसा जो भी कुछ है हमने नबोकोव से पाया है
वह ज़मींदार का बेटा था
हम लोग तो जूठन हैं
ये क्या, तुम्हारे चेहरे पर आंसू
अरे छोड़ो भी, मुस्कराओ यार

हमारा स्टॉप ये है-
जहां देखो वहां पोस्टर, बैनर
नीला आसमान, लाल नेकटाई
किसी की शोकयात्रा है, साजि़ंदे बजा रहे हैं
उनके साथ तुम भी गुनगुनाओ सीटी बजाते हुए
और उस ख़ूबसूरत आवाज़ में खो जाओ
खो जाओ अपने लैदर जैकेट में,
उसकी जेबों में हाथ डाले
उस रास्ते पर जहां अलगाव कभी ख़त्म नहीं होता
उदासी कभी ख़त्म नहीं होती जिस सड़क पर
जो जाती है उस घर तक
जहां तुम पैदा हुए थे
सूर्यास्त, अकेलेपन, नींद और
पत्तियों के झड़ने के बीच पिघलते हुए
लौटना किसी मारे जा चुके सिपाही की तरह.

स्‍मेल्‍स लाइक टीन स्पिरिट : निर्वाना (नेवरमाइंड से)

Tuesday, September 9, 2008

चादर, पैर और दिल्ली की डकार

दिल्ली एक बहुत बड़ी चादर लग रही थी, जिसमें से अनगिन पैर बाहर निकले हुए थे. चादर में न अंट पाने का दोष पैरों को देना ग़लत है. नींद में ग़ाफि़ल उन लोगों को खोजना चाहिए, जिन्होंने चादर का ऊपरी सिरा कहीं दांतों में खोंच रखा है. मैं पैदल चलता था और दिल्ली नाम की चादर से बाहर निकले, बिना नाम वाले पैरों से टकराकर लटपटा जाता.

कुछ ख़ाली घंटे नेमत की तरह आते हैं, और उनमें किसी नामधारी से मिलना नेमत को शर्मिंदा करने जैसा होता है, कुछ ऐसा ही सोचकर मैं सड़क के एक किनारे खड़ा था. पचास किताबों का बोझ मामूली नहीं होता. कंधे पर टांगकर चलना ख़ुद से कोई बदला चुकाने जैसा होता. और ख़ाली घंटे नेमत होते हैं, और ये नेमत आपको ईश्वर भेजता है, और ईश्वर नेमतें भेजने के मामले में बहुत कंजूस होता है, फ़रिश्तेपन की प्रतीक्षासूची में खड़ी आत्माएं ऐसा बताकर गई थीं.

और वह जो ऑटो रिक्शा वाला था, वैसी ही किसी सूची में खड़ा दिखता था. स्वभाव के विपरीत मेरे मुंह से शब्द झरने लगे. वह भी बोल रहा था. मेरी भाषा उसके सामने, भाषा सीखने के क्रम में किसी बच्चे की त-त, प-प से ज़्यादा नहीं लग रही थी. वह मोलभाव कर रहा था और मैं उसे आशंकित कर रहा था कि मैं बिना किराया दिए भाग भी सकता हूं. मयूर विहार, नहीं, पश्चिम विहार, अरे, द्वारका चलो यार, छोड़ो, आईटीओ तक ही. एक काम करो, मंडी हाउस छोड़ देना. श्रीराम बुक सेंटर.

वह सलाह दे रहा था कि पहले सोच लो. और मैं सोच रहा था कि कुछ घंटे अचानक ख़ाली मिल जाएं, तो वाणी कैसी तो खड़बड़ा जाती है, खोपड़ी वैताग जाती है. करें क्या, दिमाग़ बोंब मारता है. मैं उसके रिक्शे में जमा हुआ था और बाहर खड़ा वह अभी भी नक्की कर लेना चाहता था कि कहां और कितने में उतारेगा मुझे.

हो सकता है, दो मिनट बाद ही उतर जाऊं मैं.
मेरी बात सुनकर वह बमकने-सी अवस्था में आने लगा- आप तो अभी उतर जाओ. गड़बड़ आदमी लगते हो.
तो ये भी मेरी गड़बड़ी ताड़ गया. इस गड़बड़ी का क्या किया जाए, जो छिपाए नहीं छिपती. जिसे मैं अपने सीधेपन का छत्रगौरव मानता हूं, वह सामने वाले को गड़बड़ कि़स्म की धूर्तता क्यों लगती है?

सारी धूर्तता को रिवील करते हुए मैंने उसे यूं ही दिल्ली घुमाने के लिए कह दिया. और वह घुमाता भी रहा. इंडिया गेट के सामने ले जाकर बोले कि ये इंडिया गेट है, तो 'तिच्या आईला, देऊ का कानाखाली' जैसा कोई रापचिक बोलवचन मुंह से फूटने-फूटने को होता, पर वासुदेव कृष्ण टाइप का मुस्कानिज़्म रोक-रोक लेता. आंख निकलकर नाक तक आती और स्वांग में रोम-रोम का साझा होता.

एक जगह थककर सड़क किनारे पेड़ तले लेट जाने का मन हुआ. इस तरह खुले में पता नहीं कब लेटा था. आंख खुले, तो नींद आती है और आंख बंद हो, तो अनिद्रा. मारकेस के नॉवेल की वह लड़की, जो मिट्टी खाती है और पूरे गांव की नींद भी. पर छांव भली लगती है. घास पर और भी लोग लेटे हैं. उन सबके पांव चादर से बाहर हैं.

पास बैठकर बीड़ी फूंकता ऑटोवाला अपने घर की कहानी सुना रहा है. दिल्ली की बेदिली के कि़स्से. मैंने एक घर ख़रीदा. पटपड़गंज में. एक जाट ने उस पर क़ब्‍ज़ा कर लिया. मुझे सामान सहित घर से निकाल दिया. कुछ दिन मेरे पूरे परिवार ने ऐसे ही सड़क के किनारे जीवन जिया.
सामने एक दूसरा ऑटोवाला सवारी से भाड़े की किचकिच कर रहा है. ये वाला कहता है कि सब एक जैसे हैं.
उससे एक बीड़ी लेकर किनारे का जीवन जीता हूं. उससे कहता हूं, पैर दिखा.
अचकचा जाता है.
अबे, पैर दिखा.
अपना और उसका पैर एक साथ रखता हूं और कहता हूं, देख, दोनों एक-से हैं. दोनों पर चादर से बाहर रहने के निशान हैं, सूखी हुई चमड़ी पर बाहर रहने की सफ़ेद धारीदार आदत है.
आंख फिर नाक तक आती है और उलटकर लौटकर जाती है. स्साला. गड़बड़ आदमी है. कुछ ऐसा ही सोचा उसने और पैर पीछे खींच लिया. फिर सकुचाकर पूछा- कहां रहते हो?

बग़ल में लेटी अरस्तू की आत्मा को उसका सवाल दिलचस्प लगता है. वह मेरी देह में आ जाता है और कहता है-
मैं अपने शब्दों में रहता हूं. मेरे शब्दों की छत इन दिनों टपकती है. तुम ही बताओ, कोई टपकती छत के नीचे कितने दिनों तक रह सकता है?
हम तो खुले आसमान के नीचे रह लेते हैं. टपकती छत से क्या गुरेज़!
अरस्तू की आत्मा ओझा को चंवर डुलाती है. उचक कर पेड़ पर टंग जाती है. ये सारे दार्शनिक दिल्ली के ऑटोवालों से क्यों नहीं मिल लिए आकर?

उबासी की पत्ती उड़ते हुए आती है. पिछली कई रातों से थकान के बाद भी बिस्तर पर जागी हुई सिलवटें हैं बस. मिट्टी खाने वाली बच्ची नींद भी खा जाती है.
एक राउंड और. एक्सीलरेटर और ब्रेक का संतुलन बनाते वह फिर अपने मकान से बेदख़ली का कि़स्सा सुनाने लगता है.
मैं उसके और अपने पैर देखता हूं. दोनों एक जैसे ही तो हैं. पर वह नहीं मानता.
ख़ाली घंटे ईश्वर नेमत से देता है. और मैं ऐसे ही बचे किसी घंटे में फिर दिल्ली नाम की चादर से बाहर निकले, बिना नाम वाले पैरों से टकराता लड़खड़ाता भटकता हूं. उम्मीद से कि इस चादर के नीचे कहीं कोई जगह मुझे भी मिल जाए.

मकान से बेदख़ली का कि़स्सा जारी रहता है. किसी ऐसी लिपि में, जिसे पढ़े जाने की उम्मीद भी बाक़ी नहीं. किसी ऐसी आवाज़ में, जो डकार और ठहाकों के समय में गूंगी-बहरी हो चुकी.

Sunday, September 7, 2008

झोंक या झक का आज-टाइप रंग

जो नहीं समझ सका
तुम्‍हारी चुप्‍पी
व‍ह क्‍या समझेगा तुम्‍हारे बोल?

कितना बुरा था यह सुनना
मैं तुमसे प्‍यार करता हूं
हंड्रेड परसेंट
और सच है ये सच
हंड्रेड परसेंट

नहीं, कहन का तरीक़ा नहीं था यह
माप लेने की नपी-तुली साजि़श थी
दिल साफ़ रहा बरहमेश ज़िंदगी गंदी

अब कम से कम
आसमान से गिरती हर शै को गाली मत दो
पुरानी किताबों में पढ़ा है मैंने
बौराई बारिश की तरह
कभी-कभार पंखुरियां भी बरसती थीं
***
(काग़ज़ पर गिरकर फैल गए, किसी झोंक या झक के आज  वाले रंग के  बीच  आईं कुछ बेतरतीब पंक्तियां.)


और एनिग्‍मा का सेडनेस.