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Friday, April 27, 2012

नेपथ्‍य में भव्‍यता





वाराणसी, राम कुमार. 


'मेघदूतम' में कालिदास, उज्‍जैन को स्‍वर्ग से टूटकर गिरा एक टुकड़ा कहते हैं. जब मेघदूत इस शहर की छत से गुज़रता है, तो बस, इसे निहारता रहता है, इसकी और इसके लोगों की तारीफ़ में कई पन्‍ने लिखे हैं उन्‍होंने. यक्ष अपनी स्‍त्री के प्रेम में है, विछोह में है, उसी तरह जल से भरे उस मेघ को अगर पूरे काव्‍य में किसी से प्रेम हुआ जान पड़ता है, तो उज्‍जैन से ही हुआ होगा. वह इतनी प्रेमिल आंखों से इस शहर को निहारता है.

कई बार मैं सोचता हूं कि जब मेघ, अलकापुरी पहुंच गया होगा, तो उसके बाद वह ख़ुद एक विचित्र कि़स्‍म के बिछोह से पीडि़त हुआ होगा-- उज्‍जैन का बिछोह. वह किसे दूत बनाएगा ? उज्‍जैन जैसे शहर, क्‍या अघोषित और अन-अभिव्‍यक्‍त प्रेम को अभिशप्‍त हैं ? महाकाल उज्‍जैन में रहते हैं, लेकिन बसेरा उनका कैलाश है, नगरी उनकी काशी है. अशोक अपने जीवन के महत्‍तम पाठ उज्‍जैन में पढ़ते हैं, लेकिन उनका अस्तित्‍व मगध में रहता है, राजगृह में टहलता है, कलिंग में वह शेखर हैं. महेंद्र और संघमित्रा, विदिशा चले गए हैं, श्रीलंका के खाते में हैं. वर:मिहिर का नाम ख़ुद उज्‍जैन हिचक से लेता है कि उन्‍हें शहर से नहीं, आसमान से प्रेम था. और वह बार-बार बग़दाद भाग जाना चाहते थे.

क्‍या अतुल्‍य भव्‍यता भी आपको द्वितीयक बनने को प्रशस्‍त करती है ? ऐसा होता है. सारी भव्‍यताएं एक दिन नेपथ्‍य में चली जाती हैं.

बहुत कम शहर ऐसे बचे हैं, जो एक साथ दो युगों में जीते हैं. पुराने मिथकीय शहर नष्‍ट हो चुके हैं. ट्रॉय कहीं नहीं है, कुन्‍स्‍तुनतूनिया अब अत्‍याधुनिक इस्‍ताम्‍बुल है, रोम अपने शव का म्‍यूकस है. पटना, नालंदा, कश्‍मीर अपने भव्‍य अतीत के वर्तमान चुटकुले या दर्द हैं. उज्‍जैन इसलिए भी विरल है कि वह अब भी एक अवधारणात्‍मक इतिहास की धूल में जि़ंदा है. कई सारे नगरों के साथ ऐसा नहीं हो पाता. 

विक्रमोर्वशीयम में कालिदास ने कथा की पृष्‍ठभूमि प्रतिष्‍ठानपुर को बनाया है. विद्वानों में एकराय नहीं कि यह प्रतिष्‍ठानपुर है कौन-सी जगह? उन्‍होंने जैसा वर्णन किया है, उसके आधार पर कुछ लोग उसे प्रयाग पास स्थित एक छोटा-सा क़स्‍बा झूंसी मानते हैं. महादेवी वर्मा के रेखाचित्रों में झूंसी कई बार आता है. लगभग चार बड़े राजवंशों के दौरान महत्‍वपूर्ण स्‍थान रहे प्रतिष्‍ठान के नाश की कथा भी कम दिलचस्‍प नहीं है. चौदहवीं सदी में यहां हड़बोंग नामक राजा का राज था. कहते हैं, अन्‍यायी था. एक बार एक पीर उसके राज्‍य में आए और राजा उनका यथोचित सम्‍मान न कर पाया, उल्‍टे अपमान कर बैठा. तब पीर ने क्रुद्ध होकर आसमान में चमकने वाले मिरिख सितारे को हुक्‍म दिया कि वह इस नगर पर वज्र की तरह गिरे. ग़लती राजा की थी, दंड पूरे नगर को मिला. नगर झुलस गया. बर्बाद हो गया. झुलसने के कारण उसका नाम झूंसी पड़ा. 

अगर ऐसी कहानियों में सत्‍यता हो, तो सबसे बड़ी बात निकलकर आती है कि एक राजा की ग़लती के कारण सिर्फ़ नगर और उसके नागरिकों को ही दंड नहीं मिलता, बल्कि पूरा इतिहास दंडित हो जाता है. क्‍योंकि कोई भी नगर कभी भी सिर्फ़ वर्तमान नहीं होता. इस कथा में वह पीर शायद अतीत का प्रतीक है. जिन नगरों और राजाओं को अतीत का सम्‍मान करना नहीं आता, उन पर मिरिख, वज्र बनकर टूटता है. झूंसी को भी नहीं पता कि उसका झुलसना समय के एक विशाल वृक्ष का झुलसकर लुप्‍त हो जाना है.

शहरों से प्रेम अपने अस्तित्‍व से प्रेम की तरह है. बहुत सारे लोग बदन पर कपड़ों की जगह शहर ओढ़कर चलते हैं. वे भाषा नहीं बोलते, शहर बोलते हैं. तभी किसी को देखते ही आप पहचान जाते हैं कि यह बठिंडा का है. और किसी की बोली सुनते ही आप कह देते हैं कि यह भोपाली है. यह ऐसा समय है, जिसमें सबसे ज़्यादा क्राइसिस आइडेंटिटी की है. कुछ लोग अपनी आइडेंटिटी को खो चुके हैं. कुछ के पास है, लेकिन वे उस आइ‍डेंटिटी से दूर भागते हैं. और कुछ अपनी आइडेंटिटी को त्‍यागकर दूसरी आइडेंटिटी ग्रहण कर लेना चाहते हैं. जैसे एक क़स्‍बाई, लगातार चाहता है कि उसकी आइडेंटिटी मुंबई-दिल्‍ली के साथ जुड़ जाए. जैसे मुंबई-दिल्‍ली में कई लोग लगातार चाहते हैं कि उनकी आइडेंटिटी न्‍यूयॉर्क-लंदन से जुड़ जाए. 

इस तरह का संघर्ष अपने इतिहास के साथ संघर्ष है. यह अपने शरीर से अपनी परछाईं को हटा देने का संघर्ष है.


(27 अप्रैल को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित.)

Saturday, April 21, 2012

पिकासो की प्रेमिकाएं






पिकासो की पेंटिंग 'सपना'. इसमें मैरी वॉल्‍टर मॉडल के रूप में हैं.

पिकासो का प्रेम-जीवन बहुत डरावना है. पिकासो ने कई बार प्रेम किया और हर बार वह ख़ुद प्रेम से दूर हुए. कई बार मुझे लगता है कि प्रेम भी उनके लिए एक प्रयोग था. वह न जाने किस चीज़ की तलाश कर रहे थे. उनके जीवन में कई प्रेम के बारे में पता चलता है, लेकिन सात प्रेमिकाओं ने उनकी कला पर गहरा प्रभाव डाला. पिकासो के कलात्‍मक जीवन में आलोचक सात मोड़ मानते हैं. द ब्‍लू पीरियड, द रोज़ पीरियड यानी गुलाब-काल, द न्‍यूड, क्‍यूबिज़्म, अफ्रीका से प्रभावित काल, क्‍लासिक दौर और सर्रियलिस्‍ट आदि हिस्‍से. हर प्रेम के बाद पिकासो के चित्रों में बदलाव आया. 


1904 : 
फरनांदे ओलिवर, पिकासो की पहली प्रेमिका थी. उसके साथ रहकर पिकासो ने 'द रोज़ पीरियड' पर काम किया. उस दौरान की अधिकांश पेंटिंग्‍स में जिस महिला की छवि है, वह ओलिवर ही है. दोनों नौ साल तक साथ रहे. पिकासो बहुत ईर्ष्‍यालु और पज़ेसिव प्रेमी थे. ओलिवर पर इतना संदेह करते थे कि कुछ घंटों के लिए बाहर जाना हुआ, तो ओलिवर को कमरे में बंद कर देते और बाहर से ताला लगा देते थे. ऐसा बरसों तक होता रहा, जब तक कि उनके जीवन में एवा गूल न आई. 


1913 :
एवा गूल के साथ भी पिकासो ओलिवर की तरह ही रहना चाहते थे, लेकिन यहां टकराव हुआ. उनका प्रेम-संबंध बहुत छोटा रहा. एवा ने दूर होने की धमकी दी, तो पिकासो ख़ुद ही दूर हो गए. एवा इसे सहन नहीं कर पाई, उसे टीबी हो गई. मनोरोगों और अवसाद से जूझते 1915 में उसकी मृत्‍यु हो गई. उसकी मृत्‍यु ने पिकासो को तोड़ दिया. क्‍यूबिज़्म पर किए गए तमाम कामों में आप पिकासो का एवा के प्रति प्रेम देख सकते हैं. क्‍यूबिज़्म में पिकासो पैशन से भरे हुए हैं.


1918 :
रूसी नर्तकी ओल्‍गा कोकलोवा से शादी करने से पहले पिकासो का ओल्‍गा की कई मित्रों से प्रेम रहा. ओल्‍गा रूसी नर्तकी थी और यूरोप के अभिजात्‍य में उसकी गहरी पैठ थी. उसने पिकासो को कई हाई-प्रोफ़ाइल लोगों से मिलाया, उनकी कला को पेरिस के एलीट के बीच प्रस्‍तुत किया. पिकासो मूलत: बोहेमियन स्‍वभाव के थे और ओल्‍गा पूरी तरह एलीट. दोनों में नहीं जमनी थी. नहीं जमी. ओल्‍गा से मुलाक़ात ही वह समय था, जब पिकासो ने बैलेरिना में पेंटिंग के प्रभावों को बदल दिया. उसी दौरान फिल्‍मकार ज़्यां कोक्‍त्‍यू से उनकी मित्रता गहरी हुई. कोक्‍त्‍यू ने कहीं लिखा, 'पिकासो मुझे रोज़ हैरत में डाल देते हैं. वह कई सुंदर आकार बनाते हैं, और घोषित सुंदरता से कुरूप आकारों की तरफ़ बढ़ते हैं. फिर वह सुंदर, सरल आकारों, चित्रों को रिजेक्‍ट कर देते हैं.' पिकासो ने यहां एक नया सौंदर्यशास्‍त्र गढ़ा था. लोगों ने जब उसे देखा, तो हैरान रह गए थे. उसे तुरत स्‍वीकृति नहीं मिली थी. यह ओल्‍गा के साथ पिकासो के प्रेम व कटु संबंधों का प्रतिफलन था. इनमें पिकासो का रंग-प्रयोग बहुत आक्रामक हो गया था. वहां ओल्‍गा भी अवसाद और पागलपन से घिर रही थी. 17 साल साथ रहने के बाद दोनों अलग हो गए. ओल्‍गा को नर्वस ब्रेकडाउन हो गया. वह विक्षिप्‍तों-सी हो गई. वह हमेशा उनका इंतज़ार करती रही.  ओल्‍गा को जब भी यह लगता कि पिकासो का प्रेम अब फलां लड़की के साथ चल रहा है, तो वह उस लड़की से संपर्क करती और पिकासो से दूर होने के लिए ध‍मकियां देती. धमकाते-धमकाते वह रोने लगती और धमकी, गुज़ारिश की भाषा में बदल जाती, 'मुझे मेरा पाब्‍लो लौटा दो.'  पिकासो ने उसे तलाक़ नहीं दिया था, क्‍योंकि ऐसा करने पर संपत्ति का आधा हिस्‍सा उसे देना होता. पिकासो धन के मामले में बेहद कंजूस थे. ओल्‍गा अपनी मृत्‍यु तक पिकासो की पत्‍नी बनी रही. 


1927 :
45 साल के पिकासो के जीवन में सत्रह साल की मैरी वॉल्‍टर आई. दोनों ने अपना प्रेम और रिश्‍ता गुप्‍त रखा. पिकासो उस समय ओल्‍गा के साथ रह रहे थे. वह किसी भी तरह इस रिश्‍ते को छुपा लेना चाहते थे, लेकिन वह अब तक सेलेब्रिटी बन चुके थे और ऐसा होना मुश्किल था. वह उनकी पेंटिंग्‍स के लिए मॉडल का काम करने लगी. पिकासो ने अपने घर के सामने एक मकान किराए पर लेकर मैरी को दिया. कुछ ही बरसों बाद उन्‍होंने एक महलनुमा स्‍टूडियो बनाया और मैरी वहां रहने लगी. 1935 में मैरी ने पिकासो की बेटी को जन्‍म दिया. इसके बाद ओल्‍गा सहित सभी को पिकासो के इस संबंध के बारे में जानकारी मिल गई. ओल्‍गा ने इसी घटना के बाद पिकासो को छोड़ दिया. मैरी हमेशा पिकासो से शादी करना चाहती थी. 'गेर्निका' बनाने के ठीक पहले क़रीब पांच साल तक पिकासो की पेंटिंग्‍स में बहुत चमकीले रंग, प्रसन्‍न चेहरे वाली एक युवती और आह्लाद के स्‍ट्रोक्‍स दिखते हैं. वे सब मैरी वॉल्‍टर है. चित्रों में अनूदित प्रेम. बेटी के जन्‍म के दो साल बाद पिकासो का एक और प्रेम होना था डोरा मार से. इस प्रेम के बारे में जानकारी मिलते ही मैरी बहुत दुखी हुई. वह अपनी बेटी के साथ दूर रहने चली गई. पिकासो ने कभी उससे शादी नहीं की, लेकिन हमेशा उसकी आर्थिक मदद करते रहे. 1977 में, पिकासो की मौत के चार साल बाद, बरसों लंबे अवसाद से परेशान होकर मैरी ने गले में फंदा डालकर आत्‍महत्‍या कर ली. 


1936 :
एक दावत में कवि पॉल एलुआर, पिकासो की मुलाक़ात फ्रेंच फोटोग्राफ़र डोरा मार से कराते हैं. डोरा बला की ख़ूबसूरत है और बहुत सुंदर स्‍पैनिश बोलती थी. पिकासो उसके भाषा पर प्रभुत्‍व से प्रभावित हो गए. पिकासो ने डोरा मार से प्रेम के बाद ही महान पेंटिंग 'गेर्निका' बनानी शुरू की. स्‍पैनिश गृहयुद्ध की विभीषिका पर आधारित यह पेंटिंग अगर आप सामने देखें, तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे, लेकिन उस पेंटिग में भी एक सुंदर चेहरा है, लेकिन वह रो रहा है. वह डोरा मार है. डोरा मार फोटोग्राफर थी और उसने 'गेर्निका' की रचना-प्रक्रिया और उसकी निर्मिति की छवियां बनाईं. 'गेर्निका' के बारे में कही गई उसकी बातें आज भी सबसे ज़्यादा प्रामाणिक मानी जाती हैं. एक दिन मैरी वॉल्‍टर अचानक पिकासो के स्‍टूडियो पहुंची और वहां उसने डोरा मार को देखा. डोरा के साथ प्रेम की ख़बरें मैरी ने सुन रखी थीं. वहां दोनों में कहासुनी हुई. पिकासो ने कहा कि तुम दोनों आपस में तय कर लो, मुझे किसके साथ रहना चाहिए. वह कुर्सी लगाकर बैठ गए. दोनों प्रेमिकाओं की कहासुनी बाक़ायदा कुश्‍ती में बदल गई. उन्‍होंने एक-दूसरे के बाल खींचे, कपड़े फाड़ दिए, और एक-दूसरे का उठाकर पटक दिया. मैरी वॉल्‍टर ने अपमानित और पराजित महसूस किया और पिकासो के जीवन से बाहर चली गई. डोरा मार उनके साथ रही. पिकासो ने अपने संस्‍मरणों और इंटरव्‍यूज में कहा है, 'वह मेरे जीवन का सबसे सुंदर क्षण था, जब मैंने दो औरतों को मारपीट करते देखा, इस बात के लिए मारपीट कि मेरे साथ कौन रहेगा.' पिकासो हमेशा उन स्थितियों को पसंद करते थे, जब एक महिला, उन पर दावेदारी के लिए दूसरी को कोस रही होती थी. लेकिन सात साल बाद पिकासो डोरा मार से भी अलग हो गए. डोरा के लिए यह इतना बड़ा सदमा था कि वह रोती रही, रोती रही. वह इतना रोई कि उसे रोना रोकने के लिए दवाएं लेनी पड़ीं. उसके बाद वह कभी अवसाद से बाहर नहीं आ सकी. बीस साल इसी दुख में रहने के बाद उसके कुछ प्रेम और हुए, लेकिन पिकासो की जगह कोई न ले पाया. पिकासो ने अपनी पेंटिंग्‍स में हमेशा उसे रोती हुई सुंदरी के रूप में दिखाया था. डोरा मार को नहीं पता था कि पिकासो उसका वर्तमान नहीं, उसका भविष्‍य रंग रहे हैं. प्रेम में पागल हुई, धोखा खाई एक रोती हुई बर्बाद सुंदरी. पिकासो ने उसके लिए निजी पेंटिंग्‍स बनाई थीं. 1997 में डोरा ने अपनी मृत्‍यु तक उन्‍हें छिपाए-संभाले रखा था. 


1944 :
पिकासो 63 साल के थे, जब उनका प्रेम कला की छात्रा 23 वर्षीय जीलो से होता है. पिकासो से संबंध को जीलो ने प्रेम के साथ-साथ अपने कैरियर में बड़े बदलाव की तरह भी देखा. पिकासो के साथ उसने कला की बारीकियां सीखीं. पिकासो के लिए उसने आर्ट क्रिटीक का काम किया. मॉडल के अलावा वह पिकासो के आयोजनों की मेज़बान भी थी. डोरा मार से प्रेम के दौरान ही पिकासो का प्रेम जीलो के साथ हुआ और इसी कारण वह डोरा से अलग हुए. दोनों के अलग होते ही जीलो पिकासो के साथ रहने लगी. उसने भी पेंटिंग्‍स बनाईं और उसे नाम मिला, लेकिन पेरिस के कलाजगत का यह मानना था कि एक अत्‍यंत प्रतिभाशाली लड़की ने पिकासो से प्रेम करके ख़ुद को ख़त्‍म कर लिया है. अगर वह खु़द अकेले अपनी पेंटिंग्‍स पर काम करती, तो शायद उसे ज्यादा प्रसिद्धि मिलती. जीलो पेरिस में ही थी, जहां उसने पिकासो की रूसी नर्तकी पत्‍नी ओल्‍गा के पागलपन को झेला. ओल्‍गा ने पिकासो की प्रेमिकाओं में संभवत: जीलो पर ही सबसे ज़्यादा प्रहार किए. जीलो की स्थिति भी ओल्‍गा जैसी ही होने लगी. क़रीब दस साल तक साथ रहने के बाद वह पिकासो से अलग हो गई. अलगाव के बाद उसने किताब लिखी- लाइफ़ विद पिकासो, जिसकी लाखों प्रतियां बिकीं. पिकासो ने उस किताब का प्रकाशन रुकवाने के लिए कोर्ट में केस कर दिया था, लेकिन वह हार गए. जीलो ने उसके बाद पेंटर और लेखिका के रूप में अपना जीवन बिताया, और वह पिकासो की एकमात्र प्रेमिका थी, जिसने पिकासो से अलगाव के बाद अपना मानसिक संतुलन नहीं खोया. 


1953 :
पिकासो अब बूढ़े हो गए थे, लेकिन अब नवयुवतियों के प्रति उनका प्रेम और प्रगाढ़ हो रहा था. जीलो के साथ प्रेम के दौरान ही उनके कई छिटपुट संबंध बने, लेकिन 27 साल की जैकलीन रोके के आने से जीलो के साथ उनके संबंध समाप्‍त हो गए. रोके भी उनमें से थी, जिनसे पिकासो पहली ही नज़र में प्रेम कर बैठे. उसे प्रभावित करने के लिए एक दिन वह रोके के घर गए और उसके दरवाज़े पर चॉक से कबूतर का चित्र बनाया. उसके बाद वह छह महीने तक लगातार हर रोज़ रोके को गुलाब देते रहे. अंतत: रोके भी उनके प्रेम में पड़ गई. इस प्रेम को भी उन्‍होंने गुप्‍त रखा. जीलो ने अपने पति को तलाक़ दे दिया था और पिकासो से शादी करना चाहती थी. पिकासो ने ही उसे तलाक़ देने को कहा था, लेकिन उस दौरान उन्‍हें लगा कि जीलो सिर्फ उनके पैसों के कारण उनसे शादी करना चाहती है. पिकासो ने चोरी-छिपे रोके से शादी कर ली. यह पिकासो का आखि़री प्रेम था. दोनों 20 साल तक साथ रहे. पिकासो अब हर चीज़ से दूर हो चुके थे. बीमार और बूढ़े. सिर्फ़ चित्र बनाया करते. रोके को सामने रख उन्‍होंने 400 से ज़्यादा चित्र बनाए. रोके न केवल उनकी पत्‍नी थी, बुढ़ापे का सहारा, बल्कि उनकी सेक्रेटरी भी. 1973 में पिकासो की मौत के बाद उनकी जायदाद को लेकर विवाद हो गया्. जीलो, पिकासो के बच्‍चों की मां थी. उसने केस कर दिया. रोके क़ानूनी पत्‍नी थी. अंत में मामला सुलझाया गया और पिकासो की जायदाद से बनी संस्‍था 'म्‍यूसी पिकासो' की स्‍थापना हुई. यह नाम पिकासो की प्रेमिकाओं और प्रेरणाओं की स्‍मृति में रखा गया. रोके पिकासो से बहुत जुड़ी हुई थी. उनके मरने के बाद उनकी कला और उससे जुड़ी आर्थिकताओं को संभालती रही, लेकिन अकेलापन उसके लिए भारी था. वह पिकासो को याद कर हमेशा रोती. रुदन से अवसादग्रस्‍त होती. कभी हाइपर हो जाती. ऐसी ही, स्‍मृतियों के आक्रमण में ख़ुद को संभलने में अक्षम पा उसने ख़ुद को गोली मार ली. 


पिकासो ने सबसे प्रेम किया. उनका निजी जीवन था, उनका रवैया सही था या ग़लत, इस पर नैतिकतावादी कुछ भी कह सकते हैं. हम भी कह सकते हैं.

पर बहुधा मुझे लगता है, शायद पिकासो बहुत जुनूनी प्रेमी थे, इसीलिए उनका अलग होना उन स्त्रियों को सहन नहीं हुआ, जो ख़ुद उनसे अलग हो जाना चाहती थीं. शायद पिकासो ने उनके अनेक प्रश्‍नों को अनुत्‍तरित छोड़ दिया था. प्रेम में ऐसी दीवानगी उस समय भी आती है, जब आपका प्रेमी आपके प्रश्‍नों के जवाब नहीं देता. तब आप सिर्फ़ प्रेम के लिए नहीं जी रहे होते, बल्कि उन उत्‍तरों के लिए भी जी रहे होते हैं. 



(डायरी से.)

Tuesday, April 10, 2012

शब्‍द-बोध, दिशा-बोध




Painting : Ravindra Vyas, Indore.



कविता के भीतर कुछ शब्‍द लगातार कांपते रहते हैं. वे पत्‍तों की तरह होते हैं. हवा का चलना बताते हैं. दिशा-बोध कराते हैं. कांपते हुए शब्‍दों का दायित्‍व है कि वे दूसरे शब्‍दों को जगाए रखें, जिलाए रखें.

कविता के सौष्‍ठव और प्रभाव पर तभी फ़र्क़ पड़ता है, जब उन शब्‍दों के साथ अभ्‍यास व प्रयोग किया जाए. बाक़ी शब्‍द इतने सेंसिटिव नहीं होते.

कविता अपने में प्रयुक्‍त सारे शब्‍दों पर नहीं, महज़ कुछ शब्‍दों पर टिकी होती है. उन शब्‍दों से बनने वाले अदृश्‍य वातावरण पर टिकी होती है. क़रीब से देखें, तो अदृश्‍य पर सबकुछ नहीं टिक सकता. ध्‍वनि टिकती है. दृ श्‍य टिकता है. तरंग टिकती है. और आकाश भी इसी अदृश्‍य पर टिका है. बहुत दूर से पृथ्‍वी को देखें, तो पता चले कि पृथ्‍वी भी निराधार है. अदृश्‍य पर टिकी है.

इसलिए हर चीज़ को क़रीब से देखने की ज़रूरत भी नहीं. दूर होकर देखना बहुधा पूरा देखना है. यह उसी तरह है, जैसे बचपन में हम एक खेल खेलते थे. एक गेंद में रबर की रस्‍सी बंधी होती है. रबर का एक सिरा हम उंगली में बांध लेते, फिर गेंद को हाथ में पकड़ ठीक सामने फेंकते. गेंद तेज़ी से दूर जाती, उतनी ही तेज़ी से लौट आती. लौटती गेंद को पकड़ना आसान नहीं होता. यह उसे पकड़ लेने का खेल था.

कवि उसी गेंद पर बैठा होता है. वह जितनी तेज़ी से चीज़ के क़रीब जाता है, उतनी ही तेज़ी से लौट भी आता है. तेज़ी के इन्‍हीं पलांशों के बीच उसे अपनी स्थिरता का ग्रहण करना होता है. वे पल, पलांश ही उसकी काव्‍य-दृष्टि की मर्जना करते हैं.

* * *

(डायरी का एक टुकड़ा. अभी समालोचन पर मेरी डायरी के कुछ टुकड़े प्रकाशित हुए हैं. डायरी मेरे नोट्स हैं. पढ़ाई या न-लिखाई के दिनों में साथ रहती है. उसमें निजी ब्‍यौरे बहुत कम होते हैं. मेरे पास बहुत कम निज है.  जो निज है, वह इतना ज़्यादा निज है कि मैं उसे डायरियों को भी नहीं बताता.

बहरहाल, डायरी के उन टुकड़ों को पढ़ने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक पर जा सकते हैं. ऊपर जो टुकड़ा लगा है, वह समालोचन की प्रस्‍तुति में शामिल नहीं है.)

समालोचन : निज घर : गीत चतुर्वेदी की डायरी

* * *

ऊपर लगी कलाकृति हमारे प्‍यारे मित्र रवींद्र व्‍यास की है. आज 10 अप्रैल उनका जन्‍मदिन है. उन्‍हें जन्‍मदिन की ढेरों शुभकामनाएं देते हुए यह सब उन्‍हें समर्पित. 


Sunday, May 22, 2011

गालेआनो के आईनों से






दो-तीन दिनों से मैं एदुआर्दो गालेआनो की नई किताब 'मिरर्स' पढ़ रहा हूं. इसके लिए मुझे अपने दोस्‍त विनीत तिवारी का शुक्रिया कहना चाहिए. इससे पहले गालेआनो की 'ओपन वीन्‍स' और 'डेज़ एंड नाइट्स ऑफ लव एंड वार' पढ़ चुका हूं. गैल्‍यानो रचनात्‍मक गद्य की मीनार हैं. वह कालयात्री भी हैं. इतिहास को वर्तमान से और वर्तमान को इतिहास से देखते हैं. इससे दोनों के नए अर्थ उरियां होते हैं. 'मिरर्स' में वह अपने पूरे वैभव पर हैं. 365 पेज में छोटी-छोटी 600 कहानियां हैं, जो सृष्टि की उत्‍पत्ति से लेकर इक्‍कीसवीं सदी के शुरुआती बरसों की गुमशुदगियों तक को बयान करती हैं. कहानी-दर-कहानी समय नाम की दाई की काया को वह नापते हैं और इतिहास-लेखन की अद्भुत कला से झांकते हैं. इस किताब के कुछ अंश नीचे प्रस्‍तुत हैं. बिना अनुमति लिए अनुवाद करना व छापना नैतिकता के विरुद्ध है, लेकिन इस किताब की सुंदरता यहां अनैतिक होने पर विवश कर रही है. गालेआनो और उनके प्रकाशकों से क्षमा भी, उनका आभार भी. अगर आपने यह किताब न पढ़ी हो, तो ज़रूर पढ़ें.  


***

आईने बेशुमार इंसानों से भरे हुए हैं 
जो अदृश्‍य हैं वे झांककर हमें देखते हैं 
हमें याद करते हैं विस्‍मृत लोग 
जब हम खु़द को देखते हैं, उन्‍हें देखते हैं 
जब हम पीठ फेर मुड़ जाते हैं, क्‍या वे भी फिरा लेते हैं पीठ ?

***

इच्‍छा का जन्‍म 

जिंदगी अकेली थी. उसके पास न कोई नाम था, न कोई स्‍मृति. हाथ थे उसके पास, लेकिन छूने के लिए कोई नहीं था. उस के पास जु़बान भी थी, लेकिन बातें करने लिए कोई न था. जिंदगी इकलौती थी और इकलौता कुछ नहीं था. 

तब इच्‍छा ने अपने धनुष की प्रत्‍यंचा खींची. उससे निकले तीर ने जिंदगी को ठीक बीच से काट दिया, और जिंदगी दो में बदल गई. 

जब उन दोनों की नज़रें मिलीं, वे ज़ोर से हंसे. जब उन्‍होंने एक-दूसरे को छुआ, वे फिर से हंसे.


लिखाई का जन्‍म 

इराक़ तब तक इराक़ नहीं बना था, जब वहां पहली बार लिखे गए शब्‍दों का जन्‍म हुआ था.

शब्‍द चिडि़यों की क़तार की तरह दिखते थे. उस्‍ताद हाथों ने नुकीली लकडि़यों से मिट्टी में उकेर-उकेरकर उन्‍हें लिखा था . 

आग नाश करती है और रक्षा भी, जीवन देती है और लेती भी, जैसा कि हमारे देवता करते हैं, जैसा कि हम ख़ुद करते हैं. आग ने मिट्टी को तपा दिया और शब्‍दों को बचा लिया. आग का आभार कि इस दोआबे में ये शिलाखंड अब भी हमें वे सारी कहानियां सुनाते हैं, जो हज़ारों साल पहले सुनाया करते थे. 

हमारे समयों में जॉर्ज डब्‍ल्‍यू. बुश को शायद यह भरोसा हो गया कि लेखन की खोज टैक्‍सस में हुई थी, अपने होहराते उल्‍लास में दंड देने की ठानी और इराक़ को मिटाने के लिए उस पर हमला बोल दिया. हज़ारों हज़ार शिकार हुए और ऐसा नहीं था कि हर शिकार गोश्‍तो-ख़ूं से ही बना हो. उसमें बेशुमार स्‍मृतियों की भी हत्‍या कर दी गई. 

बेशुमार शिलाखंडों के भीतर जीवित धड़कता हुआ इतिहास चुरा लिया गया या बमों को नज़र कर दिया गया. 

एक शिलाखंड कहता था : 

हम कुछ नहीं सिवाय मिट्टी के 
हम जो कुछ भी करते हैं उसका मोल हवा से ज़्यादा कुछ नहीं.  


मिट्टी का जन्‍म 

पुराने ज़माने में सुमेरियनों का विश्‍वास था कि पूरी दुनिया दो नदियों के बीच की ज़मीन है और दो स्‍वर्गों के बीच बसी है. 

ऊपर के स्‍वर्ग में शासन करने वाले देवता रहते थे.

नीचे के स्‍वर्ग में कर्मचारी देवता रहते थे. 

सब कुछ ऐसा ही चलता रहा, पर एक दिन नीचे वाले देवता हमेशा काम करते रहने से क्‍लांत हो गए और इस तरह इतिहास में पहली बार हड़ताल का जन्‍म हुआ. 

अफ़रातफ़री मच गई. 

लोगों को भुखमरी से बचाने के लिए ऊपर के देवताओं ने मिट्टी से स्त्रियों और पुरुषों को बनाया और उन्‍हें काम पर लगा दिया. ये स्‍त्री-पुरुष तिगरिस और यूफ्रेट्स के तट पर पैदा हुए थे. 

उसी मिट्टी से वे किताबें भी बनाई गईं, जो उन लोगों की कहानियां कहती हैं. 

वे किताबें बताती हैं कि मरना वापस मिट्टी हो जाना होता है. 

Marian Siwek 1936-2007. Polish artist. Krakow.

अमर हो जाने की चाहत वाला राजा

समय हमारी दाई है और वही हमारी संहारक भी. कल उसने अपने स्‍तनों से हमें दूध पिलाया था और कल वह हमें खा जाएगी. 

तो ऐसा होता ही रहता है. और हम जानते भी हैं यह सब. 

पर क्‍या सच में जानते भी हैं ?

दुनिया में पहली बार जो किताब जन्‍मी थी, वह हमें राजा गिलगमेश की कहानी सुनाती है, जिसने मरने से इंकार कर दिया था. 

यह महाकथा जो पांच हज़ार बरसों से मुंहज़बानी सफ़र कर रही है, उसे लिख डालने का काम किया था सुमेरियनों ने, अकादियनों ने, बेबीलोनियाइयों ने और असीरियाइयों ने. 

यूफ्रेट्स के किनारों का राजा गिलगमेश एक स्‍वर्गिक देवी और एक पुरुष के मिलन से हुआ था. ईश्‍वरीय इच्‍छाएं मानवीय नियतियां बन जाती हैं. देवी मां से उसने अलौकिक शक्ति और सुंदरता पाई थी, पुरुष पिता से मृत्‍यु.

नश्‍वर होने का अर्थ उसे तब तक पता नहीं था, जब तक उसने अपने दोस्‍त एनकिदु को मृत्‍युशैया पर न देख लिया. 

गिलगमेश और एनकिदु ने ख़ुशियों को अचंभे की तरह एक साथ जिया था. साथ-साथ ही दोनों देव-वन में भी घुस गए थे, जहां उन्‍होंने उस पहरेदार को हरा दिया था, जिसकी भुजाओं का बल देख पर्वत तक कांप उठते थे. साथ-साथ ही दोनों ने स्‍वर्ग के बैल को भी पराजित किया था, जिसकी एक हुंकार से ज़मीन में विशाल गड्ढा हो जाता था और जिसमें सैकड़ों लोग दफ़न हो जाते थे. 

एनकिदु की मृत्‍यु ने गिलगमेश को तोड़कर रख दिया और आतंकित कर दिया. उसने पाया कि उसका जांबाज़ जिगरी दोस्‍त तो मिट्टी का बना हुआ था और वह ख़ुद भी मिट्टी से ही बना है. 

तो वह एक अनंत जीवन की तलाश में निकल पड़ा. अमरता की चाहत रखने वाला यह राजा अनगिनत रेगिस्‍तानों और चारागाहों से गुज़रा, 

उसने रोशनी और अंधेरों को पार किया, 
उसने विशाल नदियों को तैर डाला
एक दिन वह स्‍वर्ग के उपवन में पहुंचा 
एक नक़ाबपोश अप्‍सरा जो अपने भीतर सारे रहस्‍य छुपाए रखती थी, ने उसे शराब परोसी,
वह समंदर के परली ओर पहुंच गया 
उसने वह आर्क खोज लिया जो बाढ़ से बच गया था 
उसे वह पौधा भी मिल गया जो बुढ़ापे को तरुणाई में बदल देता है 
वह उत्‍तरी सितारों के दिखाए पथ पर चला और दक्षिणी सितारों के पथ पर भी 
उसने वह द्वार खोलकर देखा जिससे सूरज इस दुनिया में आता था और उस द्वार को बंद करके देखा जिससे सूरज जाता था 

और वह तब तक अमर बना रहा 
जब तक कि एक दिन वह मर नहीं गया. 


आंसुओं का जन्‍म 

जब मिस्र, मिस्र नहीं था, तब सूरज ने आकाश की उत्‍पत्ति की और उन चिडियों की भी, जो उस आकाश को पार करते उड़ें. उसने नील नदी बनाई और उसमें तैरने के लिए मछलियां भी. और पौधों और जानवरों में जान भरकर उसने उस नदी के काले तटों को हरे में बदल दिया. 

तब जीवन की उत्‍पत्ति करने वाला सूरज थोड़ी देर सुस्‍ताने बैठ गया और अपने इन कामों के बारे में विचार करने लगा. 

इस नवजात विश्‍व की गहरी सांसों को उसने अपने ऊपर महसूस किया और उसकी पहली-पहली आवाज़ें सुनीं. 

अतिशय सुंदरता भयानक ठेस भी पहुंचाती है. 
सूरज के आंसू ज़मीन पर गिरे और उनसे कीचड़ बना. 
और उस कीचड़ से मनुष्‍यों की उत्‍पत्ति हुई.

PS


श्रम के विभाजन का जन्‍म 

कहते हैं कि राजा मनु ने भारतीय जातियों पर पवित्र प्रतिष्‍ठाएं नाजि़ल की थीं.

उनके मुंह से ब्राह्मणों की उत्‍पत्ति हुई, भुजाओं से राजाओं और योद्धाओं की (क्षत्रिय). जांघों से व्‍यापारियों की (वैश्‍य). उनके पैरों से मज़दूरों व कारीगरों की (शूद्र).

और इस आधार पर उस सामाजिक पिरामिड का निर्माण हुआ, जिसकी भारत में तीन हज़ार से ज़्यादा कथा-मंजि़लें हैं.

हर कोई वहीं पैदा होता है, जहां उसे पैदा होना चाहिए. वही करता है, जो उसे करना चाहिए. पालने में ही क़ब्र बनी होती है, जन्‍म से नियति बन जाती है, हमारी जिंदगी पिछले जन्‍मों का कर्म है या फल, और हमारे वंश हमारी भूमिका व जगहें तय करते हैं.

व्‍यवस्‍था में गड़बड़ी न फैले, इसके लिए मनु ने आदेश किया: अगर निचली जाति का कोई व्‍यक्ति पवित्र किताबों की ऋचाओं को सुनेगा, तो उसके कानों में पिघला हुआ सीसा डाल दिया जाएगा, और अगर वह उन्‍हें पढ़ेगा, तो उसकी जीभ काट ली जाएगी. ऐसे उपदेशों का अब ज़्यादा चलन नहीं रहा, लेकिन अब भी जब कोई अपनी जगह छोड़ता है, प्रेम में, श्रम में, तो ख़तरा रहता है कि उसे मौत मिल जाए या मौत से भी बदतर जीवन.

हर पांच में से एक भारतीय जाति-बाहर है और निचले से भी निचले पर है. उन्‍हें अछूत कहा जाता है, क्‍योंकि वे छूत फैला देते हैं: वे गए से भी गुज़रे हुए हैं, वे दूसरों से बोल नहीं सकते, दूसरों की बनाई सड़कों पर चल नहीं सकते, और उनके गिलास व बर्तनों को छू नहीं सकते. क़ानून उनकी रक्षा करता है और यथार्थ उन्‍हें बहिष्‍कृत. कोई भी उनके पुरुषों का अपमान कर सकता है और कोई भी उनकी स्त्रियों से बलात्‍कार कर सकता है, सिर्फ़ यही एक ऐसा मौक़ा होता है, जब वे अछूत, छूने लायक़ बन जाते हैं.

2004 के अंत में जब सुनामी की लहरों ने भारतीय तटों पर तबाही मचा दी थी, वे कचरा बीन रहे थे, शव उठा रहे थे.

हमेशा की तरह. 



Wednesday, February 2, 2011

दृश्य समंदर






The 400 blows
फ्रेंच निर्देशक फ्रांसुआ त्रूफो की फिल्म 400 ब्लोज़ के आखिरी दृश्य में समंदर आता है, जबकि उस फिल्म का किशोरवयीन नायक शुरुआत से ही अपनी सबसे बड़ी आकांक्षा यह बताता है कि उसे समंदर देखना है। आकांक्षाएं हमारे भीतर शुरुआत में ही बनती हैं। ऐसे भी कह सकते हैं कि जब आकांक्षाओं का उत्पादन हमारे भीतर होता है, वही हमारी शुरुआत का क्षण बन जाता है, जबकि ऐसा बहुत कम होता है कि जीवन की फिल्म का आखिरी फ्रेम चल रहा हो और हम पाएं कि सामने हमारी आकांक्षाओं का समंदर डोल रहा है।

जीवन जितना बारीकियों से बनता है, उतना ही विस्तारों से भी। किशोरवयीन नायक दौड़ता हुआ समंदर की ओर जाता है और उसके ठीक नज़दीक पहुंचकर, पैर गीले करके, वह लौट पड़ता है। दौड़ते हुए कैमरे में समा जाता है। आकांक्षा की पूर्ति तुरंत दूसरी आकांक्षा के जन्म का क्षण होता है। वह जैसे ही समंदर को सामने देखता है, उसके भीतर जीवन का उद्दाम विस्तार अपनी जगह बनाता है और वह उसे छूकर लौटता है, जीवन के नए रास्तों के लिए। यहां एक क्रिया के रूप में लौटना महत्वपूर्ण है। बिना लौटे आगे नहीं बढ़ा जा सकता, कोई बड़ा स्वप्न नहीं देखा जा सकता। समंदर लौटना सिखाता है।

समंदर का सारा पानी ताउम्र इस कोशिश में रहता है कि वह किसी तरह किनारे पहुंच जाए। पर दुनिया का कोई समंदर किनारे पर अपना घर नहीं बना पाया। लहरें किनारे पर पहुंचती हैं, किनारे को छूकर अपना पैर गीला करती हैं और फिर लौट जाती हैं। इसी से समंदर का जीवन चलता है। अगर ये न हो, तो समंदर अपना समंदरपना खो देगा। हम अपने एक सपने के लिए जी रहे होते हैं, उस सपने को पूरा कर पाते हैं और वहां से तुरंत लौट आते हैं, अगले सपने के लिए।

एक यूनानी लोककथा में एक बच्चा अपनी मां से पूछता है कि सपने कहां से आते हैं? वह कहती है- दुनिया के सारे सपने समंदर के पेट में रहते हैं। वहां से एक सीढ़ी सीधा चांद के दरवाज़े पर जाती है। वे एक-एक सीढ़ी चढ़कर चांद पर जाते हैं और वहां से हमारी नींद के समंदर में आ जाते हैं। इसीलिए जब हम सपना देख रहे होते हैं, चांद मुस्करा रहा होता है, कभी पूरा सफेद बनकर, कभी अंधेरे में खुद को छिपाकर।

फिर हमारे देखे हुए सपने कहां जाते हैं? शायद वे वापस समंदर के भीतर चले जाते हैं। एक दूसरी कहानी याद आती है, जिसमें एक बच्चा पूछता है कि आंख से गिरने के बाद आंसू गाल पर तो दिखता है, उसके बाद कहां चला जाता है? यहां भी जवाब देने वाली मां ही है- गाल जहां खत्म होते हैं, वहां से समंदर शुरू हो जाता है। आंसू समंदर में चले जाते हैं। जैसे सारी बारिशें समंदर के पानियों के ऊपर उठ जाने से होती हैं, उनसे नदियां भरती हैं और नदियां वापस समंदर में चली जाती हैं।

यानी जहां सपनों का घर होता है, वहीं आंसू का भी घर होता है। सपने आंखों में रहते हैं। आंसू भी वहीं रहते हैं। और समंदर के पेट में भी दोनों साथ-साथ ही रहते हैं। दोनों ही दुख, विफलता, भावुकता और अतिरेकों की उत्पत्ति हैं। पीड़ा न हो, तो आंसू न होगा। पीड़ा न हो, तो कोई बड़ा स्वप्न भी नहीं होगा। आंसू न हो, तो स्वप्न भी नहीं होगा। और स्वप्न न हों, तो विफलता या सफलता के आंसू भी न होंगे। दोनों लौट-लौटकर एक-दूसरे के भीतर जाते हैं। और लौटना, तो समंदर का ही गुण है।

आंसू के नुक्तों को पकड़कर गाल से नीचे कूद जाया जाए, तो समझ आएगा, समंदर और कुछ नहीं होता, सिवाय एक संचित रुदन के। विज्ञान के लिए वह पानियों का समुच्चय होता होगा, लेकिन मनुष्यों को उसे एक स्वप्न की तरह देखना चाहिए, लाड़ से भरी एक सांत्वना, जो भीतर से बहुत गीली होती है, लेकिन पुचकारकर जो सांत्वना देती है, वह पैरों में टिके रहने लायक लोहा पैदा कर देती है।
 
(दैनिक भास्कर से) 

Monday, January 17, 2011

अकेले रहने का हुनर सिखाते हैं पेड़

एक जर्मन फिल्म में एक किरदार है, जो अपने दफ्तर की खिड़की से एक पेड़ को देखा करता है। सड़क किनारे सिर झुकाने-जैसी मुद्रा में खड़ा वह पेड़ उसे अपने बचपन के घर जैसा लगता है, कभी दबंग पिता जैसा लगता है, तो कभी नाराज़ होकर दूर चली गई प्रेमिका जैसा उदास। उस किरदार के जीवन में कुछ भी हरा नहीं बचा, इसलिए वह उस पेड़ की हरियाली को अपनी जीवन में सब्स्टीट्यूट की तरह ले लेता है। वह भीड़ में जाता है, कुछ लोगों की मदद करता है और वापस अपने अकेले फ्लैट में, भीड़ भरे दफ्तर के अकेलेपन में खो जाता है। एक दिन पाता है कि वह उस पेड़ में खुद को देखने लगा है। जीवन में हम सबको एक आईने की जरूरत हमेशा पड़ती है, जिसमें हम अपना निखालिस अक्स निहार सकें। कभी वह आईना किसी व्यक्ति के भीतर मिल जाता है, तो कभी किसी चीज के भीतर। उसे उसका आईना उस पेड़ में दिखाई दिया, जिसने बता दिया कि अगर वह अकेला है, तो उसे पेड़ की तरह जीना चाहिए। अपने अकेलेपन को खत्म भी न करे और कुछ-कुछ सबके काम भी आता रहे।

वांग कार-वाई की एक फिल्म में एक किरदार जब अपने भीतर किसी भावना के उत्पात को महसूस करता है, बहुत बेचैन हो जाता है, अपनी बात कहने के लिए उसे कोई नहीं मिलता, तो वह घर से दूर एक उपवन में अपने एक प्रिय पेड़ के पास जाता है। उसके एक कोटर में मुंह घुसाकर, फुसफुसाते हुए अपनी बात कहता है, फिर घास के तिनकों से उस कोटर को ढंक देता है। उसे लगता है कि पेड़ ने उसकी बात सुनकर, संजो ली है। वह पेड़ किसी तीसरे को नहीं बताएगा। यह दरअसल चीन के एक समुदाय की मान्यता भी है। खुद को अभिव्यक्त न कर पाने की उसकी बेचैनी खत्म हो जाती है। वह बहुत शांत महसूस करता है। उसे शांति इसीलिए मिलती है कि जिसे वह बता रहा है, वह खुद शांत है। पेड़ में चंचलता नहीं है, इसीलिए उसे विश्वास है कि उसका राज यहां राज ही रहेगा।

जिन लोगों को अकेले रहने की आदत होती है, पेड़ उनके सबसे क़रीबी साथी हो सकते हैं या उनके सबसे नज़दीकी राज़दार। अकेले रहने का हुनर भी पेड़ ही सिखाते हैं। पानी में अकेलापन नहीं होता, पहाड़ में भी नहीं, हवा में तो बिल्कुल नहीं। घास, जानवर और मछलियां भी एक खास किस्म की सामूहिकता उत्सर्जित करते हैं, लेकिन पेड़ समूहों में रहकर भी अकेलेपन का भावबोध देते हैं। मछलियां एक दिशा में तैरती हैं, पानी के अणु एक दिशा में बहते हैं, पहाड़ अपने तिकोनेपन में सबसे ऊपर सबसे ज्यादा संकुचित होते हैं। ये उनकी स्वाभाविक विशेषताएं हैं।

पेड़ों के साथ ऐसा नहीं। कतार से सारे पेड़ एक ही दिशा में नहीं झुके होते। जंगल को देखिए, हर पेड़ अकेला है, तभी तो अपनी-अपनी राह बढ़ता है। उनका अकेलापन, वृद्धि की स्वच्छंद इच्छा और नितांत निजी शख्सियत ही जंगल के सौंदर्यबोध का विकास करती हैं। पेड़ों की सामूहिकता मनुष्य की सामूहिकता से मिलती-जुलती है। भरी भीड़ में अकेला होने की सामूहिकता। आदमी का व्यवहार भी ऐसा ही होता है। दोस्ती किसी से भी हो सकती है, लेकिन विश्वास वह उन्हीं पर कर पाता है, जिनमें पेड़ जैसी विशेषताएं हों। यानी जिनमें स्थिरता हो, कम से कम चंचलता हो, जो अपने अकेलेपन में भी मदद की छांव बढ़ाए रखते हों, जो अपने भीतर की हरियाली को सामने वाले के भीतर रोप सकें, कड़ी धूप में भी शीतलता का निर्यात कर सकें और छोटे-मोटे धक्कों से उखड़ न जाएं।


Tuesday, November 9, 2010

कैट्स इन द क्रैडल





लिखने कुछ और बैठा था, लेकिन मन इस पुराने गाने में अटक गया है. कुछ गाने लगातार आपके साथी बन जाते हैं, कुछ धुनें भी. वे आपके भीतर इस क़दर बस जाती हैं कि कब आपके मुंह से निकल पड़ें, आपको अंदाज़ा भी नहीं होता. कई बार आपकी पहचान भी उसी धुन से ही बन जाती है. वह उस धुन में ऐसे खो जाता है कि कब उस धुन को फेरबदल कर अपनी धुन बना लेता है, उसे भी नहीं पता चलता. जैसे मैंने अपने पिताजी को आज तक सिर्फ़ एक ही गाना गुनगुनाते हुए सुना है- मुबारक बेगम का 'कभी तनहाइयों में यूं हमारी याद आएगी'. वह अब भी जब तल्‍लीन होकर कुछ कर रहे होते हैं, तो यही गुनगुनाते हैं. मैंने कई बार पूछा है कि वे किसकी तनहाइयों में जाकर अपनी याद दिला आना चाहते हैं, हमेशा की तरह वह हा-हा-हा कर देते हैं. वह बहुत अच्‍छी बांसुरी बजाते हैं, तबला बजाते हैं, माउथ ऑर्गन भी. हैं कहूं या था, क्‍योंकि आखि़री बार उनसे यह सब सुने हुए भी दस से ज़्यादा साल होने को आए. किसी ज़माने में सितार पर उनका अच्‍छा हाथ था, यह भी जानने वालों से ही सुना है, उन्‍हें बजाते हुए नहीं सुना. वह संगीत में डूबे हुए धुनी इंसान थे, पर अब गाने की (या किसी भी कि़स्‍म की) ज़रा-सी ऊंची आवाज़ भी उनका ब्‍लडप्रेशर बढ़ा देती है. फिर भी कभी-कभार मुबारक बेगम उनके होंठों पर आ जाती है. कितना अचरज भरा लगता है कि एक इंसान किसी एक धुन के सहारे, एक गीत के सहारे अपना ज़्यादातर जीवन गुज़ार दे.

मुबारक बेगम का वह गीत कब मेरे भी पसंदीदा गीतों में शामिल हो गया, मुझे नहीं पता. यहां उसका चर्चा तो पिताजी के संदर्भ में आ गया, उस गीत को याद करने का काम मेरे दोस्‍तों राजकुमार केसवानी और यूनुस ख़ान के जि़म्‍मे, पर जिस गीत में मेरा मन अटका हुआ है, वह है अग्‍ली किड जो का कैट्स इन द क्रैडल. 1992 में जब अमेरिकाज़ लीस्‍ट वांटेड रिलीज हुआ था और इसके दो गाने बिजी़ बी और कैट्स इन द क्रैडल ने एमटीवी पर धूम मचा दी थी, तो मैंने ठाणे पश्चिम में स्‍टेशन से बिल्‍कुल लगी हुई, म्‍यूजि़क की उस समय की सबसे बड़ी दुकान, गणेशा म्‍यूजि़क सेंटर से तुरंत यह कैसेट ख़रीदा था. क़ीमत थी 95 रुपए. अब वह कैसेट मेरे पास नहीं है, लेकिन उसका कवर, उसकी मोटाई, उसे सुनते समय हुए अनुभव और उसके गानों के शब्‍द अब तक याद हैं. और 'कैट्स इन द क्रैडल' तो अब तक का साथी बना हुआ है. 

यह गाना ओरिजिनली अग्‍ली किड जो  का नहीं है, हैरी चैपिन का है. बहुत समय बाद जाकर यू-ट्यूब पर चैपिन वाला वर्शन सुना, लेकिन मैं दुनिया के उन बहुतेरे लोगों में शुमार हूं, जो यह मानते हैं कि किड्स ने चैपिन के सुंदर गाने को और सुंदर बना दिया. उसे एकदम से नया कर दिया. शायद मेरे ऐसा मानने के पीछे यह कारण हो कि मैंने बहुत लंबे समय तक सिर्फ़ किड्स वाला वर्शन ही सुना था और मेरे दिल के क़रीब वो ज़्यादा है. दिल तो दिल है, क़ुरबत बिना किसी शर्त के कर लेता है. यह एक पिता की तरफ़ से गाया गया गाना है, जो अपने बेटे को समय नहीं दे पाता. और एक दिन पाता है कि अब बेटा भी उसे समय नहीं दे पाता. 

मेरे पिताजी ने मुझे भरपूर समय दिया, भरपूर प्‍यार दिया, लेकिन फिर भी इसे सुनते हुए हर बार उनकी याद आ जाती है. यह गाना आप ही के लिए, डैड! 



Cats in the cradle
- Ugly Kid Joe

My child arrived just the other day
came to the world in the usual way
but there were planes to catch
and bills to pay
he learned to walk while I was away
he was talking for a minute
and as he grew
he'd say I'm gonna be like you Dad
you know I'm gonna be like you

And the cats in the cradle
and the silver spoon
little boy blue and the
man on the moon
when you comin' home Dad
I don't know when
we'll get together then
you know we'll have
a good time then

Well my son turned ten
just the other day
he said thanks for the ball Dad
come on let's play
can you teach me to throw
I said not today - I got a lot to do
he said that's o.k.
and he walked away and he
smiled and he said
you know I'm gonna be like him yeah
you know I'm gonna be like him

And the cats in the cradle ...

Well he came from college
just the other day
so much like a man I just had to say
I'm proud of you could you
sit for a while
he shook his head
and he said with a smile
what I'd really like Dad
is to borrow the car keys
see you later can I have them please

And the cats in the cradle ...

I've long since retired
my son's moved away
I called him up just the other day
I'd like to see you if you don't mind
he said
I'd love to Dad
if I could find the time
you see my new job's hassle
and the kids have the flu
but it's sure nice talking to you Dad
it's been sure nice talking to you
and as I hung up the phone
I occured to me
he'd grown up just like me
my boy was just like me

And the cats in the cradle ...

And the cats in the cradle ...


Friday, October 1, 2010

अब्‍बू ख़ां की बकरी





यह बहुत पुरानी कविता है, इतनी कि लंबे समय तक यह याद भी नहीं रहा था कि ऐसी कोई कविता लिखी थी. पुराने काग़ज़ों की सफ़ाई करते वक़्त मिली. सफ़ाई तो पहले भी की है, लेकिन मिली अबकी. इसके नीचे तारीख़ है 8 सितंबर 98. यह पूरी होने की तारीख़ है. तब मैं कविता के नीचे पूरी होने की तारीख़ डाला करता था, शुरुआत की नहीं. इसलिए यह नहीं याद कि शुरू कब हुई थी. कुछ ही समय बाद यह गोरखपुर की पत्रिका 'दस्‍तावेज़' में छपी थी. उसके बाद का कुछ नहीं याद. जैसे कभी यह सब लिखा ही न था. मेरे पास वे पत्रिकाएं कभी नहीं होतीं, जिनमें मेरी चीज़ें छपी होती हैं. ऐसा कोई अंक नहीं है, किसी भी पत्रिका का. 2007 में इस कविता की याद नागपुर से कवि-मित्र बसंत त्रिपाठी ने दिलाई. उनसे पहली बार फ़ोन पर बात हो रही थी, और उसी दौरान उन्‍होंने इसका जि़क्र छेड़ा. उन्‍होंने तब पढ़ी थी. उस समय याद आया कि हां, ऐसी एक कविता लिखी थी, पर वह कहां गई, नहीं पता. उस समय भी मैंने इसे खोजा था. बाद के दिनों में भी कुछ और दोस्‍तों ने इस कविता को याद किया. मैं बार-बार याद करता कि उस कविता में मैंने लिखा क्‍या था, कुछ विचारधाराओं-प्रतीकयोजनाओं के आधार पर इसकी सिलाई की थी, इससे ज़्यादा कुछ याद न आता. यही कारण था कि यह न संग्रह में रही, न बातचीत में, न डायरियों में, न ही ऑनलाइन डाटा में. कल शाम मिल ही गई आखि़र. जब इसे नहीं खोज रहा था तब. यही नहीं, कुछ और भूल चुकी कविताएं भी मिली हैं. एकाध को पढ़कर मुझे समझ ही न आया कि ये किन मन:स्थितियों में लिखी गई थीं और इनका अर्थ क्‍या है (जो लोग मुझसे मेरी कविताओं का अर्थ पूछते हैं, उन्‍हें ख़ुश होना चाहिए). 

मुझे ऐसा लगता है कि उस समय मुझे उत्‍तर-आधुनिकता के बारे में कुछ संपट नहीं पड़ा होगा, क्‍योंकि हाशिए पर एक नोट में उसे भी इसमें शामिल करने का निर्देश लिखा हुआ है. संपट होती, तो पता नहीं क्‍या लिखता. अभी भी यही सोच रहा हूं कि क्‍या लिखा है. पुरानी, विस्‍मृत रचनाओं को देखकर हम हमेशा ऐसा सोचते हैं कि इसे आज लिखा होता, तो ये-ये, वो-वो दुरुस्‍त कर देता. दुरुस्‍त कर लेने वाला भाव ही शायद आपका क्रमिक विकास होता हो. 

ख़ैर, बारह साल पहले भूली जा चुकी यह कविता पढ़ें. इसे यहां लगाने से पहले मैं इसे कवि बसंत त्रिपाठी को ही समर्पित करता हूं.     
***



अब्‍बू ख़ां की बकरी


अब्‍बू ख़ां एक परंपरा है
अब्‍बू ख़ां की बकरी एक मुहावरा

सबसे पहले हमें कुछ बुनियादी बातों पर सोचना चाहिए
अब्‍बू ख़ां कौन था
वह बकरियां क्‍यों पालता था
उसने कितनी बकरियां पाली थीं
उसकी बकरियां बार-बार उसके पास से भाग क्‍यों जाती थीं
उसकी बकरियों को खा जाने वाला भेडि़या कौन था
जब उसने धीरे-धीरे सारी बकरियां खा डालीं
तो क्‍या अब्‍बू ख़ां ने बकरियां पालना छोड़ दिया

मार्क्‍सवादी पद्धति से इस पर सोचा जाए
तो अब्‍बू ख़ां मेहनतकश वर्ग का था जिसे
सर्वहारा कहा जाना चाहिए
अय्यप्‍प पणिक्‍कर की एक कविता खुजली और बंबई में
प्रचलित शब्‍द खुजली के आशयों के अनुसार
उसे बकरी पालने की खुजली थी
या उसके पेट में भूख नाम की एक पिशाचिनी रहती थी
जो उससे बकरी पलवाती थी
और उसका दूध निकलवाती थी
यानी बकरी उसके लिए उत्‍पादन का साधन थी
जिसे दुहकर वह एक तरह से दूध का उत्‍पादन करता था
इस तरह देखा जाए तो
उत्‍पादन के उस साधन पर अब्‍बू ख़ां की मिल्कियत थी
अब्‍बू ख़ां दूध निकालने में मेहनत भी करता था
अर्थात वह मेहनतकश भी था
अर्थात उत्‍पादन के साधन पर मेहनतकश का स्‍वामित्‍व था
तो इस तर्क के आधार पर हम यह कैसे कह सकते हैं
कि अब्‍बू ख़ां सर्वहारा था
लेकिन उसकी माली हालत इतनी अच्‍छी भी नहीं थी कि
उसे नेशनल बूर्ज्‍वाजी का नाम दे सकें
उसे हम मध्‍यवर्ग या निम्‍न(मध्‍य)वर्ग में ले सकते हैं
जो श्रम करता है और वस्‍तुत: भूख का श्रमिक होता है

दूसरी तरफ़ इसे थोड़ा अस्तित्‍ववादी मोड़ दिया जाए
तो अब्‍बू ख़ां एक स्‍वतंत्र व्‍यक्ति था
और उसकी एक निरपेक्ष्‍ा इच्‍छा थी कि बकरी पाली जाए
अस्तित्‍वाद में व्‍यक्ति के पास इच्‍छा का होना ज़रूरी है
इसमें ऐसा नहीं कि भूख मर जाती है
बल्कि भूख मिटाने की इच्‍छा का होना महत्‍व का है
व्‍यक्तिनिष्‍ठ तरीक़े से वह एक व्‍यक्ति था
जिसके पास एक व्‍यक्तिगत भूख होती है
जिसे वह व्‍यक्तिगत या सार्वजनिक माध्‍यम से पूरा करता है
उसकी बकरियों की भी एक निहायत व्‍यक्तिगत इच्‍छा होती है
मुक्ति की जिसे आध्‍यात्मिक शब्‍दों में
अब्‍बू ख़ां से मुक्ति पूरी दुनिया से मुक्ति पा मोक्ष की तलाश
कह सकते हैं
जबकि मार्क्‍सवादी शब्‍दों में बकरी सर्वहारा नहीं है
क्‍योंकि उसके पास खोने के लिए बेडि़यां और पाने के लिए सबकुछ के ठीक उलट
खोने के लिए बेडि़यों के साथ सुरक्षा और प्‍यार और पाने के लिए भेडि़ये से संघर्ष और मौत है
हालांकि मार्क्‍सवाद नियतिवाद में विश्‍वास नहीं करता

अस्तित्‍ववादी परंपरा और रेनेसां की प्रतीकयोजना के मुताबिक़ यह भी संभव है कि
अब्‍बू ख़ां भारत का एक आम व्‍यक्ति हो
और उसके पास कोई बकरी ही न हो
यानी अब्‍बू ख़ां के दिमाग़ के कुछ अंधेरे पहलू हों
और उनमें कुछ बकरियां निवास करती हों
बकरियां ज़रूरी नहीं कि बकरी की तरह ही हों
बकरियां नादान होती हैं सीधी-सादी होती हैं
सो बकरियां दिमाग़ के नादान सुविचार भी हो सकती हैं
और भेडि़या भी दिमाग़ में ही निवास करता हो
किसी भयानक कुविचार की तरह
अब्‍बू ख़ां के दिमाग़ की बकरियां जब-जब हरे-भरे मैदानों में तफ़रीह करना चाहती हों
यानी अब्‍बू ख़ां के नादान सुविचार उससे मुक्‍त हो अमल में आना चाहते हों
या अभिव्‍यक्‍त हो सार्वजनिक हो जाना चाहते हों
ठीक उसी समय धर दबोचता हो उन्‍हें कुविचार का भेडि़या
अब्‍बू ख़ां की बकरी को हम देश के हर आदमी के दिमाग़ के अंधेरे पहलुओं में
चल रहे सुविचार-कुविचार के संघर्ष के रूप में देख सकते हैं
पर चूंकि यह वैदिक-ऐतिहासिक धर्म-अधर्म का संघर्ष नहीं
सो इसमें बकरी रूपी धर्म अर्थात कमज़ोर नादान सुविचारों की ही जीत हुई हो
इतिहास में ऐसा कभी दर्ज नहीं हो पाया

यह भी संभव है कि अब्‍बू ख़ां अपनी बकरियों और भेडि़ये और अपनी पूरी कहानी समेत हमारे दिमाग़ में रहता हो, लड़ाई चलती ही रहती हो और वह हमारे बहुत सारे निर्णयों को प्रभावित भी करता हो 

आजकल के टाइम का एक व्‍यावहारिक सिद्धांत यह भी है
बतर्ज लड़की अगर मिनी स्‍कर्ट पहनेगी तो रेपिस्‍ट तो आएगा ही कि
बकरी जब देर रात घने जंगल में अकेले घूमेगी
तो भेडि़या तो उसे खाएगा ही
इसमें दोष बकरी का ही था
क्‍योंकि बकरी ही बार-बार आज़ाद होने के लिए अब्‍बू ख़ां के पास से भाग जाती थी
और भेडि़ये के इलाक़े में पहुंच जाती थी
फुक्‍कट में भेडि़ये को दोष कायको देना
उसके पास भी भूख है और पारिस्थितिकी के अनुसार उसका आ‍हार बकरियां हैं
सवाल यह है कि बकरियां अब्‍बू ख़ां से आज़ादी क्‍यों चाहती थीं
क्‍या मेहनतकश अब्‍बू ख़ां शोषक अब्‍बू ख़ां भी था
क्‍या अब्‍बू ख़ां की पालना में रहना अब्‍बू ख़ां की कष्‍टकर ग़ुलामी में रहना था
वे अब्‍बू ख़ां के पास घास खाने, दूध देने, छोटी-छोटी लेंडियां करने और
जब-तब में-में करने के सिवाय करती ही क्‍या थीं
अब्‍बू ख़ां में कोई लाड़-प्‍यार भी था जो बकरियों का दिमाग़ फिरा देने को काफ़ी था
और उन बकरियों की भूख नामक मूलभूत ज़रूरत पूरी तरह संतुष्‍ट थी
क़ायदे की बात है कि जब पेट भरा हुआ होता है
तो आज़ाद होने की बात ख़याल आती है
(देश की आज़ादी का पूरा संघर्ष ही भरे पेट वाले लोगों की अगुआगिरी में हुआ था)

अब यहां कलावादी उचककर सवाल करते हैं
लेकिन हर चीज़ आकर भूख पर ही क्‍यों टिक जाती है
और भी ग़म हैं ज़माने में भूख के सिवाय

ये तो आप जानते ही हैं कि ऐसा कौन कहेगा कि
भेडि़या हिंदू था और मुसलमान (की) बकरियों को ही खाना प्रिफ़र करता था

क़ानून की बात कि अब्‍बू ख़ां ने अपनी बकरियों की सुरक्षा का इंतज़ाम कैसा किया था
अलेक्‍ज़ेंडर ब्‍लोक के प्रतीकवाद और मायकोवस्‍की के बाद के भविष्‍यवाद पर आएं
और अब्‍बू ख़ां की बकरियों को अब्‍बू ख़ां की बेटियों के रूप में देखें तो
लड़कियों के बार-बार भेडि़यों द्वारा खा लिये जाने की अनंत दारुण कथा समझ में आती है
तब भेडि़ये को कैसे लें
जवान लड़कियों को सुनहरी सपने दिखा खींच लेने वाला प्रलोभन
एक ऐसा चुंबक जिसे पता है मिट्टी और लोहे के बुरादों का फ़र्क़
फिर बकरियों को क्‍यों नहीं पता अब्‍बू ख़ां और भेडि़ये का फ़र्क़

जब-जब कोई बकरी मारी जाती है
तब-तब अब्‍बू ख़ां ख़ुद को भयंकर असुरक्षित और एकाकी महसूस करता है
जब-जब हमारे दिमाग़ में कोई पराजय होती है दुख सिर उठाता है
हम अब्‍बू ख़ां की गति को प्राप्‍त होने लग जाते हैं
उपभोक्‍तावाद में बकरी हमारी संस्‍कृति बन जाती है और भेडि़या बाज़ार आक्रांता
हम एक-एक करके अपनी बकरियां खोते जा रहे हैं अलग-थलग होते जा रहे हैं
पूंजीवाद अपने विध्‍वंसक रूप के प्रभावों से व्‍यक्ति को लगातार आत्‍मकेंद्रित
अलग-थलग और एकाकी बनाता जाता है

ज़रा फिर मार्क्‍सवादी-समाजवादी संदर्भों में लौटें
भुवनेश्‍वर, सर्वेश्‍वर से लेकर विमल कुमार की कविताओं का भेडि़या कितने रूप बदल चुका है
क्‍या अब्‍बू ख़ां की बकरियों के प्रतिकूल परिस्थिति का निर्माण करने की प्रवृत्ति ही भेडि़या है
अगर बकरी अब्‍बू ख़ां का श्रम है तो उसे बेमोल पचा ले जाता है
उसके उत्‍पादन का एक अंग तो लगान की तरह वसूल ले जाता है
अब्‍बू ख़ां लाख सिर पटकता है
बकरी उसके पास टिकती नहीं
पालतू ग़ाफि़ल हो बार-बार भग जाती है
घात लगाये भेडि़या दबोच लेता है
अब्‍बू ख़ां रोता है
अकेले में बूढ़ा होता है

अब्‍बू ख़ां एक परंपरा है
अब्‍बू ख़ां की बकरी एक कहावत-मुहावरा
भेडि़या परंपराओं-कहावतों से रूढ़ एक नंगी असलियत
(फिन देक के लो न भिड़ू, कविता को परंपराओं-मुहावरों से बचाने का है,
बोले तो काय-काय चीज़ से बचाने का है, समझ के लो न)


Thursday, May 6, 2010

जो था, है


जो था, वह था ही नहीं रहता, है भी हो जाता है... 

जो नहीं था, वह भी है हो जाने को अकुलाता है



नया क्‍या है?
जो नया है, वह यहां है.

कहां मिलेगी?




Saturday, April 24, 2010

जुगनू


बहुत पहले दुनिया में सिर्फ़ रात थी, मेरी कंखौरियों में मिट्टी के दिए चिपके थे. मैं उड़ने के लिए हाथ उठाता, दिए अपने आप बल उठते. रोशनी की फुहार उठती, बरसती. मैं हाथ नीचे करता, अंधेरा फिर हो जाता. मुझे इस तरह देखने के बाद ईश्‍वर ने जुगनू बनाए.

फिर भी उड़ने का हुनर मुझे कभी न आया. न ही रोशनी का भंडारगृह बन पाया.

जब देखने को कुछ नहीं होता, तब भी अंधेरा दिखता है. 




(मोत्‍सार्ट सिंफनी नंबर 1)


Sunday, October 4, 2009

इस साल किसे मिलेगा नोबेल?


लेबनान के उपन्यासकार इलियास खौरी, (जिनका उपन्यास ‘गेट ऑफ़ द सन’ पिछले दिनों पढ़ी सबसे अच्छी किताबों में से एक मानता हूं) ने ओरहान पामुक को नोबेल पुरस्कार की घोषणा के कुछ ही दिनों बाद एक लेख लिखा था, जिसमें कुछ ऐसा याद किया था- ‘2005 में जिस समय नोबेल की घोषणा होनी थी, मैं होटल के एक कमरे में पामुक के साथ बैठा था. पामुक बहुत बेचैन थे, प्रतीक्षा से परेशान. अख़बार उन पर लेखों से भरे हुए थे और उन्हें उस साल नोबेल का दावेदार माना जा रहा था. मैंने उनसे मज़ाक़ में कहा कि इस बेचैनी का कोई मतलब नहीं और इस तरह इंतज़ार करने का अर्थ है कि आपको यह पुरस्कार कभी नहीं मिलेगा. दावेदार के रूप में जिसका नाम मीडिया में उछल जाता है, उसे नोबेल क़तई नहीं मिलता. मैंने पामुक को तुर्की उपन्यासकार यासर कमाल का कि़स्सा बताया, जो नोबेल पाना चाहते थे. ज्यूरी की नज़र में बने रहने के लिए उन्होंने स्टॉकहोम में एक मकान किराए पर ले लिया और वहीं रहने लगे थे, पर उन्हें यह पुरस्कारर कभी नहीं मिला. पामुक इसके जवाब में मुस्करराए-भर थे. उनका नाम नोबेल के दावेदारों में पहली बार आया था.’

पर अगले ही साल पामुक को नोबेल पुरस्कार मिल गया. और खौरी समेत तमाम लोगों की यह धारणा भी टूट गई कि जिसका नाम मीडिया उछाल देता है, उसे यह पुरस्कार नहीं मिलता. बोर्हेस, आर्थर मिलर और रूश्दी के नाम भी मीडिया में उछले थे. बोर्हेस को संभवत: राजनीतिक कारणों से नहीं दिया गया, और मिलर-रूश्दी को उनकी ‘अतिशय लोकप्रियता’ के कारण. ऐसे कई कि़स्से हैं.

ख़ैर! किसे मिलता है, किसे नहीं मिलता है में डूबते- उतराते,  इंतज़ार है कि इस साल किसे मिलेगा?


जब से यह ख़्याल आया है कि अक्टूबर आने-आने को है और फिर आ गया, मेरे दिमाग़ में नाम घूमने लगे हैं. और नेट पर ज़रा खोजबीन की, तो भान हुआ, बहुतों के दिमाग़ में आ ही रहे हैं. जैसे यहां एक पूरी लिस्ट ही बनी हुई है और वोट करके प्रेडिक्ट भी किया जा रहा है. इस सूची में कुछ नाम ऐसे भी हैं, जो मेरे भी दिमाग़ में चल रहे थे. हालां‍कि वहां वोट करने वालों में ज़्यादातर का मानना है कि सूची से बाहर किसी को मिलेंगे.

जो नाम मेरे दिमाग़ में भी हैं उनमें से एक हैं- अमोस ओज़. उन्हें स्पष्ट नामों में सबसे ज़्यादा 24 फ़ीसदी वोट मिले हैं. इजराइल-फ़लीस्तीन के लिए टू-स्टेट सोल्यूशन की वकालत करने वाले ओज़ की चर्चा उनके राजनीतिक वक्तव्यों के कारण जितनी हुई है, उतनी ही उनके लेखन की विलक्षण बारीकी, सहजता और आसानी से पकड़ में न आने वाले वाली, बहुधा अभिधा का भ्रम दे देने वाली आइरनी के कारण भी. यह आइरनी ‘विधाता का नमक’ नहीं है. ओज़ पिछले साल भी मेरी निजी सूची में थे, नोबेल नॉमिनीज़ में रहे या नहीं, यह पता करने का कोई ज़रिया नहीं है. अगर उन्हें नोबेल मिलता है, तो मेरा पाठक, जो कि मैं हूं और सबसे पहले वही हूं, ख़ुश होने का एक और बायस पा लेगा.

उस साइट में फिर हारुकि मुराकामी का नंबर है. 19 फ़ीसदी. मुराकामी उन लेखकों में है, जिसे मैं पिछले कुछ बरसों से लगातार फॉलो कर रहा हूं और कभी लिख कर, कभी दोस्तों के बीच गपियाते, कई बार, अगला नोबेल विजेता मान चुका हूं. हालांकि उसी समय मेरे भीतर का संदेह गहरा भी हो जाता है. मुराकामी की पॉपु‍लैरिटी को ग्राहम ग्रीन की तरह देखा जाता है, और ग्रीन नॉमिनेट होने के बाद भी नोबेल से वंचित ही रहे.

तीसरा नाम फिलिप रॉथ का है, जो अमेरिकी उपन्यासकार है. इसकी तीन किताबें ही पढ़ी हैं, फिर भी इसके लिए मेरी रेटिंग बहुत ऊंची है. इन्होंने एक ही किरदार लेकर कई उपन्यास लिखे हैं और इस तरह दो-तीन किरदारों की अलग-अलग सीरिज बनाई है. ‘अमेरिकन पैस्टोररल’ मुझे बहुत प्रिय है. ‘द डाइंग एनिमल’ मैं पढ़ नहीं पाया, लेकिन इस पर पिछले साल बनी फिल्म ‘एलीजी’ देखी थी. रॉथ की कहानी, बेन किंग्‍स्‍ले का अभिनय और इसाबेल कोइक्सेत का निर्देशन. यहां कोइक्सेत ‘माय लाइफ़ विदाउट मी’ और ‘द सीक्रेट लाइफ़ ऑफ़ वर्ड्स’ वाली नहीं है यानी रॉथ इसमें से बराबर झांकता रहता है. हालांकि रॉथ अमेरिकी है और नोबेल के भाग्य विधाता यूरोपियनों को अमेरिका में साहित्य की ‘तमीज़’ न के बराबर दिखती है. फिर भी मैं चौंक जाने के लिए सहर्ष तैयार हूं.

कार्लोस फ़्वेन्‍तेस भी मेरी नज़र में कड़े और बड़े दावेदार हैं, लेकिन शायद वह तब से ही हैं, जब मारकेस को मिला था. एक बहुत ही अच्‍छा लेखक, अपने ड्यू के इंतज़ार में. आप एक बार 'द डेथ ऑफ़ आर्तेमीयो क्रूस' या 'द ईयर्स विद लॉरा डियास' पढ़ देखें. वह मारकेस के क़रीबी मित्रों में हैं और ऐसा कहा जाता है कि मारकेस कुछ बार उन्‍हें नोबेल के लिए नामांकित कर चुके हैं. इसी तरह मारीयो योसा का नाम भी चल रहा है.

एक और नाम अदूनिस का है, जो कि दुनिया में कई लोगों की नज़र में, नोबेल से ऊपर पहुंच चुके हैं. अदूनिस के नाम से अपना इंट्यूशन यह जोड़ता चलूं कि मुझे लगातार लग रहा है कि इस बार का नोबेल किसी नॉवेलिस्ट को नहीं, बल्कि किसी कवि को जाएगा. और वह कवि भी यूरोप के बाहर का नहीं होगा. यानी नोबेल इस साल भी किसी यूरोपियन को ही मिलेगा. 1994 में केंजाबुरो ओए के बाद किसी ग़ैर-यूरोपियन को और 1996 में वीस्वावा शिम्बोर्स्का के बाद किसी कवि को यह पुरस्कार नहीं मिला है. कवि का ख़्याल बार-बार आता है, लेकिन ग़ैर-यूरोपियन का नहीं. ख़ैर. यह तो सिर्फ़ मेरी अटकलबाजि़यां हैं, पर अदूनिस (जो कि यूरोप के बाहर के हैं) के बाद जिन नामों पर मुझे उम्मीद है, वे हैं एडम ज़गायेवस्की और बेई दाओ. ज़गायेवस्की पोलैंड के हैं, और बेई दाओ अपने चीन-संबंधों के बाद भी अपनी बनावट, बुनावट और स्टैंड में यूरोपियन ही हैं. ज़गायेवस्‍की मेरे प्रिय कवि हैं और अगर निर्णय का अधिकार मेरे हाथ में हो, तो तुरंत दे दूं.

इसी क्रम में एक ख़्याल और- कवियों में तादेयूश रूज़ेविच का नाम क्यों नहीं? शायद (मेरे मन में भी), अदूनिस की तरह रूज़ेविच के बारे में भी मान लिया गया है कि उन्हें नोबेल कभी नहीं मिलेगा, वह नोबेल पुरस्कार से काफ़ी ऊपर उठ चुके हैं. सच है, नोबेल मिल जाना ही सब कुछ नहीं है, कई बड़े लेखकों को नहीं मिला है. बीसवीं सदी के आखि़री हिस्से के साहित्य को जिन दो लेखकों ने सबसे ज़्यादा प्रभावित किया, बोर्हेस और कल्वीनो, दोनों को नोबेल नहीं मिला. वही आइरनी? जो कि ‘विधाता का नमक’ नहीं.

लेकिन यह भी सच है कि नोबेल, नोबेल है. हर साल उतनी ही उत्सुकता. फिर चीर-फाड़ का दौर.

तो ज़गायेवस्की या ओज़? मुराकामी या बेई दाओ? एक नाम तो अंबर्तो ईको का भी चल रहा है. कौन होगा, नतीजा बमुश्किल दस दिनों में आ जाएगा. क्या उन लेखकों में से होगा, जिन्हें मैं पढ़ चुका हूं? (हालांकि पिछले दस बरसों में, जब से मेरी पढ़ाई शुरू हुई है, ऐसा एक ही बार हुआ है कि मेरे पढ़े लेखक को यह पुरस्कार मिला हो. ऑफ़कोर्स, वह पामुक ही था.) या वह लेखक, जिसका नाम भी न सुना हो? (इस न सुने होने में उस लेखक का दोष तो क़तई नहीं होगा. जैसे- जब पिंटर को मिला था, तब कुछ स्वीडी प्रकाशकों ने कहा था कि इस लेखक की कोई किताब तक हमारी भाषा में नहीं और ज्यूरी ने व्यंग्य किया था- इसमें पिंटर या उनकी गुणवत्ता का दोष बिल्कुल नहीं.)

दसेक दिन प्रतीक्षा के. पर उससे पहले 6 अक्टूबर का इंतज़ार, जब बुकर की घोषणा होनी है. शॉर्टलिस्‍टेड एक ही पढ़ी है, कोएत्सी की ‘समरटाइम’ विलक्षण है, संभवत: उसका सर्वश्रेष्ठ और मेरी नज़र में फेवरेट भी; लेकिन सटोरियों का फेवरेट कोई और है.




P.S.
08 Oct
अभी लाइव वेबकास्‍ट में देखा. हेर्ता म्‍यूलर को दिया गया है. जर्मन कवि और उपन्‍यासकार.  :-)

Thursday, March 26, 2009

उस देखे की मौन भाषा

व्‍यास हिमाचल को रूप देती है, आकार देती है. शील, सैन, संस्‍कार देती है. व्‍यास तीरे मैं उसे देखता रहा, सुनता रहा.

कहते हैं कि वशिष्‍ठ ने पुत्रशोक से विह्वल होकर अपने को रस्‍सी में बांध यहीं-कहीं व्‍यास में छोड़ दिया था. इस गंभीरा नदी ने वशिष्‍ठ को पाशमुक्‍त किया और किनारे लगाया. तब से यह विपाशा कहलाती है. लेकिन हम तो इसे सिर्फ़ इसलिए विपाशा न मानेंगे कि इसने कभी वशिष्‍ठ का पाश हरा. हम तो इसे तब विपाशा मानें, जब यह हमारा पाश हरे. हम अंदर-बाहर पाशों से बंधे हुए हैं. कहीं झटक कर छुड़ाते हैं, तो ये राग-द्वेष दूसरी ओर से, दूसरे रूप में, अरूप में आकर बांध लेते हैं. ये पाश अंतर, अंतरतम के हैं और बाहर के भी हैं. मैं विपाशा तीरे अपने पाश देखता रहा. विपाशा को देखता रहा. सुनता रहा. फिर जैसे सब देखना-सुनना सुन्‍न हो गया. भीतर-बाहर सिर्फ़ हिमवान, वेगवान, प्रवाह रह गया. न नाम, न रूप, न गंध, न स्‍पर्श, न रस, न शब्‍द. सिर्फ़ सुन्‍न. प्रवाह, अंदर-बाहर प्रवाह. यह विपाशा क्‍या अपने प्रवाह के लिए है? क्‍या इसीलिए गंगा, यमुना, सरस्‍वती, सोन, नर्मदा, वितस्‍ता, चंद्रभागा, गोदावरी, कृष्‍णा, कावेरी की तरह विपाशा महानद है? पुण्‍यतमा है? क्‍या शीतल, नित्‍य गतिशील, सिलसिले में ही ये पाश कटते हैं? विपाश होते हैं?
***

यह लिखना भी देखने में बाधक होता है. एक कि़स्‍म का परिग्रह होता है. अहंता है- मैं इसे लिखूंगा. ममता है. इसलिए संचय की भावना आ जाती है. फिर आरंभ करिए, तो इच्‍छा और परिग्रह का अंत नहीं होता. इसलिए सध सके, तो बिल्‍कुल ही न लिखें; न लिखने के लिए देखें. सिर्फ़ देखते रहें, तो ही ठीक देखना होता है. उस देखे की भाषा मौन होती है. उस संवेदन का प्रकाश नहीं किया जा सकता. लेकिन जीने के लिए अंतों को छोड़ना अच्‍छा होता है. इसलिए न तो बस लिखने के लिए लिखने की अति हो कि देखना ही न हो सके, न सिर्फ़ देखना ही देखना हो कि कुछ लिखा ही न जा सके. इसके बीच क्‍या कोई रास्‍ता है कि देखना भी पर‍िमित हो, लिखना भी, इच्‍छा भी.

वैसे स्‍मृति भी एक पाश है. भोग की स्‍मृति, चाहे दुखभोग हो, चाहे सुखभोग, बंधनकारक होती है. मरण स्‍मृति शायद मुक्‍त करती है. मरना है, यह याद रहे तो आदमी या औरत बहुत-से झंझटों से छूट जाता है. इसकी अति भी बरजने जैसी है. हमेशा यह लगा रहे कि अब मरा, तब मरा, या मरना है, इसलिए लट्ठे की तरह पड़े रहना है, तो यह भी अच्‍छा नहीं. स्‍मृति चाहे भोग की हो, चाहे मरण की, पाश ही है. क्‍योंकि यह 'जो नहीं है' को 'जो है' पर थोप देती है. इसलिए 'जो है' उसमें जीना नहीं होता. स्‍मृति काल-क्रम को ही तखड़-पखड़ कर देती है.

( ब्‍यास तीरे खड़े होने पर कृष्‍णनाथ बेतहाशा याद आए थे. यह उनकी पुस्‍तक 'स्‍पीति में बारिश' का एक अंश है.)

Friday, October 31, 2008

अतल में

हर उदासी की शुरुआत तालियों से होती है. सबसे होहराती धुनों में भी उदासी खोज लेता हूं. कितौ धुनें ही खोज लाती हैं और सामने पटक देती हैं. गिरकर छितराई हुई उदासी, जो गिरने के बाद भी चढ़ी रहती है. यानी इसी तरह उदास करता है. उसके यहां जो पियानो बजता है, या ड्रम खड़कता है, तो लोग उत्‍साह खोजते हैं, मुझे बिना खोजे उदासी मिलती है.

'एक पीली शाम,
पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्‍ता,
शांत,
मेरी भावनाओं में
तुम्‍हारा मुखकमल...'

ऐसी उदासी पर मैं सबसे उदास कविता नहीं लिख सकता, पढ़ सकता हूं, निरुपमा दत्‍त का नाम ले यह नहीं कह सकता कि मैं बहुत उदास हूं.

'अब गिरा
अब गिरा वह
अधर में अटका हुआ आंसू
सांध्‍य तारक-सा
अतल में.'

आंखें बंद कर यानी सुनता हूं. सोचता हूं कि ताली बजाना एक बहुत अपमानजनक/कारक क्रिया है. वाह-वाह करने वाले आखि़र अब तक अपने घर क्‍यों नहीं चले गए?



Tuesday, September 30, 2008

उबासी के बीच कोई उदासी


बहुत दिनों बाद दफ़्तर पहुंचे, तो किताबों के दो पैकेट आए पड़े थे. कुछ किताबों की काफ़ी दिन से प्रतीक्षा थी. एमस ओज़ (पुराने हिब्रू उच्‍चारण के अनुसार आहमोस आउस) की 'हाऊ टु क्‍योर अ फैनेटिक' और डेविड ग्रॉसमैन की 'द येलो विंड'. ये दोनों इज़राइली लेखक बहुत पसंद हैं. और कुछ कवि भी. अमीख़ाई के बाद मिशोल, शेरन हास, लीसा कात्‍स, रोनी सॉमेक, रामी सारी. ये लिस्‍ट भी ख़ुद को याद दिलाने के लिए, क्‍योंकि अभी घर के कबाड़ से अहमद नदीम क़ासमी की एक पुरानी कहानी खोजने के चक्‍कर में हास और सॉमेक की कुछ बेहद प्रिय कविताओं का झेरॉक्‍स मिल गया. सौ-सवा सौ पन्‍नों का धूल-भरा पुलिंदा. नाक सुड़कसूं हो गई है. धूल सहन नहीं इसे. जबकि किताबों की कि़स्‍मत में यह धूल हथेली की जीवन रेखा की तरह गाढ़ी है. देखिए, 'द प्रेस एंड अमेरिका' भी मिल गई, और दूबोई की हिंदू मैनर्स वाली किताब भी. पिछले साल जब खोजा, तब नहीं मिली थी. अभी भी इसकी धूल नाक के रोओं पर झूल रही है. आक्‍छी. पर क़ासमी नहीं मिले. वह अगले अगले साल मिलेंगे, यूं ही, हाथ से लिखे पीले पन्‍नों से झांकते, जब उनको नहीं खोजा जा रहा होगा. काफ़्काई उकताहट और बेहनाम दायानी टाइप की बुझेली खीझ लिए बैठे पढ़ने. पर लिखने लग गए. फि़ज़ूल. अब अंबर्तो ईको टाइप का 'मैं कैसे लिखता हूं' थोड़े पढ़ा जाएगा. पढ़ा तो जाएगा.

पढ़ा / तो / जाएगा/ (काम से).


घोंघा बसंत.
थोथा बसंत.
पतरे पर खड़ा होकर नाचता बसंत.
अनंत महंत.
संत बसंत.
इतिहास का अंत.
सबर का भी.

(कोई असंसदीय शब्‍द लिखने का मन हो गया. किसको संबोधित करूं? हिस्‍स. भाव का फन-फ़नी विलक्षण अभाव. गाली खाने को कोई समर्थ गुसाईं भी नहीं परकटता. रात के तीसरे पहर एक 'निहायत शरीफ़' आदमी का मन गाली देने को क्‍यों करता है? नोप्‍स. डॅन कॉल इट नाइट, बडी.)

चलो, अक्‍टूबर से पहले नोवेंबर रेन. जीएनआर को सुनिए. सुनिए, जब रोज़ का गला और स्‍लैश का गिटार टनकता है, तो इलेक्‍ट्रॉन, प्रोटॉन क्‍या, उलझे-न पकड़ आए बोसॉन भी झनक-झनक जाते हैं. पूछूं- झनके क्‍या, और इयाऊं-झियाऊं करते गाल को भीतर से चुभलाते चच्‍चा-चाची सब निकल लिए, तो पचका हो जाएगा. सच बात है न, सर विदिया कक्‍का?

Thursday, September 18, 2008

इमरे कर्तेश की दुनिया से बाहर














कहते हैं कि इमरे कर्तेश को पढ़ने के तुरंत बाद वैसे भी कुछ करने का मन नहीं करता. एक अजीब कि़स्म का अवसाद, घुटने मोड़कर बैठी हुई चुप्पी, हथौड़े की तरह पूरे वजूद पर आ गिरा अकेलापन, अपने होने पर सकुचाता कोई लजीला संवाद, अचानक चीख़ में बदल गई कोई कराह और कुछ बेहद अमूर्त कि़स्म के सवाल आपको बड़े फूहड़ तरीक़े से खींच ले जाते हैं, बाल्कनी में खड़े होकर आप अपने आप में और बेकार होते रहते हैं. पिकासो के पास ब्लू पीरियड था. कर्तेश आपको ग्रे पीरियड में ले जाते हैं. धूल से भरा हुआ, मटमैले रंग का, जहां त्वचा पर बरसों पहले चिपकी गीली मिट्टी त्वचा जैसी ही झुर्रीदार दिखने लगती है.

पार्क में पत्थर की बेंच पर बैठी हर चीज़ पत्थर नहीं होती. पर दिखने वाली और न दिखने वाली हर चीज़ को धीरे-धीरे पत्थर में बदलते जाना है. दिखने वाले और न दिखने वाले पत्‍थर में. बेंच पर बैठकर देह से अलग होती एक औरत थोड़ी देर बाद पत्थर बन जाती है, फिर उस पर किसी हवा, किसी पानी का असर नहीं होता. जब वह उड़ती है, तो पत्थर की तरह उड़कर कहीं लगती है और जब टूटती है, तो पत्थर की तरह. पत्थर की तरह टूटना सबसे बुरा होता है. जुड़ने की कोई उम्मीद बाक़ी नहीं रहती. पर टूटे हुए टुकड़ों के पास भी आकार होता है, टूटा हुआ आकार. बच्चे उनसे सात चिप्पी खेलते हैं. एक अद्भुत आकार वाला पत्थर देव बन जाता है. एक पत्थर धमकाने के काम आता है और एक डरा हुआ, हमेशा के लिए बेंच के पास ही दुबक कर सदियों लंबी एक नींद में चला जाता है. सदियों बाद उठकर वह इन वक़्तों की गवाही देगा, यह बताएगा कि कैसे एक पत्थर की बेंच पर बैठकर रोती हुई एक औरत पत्थर की बन गई थी और उसके बाद पत्थर की तरह टूट गई थी.

और उसके पास बैठा पुरुष हवा की तरह हल्का होता है. उसके टूटने की कोई आवाज़ नहीं होती. वह अपने जुड़ने की तलाश नहीं करता कभी. उसका टूटा हुआ चेहरा भी जुड़े हुए चहरे जैसा ही भरम देता है. वह कहना चाहता है, लेकिन सांय-सांय से ज़्यादा कोई आवाज़ नहीं निकल पाती. कहने की तमाम कोशिशों के बाद जो कहा जा सके, वह नहीं होता, जिसे कहने के बारे में सोचा था.

कहानी दोनों के पास होती है. दोनों अपनी कहानी के साथ चलना चाहते हैं, लेकिन वह असंभव लगता है. दोनों अपनी कहानी को नए सिरे से लिखना चाहते हैं, लेकिन वह भी असंभव लगता है. हर निजी कहानी दरअसल कभी न सुनाई जा सकने वाली कहानी होती है. जैसे ही कुछ बोलने के लिए हम मुंह खोलते हैं, आंखें उसी वक़्त खुल जाती हैं. कहानी ख़त्म हो चुकी होती है. हम हमेशा दूसरों की कहानियों में रहते हैं. उनकी कहानी सुनते हैं, उसे ही लिखते हैं. उसी के बीच अपने कुछ प्रसंग जोड़कर बुनकरों का इल्म पाने की कोशिश करते हैं. जो हाथ लगता है, वह भटकते हुए शब्दों का गुच्छा-भर होता है.

कभी उस प्रोटॉन की मजबूरी के बारे में सोचा है, जो चाहे कितनी बग़ावत कर ले, रहना उसे इलेक्ट्रॉन के दायरे में ही है. उसी के केंद्र में भटकना है, अभिशप्त गति से. उस समुद्र को क्यों कोसना, जो अपने ही पानी में डूब मरा हो. बदबख़्गी का ऐसा आलम तो उस आदम के पास भी नहीं, जिसके पास सिर्फ़ एक ही जन्नत थी, जिसने सिर्फ़ एक ही जन्नत खोई थी. बदबख़्त होना क्या होता है, उस आदम से पूछो, जिसके पास कई जन्नतें थीं और हर जन्नत को वह ऐसे खोता रहा, जैसे देह सांस खोती है. पीछे मुड़कर देखना रूमानी प्रतीक हो सकता है, पर यह कितना घातक होता है, उस ऑर्फियस से पूछो, जो स्वर्ग से अपनी बीवी को लौटा कर ला रहा था और पृथ्वी पर पांव रखते ही उसने पीछे मुड़कर देखा कि वह आ रही है या नहीं और उसका सिर कटकर गिर गया. देवदूतों ने उससे वादा मांगा था कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेगा.

पीछे मुड़कर देखना अकेलेपन को चुनौती देना होता है. दूसरों की कहानी को झांककर देखना अपनी कहानी न कह पाने का शोक होता है.

और अकेलापन क्या होता है. एक हथौड़ा ही न, जो पत्थर पर गिरता है, तो पत्थर टूटकर बिखर जाता है. लोहे पर गिरता है, तो लोहा और मज़बूत हो जाता है. सब कुछ तो मेरे चारों ओर ही है. अकेलापन किस बात का? किस घड़ी अकेले होते हैं हम? स्मृतियां अकेला होने देती हैं क्या? डर, आशंका, अनजाने आई कोई मुस्कान या माइग्रेन की तड़तड़ अकेले होने देते हैं? जो मर चुके हैं, वे तो मेरे अकेलेपन में कभी साथ नहीं छोड़ते. जो अब भी कहीं जी रहे हैं, वे मेरे अकेलेपन का साथ देने नहीं आते.

`स्क्रीम ऑफ द आंट्स´ के अंत में एक पात्र बताता है: `मैं अकेले-अकेले पूरी दुनिया घूम आया, मैंने सबसे ऊंचे पहाड़ पार किए, सातों समंदरों को लांघा, रेगिस्तानों और दलदलों से गुज़रा और एक दिन मैं लौट आया. मैंने देखा, जो मैं खोज रहा था, वह पत्तियों से लटकती पानी की बूंद में छिपी थी, पंखुडि़यों पर उसका पता लिखा था.´

(इमरे कर्तेश की `फेटलेस´ और `लिक्विडेशन´ पढ़ने के बाद उससे जुदा कुछ बिंब. हमेशा की तरह धूल-धुंधले. पेंटिंग मार्क शाशा की है. उनकी वेबसाइट से साभार.)