Tuesday, May 27, 2008

समंदर क्‍या है सिवाय एक गहरे रुदन के

दिन, तारीख़, महीना याद नहीं। रात थी और चांदनी थी, इतना ज़रूर याद है। 93 की कोई रात। अकेला मूंगफली वाला खोमचा था। मूंगफलियों पर एक कटोरी में सुलगती हुई लकडिय़ां थीं और ग्रैविटी का नियम तोड़ता धुआं। ढिबरीनुमा कोई चीज़ अपने ही धुएं से काली हो रही थी। उसी के पास अपने जूते जमाकर हम नंगे पैर अंधेरे की चट्टानों पर उतर गए। पता नहीं, क्या जमा होता है बैंड स्टैंड की चट्टानों पर कि लाख बचाओ, एकाध बार वे पैरों में चुभ ही जाते हैं। चीरा मारने पर ख़ून की हल्की-सी लकीर रेंगती हुई-सी महसूस होती है।

पीठ पर लदी हुई थकान थी। कुहनियों, पिंडलियों और कमर से थकान की पोटलियां लटकी हुई थीं। हम शाम-भर नाचे थे। उन दिनों बांद्रा में हमारा पसंदीदा थेक था- रॉक अराउंड द क्लॉक। पता नहीं, अब है या नहीं। बांद्रा में ही कॉलेज था। स्टेशन से ही बाहर निकलते, तो सामने ही फलूदे वाला होता था। उसका नाम नहीं, स्वाद याद है। और रंग भी। गुलाबी-केसरिया मिक्स। गिलास के बाहर चिपके हुए फलूदे नयों की नाक चढ़ाते थे। हम आदी थे और स्वाद ले-लेकर सुड़क जाते थे।

नाच की थकान के बाद अमूमन इन चट्टानों पर आकर लेट जाते। आसपास की चट्टानों के नीचे या दाएं या बाएं प्रेमी जोड़े बैठे होते। दुनिया-जहान से दूर। प्रेम और दुख हमेशा निर्जन कोनों में घनीभूत होते हैं। समंदर किसी राग में होता। उसकी आवाज़ से उसका संगीत समझ में आता, लेकिन हम आज तक उसकी राग, उसका ताल नहीं समझ पाए। उसी में हमारी होहराहट का संगीत भी होता। हम कुछ देर लेटे रहे। उठकर कंकड़ चुनकर समंदर में फेंकते रहे। फिर छोटे प्लेयर पर 'गन्स एंड रोजेस' सुनते रहे। लहरों के बीच एक्सल रोज की आवाज़ गूंजती रही। स्लैश का गिटार टुनकता रहा। गिटार की वह आवाज़ अकेलेपन के भटकते हुए पलों में अब भी गूंज-गूंज जाती है।

Talk to me softly
There is something in your eyes
Don't hang your head in sorrow
And please don't cry
I know how you feel inside I've
I've been there before
Somethin is changin' inside you
And don't you know

Don't you cry tonight
I still love you baby
Don't you cry tonight
Don't you cry tonight
There's a heaven above you baby...

लड़कपन का गाना था, किसी प्रार्थना की तरह इसे सुनते थे, आंखें बंद करके, गले में कांटे उगाए हुए, हमने किसी को छोड़ दिया था, या हम सब किसी न किसी के द्वारा छोड़े गए थे और भीतर हो रहे बदलावों पर जैसे ख़ुद से कहते थे- डोंट यू क्राय टुनाइट... हम जिसे कहना चाहते थे, पता नहीं उस तक हमारी बात पहुंचती भी थी कि नहीं, पर स्लैश के एक गहरे आलाप के बाद जब गाना ख़त्म होता था, तो हम खो चुके होते थे, एकाध बार अपने भीतर रो चुके होते थे और आसपास के माहौल को ऐसे देखते थे, जैसे कोई गीली झिल्ली अभी भी दृश्य और दृष्टि के बीच कांपते हुए झूल रही हो...

और इसी बीच तड़ाक की एक आवाज़ उठती है। कोई गूंज बेतहाशा चट्टानों पर दौड़ती है और छपाक से अरब सागर में कूद जाती है। फिर दो-तीन बार और आवाज़ आती है- तड़ाक-तड़ाक-तड़ाक।

हम बौखलाकर खड़े होते हैं। किसी चट्टान से किसी स्त्री के रुदन की आवाज़ आती है। पहले ज़ोर-से, फिर सुबकने की। अंधेरे में किसी पुरुष की आकृति ऊपर उठती है और चट्टानों को फलांगती हुई निकल जाती है। सिसकी बच रहती है।

हम वहां जाकर देखते हैं। एक स्त्री बिखरे हुए बालों के साथ अपना पर्स समेट रही है और मंत्रों की तरह बद-दुआएं बुदबुदा रही है। हममें से एक उस दिशा में दौड़ता है, जहां वह पुरुष गया है। कोई फ़ायदा नहीं।

हम बार-बार उस औरत से पूछते हैं। हमें कोई जवाब नहीं मिलता। उसकी सिसकी बढ़ती है... बढ़ती जाती है। चट्टानों पर चलते-चलते वह सड़क की तरफ़ जा रही है। एक हाथ में पर्स है, दूसरे में लटकती हुई सैंडिलें। अपने पीछे रुदन छोड़ जाती है, जो वहां गूंज रहा है।

हम देर तक सन्नाटे में हैं। लौटकर अपनी चट्टान पर पसर जाते हैं, पत्थरों से छीजी हुई रेत की तरह बिखरे हुए और गीले। वह बिखराव जिंदगी में लौट-लौटकर आता है... समंदर की ढेर सारी यादों, आवाज़ों के साथ नत्थी एक सिसकी... जो पलटकर तकती तक नहीं.

बाब डिलन बेतहाशा याद आता है। हमारी किसी नस को गिटार की तरह छेड़ता-
समंदर क्या है,
सिवाय एक गहरे रुदन के...

Saturday, May 17, 2008

हमें माफ़ कर दो, वरना हम तुम्हें गोली मार देंगे

राख-इराक़

बहुत सारे हथियारों के साथ
वे दनदनाते हुए घुसेंगे आपके घर में
और कहेंगे कि सारे हथियार निकाल फेंको
उन पर सिर्फ़ हमारा हक़ है
वे आपको रास्ते में रोक लेंगे और
नाक पर पिस्तौल सटाकर कहेंगे
जेब में जितने भी हों पैसे
हमें दे दो
पैसों पर सिर्फ़ हमारा हक़ है
वे आधी रात को फ़रमान जारी करेंगे
अपनी औरतों को भेज दो हमारे तंबुओं में
ख़ूबसूरत औरतों पर सिर्फ़ हमारा हक़ है

वे मासूम बच्चों की आंखों में गोली मारेंगे
बिना ज़ाहिर किए कि उन आंखों से उन्हें डर लगता है
वे बुज़ुर्गों की ज़ुबानों पर छुरी चलाएंगे
और दूर खड़े होकर खिजाएंगे
वे पीठ से बांध देंगे आपके हाथ और
किसी महिला की चड्ढी से ढांप देंगे आपका मुंह
और कहेंगे कि ढूंढ़ लीजिए वह राह
जिस पर चलना है आपकी सरकार को

आपके गले में पट्टा बांधकर कहेंगे
सिर्फ़ हांफो ज़ुबान निकाल कर
कराहने, रोने या चीख़ने की हिम्मत न करना
हमें तफ़रीह का मन है

और एक दिन जब उनका मन भर जाएगा
वे आपकी कनपटी पर लगाएंगे बंदूक़
और दुख के साथ कहेंगे
हमें माफ़ कर दो इन सबके लिए
वरना हम तुम्हें गोली मार देंगे
(2004 में लिखी गई, प्रगतिशील वसुधा में प्रकाशित)

Thursday, May 15, 2008

एक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत...





यौवन की ऋतु में जो भी मरता है,
वह या तो फूल बन जाता है या तारा।
यौवन की ऋतु में आशिक़ मरता है
या फिर करमों वाला।

हमारे यहां बहुत उम्‍दा कवि हुए हैं, लेकिन ऐसे कम ही हैं, जिन्‍हें लोगों का इतना प्यार मिला हो। हिंदी में बच्चन को मिला, उर्दू में ग़ालिब और फ़ैज़ को. अंग्रेज़ी में कीट्स को. स्पैनिश में नेरूदा को. पंजाबी में इतना ही प्यार शिव को मिला. शिव कुमार बटालवी. शिव हिंदी में कितना आया, यह अंदाज़ नहीं है. पंजाब आने से पहले मैंने सिर्फ़ शिव का नाम पढ़ा था. इतना जानता था कि कोई मंचलूटू गीतकार था. पर शिव सिर्फ़ मंच नहीं लूटता. उसकी साहित्यिक महत्ता भी है. उसे पढ़ने, सुनने के बाद यह महसूस होता है. वह अकेला कवि है, जिसकी कविता मैंने अतिबौद्धिक अभिजात अफ़सरों के मुंह से भी सुनी है और साइकिल रिक्शा खींचने वाले मज़दूर के मुंह से भी. ऐसी करिश्माई बातें हम नेरूदा के बारे में पढ़ते हैं. पंजाब में वैसा शिव है.

1973 में जब शिव की मौत हुई, तो उसकी उम्र महज़ 36 साल थी। उसने सक्रियता से सिर्फ़ दस साल कविताएं लिखीं. इन्हीं बरसों में उसकी कविता हर ज़बान तक पहुंच गई. 28 की उम्र में तो उसे साहित्य अकादमी मिल गया था. प्रेम और विरह उसकी कविता के मूल स्वर हैं. वह कविता में क्रांति नहीं करता. मनुष्य की आदत, स्वभाव, प्रेम, विरह और उसकी बुनियादी मनुष्यता की बात करता है. वह लोककथाओं से अपनी बात उठाता है और लोक को भी कठघरे में खड़ा करता है. जिस दौर में लगभग सारी भारतीय भाषाओं में कविता नक्‍सलबाड़ी आंदोलन से प्रभावित थी, शिव बिना किसी वाद में प्रवेश किए एक मेहनतकश आदमी की संवेदनाओं और भावनात्मक विश्वासों की बात कर रहा था. इसीलिए पंजाबी कविता के प्रगतिशील तबक़े ने शिव को सिरे से ख़ारिज कर दिया. हालांकि उसकी कविता इतनी ताक़तवर है कि अब तक लोकगीतों की तरह सुनी-गाई जाती है. कहते हैं, एक बार पाश ने शिव का गला पकड़ लिया था, किसी मंच पर. पाश को शिव की कविता पसंद नहीं थी. ख़ैर.

शिव की बरसी पिछले सप्ताह ही बीती है। यहां शिव की एक कविता प्रस्तुत है, जो पंजाबी में ही है. शिव बहुत सुंदर था. नाम था. कविताओं की गूंज थी. कहते हैं, एक वरिष्ठ साहित्यकार की बेटी उस पर फिदा हो गई. नाराज़ होकर बाप ने लड़की को लंदन भेज दिया. तो उस 'खो गई लड़की' के लिए शिव ने यह कविता लिखी थी, जिसका असली शीर्षक है इश्तेहार. सरल-सी यह कविता सरल-सी पंजाबी में है. 

एक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है

सूरत उसदी परियां वरगी
सीरत दी ओह मरियम लगदी
हसदी है तां फुल्ल झड़दे ने
तुरदी है तां ग़ज़ल है लगदी
लम्म सलम्मी सरूं क़द दी
उम्र अजे है मर के अग्ग दी
पर नैणां दी गल्ल समझदी

गुमियां जन्म जन्म हन ओए
पर लगदै ज्यों कल दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों अज्ज दी गल्ल है
इयों लगदै ज्यों हुण दी गल्ल है
हुणे ता मेरे कोल खड़ी सी
हुणे ता मेरे कोल नहीं है
इह की छल है इह केही भटकण
सोच मेरी हैरान बड़ी है

नज़र मेरी हर ओंदे जांदे
चेहरे दा रंग फोल रही है
ओस कुड़ी नूं टोल रही है
सांझ ढले बाज़ारां दे जद
मोड़ां ते ख़ुशबू उगदी है

वेहल थकावट बेचैनी जद
चौराहियां ते आ जुड़दी है
रौले लिप्पी तनहाई विच
ओस कुड़ी दी थुड़ खांदी है
ओस कुड़ी दी थुड़ दिसदी है

हर छिन मैंनू इयें लगदा है
हर दिन मैंनू इयों लगदा है
ओस कुड़ी नूं मेरी सौंह है
ओस कुड़ी नूं आपणी सौंह है
ओस कुड़ी नूं सब दी सौंह है
ओस कुड़ी नूं रब्ब दी सौंह है
जे किते पढ़दी सुणदी होवे
जिउंदी जां उह मर रही होवे
इक वारी आ के मिल जावे
वफ़ा मेरी नूं दाग़ न लावे
नई तां मैथों जिया न जांदा
गीत कोई लिखिया न जांदा

इक कुड़ी जिहदा नाम मोहब्बत
गुम है गुम है गुम है
साद मुरादी सोहणी फब्बत
गुम है गुम है गुम है।