Tuesday, January 12, 2010

मध्‍य-वर्ग का मर्म-गीत

यह श्री गुरु गोबिंद सिंह हिंदी प्राइमरी स्‍कूल में पढ़ाई जाने वाली राइम्‍स में से है
अम्‍मा-बाबा-दादी टाइप के संबोधनों वाले बूढ़ों के ज़माने के कांपते गीतों में से
किसी की मौज या शग़ल है ताल-बेताल-क़दमताल
ओह, देखो-देखो, अब भी वही सिंदूर तिलकित भाल
या पूरे इतिहास को दिखा दे ताक़त के खेल की ताक़त है
पूरब के मेटा-फि़जि़क्‍स का मोटा फ़ार्मूला है - के एक दिन तय है सबका मरना
मेरा कर्मा... कर्मा... कर्मा... तू... मेरा धर्मा... धर्मा... धर्मा
ऊप्‍स! तीनों में से कोई फ़ुक्‍कट में नहीं मरा, काम करते-करते मरा,
जिनके लिए शहीद जैसा कोई शब्‍द क्‍यों नहीं, ऐसा प्‍लकार्ड लिए अभी गुज़रे थे स्‍वामी वर्ग-चैतन्‍य कीर्ति-आकांक्षी 1008
भुजंग की तरह मैं भी पूछ बैठा - शिवाकाशी का बचपना क्‍यों नहीं जाता...
आईक्‍यू जितना कम होगा, कविता उतनी अच्‍छी होगी; जीवन भी
मैं कहता हूं, जहां रहना है वहां से संन्‍यास ले लीजिए; इसमें डुप्‍लेक्‍स रिहाइश का मज़ा है :-)
नको बाबा
कक्षा 1ली वर्ग अ और वर्ग ब का संघर्ष नहीं, बहुत जटिल है जितना कि विचित्र मेरा वर्ग-मानचित्र है
जो है उसे वैसे ही पेश करना रिवायतों के खि़लाफ़ है
तो जैसे मैं घर की बरमूडा और टी-शर्ट पहने ही दफ़्तर आ गया
उसी तरह इस पेशकश में पेश्‍ट करता हूं
ग़ौर से पढि़ए, यह मेरे मध्‍य-वर्ग का मर्म-गीत है :
राजा मरा लड़ाई में
रानी मरी कड़ाही में
बच्‍चे मरे पढ़ाई में...


(अगस्‍त 2009 में लिखी गई  कविता. इधर, प्रतिलिपि के ताज़ा अंक में चेस्‍वाव मिवोश की एक कविता पर कुछ लिखा है. यहां पढ़ सकते हैं.)  

Saturday, December 19, 2009

फिर कविता के बारे में


पिछली पोस्‍ट पर कुछ बातें उठी हैं, उनके बारे में अपनी राय जल्‍द ही; इस बीच पोलिश कवि चेस्‍वाव मिवोश का एक टुकड़ा, जो कि उनकी किताब 'न्‍यू एंड कलेक्‍टेड पोएम्‍स: 1931-2001' (संस्‍करण : 2003) की प्रस्‍तावना से लिया गया है.


I strongly believe in the passivity of a poet, who receives every poem as a gift from his daimonion or, if you prefer, his Muse. He should be humble enough not to ascribe what is received to his own virtues. At the same time, however, his mind and his will should be alert. I lived amidst scenes of horror in the twentieth century-- that was a reality and i could not escape into a realm of  'pure poetry' as some descendants of French symbolism advised. Yet our hot-blooded reactions to inhumanity rarely result in texts artistically valid, even if such poems as my 'Campo dei Fiori', written in April 1943 in Warsaw when the ghetto was burning, continue to have some value.

I think that effort to capture as much as possible of tangible reality is the health of poetry. Having to choose between subjective art and objective art, I would vote for the latter, even if the meaning of that term is grasped not by theory but by personal struggle. I hope that my practice justifies my claim.

The history of twentieth century has prompted many poets to design images that conveyed their moral protest. Yet to remain aware of the weight of fact without yielding to the temptation to become only a reporter is one of the most difficult puzzles confronting a practitioner of poetry. It calls for a cunning in selecting one's means and a kind of distillation of material to achieve a distance to contemplate the things of this world as they are, without illusion. In other words, poetry has always been for me a participation in the humanly modulated time of my contemporaries.

(Photo by Judyta Papp, Krakow 2002)

Monday, December 14, 2009

आज की कविता के बारे में


आज की कविता के बारे में कुछ भी बोलने से पहले मैं उस समाज के बारे में सोचता हूं, जिसमें मैं रहता हूं, जो कि बोर्हेस के शब्‍दों में ‘स्‍मृतियों और उम्‍मीदों से पूर्णत: मुक्‍त, असीमित, अमूर्त, लगभग भविष्‍य–सा’ है; मैं उस भाषा के बारे में सोचता हूं, जिसमें मैं सोचता-लिखता हूं, जो कि, जैसा भी दिख रहा है, बहसतलब रूप से निरंतर क्षरित और मृत्‍योन्‍मुखी है, जो वंचितों और मजबूरों द्वारा बेबसी में अपनाई जा रही है, तमाम घोषित ‘बूम्‍स’ के बावजूद जो अपनी वर्तमान लिपि के साथ कितने बरसों तक चल पाएगी, कहना कठिन है. ऑक्‍तोवियो पास कहता है कि भाषा सबसे पुरानी और सबसे सच्‍ची मातृभूमि होती है, उसमें यह ज़रूर जोड़ दिया जाना चाहिए कि कविता ऐसी तमाम मातृभूमियों का महाद्वीप है, लेकिन सरलता से पूछा जाए कि यदि यह मातृभूमि नहीं होगी, तो उसका महाद्वीप कहां से होगा?  हम निश्चित भाषाई निर्वासन के पथ पर हैं, जहां कुछ समय बाद, बल्कि कई बार तो अभी भी, अपने अज्ञान को सम्‍मानित करते हुए सरलता, सुपाच्‍यता का आग्रह किया जाएगा और फिर एक स्‍ट्रेटजिक उपेक्षा के साथ छोड़ दिया जाएगा.
बहुत पीछे नहीं, सिर्फ़ चार सदियां पीछे जाएं, तो एक निरर्थक, लेकिन बात करने लायक़, प्रसंग मिलता है- हुमायूं पूरब में कहीं लड़ रहा था कि उसके पास सूचना आई कि दूर समरकंद के पास उसकी सबसे प्रिय पत्‍नी की मृत्‍यु हो गई है. वह बादशाह था, फिर भी उस तक सूचना पहुंचने में सात महीने लगे थे. वह इन सात महीनों तक उसे जीवित मान कर रोज़ उसके लिए तोहफ़े इकट्ठा करता रहा था. ऐसे कि़स्‍से उससे पहले की सदियों में भी हुए होंगे, उसके बाद की सदियों में भी और हमारी इस सदी में भी कमोबेश संभव हों, पर यह निरपराध-सी अज्ञानता का समय नहीं है. माध्‍यमों की तेज़ी और सूचनाओं का विस्‍फोट एक अपराधी-नुमा ज्ञान का प्रसार करता है. दूर हुई घटना की हिंसक प्रतिक्रिया से पड़ोस का जल उठना इसी का मिनिएचर है. इतिहास के आततायियों ने भी बेशुमार हत्‍याएं कीं और अपने समय की सुविधाओं के अनुरूप उनका प्रदर्शन भी किया, लेकिन आज आपको तुरंत दिख जाता है कि एक घंटे पहले ही स्‍वात में एक औरत की पीठ पर हथौड़ा मार-मारकर उसकी रीढ़ की हड्डी तोड़ी गई है. उसका बाक़ायदा वीडियो बनाकर दुनिया-भर को दिखाया जा रहा है. क्रूरता को कभी ‘क्‍वांटीफ़ाय’ नहीं किया जा सकता, लेकिन यह क्रूरताओं के प्रदर्शन का सबसे क्रूर समय है, निश्चित ही. प्रदर्शन इस समय का सबसे अश्‍लील आचार है. पूंजी का जादू-भरा यथार्थ और उससे उपजे नव-बाज़ार का ‘सौ फ़ीसदी शर्तिया भले अनैतिकता’ के रवैये ने पूरे माहौल को बाइबल में आने वाली नगरियों सोडोम और गोमोरा की तरह बना दिया है, जहां हर आचार एक अनियंत्रित, अराजक, अनैतिक व प्रदर्शनोन्‍मुखी व्‍यभिचार में बदल जाता है, जहां नज़ाकत निहायत फूहड़ता बन जाती है.
यह उदात्‍तता, अनुभव, सेंसरी, मोहकता, द्रवता और द्रव्‍यताओं के ब्रैंडिग टूल्‍स में बदल जाने का समय है, जहां व्‍यक्ति की ‘सोशल रिस्‍पॉन्सिबिलिटी’ गौण है, ‘कॉर्पोरेट सोशल रिस्‍पॉन्सिबिलिटी’ महत्‍वपूर्ण है. यह स्‍वांग के केंद्र में आ जाने का समय है, जहां हर‍ क्रिया एक डी-ग्रेडेड मल्‍टीग्रेडेशन में तयशुदा अभिनय लगती है. जहां हर सूचना एक टारगेटेड मिसाइल की तरह आप पर गिरती है और आपकी बर्बाद अचकचाहट में अपनी सफलता प्राप्‍त करती है.
तुर्की कवि आकग्यून आकोवा की एक पंक्ति है, ”कविता चींटियों की बांबी में लगी ख़तरे की घंटी है.” मुझे रघुवीर सहाय की एक पंक्ति ठीक इसी के सामने याद आती है,” ख़तरे की घंटी बजाने का अधिकार सिर्फ़ बादशाह के पास है.” कविता में हम वही अधिकार वापस लेने का संघर्ष करते हैं या एक वैकल्पिक घंटी बना रहे होते हैं, जिसकी आवाज़ बादशाह की घंटी की आवाज़ से ज़्यादा साफ़ और ईमानदार हो। और ऐसे समय में, जब बादशाह मनोरंजन के लिए ख़ुद कविता करता हो, कविता को विज्ञापन फिल्मों की कैचलाइन में बदल देता हो, दर्द की एक धुन और आंसू के एक बड़े फोटो के साथ, गुडि़या छीनकर बच्चों के हाथ में बंदूक़ का खिलौना पकड़ा देता हो, कविता की भाषा में आपसे जेब ढीली करने की मनुहार करता हो, रूढि़यों, भ्रांतियों और पूर्वग्रहों के विखंडन के बजाय परमाणु विखंडन पर ख़ज़ाना खोल देता हो, जो बच्चों को चॉकलेट न मिलने पर घर से भाग जाना सिखाता हो, मुक्ति के नाम पर स्त्री की देह को सिसकारियों से छेद देता हो, जो बीच राह रोककर पुरुष की मैली शर्ट, फटे जूते और ख़ाली बटुए का मख़ौल उड़ाता हो, और यह सब जानबूझकर, योजना बनाकर, विज्ञापनों में, कविता की भाषा में करता हो, वह समय कितना ख़तरनाक होगा, अंदाज़ा नहीं लगा सकते। जब बादशाह यह मनवा दे कि मृत्यु और तबाही दरअसल भूख, ठंड, बारिश, बाढ़, रोग, महामारी से नहीं, बल्कि एलियंस, साइबोर्ग्स, नामुराद उल्काओं और रहस्यमयी उड़नतश्तरियों से होती हैं, तो उस समय की भयावहता की कल्पना कर सकते हैं हम। अचरज है कि ये सब कविता की भाषा में भी हो रहा है।
हम इस पूरे यथार्थ को ढो रहे हैं और इससे मुक्‍त होना संभव भी नहीं दिखता. यह सबसे पहले कला की धार को कुंद करता है, विशुद्ध कला का हॉलो बनाकर. फिर यह विचारों का दिशासूचक मुर्ग़ा स्‍थापित करता है, तमाम विचारहीन लोगों को वैचारिकता के चमकीले तमग़े पहनाकर. यह पहले ध्‍वंस का तजुर्बा करता है, फिर सर्व-कल्‍याण की प्रयोगशालाओं को अनुदान देता है. इसके हर क़दम पर लैंडमाइन्‍स बिछी हुई हैं, यह भ्रम के फव्‍वारों से शीतलता देता है. यह हमारी ज्ञात सभ्‍यता का एकमात्र ऐसा समय है, जब भ्रम महज़ एक मानसिक अवस्‍था नहीं, एक राजनीतिक हथियार है.
बंद कमरे में बैठकर पूरी दुनिया का अनुभव कर लेने के ग़रूर के साथ यह आपके अनुभव को ही ब्लिंकर पहनाता है, मस्तिष्‍क अनुभूतियों को जैसे डी-कोड करता है, यह उसी प्रक्रिया पर चोट करता है और एक तरह से अनुभवों की निजी डी-कोडिंग को ध्‍वस्‍त कर देता है.
ऐसे गॉलिएथ के सामने जिसमें शकुनियों की चालाकियां भी भरी हों, कविता क्‍या कर लेगी? जैसे डेविड कॉपरफील्‍ड कहता है- ‘मोर सूप’, वैसे ही कविता भी ‘विरोध का मोर सूप’ मांगेगी. वह ज़्यादा सीधी लेकिन कम सरल होगी, वह जटिल होगी लेकिन उसके जोड़ों का दर्द नहीं दिखेगा, वह तमाम पारंपरिकताओं का मुखर नकार करेगी और मुहावरों को चुनौती और नया अर्थ देगी, वह बहुलताओं को समाविष्‍ट और बहुमतों को निरस्‍त करेगी, स्‍वयं निरस्‍त हो जाने के आत्‍महंता जोखिम तक जाकर. वह तेवरों से भरी तमाम तार्किकताओं से परे होगी लेकिन अराजकताओं से भी दूर होगी, प्रतिबद्धता से नालबद्ध लेकिन असंबद्धताओं को अर्थवान बनाते हुए. छोटी से छोटी संभावनाओं में यक़ीन करना सबसे बड़ी प्रतिबद्धता होती है. वह स्‍वांग्‍य ग़ुस्‍सैल, भ्रामक आत्‍मजयी, हेडोनिस्‍ट सुखयाचक या सशर्त निरीहता में अपने लिए एक घर की मांग नहीं करेगी. इस यथार्थ को देखने-जानने के लिए उसे अत्‍यधिक सरलता का आग्रह छोड़ कठिन कंदराओं की ओर जाना होगा, सुंदरता की '90 परसेंट ग्रैंड सेल' में उसे अपनी तथाकथित पारंपरिक सुंदरता के पैमाने बदलने होंगे, उसे एहतियातन अपनी एफिशिएंसी को इफ़ेक्टिवनेस में बदलना होगा--- जैसा कि एक यूनानी मिथक में एक रानी का जि़क्र आता है, जिसने अपना दाहिना स्‍तन इसलिए कटवा लिया था कि वह पुरुषों के मुक़ाबले ज़्यादा तेज़ी से तीर चला सके--- उसने अपनी कथित/स्त्रियोचित सुंदरता का परित्‍याग कर दिया था.
वर्तमान कविता को अपने रूप, अन्विति, व्‍याकरण, तेवर में सुपाच्‍य स्‍वीकृत-पने को बदलना होगा. उसे वर्तमान और अतीत के पारस्‍परिक-राजनीतिक-पारिवारिक-पारिस्थितिकीय सहवास को नहीं, सहमतियों को संदेह की निगाह से देखना होगा. सहमत लोगों के बीच करुण वृंदगान से विलग हमें असहमत होने की निहायत नई चेन बनानी है. हमारी कविता ढेर सारे शब्‍दों का इस्‍तेमाल करने के बाद भी मूक होने का भान देती है- जैसे टीवी पर म्‍यूट का बटन दब गया हो. उसकी वय और इयत्‍ता को काल-उचित बनाना होगा. बौद्धिकता निजता से नहीं बनती, हमें एक सामूहिक-सामाजिक बौद्धिकता का परिष्‍कार करना होगा. हमारे साहित्यिक समाज को अपरिमेय उपेक्षा से भरे फ़र्स्‍ट हैंड नकार को नकारना होगा. नंबर देने वाली माट्साब ब्रैंड आलोचना तब तक इस कविता को नहीं पकड़ पाएगी, जब तक कि वह अपनी आदतें न सुधार ले. लेकिन कविता पढ़ने और उस पर यक़ीन करने वाले लोग, जो लगातार कम होते जा रहे हैं, उसके साथ खड़े ही रहेंगे.
(यह भारत भूषण अग्रवाल स्‍मृति कविता पुरस्‍कार समारोह के अवसर पर नई दिल्‍ली में 10 सितंबर 2009 को पढ़ा गया वक्‍तव्‍य है. इसका पहला प्रकाशन प्रतिलिपि में हुआ. यहां एक बार फिर. पेंटिंग भोपाल में रहने वाले प्रिय चित्रकार अखिलेश की है.)