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Thursday, June 28, 2012

निशास्‍वर



जाग, दो निद्राओं के बीच का पुल है, जिस पर मैं किसी थके हुए बूढ़े की तरह छड़ी टेकता गुज़र जाता हूं. दिन की किसी ऊंघ में जब यह पुल कमज़ोर होता है, मैं छड़ी की हर थाप पर अपने क़दम रखता हूं. आवाज़ पायदान होती है. पदचाप की ध्‍वनि पैरों के होंठों से निकली सीटी है.

दिन कुछ कंकड़ों की तरह आते हैं. उनका आकार तय नहीं होता. कई बार इतनी दूर बैठकर मैं अपने दिनों को देखता हूं कि भारी चट्टान-से एक दिन को कंकड़ मानने की भूल कर बैठता हूं.

चट्टान की चोट को कितना भी दूर खड़े होकर देखो, कंकड़ की चोट जैसी नहीं दिखेगी. ध्‍यान रखना कि

छल जिन लोगों का बल है, उनकी पेशानी पर ठंडे पानी की पट्टियां रखना. वहां मेरे नाम के बल बुख़ार की तरह पड़ते हैं.

तुम्‍हारा चेहरा जब-जब भी मैं हथेली में थामता हूं, मुझे लगता है, मैं अपनी सारी स्‍मृतियों को अपने प्रेम की अर्घ्‍य दे रहा. तुम मेरे आंसुओं से आचमन करती हो. खिलखिलाते हुए पानी का प्रदेश बन जाती हो.

सारी रात मैं अंधेरे के सिरहाने बैठता हूं और सीली माचिसों को कोसता हूं. इस समय दिन अतीत है. सूरज अतीत की उपस्थिति था. गर्मी अतीत की एक घटना. इस समय इस कमरे में जितनी भी उमस है, वह अतीत की उमस है.

जबकि दिन मैंने अतीत में जाकर नहीं गुज़ारा था.

किसी ने पूछा था, तुम गुनहगार हो, जो तुम्‍हें नींद नहीं आती? गुनहगारों को जागती हुई रातें मिलें, यह उनका अव्‍वल नसीब होगा. जो मुतमईन सोते हैं, वे भी बेगुनाह नहीं हैं.

आंसू में नमक हो न हो, नहीं पता, उनमें गोंद ज़रूर होती है. वह अपनी जीभ की गरम नोंक पर रोपती थी मेरा हर आंसू और आसमान में सितारा बनाकर चिपका देती थी. सितारे टिमटिमाते हैं, क्‍योंकि वे मुझसे नज़रें नहीं मिला पाते. मुझे हर सितारे की कहानी पता है.

चौंधियाना, दृश्‍य को भंग करना है.

छोटे बादलों की ये क़तारें आसमान में पड़ी सिलवटें हैं. मेरी रातें गठरी से बाहर निकले कपड़ों की तरह मुड़ी-तुड़ी हैं. उमस का पसीना श्रम का मख़ौल है.

आत्‍मा इस देह के भीतर उतनी ही अजनबी है
जैसे बड़े शहर के बड़े बाज़ार की बड़ी भीड़ के बीच अजनबी हूं मैं

सुनो, तुम थोड़ा ज़ोर से गाया करो
झींगुर मेरी रातों को धीरे-धीरे कुतर रहे हैं

काजल आंख का सपना है. तुम्‍हारी बाईं आंख से थोड़ा काजल जो फैल गया है, तुम उसकी फि़क्र कभी मत करना. सपनों की कालकोठरी से भला कोई बेदाग़ निकला है?

* * *

एक अनाम रात, जिससे चांद की कलाएं भी नितांत अपरिचित हैं, जिसे पड़ोसन रातें भी नहीं पहचानतीं, रोज़मर्रा की रातों के गुच्‍छे में अचानक उग आई. उस रात के अभिवादन में बुनी गई शब्‍दों की एक देह. साथ लगी पेंटिंग सिद्धार्थ की है. 


Monday, February 27, 2012

मैं समंदर को प्रेम क्‍यों कहता हूं?






photo source : unknown (with apologies)
कल एक मित्र ने पूछा, 'जब भी प्रेम पर लिखते हो, उसमें समंदर ज़रूर आता है. क्‍यों?' 

मैंने कहा, 'पेड़ भी आते हैं. आसमान भी आ ही जाता है.' 

'लेकिन समंदर ज़्यादा आता है.' 

मैंने उसे कुछ कारण बताए. सारे तो मैं बता भी नहीं पाऊंगा. या उनका समय ही नहीं अब. पर समंदर मेरी निजी पसंद है. बहुत सारे लोगों को पसंद है, इसलिए निजता वैसी भी नहीं. कुछ ऐसी है, जैसे हवा सबकी निजी ज़रूरत है, फिर भी जीव होने के कारण मेरी विशेष ज़रूरत भी है. 

पहला कारण तो संभवत: यही है कि मैं मुंबई का हूं, वहीं पला-बढ़ा, वहीं हंसा-रोया. जब बहुत ख़ुश होता, तो समंदर के पास चला जाता. जब बहुत उदास होता, तो समंदर के पास चला जाता. किनारे जब अकेला बैठता, तो समंदर सशरीरी रूप में मेरी बग़ल में आ बैठता. किनारे जब किसी के साथ बैठता, तो समंदर हम दोनों के बीच एक पतली दरार की तरह अंड़स जाता. जिस समय निगाहों के आगे न होता, उसकी तस्‍वीर होती. भयानक चुप्‍िपयों के बीच मैंने समंदर की आवाज़ को स्‍मृति की तरह सुना है. तब से मेरा यक़ीन है कि आवाज़ें गीली होती हैं. 

इस समय भी जब यह लिख रहा हूं, कमरे में सिर्फ़ की-बोर्ड खटक रहा है, बीच-बीच में आदत के मुताबिक़ टाइप करते हुए मैं शब्‍दों को उच्‍चार भी रहा हूं. जैसे यही पंक्ति उच्‍चार कर टाइप की. और कोई बाहरी आवाज़ नहीं है. फिर भी मैं समंदर की गीली आवाज़ को कानों में टपकता पाता हूं. 

मैं अपनी हथेली का स्‍पर्श अपनी ही जीभ से करता हूं. अरब सागर का नमक मेरे स्‍वाद का अभिवादन करता है. 

मुझे तैरना नहीं आता. गहरे पानी से मैं हमेशा ख़ाइफ़ रहता हूं. डूबने के लिए किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं पड़ती. उसे कोई नहीं सिखा सकता, इसलिए वह तैरने से भी ज़्यादा मुश्किल है. 

जितनी बार मैंने समंदर को देखा, पाया, वह सिर्फ़ ऊपर से ही बेज़ार रहता है, लगातार अस्थिर. एक ही दिशा में बार-बार दौड़ता हुआ. उसके भीतर की तस्‍वीरें देखी हैं. निस्‍तब्‍धता है. गहरी शांति. अपूर्व स्थिरता. लहरें गहराई का गुण नहीं. लहरें समंदर की त्‍वचा हैं, शल्‍कयुक्‍त. अस्थिरता आंखों का सुरमा है. चंचलता गहना है. शांति उपलब्धि है. स्थिरता को हमेशा एक अस्थिर चादर की दरकार होती है. लहरें सबकुछ बाहर फेंक देती हैं. गहराई सबकुछ समेट लेती है. 

प्रेम का स्‍वभाव भी कुछ ऐसा ही है. सारी बेचैनी ऊपरी होती है, भीतर कहीं प्रेम की शांति होती है. आप कितना भी लड़ रहे हों, भीतर एक स्थिरता होती है, इस अनुभूति से भरी कि प्रेम है, निश्‍िचत है, तभी यह अस्थिरता है. प्रेम हर चीज़ को लौटा देता है. प्रेम हर चीज़ को गहराई में समेट लेता है. प्रेम निराकार न होता, तो यक़ीनन उसका आकार समंदर जैसा होता. एक अस्थिर स्थिरता. एक स्थिर अस्थिरता. एक स्थिर गति. एक गतिमान स्‍थैर्य. यानी प्रेम. यानी समंदर. 

घंटों समंदर के किनारे अकेले बैठे रहने के बाद उभरने वाली ये अनुभूतियां अब भी साथ चलती हैं. इसीलिए समंदर अब भी साथ चलता है. दृष्टि में नहीं है. स्‍मृति में चलता है. जीवन में आप कितनी भी बुरी स्थिति में हों, प्रेम हमेशा आपके साथ चलेगा. दृष्टि में न चले, स्‍मृति में तो चलेगा ही. 

*
Pic by Diana Catherine
एक और कारण्‍ा है. वह ग्रीक मिथॉलजी से आता है. अफ्रोडाइटी ग्रीक मिथ में प्रेम, सौंदर्य और आनंद की देवी हैं. उसके पिता आसमान (यूरेनस) और मां दिन (दिएस) है. लेकिन वह दिएस से नहीं जन्‍मी थी. वह समंदर से जन्‍मी थी. बहुत सुंदर कथा है. विस्‍तार में नहीं जाऊंगा. यही कि एक द्वंद्व में यूरेनस का जननांग कटकर समंदर में गिर गया. लहरें झाग से भरी हुई थीं. झाग को लातिन में अफ्रोस कहते हैं. उस झाग से एक सुंदर युवती का जन्‍म या अवतरण हुआ. महान सुंदरी. अफ्रोस से निकलने के कारण उसका नाम अफ्रोडाइटी पड़ा. उस महान सुंदरी को प्रेम की देवी कहा गया. इस तरह प्रेम की देवी का जन्‍म समंदर के भीतर से होता है. अफ्रोडाइटी की सुंदरता के कारण युद्ध हुए. ख़ुद उसने कई युद्धों में भाग लिया. ट्रॉय के युद्ध में वह पेरिस के साथ थी. पेरिस के प्रेम ने उस युद्ध को जन्‍म दिया था. 

अफ्रोडाइटी, जिसने जीवन में अनंत बार प्रेम किया. प्रेम की शुद्धि और निष्‍ठा पर विमर्श चलाना सरपंचों का काम है, सहृदय सिर्फ़ उसका प्रेम देखेगा. मैं जब भी किनारे की झाग देखता हूं, मुझे अफ्रोडाइटी याद आती है. मैं झाग से निकलती एक देवी को देखता हूं और पाता हूं कि समय का गुज़र जाना हमारा भ्रम है. वह वहीं रहता है. कहीं नहीं जाता. जैसे हज़ारों साल पुराना वह ग्रीक समय कहीं नहीं गया. वह बांद्रा में बैंड स्‍टैंड के किनारे खड़ा रहता है. वह नरीमन पॉइंट पर खड़े होने पर मरीन ड्राइव के क्‍वीन्‍स नेकलेस की तरह दमकता रहता है. 


ऋग्‍वेद कहता है कि हम सब जल की सं‍तति हैं. हम सब पानी से पैदा हुए हैं. समंदर के पानी से. अफ्रोडाइटी पानी से पैदा होती है. हम सब पानी से पैदा हुए हैं. हम सब अफ्रोडाइटी हैं. अफ्रोडाइटी प्रेम की देवी है. हम सब प्रेम के देव हैं. प्रेम के देवों को समंदर पैदा करता है. प्रेम को समंदर पैदा करता है. फिर क्‍यों न भला समंदर प्रेम का स्‍वामित्‍वबोधी रूपक हो? 

भाषा में मुझे नर-नारायण्‍ा का युग्‍म बड़ा मोहता है. सवाल आस्तिकताओं का नहीं, भाषा का है. नारायण, जिसका व्‍यावहारिक अर्थ विष्‍णु से लिया जाता है, लेकिन इसका शाब्दिक अर्थ है - वह जो पानी पर तैरता हो. जब यह कहा जाता है कि नर ही नारायण है, तो तुरंत मुझे ख़्याल आता है कि नर तो पानी पर तैरते हैं. भले तैरना न भी आए, तब भी. मन आपका सबसे बड़ा तैराक है. देह डुबो दोगे, मन को कैसे डुबोओगे? वह तो तिरता पार निकल जाएगा. डूबने की नई जगह का पता खोज लाएगा. उठो, नई जगह चलो. आप प्रेम में डूबते हैं, लेकिन प्रेम हमेशा तैरता रहता है. सबकुछ समंदर में डूबता है, लेकिन समंदर हमेशा तैरता रहता है. भले कहीं न पहुंचे. इस तरह समंदर ही नारायण है. वह जो पानी पर तैर सके. प्रेम भी यही है. हमेशा तैरता रहता है. भले कहीं न पहुंचे. 

पानी यानी नदी नहीं. जीवन की पहली नदी, (जिसे सही तरह से नदी कह सकते हैं, मुंबइया नाला टाइप नदियों से परे) जब देखी थी, तब तक मैं समंदर के इश्‍क़ में पड़ चुका था. और जब यह विचार आया कि अंतत: सारी नदियां, समंदर के मोह में ही धरातल पर तैरती हैं, तो लगा, मैं तो पहले ही गंतव्‍य में डूबा हूं. मैं नदी से समंदर की तरफ़ नहीं जाता, समंदर से नदियों की तरफ़ आया हूं. मैं उल्‍टे रास्‍तों का यात्री हूं. 

जब मैं ये सारी चीज़ें देखता हूं, तो समंदर को प्रेम से सिल देता हूं. दोनों एक हैं मेरे लिए. मेरी कविता और गद्य के लिए भी. 

पुराने ज़माने से कवियों को समंदर एक रूपक की तरह लुभाता रहा है. मुझे भी लुभाता है. ऐसे समय में मुझे नेरूदा का वह उद्घोष याद आता है, जब उन्‍होंने छद्म प्रयोगवादियों की ओर मुस्‍कान फेंकते हुए कहा था-- The Rose and The Moon are not alien to us. यानी सृष्टि के अंत तक दोनों ही प्रेम के प्रतीक बने रहेंगे, चाहे कितने भी नयेपन का आग्रह हो. 

ऐसे बहुत सारे कारण हैं, जिनके बारे में इत्‍मीनान से लिखूंगा, जिनने मेरे चेतन-अवचेतन में इस तरह के बिंब जिलाए हैं. और मेरे जिन दोस्‍तों को हमेशा यह गुप्‍तरोग रहता है कि तुम विदेशी साहित्‍य से प्रभावित हो, वे हैरत में पड़ जाएंगे कि अधिकांश बातें भारतीय मिथॉलजी से निकलकर आती हैं. 


(डायरी का हिस्‍सा, 21 फ़रवरी 2012)


Wednesday, December 21, 2011

आषाढ़ पानी का घूंट है






तुम्‍हारी परछाईं पर गिरती रहीं बारिश की बूंदें

मेरी देह बजती रही जैसे तुम्‍हारे मकान की टीन
अडोल है मन की बीन

झरती बूंदों का घूंघट था तुम्‍हारे और मेरे बीच
तुम्‍हारा निचला होंठ पल-भर को थरथराया था

तुमने पेड़ पर निशान बनाया
फिर ठीक वहीं एक चोट दाग़ी
प्रेम में निशानचियों का हुनर पैबस्‍त था

तुमने कहा प्रेम करना अभ्‍यास है
मैंने सारी शिकायतें अरब सागर में बहा दीं

धरती को हिचकी आती है
जल से भरा लोटा है आकाश
वह एक-एक कर सारे नाम लेती है
मुझे भूल जाती है
मैं इतना पास था कि कोई यक़ीन ही नहीं कर सकता
जो इतना पास हो वह भी याद कर सकता है

स्‍वांग किसी अंग का नाम नहीं

आषाढ़ पानी का घूंट है
छाती में उगा ठसका है पूस.



Tuesday, October 11, 2011

शाम से आंख में नमी-सी है





ईश्वर के उपवन के सबसे सुंदर पक्षी ने जगजीत के गले को अपने सबसे मुलायम पंख से छुआ था। कश्मीरी कारीगरों की रेशमकला के कई किस्से इतिहास में मिलते हैं। उस कलाकारी को देख जहांगीर ने उसे ईश्वरीय हाथों की बुनावट कही थी। अगर उस कला का आवाज़ में अनुवाद किया जाए, तो निश्चित ही वह जगजीत सिंह की आवाज़ होगी। 

कई गायकों को आप अकेले में सुनते हैं, लेकिन जगजीत आपको भीड़ के बीच भी अकेला कर देते हैं। सत्तर के दशक में महानगरीय आपाधापियों ने जब व्यक्ति के आत्म पर गहरी चोट करना शुरू कर दिया था, उसी दौरान उनकी आवाज़ रेशमी सुकून की तरह हमने अपने कानों में पहनी थी। मुंबई की ठसाठस भरी लोकल ट्रेन में जब कोई मोबाइल या आईपॉड का ईयरफोन कानों में खोंस उन्हें सुन रहा होता है, तो जगजीत उसे उस भीड़ से बाहर ले जाते हैं, एक नितांत निजी आत्म के क्षेत्र में खड़ा करते हैं। जिस अवस्था को आप घंटों की विपश्यना से प्राप्त करते हैं, उसी अवस्था को जगजीत अपनी आवाज़ में बुनी एक ग़ज़ल से उपलब्ध करा देते हैं। यह उनकी आवाज़ का वैभव है, जो एक साथ प्रेम, पीड़ा, उम्मीद, प्रतीक्षा और यक़ीन की अटल मीनारें आपके भीतर खड़ा करता है। जाने कितने होंगे, जिन्होंने प्रेम के अपने अनुभवों को जगजीत की आवाज़ में व्यक्त होते पाया होगा। महानतम प्रेमी मजनूं अगर अपनी दीवानगी को गाकर व्यक्त करता, तो वह जगजीत की ही आवाज़ होती।  जैसे महानतम शायर ग़ालिब जगजीत की आवाज़ में फबे। 


वह एक विनम्र और सकुचाई हुई आवाज़ थी। प्रेम से ज़्यादा संकोची कुछ नहीं होता। उसकी सांद्रता होंठों की बुदबुदाहट से ज़ाहिर होती है, चीख़ने से नहीं। जगजीत की आवाज़ में वह दर्द है, जो दबे पांव आता है, शोर नहीं करता और आपसे ख़ुद पर उस एतबार की मांग करता है, जो यह बता सके कि आपका रुदन बेआवाज़ होगा। वह होंठों के आधे खुलने पर निकली अनमनी-सी आवाज़ है, जो सबसे पहले मन को ही बांधती है। मन का पौधा शांति में उगता है। जगजीत की आवाज़ शांति की सिंचाई है। वह शास्त्रीयताओं के तने पर सुगमता की क़लम लगाते हैं और दिल को छू जाने वाली मख़मली सरलता और तरलता का गुलाब उगाते हैं।

वह विवशता के गायक हैं। उस विवशता के गायक, जिसमें यह हुनर है कि वह पराए दर्द को अपना बना ले। उसी तरह जैसे फुटपाथ पर बैठ अकेली रोती हुई स्त्री को हम कातरता से देखते हैं, घर लौटते हैं, तो पाते हैं कि हमारी विवशता के भी हाथ होते हैं, और उसने अपने हाथों में उस स्त्री का चेहरा थाम रखा है। वह स्त्री वहीं छूट गई है, लेकिन उसका रुदन हमारे साथ चला आया है। हमारे अकेलेपन में वह हमारे होने को परिभाषित करता है। जगजीत की आवाज़ उसी तरह हमारे होने की परिभाषा है।

कलाकार ईश्वर की सबसे प्यारी संतान होता है। हे ईश्वर! तुम जब भी अपनी बनाई दुनिया के तमाम दंद-फंद से कुछ पलों के लिए अलग होकर अकेले होना चाहते होगे, अपने आत्म के सबसे क़रीब बैठना चाहते होगे, मुझे यक़ीन है, उस समय तुम जगजीत सिंह को सुनते होगे। ईश्वर! अपनी आत्मा पर लगी हुई हर खुरच को तुम जगजीत की आवाज़ के मख़मल से पोंछा करते होगे। मुझे यक़ीन है।

(11 अक्‍टूबर को दैनिक भास्‍कर में प्रका‍शित)

Monday, June 13, 2011

कुछ कांच हैं, कोई आईना...






Iwona Siwek Front. Krakow. Poland.
कुछ इंसान कांच की तरह होते हैं। उनके सामने खड़े हो जाएं, तो उनके पार का सब कुछ दिखाई देता है। पारदर्शिता का चरम है यह।

और कुछ लोग आईने की तरह होते हैं। उनके सामने खड़े हों, तो पार का कुछ नहीं दिखता। जो दिखता है, वह आपका ही प्रतिबिंब होता है।

दोनों का मूल तत्व कांच ही होता है, लेकिन वे अपने व्यक्तित्व के साथ कुछ ऐसे प्रयोग कर लेते हैं, कि उनका व्यवहार बदल जाता है। हम अक्सर उन लोगों का खोज रहे होते हैं, जिनके पार का सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा हो। हम अपनी छवि से सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं, आईने में खुद को देखना पसंद भी करते हैं, लेकिन बोलता हुआ आईना तकलीफदेह स्थितियों में डाल देता है। इसलिए संभव है कि ज्यादातर लोग उन लोगों से दूर भागते हैं, जो उनके लिए आईने जैसा काम करते हों। 

दोनों श्रेणियों में से श्रेष्ठ कौन है, यह सब तो देखने वाले की मन:स्थिति और उद्देश्य के हिसाब से बदलता रहता है।  एक ऐसा व्यक्ति, जो आपकी नज़र को दूर तक यात्रा करने का मौक़ा दे और दूसरा व्यक्ति जो आपकी नजरों को परावर्तित कर दे, उसे वापस आप ही तक भेज दे!

जीवन में कुछ स्थितियां ऐसी आती हैं, जब आपको आईने जैसे लोग पसंद आते हैं। वह महत्वपूर्ण समय अपनी खोज का होता है। कुछ कहानियों में या प्रेरक प्रसंगों में पढ़ा है कि फलां व्यक्ति ने मुझे बताया कि मैं क्या चीज़ हूं, अगर वह नहीं होता, तो मुझे कभी पता ही नहीं चलता कि मेरे भीतर कितनी संभावनाएं थीं। यानी किसी एक व्यक्ति ने उनके जीवन में आईने का काम किया। आपको अपने जीवन में ऐसे ज्यादा लोग नहीं मिल सकते। पर जब भी मिलेंगे, वे आपको ख़ुद को पहचानने में मददगार साबित होंगे।

कांच की तरह पारदर्शी लोग आपको हर जगह मिलेंगे। दरअसल, उनका होना भी आपके लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि जैसे, आईने आपको बताते हैं कि आप क्या हैं, उसी तरह कांच आपको बताते हैं कि दुनिया क्या है। जब आप उनके सामने खड़े होते हैं, तो उनके पार एक पूरी दुनिया दिख रही होती है। उसमें अच्छा-बुरा, सही-गलत सब होता है। वे एक दृश्य बनाते हैं। उस दृश्य में उसका पूरा अब तक का सफर होता है, जीवन के वे हर पहलू होते हैं, जिन्हें आप उसके ज़रिए देख रहे होते हैं।

जिंदगी सवालों की आकाशगंगा है, लेकिन दो ही सवाल ऐसे होते हैं, जिनके भीतर हर जवाब की चाभी छुपी होती है। पहला सवाल है- मैं क्या हूं? और दूसरा सवाल है- जो मैं नहीं हूं, वह क्या है? यानी मेरे इतर जो भी कुछ मेरी दृष्टि के दायरे में आ रहा है, वह सब क्या है? पहले सवाल का जवाब आपको आईने जैसा व्यक्ति देगा। दूसरे सवाल का जवाब आपको कांच जैसे व्यक्ति के पार देखने पर पता चलेगा। हालांकि पार के उस दृश्य में आपको जो भी दिख रहा होगा, उसे पढऩे की क़ूवत आपको आईने जैसे व्यक्ति से ही मिलेगी।

यानी दूसरे जवाब को पाने का रास्ता भी वही बताएगा, जिसने आपको पहले का जवाब दिया है। बस, दृश्य कोई और उपस्थित करेगा। अगर आपको पहले सवाल का जवाब नहीं पता, तो दूसरे का जवाब कभी नहीं पता चलेगा। आप अंधकार को तभी पहचान सकते हैं, जब आपने प्रकाश का अनुभव किया हो। वरना सारी दुनिया तो एक जैसी ही है। हमारी प्रवृत्ति होती है कि हम पहले सवाल से भागते हैं और दूसरे सवाल का जवाब तुरंत पा लेना चाहते हैं। दूसरे सवाल का जवाब आपको भौतिक जगत में तुरंत बड़ी सफलता दे देता है, इसीलिए अगर उसकी ओर आकर्षण ज्यादा हो, तो स्वाभाविक ही है। अगर कोई हमें यह अहसास करा दे कि हम क्या हैं, तो हम उससे विमुख होने लगते हैं। इसीलिए हम आईनों से दूर भागते हैं और पारदर्शी कांच के पार देख लेने का हुनर तुरंत अपने भीतर पैदा कर लेना चाहते हैं। खुद को समझने और जिंदगी को समझने की राह में इससे बड़ी भूल कोई और हो सकती है क्या? अब आप ही बताइए।

(2 अप्रैल 2011 को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित.)



Thursday, May 19, 2011

नेह-नृत्य






जब कोई नाचता है, तो उसके भीतर क्या नाचता है? बुल्ला कहता था, उसकी देह कभी नहीं नाचती, नाचती तो रूह है। जैसे पृथ्वी के भीतर समंदर नाच पड़े, तो पृथ्वी भी तो नाचती हुई ही जान पड़ेगी। सो भीतर का नाच ही बाहर का नाच होता है। शकीरा को नाचते हुए देखें, तो लगता है कि मुर्शद को मनाने वाला बुल्ला नाच रहा है, शम्स के सामने रूमी नाच रहा है, स्कार्फ हिलाकर जीवन के तमाम अबूझ का अभिवादन करती इज़ाडोरा डंकन नाच रही है, थोड़ा-सा तुम नाच रही हो, थोड़ा-सा मैं नाच रहा हूं। एक देह में कितने सारे लोग लोग नाच रहे हैं। यह देह का नहीं, नेह का नृत्य है। नाचती देह है, नचाता नेह है।


दुनिया के सारे नेह को इकठ्ठा  किया जाए, एक जगह रख दिया जाए, तो वह उतना ही होगा, जितना एक व्यक्ति के भीतर होता है। यानी एक के भीतर का नेह, सारी दुनिया में समाए नेह जितना होता है। इसीलिए उसके नेह से हम इतनी जल्दी जुड़ जाते हैं। नेह में क्षिप्त होकर किया गया नृत्य इसीलिए कदमों को ताल की सौगात देने से रोक नहीं पाता। संभव है कि यह किसी व्यक्ति के लिए किया गया नेह न हो, बल्कि अ-व्यक्ति के लिए हो। जो व्यक्त है, वह व्यक्ति है। अ-व्यक्त भी बहुधा व्यक्ति ही है। नृत्य का नेह अ-व्यक्त के व्यक्ति बन जाने का नेह है। बुल्ला को तब तक यह पता नहीं था कि उसके भीतर का अ-व्यक्त क्या है, जब तक कि उसने नृत्य न किया। वह नाचा, इसीलिए वह अपने भीतर छिपे हुए खुद को जान पाया।


आप कितना भी प्रेम में डूबे हुए हों, हर समय आपके भीतर एक शख्स ऐसा रहता है, जिसे आप नहीं जानते। आप न तो खुद के सामने और न ही किसी और के सामने, उसे व्यक्त कर पाते हैं। उसके सामने भी नहीं, जो पूरी तरह व्यक्त और व्यक्ति बनकर आपके जीवन में बैठा हुआ है। यही अ-व्यक्ति प्रेम को बढ़ाते रहने का काम करता है। आप एक व्यक्ति से प्रेम कर रहे होते हैं, उसी के साथ-साथ एक अ-व्यक्ति से भी प्रेम कर रहे होते हैं। 


'इश्क दी नवियों नवी बहारमें बुल्ला कहता है कि हीर को रांझा मिल गया, फिर भी हीर खोई-खोई रहती है, वह रांझा को अपने भीतर खोजती रहती है। उसे सुध ही नहीं है कि रांझा उसके ठीक पास है। अगर व्यक्ति रांझा ठीक पास है, तो हीर किसमें खोई हुई है? कीनन, रांझा के अ-व्यक्ति में। यानी वह रांझा के उस हिस्से में खोई हुई है, जो अभी तक हीर की देह पर, आत्मा पर व्यक्त नहीं हुआ है। यानी रांझा या प्रेम की महा-कल्पना, जो रांझा की हकीकत से कहीं आगे हैं, उससे कहीं विशाल है। शाम के समय पडऩे वाली परछाईं की तरह, जिसमें वस्तु तो बहुत छोटी होती है, लेकिन जब रोशनी के बीच आती है, तो वस्तु के आकार से कई गुना लंबी परछाईं बना देती है। इसमें ज़ोर रोशनी पर है। भीतर की रोशनी अ-व्यक्त की एक विशालकाय परछाईं का निर्माण करती है।


तो हीर एक साथ दो से प्रेम करती जान पड़ती है- अपने जीवन में रांझा की व्यक्त उपस्थिति से और अपने मन में रांझा की अ-व्यक्त उपस्थिति से भी। यही अ-व्यक्त उपस्थिति ही प्रेम की उसकी प्यास और तलाश है। यह उसके जीवन से प्रेम को कभी समाप्त नहीं होने देगी। यह मन ही मन किया गया प्रेम हीर को नचाता है। यही बुल्ला को नचा देता है। यही रूमी को, मीरा को, यही माइकल जैक्सन, शकीरा और डंकन को भी। अ-व्यक्त से प्रेम के बिना कोई नृत्य संभव ही नहीं। इन सबमें अ-व्यक्त प्रेम, नेह के झरने की तरह रहता होगा।


 माइकल की डायरी का एक हिस्सा याद आता है- 'महाचेतना हमेशा सृजन के ज़रिए $खुद को अभिव्यक्त करती है। यह दुनिया विधाता का नृत्य है। नर्तक आते हैं, चले जाते हैं, लेकिन नृत्य हमेशा रहता है। जब मैं नाचता हूं, तो लगता है, कोई बहुत पवित्र चीज़ मुझे छूकर गुजरी है। मेरी आत्मा बहुत हल्की हो जाती है। लगता है, मैं ही चांद और सितारे हूं। मैं ही मुहब्बत हूं, मैं ही महबूब हूं। मैं ही मालिक हूं, मैं ही गुलाम हूं। मैं ही ज्ञान हूं और ज्ञानी भी मैं ही हूं। मैं नाचता जाता हूं और एक समय सृष्टि का शाश्वत नृत्य बन जाता हूं। सर्जक और सृष्टि आनंद के ऐक्य में विलुप्त हो जाते हैं। तब भी जो बचता है, वह सिर्फ नृत्य होता है।


यही नृत्य है, तो प्रेम भी यही है। यह जो नृत्य है, वही देह के भीतर नेह बनकर रहता है। प्रेम व्यक्त से ज्यादा अ-व्यक्त में वास करता है। इसीलिए तो आप कभी नहीं बता पाते कि प्रेम है, तो कितना है? बस, बहुत है। बहुत मतलब बहुत।



Tuesday, May 3, 2011

प्रेम, कविता और शोपां





शोपां पियानो
18 जनवरी 2010
मोत्सार्ट के संगीत के बारे में कई विद्वानों का कहना है कि यह बहुत सोच-समझकर रचा गया संगीत है, दिमाग की सारी जटिलताओं को रूपायित करता हुआ; वहीं बीथोफन के संगीत के बारे में राय अलग है- कहा जाता है, वह संगीत बीथोफन के दिल से निकलता है और सीधे सुनने वालों के दिलों में समा जाता है। मुझे लगता है- बीथोफन का दिल जब आखिरी बार धड़का होगा, तब उसने थोड़ा-सा रक्त बरसों बाद आने वाले शोपां के दिल को नज़र किया होगा। शोपां को, देर रात, देर तक सुनने के बाद ऐसा ही महसूस होता है।

रूबीन्स्टीन का पियानो, शोपां का नॉक्टर्न। अगर श्रीकृष्ण ने बांसुरी के वेस्टर्न नोट्स बनाए होते, तो वे शोपां के नॉक्टर्न की तरह ही होते। (यह ख्याल ही कितना एब्सर्ड है कि बांसुरी को पियानो के नोट्स पर बजाया जाए।) 

नॉक्टर्न यानी रात के समय बजने वाला संगीत। अंधेरे में डूबा हुआ एक बगीचा। पत्तों की आवाज़ से हवा के चलने को महसूस करना। ज़मीन पर तारों की परछाईं देखना और आसमान में जो आकृतियां बनी हों, उन्हें ज़मीन पर उगे पेड़-बूटों की परछाईं की तरह महसूस करना। जब पैदल चलना, तो पत्तों की खदड़-खदड़ आवाज़ आना। कोई भी आवाज़ आने से पहले खुद को श्श्श्श् कहकर चुप करा देती है। वहीं बगीचे में थोड़ी सी गुंजाइश खोज लेना कि एक समंदर भी बन जाए। उसकी आवाज़ के भीतर उतरना। उसमें मिली एक-एक नदी को रेशे-रेशे की तरह अलग करना। उन्हें पहचाने बिना उन्हें फिर एक-दूसरे में मिला देना। वहीं एक टापू बना लेना और उसमें अकेले होने के विरुद्ध आवाज़ का एक बूटा रोपना। 

ये शोपां है।
मैं तुम्हारे पास हूं। तुम्हारी हथेली में उगली फंसाए।
तुम सबके पास हो।
पर मैं सबके पास नहीं
सिर्फ तुम्हारे पास हूं।
यही शोपां है।

वह बीजगणित के ‘माना कि एक्स बराबर वाय' को नकार देता है और बताता है कि अनुभूति और संगीत का कोई सिद्धांत नहीं होता। जो संगीत में भी सिद्धांतों और व्याकरणों का पालन करते हैं, वे दरअसल, किसी भी नए से घबराते हैं, वे पुराने से भी आतंकित हैं, वे मेड़ों से बंधे खेत में अनंत की खोज करते हैं।

नियमों को तोडऩा बहुधा एक नया नियम बन जाया करता है।

शोपां इससे दूर रहना सिखाता है।

‘मैंने अपने लिए नए नियम बनाए' यह कहने से बेहतर है यह कहना, ‘मैंने नियमों को ध्वस्त कर दिया और खुद को भी नियमों से आज़ाद रखा।'

शोपां अराजक नहीं है। बहुत अनुशासित और मापा हुआ है, फिर भी उसमें वह बनैलापन है, जो आपको उसके अनुशासन पर यकीन नहीं करने देता। 

दो परस्पर विरोधी चीज़ों को साध लेने वाले कलाकार हमेशा मुझे आकर्षित करते हैं।

कई बार मुझे लगता है कि यह दक्षिणोत्तर जैसी किसी नई दिशा की तलाश कर लेने जैसा है।

दो सौ साल पहले उसे पोलैंड से भागना पड़ा था। वह पेरिस में रहा। सारा संगीत उसने वहीं रचा। पर उसका दिल लगातार पोलैंड के लिए धड़कता। उसने कहा कि जब मैं मर जाऊं, तो मेरे दिल को मेरे शरीर से निकाल लेना और उसे पोलैंड में दफनाना। 39 साल की उम्र में जब वह मरा, तो उसकी इच्छा का सम्मान किया गया। उसका शरीर पेरिस में दफनाया गया, लेकिन उसका दिल निकालकर पोलैंड ले जाया गया। वह वहां दफन हुआ।

उस दिल से ऐसा संगीत न निकलता, तो कैसा निकलता? वह इस ख्याल को भी कितने म्यूज़िकल तरीके से खारिज करता है कि वह तब तक ही सुना जाएगा, जब तक वह गूंज रहा है।





21 जनवरी 2010
शोपां को सुनना सिर्फ शोपां को सुनना होता है। मोत्जार्ट को आप दूर बैठकर सुन सकते हैं, बीथोफन को सुनते हुए आप खुद ही धीरे-धीरे हर किस्म की ध्वनि से दूर होते जाते हैं। शोपां को मैं दूर से नहीं सुन पाता। उसमें इतनी बारीकियां हैं, इतनी छोटी-छोटी हरकतें हैं कि उसकी आवाज़ के पास अपने कान ले जाने होते हैं। इसीलिए मैं उसके लिए हेडफोन लगाता हूं। मैं उसका हर स्वर कानों से सुनना चाहता हूं। पहले कान सुनें, फिर वे तरंगें देह और आत्मा से लिपटें। संगीत अंग से भी ग्रहण होता है और अनंग से भी। 

शिव ने कामदेव को भस्म कर अनंग बना दिया था- वह विदेह हो गया था। फिर भी पार्वती जब भी संगीत बजाती थीं, वे दोनों महसूस करते थे कि अनंग कहीं पास ही है। देह खोने के बाद भी अनंग ने अपना व्यवहार नहीं खोया था। वह कैलाश के आसपास ही भटकता था। इसीलिए पार्वती को उस पर रहम आया था और वह शिव से आग्रह करती रहीं कि वह कामदेव के अनंग-शाप को वापस ले लें। पर शिव कहते, वह अनंग है, इसीलिए मनोज है। इसीलिए वह हर अंग का ओज है। वह विदेह है, इसीलिए हर देह से संयुक्त है।
कई बार मुझे लगता है कि पुराणों में जरूर कोई कथा ऐसी भी होगी, जिसमें संगीत को सशरीर उपस्थिति कहा गया होगा। और किसी शाप में उसने भी अपना रूप खो दिया होगा। जैसे कामदेव ने खोया, जैसे दक्ष ने खोया, जैसे शारंग ने खोया, जैसे आठों चिरंजीवियों ने खो दिया। हालांकि मैं अभी तक ऐसी किसी कथा तक नहीं पहुंच पाया हूं।

संगीत भी अनंग है, इसीलिए हर अंग में उसकी व्याप्ति है। पर मैं उसकी व्याप्ति को दिशा देना चाहता हूं। क्यों? मैं उसे एक मार्ग दिखाना चाहता हूं कि तुम यहां से प्रविष्ट हो और यहां जाओ। संगीत कभी आज्ञा नहीं मानता। और ग्राहक यानी उसे ग्रहण करने वाला अपनी पद्धति से बाहर नहीं निकलता।

इतालवी में प्रेम की एक परिकल्पना है, जिसे 'फीनो अमोरे' कहा जाता है यानी संपूर्ण प्रेम। यह दान्ते अलीगियेरी की रचनाओं से आया। ऐसा प्रेम, जिसमें शरीर का कोई अर्थ नहीं होता, अभिव्यक्ति और स्मृति का भी कोई अर्थ नहीं होता। आप जिससे प्रेम करते हैं, संभव है कि उसे आपने कभी देखा भी न हो, उससे कुरबत तो दूर की चीज़ है। न उससे बातें की हों, न ही कोई व्यवहार। पर उससे प्रेम करते हों। वह एक उपस्थिति हो, किंतु आपके भीतर। यह सिर्फ मन में किया जाने वाला प्रेम है। बाहर उसकी अभिव्यक्ति कैसे भी संभव है, लेकिन इसकी मौजूदगी केवल आपके भीतर है। यह प्रेम को भक्ति भी बना देता है। अपने यहां मीरा के रूप में ऐसे प्रेम का उदाहरण है।

संगीत से किया जाने वाला प्रेम फीनो अमोरे ही होता होगा। यह सिर्फ आपके भीतर रहता है। आप संगीत की देह को नहीं छू पाते, लेकिन वह आपकी आत्मा और देह को छूता रहता है। शोपां इसी तरह एक अनुपस्थित उपस्थिति में आता है। बहुत बारीक स्वरों, हल्की बुनावटों, छोटे-छोटे वाल्ट्ज और मादक नाक्टर्न्‍स में। उसे लोग 'पियानो का कवि' कहते हैं। बहुत ज्यादा चीजों का इस्तेमाल नहीं करता। प्रेम भी शायद ऐसा ही होता है। बजने के लिए ज्यादा साजों का प्रयोग नहीं करता। एक अकेली तान से ही बड़ा ऑर्केस्ट्रा खड़ा कर देता है। अकेली तान वाला ऑर्केस्ट्रा। उसी तरह कविता को भी दूरी से नहीं समझा जा सकता। आपको उसे समझने के लिए, उसके बहुत करीब, झुककर, निहुरकर जाना होता है। उसमें भी अकेली तान से बड़ा ऑर्केस्ट्रा बनता है। शोपां के पास भी इसी तरह जाना होता है। झुककर, निहुरकर, बहुत करीब। प्रेम, कविता और शोपां- तीनों एक ही गोत्र से निकले होंगे।

(मेरी डायरी के हिस्‍से. पहला हिस्‍सा कथादेश अक्‍टूबर '10 में 
और दूसरा हिस्‍सा दैनिक भास्‍कर में 3 मई '11 को प्रकाशित.) 



Saturday, February 26, 2011

अलौट व अन्‍य कविता






Photo- Ana Himes

अलौट

अब कभी तुम उतनी मासूम नहीं दिख सकोगी, जितनी पंद्रह साल पहले की एक तस्‍वीर में
हमारे चेहरे की, और दिल की भी, मासूमियत सुखा देने के लिए कम नहीं होता एक पल भी
परिभाषा बदलकर सुंदरता को फिर पाया जा सकता है
मासूमियत को तो किसी पड़ोसी समार्थी तक से भय नहीं होता
इतनी निश्चिंत होती है कि जानती है जाने के बाद लौटकर आना नहीं इस देस


अस्थिरता की आराधना

जिस वक़्त वह जा रही थी, मैं अपनी टेबल पर बैठा एक कविता में खोया हुआ था। अभी-अभी मैं जिन सारी अस्थिरताओं से गुज़रा हूं, उन्हें इस कविता में पकड़ लेना चाहता हूं, इससे पहले कि वे सब उड़ जाएं। ऐसा मेरे साथ कई बार हुआ है। सोचता हूं कि इसे याद रखूंगा, स्थिर होते ही यह सब लिख डालूंगा। वे सारी स्मृतियां अस्थिरता की होती हैं। और उन्हें अभिशाप है कि स्थिर होते ही वे कपूर की तरह उड़ जाती हैं। सो, जब भी मैं उन्हें लिखने बैठता, वे खो चुकी होतीं। 

अब मैंने स्थिरता की प्रतीक्षा बंद कर दी है। मैं अस्थिरता की आराधना में डूब जाता हूं। पता नहीं, वह कौन-सा शब्द था, जिसे मैं लिख रहा था, तभी उसने कहा, 

मेरे कवि प्रेमी, एक दिन मैं तुम्हारी एक कविता बन जाऊंगी, तुम्हें हज़ार किस्म की दिक़्क़तों में डालूंगी, तुम तड़पकर उसे लिखोगे, और उस दिन तुम्हें मेरी क़ीमत का अहसास होगा।

जब वह दरवाज़े से बाहर निकल रही थी, मैं उसी तरह बेचैन हो रहा था, जैसे स्थिर क्षणों के बीच अस्थिर स्मृतियों के खो जाने और उन्हें काग़ज़ पर न लिख पाने के अफ़सोस के बीच बेचैन रहता था।


Sunday, February 20, 2011

फास्‍ट बॉलर







Usha Shantharam- Gully cricket

दफ़्तर के बाहर उन लड़कों को क्रिकेट खेलते देख मन लहक गया. रविवार का दिन था और पूरी सड़क खाली थी. आठ-दस लड़के थे और हर रविवार को यहाँ खेलते. मैं पिलर के पास खड़ा सिगरेट पीता उन्हें देखता रहता. हर बार सोचता कि जाकर पूछूं, मैं भी खेलूँ क्या? पर कभी नहीं हो पाया. एक बॉल ढुलकती हुई मेरे पास आई, उन्होंने अंकल-अंकल कहकर बॉल के लिए आवाज़ लगाई और मैं उनके साथ चला गया. फील्डिंग के लिए खड़ा होने पर मुझे बहुत शर्म आ रही थी. ऑफ़िस वाले देख रहे होंगे.
जब मेरी बैटिंग की बारी आई, तो एक लड़का चिल्लाया, ‘अंकल को स्लो फेंकना.’ मैं मुस्करा दिया. इनकी तो आईला… बॉलीच गुम कर दूंगा. बॉल बीच में टप्पा खाई और कमर तक आई. बहुत नज़ाकत के साथ मैंने उसे टिक किया. बैट की मीठी आवाज़ गूंजी और मेरे पूरे हाथ में झनझनाहट फैल गई. अगली गेंद मैंने उसके सिर से उछाल दी. उसकी तीसरी गेंद बहुत तेज़ आई और ऑफ़ में निकल गई. और चौथी गेंद सीधे मेरे दाहिने हाथ पर कलाई से चार इंच ऊपर आ लगी. दर्द से आंखों में पानी आ गया और सामने सब कुछ धुंधला पड़ गया. बैट फेंककर किनारे हो गया. बॉल ठीक उसी जगह लगी थी, जहां एक साल पहले हाथ का ऑपरेशन हुआ था. ठीक टांकों के ऊपर. पूरे हाथ में झनझनाहट. कान में सांय-सांय. हाथ लाल हो गया था, सूजन बढ़ रही थी. मैं वापस अंदर आ गया. क्रीम मंगाकर मलने लगा.
मुझे लगा, मैंने बरसों बाद बैट उठाया है, पर ऐसा नहीं था. छह साल पहले मैंने आख़िरी बार क्रिकेट खेला था. क्रिकेट के साथ मेरी बेशुमार स्मृतियां जुड़ी हैं, लेकिन कुछ ऐसी हैं, जो अक्सर लौट आती हैं. जब भी किसी बॉलर को विकेट लेने पर ख़ुशी ज़ाहिर करते देखता हूं, तो मुझे अपना ख़ुश हो जाना याद आ जाता है. मैं मुख्यतः बॉलर था और जिस तरह पहली हैट ट्रिक ली थी, वह अब भी याद आती है. क्रिकेट से जुड़ी ये सारी स्मृतियां किसी प्रतीक की तरह हैं, जो जीवन की अगली बातों का एक कूट हैं, जिन्हें तोड़ने का कोई तरीक़ा अभी तक नहीं आया. उस समय मेरी इनस्विंगर सटाक से निकलती थी, जांघ को छूती हुई और डांडी उड़ा जाती थी. अब मैं कुर्सी पर बैठा काम करता हूँ और पता नहीं, कहाँ से, कोई अदृश्य इनस्विंगर आती है और बैठे-बैठे मुझे आउट कर जाती है.
अपने ग्रुप में छोटा-मोटा मैच तो पहले भी खेला करता था, लेकिन वह पहला मौक़ा था, जब बड़ों के बीच खेला. तब मैं सातवीं में पढ़ता था. मैदान में दो टीमें थीं और दूसरी टीम में एक खिलाड़ी कम था. बेदी का भाई होने के कारण मुझे जगह मिल गई. बेदी राइवल टीम में था. मैं उससे बहुत डरता था, उसकी बॉलिंग से भी. छोटी-सी बात पर भी बीच मैदान कनटाप बजा देना उसकी आदत थी. मैं रुआंसा भगवंती नवाणी स्टेज पर बैठ जाता और कबूतरों की सूख गई शिट गिना करता.
पंद्रह ओवरों का मैच था. मुझे आठवें नंबर पर भेजा गया. छह-सात गेंदें बची होंगी तब. मैं सबसे छोटा था. वे बड़े, ऊंचे और खूंख़ार दिखते लड़के थे. उनमें से कई ऐसे थे, जिन्हें बुरा बच्चा माना जाता था और उनके साथ देख लेने पर घर में सज़ा मिल जाने का ख़तरा होता.
मुझे याद है, मैं क्रीज़ पर खड़ा हुआ, तो हमारी टीम के दो लड़कों ने मेरी पोजीशन ठीक की. एक मेरे पीछे खड़ा हो गया, बार-बार समझाते हुए कि सिर्फ़ टच करना है, एक रन लेना है और दौड़ना नहीं है, क्योंकि वह मेरा रनर है, वह दौड़ेगा. उसने गेंद फेंकी, मैंने बैट धीरे से हिलाया. टच ही तो करना था. वह फुलटॉस थी. जब वह दौड़ रहा था, तो उसे बहुत ध्यान से देखा था. उसके हाथ से छूटते समय भी बॉल दिखी थी. बीच में कब ग़ायब हो गई और कब सारे लड़के शोर करने लगे, मेरी समझ में नहीं आया. पलटकर देखा, तीनों डंडे जगह छोड़ चुके थे. मैं अवाक्‌, रोने के किनारे खड़ा था.
मेरे रनर ने मुझसे बैट लेते हुए कहा, ‘क्यों रे, तू बेदी का भाई है… और फुलटॉस पे बोल्ड?’
मनीष नाम का बॉलर जिसके बाल जॉन बॉन जॉवी की तरह थे और जो जेसन डोनोवन के गाने, ख़ासकर ‘अनदर नाइट’, दिल से गाता था, उसने मेरे सिर पर हाथ फिराया. मैं रोना रोकता पेड़ के नीचे जा बैठा. इनिंग्स बदलने पर मैं उनसे बार-बार बॉलिंग के लिए कहता रहा, पर किसी ने नहीं दिया. मैं खाड़ाभर्ती था यानी उन्होंने सिर्फ़ ग्यारह का नंबर पूरा करने के लिए मुझे रखा था.
बेदी और उसके दोस्त धमाधम कूट रहे थे. मैं हर ओवर के बाद उनसे बॉल मांगता और वे झिड़क देते. बहुत देर बाद अचानक उन्होंने खुद बॉल पकड़ा दी, ‘चल, लास्ट ओवर है, वो लोग ऑलमोस्ट मैच जीत गए हैं, तू कर ले बॉलिंग’ वाले अंदाज़ में. मुझे अब यह याद नहीं, कितने रन बने थे, क्या आंकड़े थे, पर वह इंप्रेशन याद है. गेंद फेंकते समय अपना उछलना और माइकल होल्डिंग वाली स्टाइल में फेंकने से ठीक पहले हाथ को एक ख़ास तरीक़े से झटका देना याद है. बेदी नॉन-स्ट्राइक पर था, सामने कोई और. मैं बहुत लंबे रन-अप के साथ आया और पहली गेंद इनस्विंग. सीधे उसकी जांघ में जा घुसी. वह जिस तरह सहला रहा था, पता चल जाता कि बॉल रापचिक तेज़ी से घुसी होगी. दूसरी गेंद फिर इनस्विंग. और इस बार बीच में जांघ नहीं आई. गिल्ली उड़ गई. क्या चीख़ा था मैं… किसी को भी उस बोल्ड होने पर यक़ीन नहीं हुआ. अगली बॉल डालने से पहले मैंने अज़हरुद्दीन के अंदाज़ में कॉलर खड़े कर लिए. अगली गेंद शायद मेरी स्मृति की सर्वश्रेष्ठ यॉर्कर थी, मुझे उस बैट्‌समैन का लड़खड़ाकर गिरना अब तक याद है. तीनों डंडे ज़मीन पर बिखर गए थे. मैं हमेशा चाहता रहा कि एक ऐसी गेंद डालूं, जिससे स्टंप दो टुकड़े हो जाए और गुलांटी खाता हुआ कीपर से पीछे जा गिरे. वह गेंद मेरी हथेली में रहती है, मुझे पता है, लेकिन इस जीवन में वह उंगलियों की क़ैद से बाहर नहीं निकली.
मैंने दो गेंद पर दो विकेट ले ली थी और सारे फील्डर हैटट्रिक-हैटट्रिक चिल्लाने लगे.
दर्शक बमुश्किल बीस-पचीस थे, जो अमूमन उदासीन रहते. मैदान से गुज़रते वक़्त कुछ देर खड़े होकर खेल देख लेते या कोई काम न होने पर वहीं बैठ जाते. वे कभी तालियां नहीं बजाते थे. कभी यह पता नहीं चलता था कि वे किस टीम की तरफ़ से मैच देख रहे हैं.
फिर भी मुझे महसूस हो रहा था कि पूरा स्टेडियम चिल्ला रहा है मेरे लिए. मैंने वापस अपने कॉलर नीचे कर लिए. अब मेरा हाथ कांप रहा था और हांफ बढ़ रही थी. मैंने एक और लंबा रन-अप लिया. जब दौड़ रहा था, तो ख़ुद को लग रहा था कि मैं एक ट्रेन हूँ, जिसके मुँह से आग निकल रही है. इस वक़्त मुझे ‘मुंबई एक्सप्रेस’ का नाम दिया जाना चाहिए. अंपायर के पास मैं उछला, हवा में होल्डिंग की तरह हाथ लहराया और झटक दिया. बॉडीलाइन सीरिज़ में वह बॉलर पिच पर सिक्का रखकर उस पर गेंद डालने का अभ्यास करता था. मुझे पिच पर पड़ा सिक्का साफ़ दिख रहा था. उसके बाद मुझे बॉल नहीं दिखी, सिर्फ़ टनाक की आवाज़ आई और सारे लड़कों का शोर. इस बार ऑफ़ स्टंप उड़ा था और बिना टूटे दूर जाकर गिरा था.
मैंने हैटट्रिक ले ली थी.
बड़े बच्चों के बीच यह मेरा पहला मैच था और मैंने उन्हें बता दिया था कि अगर मुझे लास्ट की जगह पहला ओवर दिया जाता, तो अब तक मैं यह मैच ख़त्म कर चुका होता.
सारे लड़के दौड़ते हुए मेरी तरफ़ आए. ऐसा पहले मैंने टीवी पर ही देखा था. उन्होंने मेरे हाथ पर ताली मारी. मेरे बालों में उंगलियां फिराईं और उनमें से एक बोला, ‘सच्ची रे, तू तो बेदी का भाई निकला.’
मैंने बेदी को देखा, वह नॉन-स्ट्राइक पर सिर झुकाए अपने बैट का मुआयना कर रहा था.
मैंने एक से पूछा, ‘हम मैच जीत गए?’
उसने कहा, ‘नहीं, दो बॉल पर चार रन चाहिए. सुन, तू ठंडा रहना. विकेट नहीं मिले, परवाह नहीं. पर रन मत देना.’
मैंने कहा, ‘देखो, अगली भी डांडी उड़ाता हूँ.’ मैंने कॉलर फिर चढ़ा लिए.
लंबे रनअप और वैसी ही रफ़्तार के साथ बॉल फेंकी. बैट्‌समैन का बैट किनारे से छू गया. बॉल स्लिप के पीछे गई. एक रन लिया जा चुका था.
सामने बेदी आ गया. मैं बेदी को कभी बोल्ड नहीं कर पाया था. वह मेरा क्रिकेट का गुरु था, म्यूज़िक, फिल्मों और किताबों का. मैं जहाँ कहीं जाता, वहां मैं बेदी का भाई होता. इनस्विंग मेरा सबसे घातक हथियार था और वह बेदी ने ही सिखाया था. मैं बेदी को भले बोल्ड न कर पाया, उसे रन तो नहीं लेने दूंगा. मेरी इनस्विंग को अमूमन वह बैकफुट पर जाकर स्लिप के पास से निकाल देता था. मैंने स्लिप पर दो-तीन एक्स्ट्रा लगा दिए. मैं इनस्विंग नहीं फेंकने वाला था. मुझे नहीं पता था, मैं क्या फेंकूंगा. मेरे हाथ से बॉल छूटी और वह कूदता हुआ आगे आ गया, फ़ुलटॉस पर लिया और टनाक. मेरी जान सूख गई. गेंद बिल्कुल मेरे पास से निकली, धूल उड़ाती हुई. पीछे भगवंत नवाणी स्टेज के पास हम चौका मानते थे, बॉल उससे भी पीछे तक गई, झाडिय़ों में.
मैं वहीं पिच पर उकड़ूं बैठ गया. बेदी की टीम जश्न मनाने लगी. वे उछल-उछलकर चीख़ रहे थे. गले लग रहे थे. बैट लड़ा रहे थे. अपनी टोपियां उड़ा रहे थे और मैच जीतने के बाद मिले पैसों का हिसाब कर रहे थे. हमारी टीम का कैप्टन उन्हें पैसे दे रहा था और बहुत नाराज़गी में मेरी ओर देख रहा था. हमारी टीम तितर-बितर हो गई थी. सब वापस जा रहे थे. चारों ओर उनके दौड़ने, चलने और उछलने से उड़ी धूल घिर गई थी. मैं वहीं पिच पर था. अपने पास से बॉल से उड़ी धूल को बॉल के आकार में ही महसूस कर रहा था.
थोड़ी देर बाद उठा. कॉलर सीधा किया और पेड़ के नीचे जाकर बैठ गया.
मैदान के उस तरफ़ दोनों टीमों के लड़के जमा हो गए. वे सब दोस्त थे. मैच से जीते पैसों से उन्होंने वड़ा-पाव खाया और एक-एक बोतल नींबू-सोडा पिया. मैं पेड़ के नीचे से उन्हें देखता रहा. फिर धीरे-धीरे मैं रोने लगा. नाक के बीच धूल का स्वाद सूंघता. आँखों के पास गिरे आंसू को पोंछता, तो शायद गीली धूल से स्टंप जैसा कोई निशान बनता. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं मैच को जीता हुआ मानूं या हारा हुआ. मैंने अपने जीवन की पहली हैटट्रिक ली थी और बॉलर के रूप में कैरियर की शुरुआत की थी. थोड़ी देर पहले ही सबने.खुशी मनाई थी और अब किसी को मेरा ख़याल नहीं था.
एक विजेता, पराजितों की तरह अकेला बैठा हुआ था. सभी की नज़रों से दूर.
यह पूरी स्थिति किस बात का प्रतीक है?
दूर तक दिखता है कि यह स्थिति घूम-घूम कर मेरे पूरे जीवन में किसी न किसी तरह आती रही है.
कई बरसों बाद दादर स्टेशन की एक बेंच पर रात के पौने एक बजे लोकल ट्रेन का इंतज़ार करते समय बेदी ने बताया, ‘किसी को भी य.कीन नहीं था कि बारह साल का लड़का इतनी फास्ट बॉलिंग कर सकता है. वह मेरी देखी सबसे सैक्सी हैटट्रिक थी.’ फिर उसने मेरे कंधे पर हाथ मारते हुए कहा, ‘पर मुझे पता था कि अगर बॉल तेरे हाथ में गई, तो हम मैच नहीं जीत पाएंगे, इसीलिए जब उन्होंने पूछा था कि बेदी, तेरा भाई बॉलिंग कैसी करता है, तो मैं सि.र्फ हंसा था और बोला था, मैच जीतना है, तो उसको दे दे बॉल. उन्होंने मेरी बात को हास्य-व्यंग्य समझ लिया. पर मुझे विश्वास था. मैं तुझसे बहुत प्यार करता हूं.’
मैं सिर झुकाकर सुन रहा था. मुझे बहुत.खुशी हो रही थी. सीने से कुड़बुड़-सी कोई अनजानी आवाज़ आ रही थी. मैंने उससे कहा, ‘अगर तूने यही बात उस शाम कह दी होती, तो मैं उस पेड़ के नीचे बैठ घंटों रोया न होता.’
वह ट्रैक पार कर मुझे तीन नंबर प्लेटफॉर्म पर ले गया और मेरे लाख मना करने के बावजूद उसने एक वड़ा-पाव और लेमन सोडा ख़रीदा. जब मैं सोडा पी रहा था, वह इस तरह मुझे देख रहा था, जैसे मेरी किसी गेंद के टप्पा खाने के बाद स्विंग होने का इंतज़ार कर रहा हो.
उसके बाद मैंने चार बार और हैटट्रिक लीं. अलग-अलग समय पर. उनमें से एक कॉलेज के ग्राउंड में ली थी, जिसके कारण मैं अपनी क्लास की लड़कियों में पॉपुलर हो गया. कॉलेज में कोई बेदी नहीं था, वहाँ कोई मुझे बेदी का भाई करके नहीं जानता था. यहाँ जो कुछ था, मैं था. इंटरक्लास मैच होते थे, तब हमारी कॉलेज की टीम नहीं बनी थी.
मैंने अपने दोस्तों के साथ मिलकर कॉलेज में बहुत हल्ला मचाया कि हमारे कॉलेज की भी एक टीम हो. एक दिन उसका बनना तय हो गया. सब मानकर बैठे थे कि मैं उस टीम का कैप्टन होऊंगा, क्योंकि मेरा इनीशिएटिव सबसे ज़्यादा था. बांद्रा में कोलगेट-पामोलिव के मैदान पर टेस्ट होना था, फिर टीम चुनी जानी थी. कॉलेज के प्रिंसिपल, फिज़िक्स के हेड और स्पोर्ट्स के हेड की सेलेक्शन कमेटी थी. हर किसी को ख़ाली स्टंप पर छह बॉल डालनी थी और बैट्समैन को छह बॉल फेस करनी थी. मैं बॉलर था, सो मेरा टर्न बाद में आना था. मैं स्ट्रेचिंग, वार्मअप करता रहा. बॉल की सिलाई को दो उंगलियों के बीच फंसाकर प्रैक्टिस करता रहा. मैंने अपनी हथेली और उंगलियों से अपने सपनों की स्टंप-तोड़ गेंद का आवाह्न किया, जैसे हवन से पहले अग्नि का आवाह्न करते हैं.
मैं छह बॉल पर छह वैरायटी देना चाहता था.
मैंने कंधों से नीचे जाते अपने केश रबर बैंड से बांधकर पोनी बनाई और लंबा रनअप नापा. मेरी पहली गेंद इनस्विंगर थी, ऑफ़ में टप्पा खाकर मिडिल स्टंप के अंगुल-भर ऊपर से निकल गई. चारों ओर तालियाँ गूंजने लगीं. दूसरी गेंद सीधी निकली और ऑफ स्टंप के सूत-भर पास से निकल गई. ये बॉलिंग की सर्वश्रेष्ठ कलात्मकता होती है, जब देखने में लगता है कि बॉल सीधा ऑफ़ या मिडिल पर जाएगी, तब वह थोड़ा बाहर की ओर लहराकर, ऐन ऑफ़ के बग़ल से निकल जाए. सबसे ज़्यादा ऐसी गेंदों पर स्लिप में कैच उड़ा करते हैं. वह गेंद फेंकने के बाद मैंने कॉलर ऊपर कर लिया. गेंद पर मेरा हाथ सही था, यह विश्वास जानते हुए. अगली गेंद गुड लेंग्थ थी, जो टप्पा खाकर स्टंप में घुस गई और चौथी गेंद लेग स्टंप को धक्का मारते हुए कीपर के पास पहुंच गई. अगली दोनों गेंदें मैंने फिर उसी कलात्मकता से लहराकर ऑफ़ के बाहर निकालीं.
ऐसी गेंदें कोई आसानी से नहीं डाल सकता. इसके लिए बरसों का रियाज़ चाहिए, हवा में ही गेंद को अप्रत्याशित लहरा देने का कौशल चाहिए और बॉल फेंकने से ठीक पहले कलाइयों को एक ख़ास झटका देने का हुनर चाहिए.
मेरी हर गेंद पर तालियां गूंजी थीं, बार-बार खुल जाने वाले मेरे केश हर गेंद पर लहराए थे. हर गेंद के बाद मैं मुस्कराते हुए उस ओर देखता, जिस ओर सेलेक्टर्स और लड़कियां बैठी थीं. पार्ला, अंधेरी और खार की वे सारी मिनी-स्कर्ट टाइप लड़कियां दूर उपनगरों से आए इस फास्ट बॉलर के अपनी ओर देख लेने मात्र से उछल-उछलकर सीटियां बजा रही थीं. मेरा सेलेक्शन तो पहले से तय था.
मैं अपना ओवर पूरा कर उन लड़कियों के पास जाकर बैठ गया और हर गेंद से जुड़ा अनुभव सुनाने लगा. थोड़ी देर बाद जब टीम की घोषणा हुई, तो उसमें मेरा नाम नहीं था. मैंने दुबारा पूछा, तिबारा पूछा, पर नहीं, मैं कहीं नहीं था. मुझे यक़ीन नहीं हुआ. मैंने सेलेक्टर्स से सीधे पूछा, पर वे कंटेस्टेंट्स को जवाब देने के लिए बाध्य नहीं थे. मैं तमाशा नहीं करना चाहता था, पर मैं सदमे में था. ऐसी गेंदें फेंकने के बाद भी सेलेक्शन न हो, यह अविश्वसनीय ही था.
मेरे दोस्तों, जिनमें.ज्यादातर लड़कियां थीं, ने हंगामा मचाना शुरू कर दिया. उन्होंने सेलेक्टर्स को घेर लिया, नारे लगने लगे. उनके धोखेबाज़, रिश्वतखोर और बेईमान होने की बातें उठने लगीं. मैं एक तरफ़ को सिर झुकाए खड़ा था और अभी भी अपने अचरज से जूझ रहा था. थोड़ी देर बाद शोर थम गया. लोग जाने लगे. एक लड़की ने मेरे पास आकर बताया, ‘वे कह रहे थे कि इसकी सिर्फ़ दो बॉल ही स्टंप पर लगी थीं, लाइन पर इसका कंट्रोल ही नहीं.’
मैं उस लड़की का चेहरा ही देखता रह गया. मुझे उस बयान पर एकबारगी भरोसा न हुआ.
थोड़ी देर बाद जब हम कैंटीन में गुजराती कचौड़ी और कटिंग चाय पी रहे थे, मुझे गहरा अहसास हुआ कि मैं अगले एक साल के लिए कॉलेज की टीम में नहीं हूँ. उस वक़्त मुझे रोना आ गया. मैं टेबल पर सिर झुकाकर सुबकने जैसा लगा. पार्ला, अंधेरी और खार की उन सारी मिनी स्कर्ट टाइप लड़कियों के सामने दूर उपनगरों से आया एक रिजेक्टेड फास्ट बॉलर सिर झुका कर रो रहा था.
उनमें से एक ने मेरे सिर पर हाथ फेरते हुए मुझे चुप कराया. बोली, ‘बॉलिंग इज़ एन आर्ट. उसे खेलना आसान है, पर समझना मुश्किल.’
यह घटना भी मुझे एक प्रतीक की तरह लगती है.
इसके बाद मुझे जीवन के हर क्षेत्र में ऐसे बहुत सारे लोग मिले, जिनके लिए किसी भी क़िस्म की बॉलिंग का मतलब बॉल का स्टंप से जाकर टकराना-भर था.
मैं ऐसे लोगों को कभी संतुष्ट नहीं कर पाया.

(प्रतिलिपि में आई थी. )

Wednesday, February 2, 2011

दृश्य समंदर






The 400 blows
फ्रेंच निर्देशक फ्रांसुआ त्रूफो की फिल्म 400 ब्लोज़ के आखिरी दृश्य में समंदर आता है, जबकि उस फिल्म का किशोरवयीन नायक शुरुआत से ही अपनी सबसे बड़ी आकांक्षा यह बताता है कि उसे समंदर देखना है। आकांक्षाएं हमारे भीतर शुरुआत में ही बनती हैं। ऐसे भी कह सकते हैं कि जब आकांक्षाओं का उत्पादन हमारे भीतर होता है, वही हमारी शुरुआत का क्षण बन जाता है, जबकि ऐसा बहुत कम होता है कि जीवन की फिल्म का आखिरी फ्रेम चल रहा हो और हम पाएं कि सामने हमारी आकांक्षाओं का समंदर डोल रहा है।

जीवन जितना बारीकियों से बनता है, उतना ही विस्तारों से भी। किशोरवयीन नायक दौड़ता हुआ समंदर की ओर जाता है और उसके ठीक नज़दीक पहुंचकर, पैर गीले करके, वह लौट पड़ता है। दौड़ते हुए कैमरे में समा जाता है। आकांक्षा की पूर्ति तुरंत दूसरी आकांक्षा के जन्म का क्षण होता है। वह जैसे ही समंदर को सामने देखता है, उसके भीतर जीवन का उद्दाम विस्तार अपनी जगह बनाता है और वह उसे छूकर लौटता है, जीवन के नए रास्तों के लिए। यहां एक क्रिया के रूप में लौटना महत्वपूर्ण है। बिना लौटे आगे नहीं बढ़ा जा सकता, कोई बड़ा स्वप्न नहीं देखा जा सकता। समंदर लौटना सिखाता है।

समंदर का सारा पानी ताउम्र इस कोशिश में रहता है कि वह किसी तरह किनारे पहुंच जाए। पर दुनिया का कोई समंदर किनारे पर अपना घर नहीं बना पाया। लहरें किनारे पर पहुंचती हैं, किनारे को छूकर अपना पैर गीला करती हैं और फिर लौट जाती हैं। इसी से समंदर का जीवन चलता है। अगर ये न हो, तो समंदर अपना समंदरपना खो देगा। हम अपने एक सपने के लिए जी रहे होते हैं, उस सपने को पूरा कर पाते हैं और वहां से तुरंत लौट आते हैं, अगले सपने के लिए।

एक यूनानी लोककथा में एक बच्चा अपनी मां से पूछता है कि सपने कहां से आते हैं? वह कहती है- दुनिया के सारे सपने समंदर के पेट में रहते हैं। वहां से एक सीढ़ी सीधा चांद के दरवाज़े पर जाती है। वे एक-एक सीढ़ी चढ़कर चांद पर जाते हैं और वहां से हमारी नींद के समंदर में आ जाते हैं। इसीलिए जब हम सपना देख रहे होते हैं, चांद मुस्करा रहा होता है, कभी पूरा सफेद बनकर, कभी अंधेरे में खुद को छिपाकर।

फिर हमारे देखे हुए सपने कहां जाते हैं? शायद वे वापस समंदर के भीतर चले जाते हैं। एक दूसरी कहानी याद आती है, जिसमें एक बच्चा पूछता है कि आंख से गिरने के बाद आंसू गाल पर तो दिखता है, उसके बाद कहां चला जाता है? यहां भी जवाब देने वाली मां ही है- गाल जहां खत्म होते हैं, वहां से समंदर शुरू हो जाता है। आंसू समंदर में चले जाते हैं। जैसे सारी बारिशें समंदर के पानियों के ऊपर उठ जाने से होती हैं, उनसे नदियां भरती हैं और नदियां वापस समंदर में चली जाती हैं।

यानी जहां सपनों का घर होता है, वहीं आंसू का भी घर होता है। सपने आंखों में रहते हैं। आंसू भी वहीं रहते हैं। और समंदर के पेट में भी दोनों साथ-साथ ही रहते हैं। दोनों ही दुख, विफलता, भावुकता और अतिरेकों की उत्पत्ति हैं। पीड़ा न हो, तो आंसू न होगा। पीड़ा न हो, तो कोई बड़ा स्वप्न भी नहीं होगा। आंसू न हो, तो स्वप्न भी नहीं होगा। और स्वप्न न हों, तो विफलता या सफलता के आंसू भी न होंगे। दोनों लौट-लौटकर एक-दूसरे के भीतर जाते हैं। और लौटना, तो समंदर का ही गुण है।

आंसू के नुक्तों को पकड़कर गाल से नीचे कूद जाया जाए, तो समझ आएगा, समंदर और कुछ नहीं होता, सिवाय एक संचित रुदन के। विज्ञान के लिए वह पानियों का समुच्चय होता होगा, लेकिन मनुष्यों को उसे एक स्वप्न की तरह देखना चाहिए, लाड़ से भरी एक सांत्वना, जो भीतर से बहुत गीली होती है, लेकिन पुचकारकर जो सांत्वना देती है, वह पैरों में टिके रहने लायक लोहा पैदा कर देती है।
 
(दैनिक भास्कर से) 

Monday, January 17, 2011

अकेले रहने का हुनर सिखाते हैं पेड़

एक जर्मन फिल्म में एक किरदार है, जो अपने दफ्तर की खिड़की से एक पेड़ को देखा करता है। सड़क किनारे सिर झुकाने-जैसी मुद्रा में खड़ा वह पेड़ उसे अपने बचपन के घर जैसा लगता है, कभी दबंग पिता जैसा लगता है, तो कभी नाराज़ होकर दूर चली गई प्रेमिका जैसा उदास। उस किरदार के जीवन में कुछ भी हरा नहीं बचा, इसलिए वह उस पेड़ की हरियाली को अपनी जीवन में सब्स्टीट्यूट की तरह ले लेता है। वह भीड़ में जाता है, कुछ लोगों की मदद करता है और वापस अपने अकेले फ्लैट में, भीड़ भरे दफ्तर के अकेलेपन में खो जाता है। एक दिन पाता है कि वह उस पेड़ में खुद को देखने लगा है। जीवन में हम सबको एक आईने की जरूरत हमेशा पड़ती है, जिसमें हम अपना निखालिस अक्स निहार सकें। कभी वह आईना किसी व्यक्ति के भीतर मिल जाता है, तो कभी किसी चीज के भीतर। उसे उसका आईना उस पेड़ में दिखाई दिया, जिसने बता दिया कि अगर वह अकेला है, तो उसे पेड़ की तरह जीना चाहिए। अपने अकेलेपन को खत्म भी न करे और कुछ-कुछ सबके काम भी आता रहे।

वांग कार-वाई की एक फिल्म में एक किरदार जब अपने भीतर किसी भावना के उत्पात को महसूस करता है, बहुत बेचैन हो जाता है, अपनी बात कहने के लिए उसे कोई नहीं मिलता, तो वह घर से दूर एक उपवन में अपने एक प्रिय पेड़ के पास जाता है। उसके एक कोटर में मुंह घुसाकर, फुसफुसाते हुए अपनी बात कहता है, फिर घास के तिनकों से उस कोटर को ढंक देता है। उसे लगता है कि पेड़ ने उसकी बात सुनकर, संजो ली है। वह पेड़ किसी तीसरे को नहीं बताएगा। यह दरअसल चीन के एक समुदाय की मान्यता भी है। खुद को अभिव्यक्त न कर पाने की उसकी बेचैनी खत्म हो जाती है। वह बहुत शांत महसूस करता है। उसे शांति इसीलिए मिलती है कि जिसे वह बता रहा है, वह खुद शांत है। पेड़ में चंचलता नहीं है, इसीलिए उसे विश्वास है कि उसका राज यहां राज ही रहेगा।

जिन लोगों को अकेले रहने की आदत होती है, पेड़ उनके सबसे क़रीबी साथी हो सकते हैं या उनके सबसे नज़दीकी राज़दार। अकेले रहने का हुनर भी पेड़ ही सिखाते हैं। पानी में अकेलापन नहीं होता, पहाड़ में भी नहीं, हवा में तो बिल्कुल नहीं। घास, जानवर और मछलियां भी एक खास किस्म की सामूहिकता उत्सर्जित करते हैं, लेकिन पेड़ समूहों में रहकर भी अकेलेपन का भावबोध देते हैं। मछलियां एक दिशा में तैरती हैं, पानी के अणु एक दिशा में बहते हैं, पहाड़ अपने तिकोनेपन में सबसे ऊपर सबसे ज्यादा संकुचित होते हैं। ये उनकी स्वाभाविक विशेषताएं हैं।

पेड़ों के साथ ऐसा नहीं। कतार से सारे पेड़ एक ही दिशा में नहीं झुके होते। जंगल को देखिए, हर पेड़ अकेला है, तभी तो अपनी-अपनी राह बढ़ता है। उनका अकेलापन, वृद्धि की स्वच्छंद इच्छा और नितांत निजी शख्सियत ही जंगल के सौंदर्यबोध का विकास करती हैं। पेड़ों की सामूहिकता मनुष्य की सामूहिकता से मिलती-जुलती है। भरी भीड़ में अकेला होने की सामूहिकता। आदमी का व्यवहार भी ऐसा ही होता है। दोस्ती किसी से भी हो सकती है, लेकिन विश्वास वह उन्हीं पर कर पाता है, जिनमें पेड़ जैसी विशेषताएं हों। यानी जिनमें स्थिरता हो, कम से कम चंचलता हो, जो अपने अकेलेपन में भी मदद की छांव बढ़ाए रखते हों, जो अपने भीतर की हरियाली को सामने वाले के भीतर रोप सकें, कड़ी धूप में भी शीतलता का निर्यात कर सकें और छोटे-मोटे धक्कों से उखड़ न जाएं।


Thursday, December 30, 2010

Democracy Don’t Rule the World





बॉब डिलन ने यह गाना 27 साल पहले लिखा था. तीन-चार दिन से मेरे मन में गूंज रहा है. डिलन कहते हैं- एक बात बहुत अच्‍छी तरह अपने भेजे में घुसा लो, इस दुनिया पर लोकतंत्र का राज नहीं है, बल्कि हिंसा का है. पूंजीवाद सारे क़ानूनों से ऊपर है. डिलन उस दिन को भी देख रहे हैं, जब घर में बग़ीचा बनाना भी क़ानून का उल्‍लंघन करने जैसा ही होगा. यह डिलन की प्रॉफ़ेसी है, एक कवि, एक गायक, एक संगीतकार की. एक भयानक डिस्‍टोपिया है. साकार दिख रहा है.

यह हिंसा कौन-सी है? लोकतंत्र का राज क्‍यों नहीं है? यह पोस्‍टर देख लीजिए, समझ में आ जाएगा. 

क्‍या भारत, क्‍या पाकिस्‍तान, क्‍या अमेरिका! क्‍या बिनायक, क्‍या असांजे. डिलन का यह गाना सारी दुनिया के लिए है. देश का नाम बदल दीजिए, देश के नेता की तस्‍वीर बदल दीजिए, तब भी क्‍या यह तस्‍वीर बदली हुई लगेगी?

Union Sundown
- Bob Dylan



Union Sundown

Well, my shoes, they come from Singapore
My flashlight’s from Taiwan
My tablecloth’s from Malaysia
My belt buckle’s from the Amazon
You know, this shirt I wear comes from the Philippines
And the car I drive is a Chevrolet
It was put together down in Argentina
By a guy makin’ thirty cents a day

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Well, this silk dress is from Hong Kong
And the pearls are from Japan
Well, the dog collar’s from India
And the flower pot’s from Pakistan
All the furniture, it says “Made in Brazil”
Where a woman, she slaved for sure
Bringin’ home thirty cents a day to a family of twelve
You know, that’s a lot of money to her

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Well, you know, lots of people complainin’ that there is no work
I say, “Why you say that for
When nothin’ you got is U.S.–made?”
They don’t make nothin’ here no more
You know, capitalism is above the law
It say, “It don’t count ’less it sells”
When it costs too much to build it at home
You just build it cheaper someplace else

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Well, the job that you used to have
They gave it to somebody down in El Salvador
The unions are big business, friend
And they’re goin’ out like a dinosaur
They used to grow food in Kansas
Now they want to grow it on the moon and eat it raw
I can see the day coming when even your home garden
Is gonna be against the law

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Democracy don’t rule the world
You’d better get that in your head
This world is ruled by violence
But I guess that’s better left unsaid
From Broadway to the Milky Way
That’s a lot of territory indeed
And a man’s gonna do what he has to do
When he’s got a hungry mouth to feed

Well, it’s sundown on the union
And what’s made in the U.S.A.
Sure was a good idea
’Til greed got in the way

Copyright © 1983 by Special Rider Music


Friday, November 12, 2010

आदत बदस्‍तूर





लिखने की आदतें के बाद कुछ मित्रों की चाह थी कि मैं अपनी आदतों के बारे में भी लिखूं. ऐसा करना आसान नहीं होता, क्‍योंकि आदतें इसीलिए आदतें होती हैं कि उन्‍हें आप ख़ुद नहीं पहचान पाते. कोई न कोई, कभी, दर्ज या अ-दर्ज तरीक़े से आपको टोकता है, टोक कर आपका ध्‍यान उसकी ओर ले जाता है और तब आप पाते हैं कि हां, यह तो सही कह रहा है, मैं तो ऐसा ही करता हूं. आदत अच्‍छी लगी, तो आप ज़ाहिरा तौर पर मान जाते हैं. अच्‍छी नहीं लगी, तो मुकर भी जाते हैं, फिर भी आदत बदस्‍तूर रहती है. 

जैसे पॉल ऑस्‍टर से किसी ने पूछा, अब लैपटॉप्‍स का ज़माना आ गया है, आप अभी भी अपने पुराने टाइप राइटर पर ही क्‍यों लिखते हैं? ऑस्‍टर कुछ देर सोच में पड़ गए और बोले, मैंने यह बात सोची ही नहीं थी कि मुझे लैपटॉप पर शिफ़्ट हो जाना चाहिए. निश्चित ही उन्‍हें अहसास होता होगा, जैसा कि उन्‍होंने बाद में कहा भी कि कंप्‍यूटर पर कॉपी एडिट करना ज़्यादा आसान होता है, लेकिन उनकी आदत में कंप्‍यूटर नहीं घुसता, तो नहीं घुसता. ड्राफ़्ट फ़ाइनल होने तक वह हर बार पूरी स्क्रिप्‍ट को फिर से टाइप करते हैं. यानी दस बार करेक्‍शंस किए, तो दस बार टाइपिंग. मैं सोचता हूं कि इस तरह न्‍यूयॉर्क ट्रायलॉजी पूरा करने में उन्‍हें कितना वक़्त लगा होगा.

पर मैं ऐसा नहीं करता. मेरी आदतें अभी भी बहुत मिली-जुली हैं और की-बोर्ड के कारण लंबे समय तक क़लम का साथ छूटे रहने के बाद भी पिछले कुछ बरसों में मेरा यह पक्‍का विश्‍वास हो गया है कि फा़इनल होने से पहले प्रिंट आउट्स पर क़लम के निशान होने ही चाहिए. कॉपी राइटिंग और एडिटिंग दोनों तरह से हो. पहले जितना कुछ ऑनलाइन हो सकता हो, उतना. फिर ऑफ़लाइन क़लम से. वह भी अपनी पसंदीदा हरी स्‍याही से. या फिर बैंगनी स्‍याही से. बिना लाइन वाले सादे काग़ज़ों पर. पॉल ऑस्‍टर की आदत दूसरी है. वह अपना सारा लेखन चार लाइन वाली नोटबुक में करते हैं, जैसी नोटबुक्‍स छोटी क्‍लासों में बच्‍चों को अंग्रेज़ी और कर्सिव में महारत के लिए दी जाती हैं. 

हालांकि मैं अपनी आदतों की तफ़सील में नहीं जाऊंगा, क्‍योंकि वह ख़ुद को भी अटपटा ही लगेगा और मैं देर तक सिर्फ़ अपने बारे में बोल भी नहीं पाऊंगा, दो-चार लाइनों बाद ही उसमें मेरे प्रिय लेखकों के प्रसंग आने लग जाएंगे. जैसा कि ऊपर के पैराग्राफ़ में ही हो गया है. 

कविता और कहानी लिखने के तरीक़े भी अलग-अलग हैं. छोटी और स्‍वत:स्‍फूर्त कविताएं एक बार में लिख ली जाती हैं, अगर उस समय कंप्‍यूटर पर हों, तो तुरंत टाइप हो जाता है, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है. कविताएं अचानक आती हैं, कई बार लंबे समय से दिमाग़ में चल भी रही होती हैं, लेकिन उन्‍हीं के बीच कोई अप्रत्‍याशित आती है. तब मेरी कोशिश होती है कि उसे पेंसिल से लिख लूं. और वे कुछ-कुछ पंक्तियों में होती हैं. तब जो किताब सामने है, उसके हाशिए पर, या अंत में प्रकाशक द्वारा फर्मे की सहूलियत के लिए छोड़े गए सादे पेजों पर नोट कर लेता हूं. फिर अगली फ़ुरसत में वे पेंसिल से ही डायरी या नोटपैड के सादे पेजों में चली जाती हैं, वहां जमा होती रहती हैं. कई बार इस तरह जमा होती रहती हैं कि बाद में पढ़ने पर यह समझ में नहीं आता कि यह पंक्‍ित क्‍यों लिखी थी. ख़ैर. कुछ कविताएं, पंक्‍ितयां देरी से खिलने वाले फूलों की तरह होती हैं. वे वैसी ही होती हैं, तो होती हैं. आप कुछ नहीं कर सकते. हां, उन पर ज़ोर-आज़माइश ज़रूर कर सकते हैं. इसी दौरान मैं एक बार उन्‍हें टाइप कर लेता हूं, प्रिंट ले लेता हूं और फिर उन पर काम. (कविता पर काम करना चाहिए या नहीं, मैं इस पर कुछ पंक्तियों बाद आऊंगा. यह एक दिलचस्‍प सवाल है, क्‍योंकि कई मित्र पर इस पर आपत्ति करते हैं, उनका मानना है कि कविता एक बार में ही जैसी लिखी जाए, वैसी ही होनी चाहिए, उस पर काम करने का अर्थ है कविता के आगमन के क्षणों की मन:स्थितियों या म्‍यूज़ का अनादर करना. मेरी नज़र में ऐसा नहीं है.)

काम का यह सिलसिला चलता ही रहता है. जब तक कि उससे एक ख़ास कि़स्‍म की विरक्ति न हो जाए. यहां विरक्ति, आसक्ति का ही समानार्थी है, जैसे मैंने पहले भी कई बार अतीत को भविष्‍य का समार्थी माना है. और समार्थी का संधि-विच्‍छेद मुझे एक और अर्थ देता है, वह है 'सम पर पहुंचाने वाला अर्थ.' जैसे मेरी एक कविता है 'माउथ ऑर्गन'. मैंने उसे सबसे पहले 97 में लिखा था, और बाद के बरसों में वह नोटपैड में यूं ही पड़ी रही. बीच के छह बरसों में जब मैंने लिखना लगभग बंद ही कर दिया था, तब मैं बीच-बीच में उसमें चला जाता, उसमें कुछ खदड़-बदड़ कर देता, जैसे सिम पर रखी हुई सब्‍ज़ी को आप जांचने के लिए उसमें यूं ही कलछुल फिरा दिया करते हैं. पर उससे कुछ हुआ नहीं. कविता की मूल संरचना और रेंज पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. दस साल बाद मैंने उसे टाइप किया और उसके प्रिंट पर काम करना शुरू किया, और तब मैं शायद उसके आरोह को छू पा रहा था,  मुझे यह नहीं याद था कि पहली बार मैंने उसे क्‍या सोचकर लिखना शुरू किया था, लेकिन दस साल बाद मैंने पाया कि इसकी कुछ पंक्तियों में अभी भी धड़कन बाक़ी है. और उसी धड़कन को और ज़्यादा पंप करने की ज़रूरत है. और यह तब तक चलता रहा, जब तक कि मैंने अपने संग्रह का आखि़री प्रूफ़ नहीं पढ़ लिया. उसमें तब भी बहुत बदलाव हुए थे. और वह संग्रह की उन कुछेक कविताओं में से है, जिनका पहले कभी प्रकाशन हुआ ही नहीं था. इन सबका अर्थ यह नहीं कि वह एक बहुत बड़ी और महान कविता हो गई, क्‍योंकि अब भी मैं उसमें अपने स्‍टैंटर्ड्स पर नहीं पहुंच पाया हूं. जब मैं रचनाओं से जुड़े हुए पृष्‍ठभौमिक तथ्‍यों के बारे में बात करता हूं, तो दरअसल रचना की रसोई की एक यात्रा करने जैसा होता है. चूंकि हमारे यहां रचनाओं की फिजि़क्‍स पर बात करने का कोई चलन ही नहीं है, सो इसे तुरंत एक नकरात्‍मक प्रवृत्ति की तरह देखा जाता है कि अरे देखो साब, फलां की एक किताब अभी छपी नहीं कि वह यह गिनाने लग गए हैं कि यह पांचवां ड्राफ़्ट है, इसे लिखने में मुझे चार साल लग गए या ब्‍ला-ब्‍ला. जबकि यह तो महज़ उसके फिजि़क्‍स का एक फ़ैक्‍ट है, जिसे लेखक उतनी ही सहजता से बताता है, जितना कि वह अपनी रचना में जाता है. सहजता एक दुर्लभ गुण है, केवल लेखक के रूप में ही नहीं, पाठक और साथी लेखक के रूप में भी हमें इसे सहर्ष, सगर्व आरोहित करना चाहिए. इसे एक लेखक की इन्‍वॉल्‍वमेंट के रूप में भी देखा जाना चाहिए. 

इसी सिलसिले में मुझे एक बार फिर विलियम फॉकनर याद आते हैं. उनसे एक बार पूछा गया कि आप अपनी किस किताब को सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं. उनका जवाब था, 'जिस किताब ने लिखने के दौरान मुझसे सबसे ज़्यादा संघर्ष कराया हो, जिसने सबसे ज़्यादा रुलाया हो, सबसे ज़्यादा मेहनत कराई हो. मैं अपनी रचनाओं की गुणवत्‍ता को इसी आधार पर मापता हूं. जैसे कि एक मां अपने उस बच्‍चे से सबसे ज़्यादा प्रेम करती है, जो उसकी बात नहीं मानता, बड़ा होकर अपराधी बन जाता है या चोरी-हत्‍याएं करने लगता है. मां को पता है कि अच्‍छा बेटा तो अच्‍छा ही है, वह बुरे काम नहीं करेगा, लेकिन यह जो बुरा बेटा है, इसे ज़्यादा प्‍यार करो, क्‍योंकि प्‍यार के कारण इसके सुधर जाने की संभावनाएं बची रहेंगी. उसी तरह एक लेखक अपनी सबसे शैतान, बदमाश, चंचल कृति की ओर देखता है.' उन्‍होंने 'द साउंड एंड द फ़्यूरी' को इसी श्रेणी में रखा, जिसे उन्‍होंने पांच अलग-अलग तरीक़ों से लिखा था और उम्र के आखि़री बरसों में बाक़ी चार वर्शन्‍स को भी छपवा देने के बारे में विचार किया था. और जहां तक मुझे याद पड़ता है, एक निबंध में उन्‍होंने बताया था कि इसका अंत उन्‍होंने पैंतीस से ज़्यादा बार लिखा था. इससे थोड़ा-सा कम काम उन्‍हें 'ऐज़ आय ले डाइंग' पर करना पड़ा था. और यहां यह कहना दिलचस्‍प होगा कि फॉकनर के जिस 'योक्‍नेपटाफ़ा' ने आगे चलकर माकोंदो और मालगुड़ी की रचना में प्रेरक भूमिका निभाई, छपकर आने के बाद उनके इस उपन्‍यासों पर कम ही लोगों ने ध्‍यान दिया था. 

हर लेखक अपने लिए लिखने का एक समय तय कर लेता है, लगभग, वह उसी समय लिखेगा या उस समय लिखने को लेकर ज़्यादा आरामदेह महसूस करेगा. जैसे कुछ ड्यूटी अवर्स की तरह नौ से पांच का समय चुन लेते हैं, कुछ दोपहर का. ज़्यादातर लोग सुबह जल्‍दी उठकर लिखते हैं. रॉबर्ट ब्‍लाय मेरे प्रिय अंग्रेज़ी कवियों में हैं और उनके ग़ालिब के अनुवादों को कई बार मैं इस शायर को आज दिनांक में समझने के लिए गाइड की तरह देखता हूं, उनकी सुबह लिखने की आदत हैरान करती है. वह सुबह पांच बजे उठते हैं, बिस्‍तर छोड़ने से पहले ही वह काग़ज़-क़लम लेकर एक कविता लिखते हैं. हर सुबह बिला नागा. जैसे सुबह की चाय. और पिछले पचास साल से वह हर सुबह ऐसा ही करते हैं. उनकी सुबह लिखी कविताओं का संग्रह 'मॉर्निंग पोएम्‍स' नाम से संकलित भी है. 

मेरे लिए सबसे आरामदेह समय रात का होता है, रात ग्‍यारह बजे के बाद. मुझे अंधेरा चाहिए. तेज़ रोशनी से मेरा माइग्रेन भड़क उठता है और मैं जिन चीज़ों से सबसे ज़्यादा डरता हूं, उनमें यह माइग्रेन भी है. दिन में कोई कमरा ऐसा नहीं होता, जहां पूरी तरह अंधेरा हो, और दिन में घर रहा भी नहीं जाता, काम पर जाना होता है. सो रात का समय सुविधाजनक होता है. नौकरी के घंटे बदलते-बढ़ते रहते हैं, इसलिए यह बैठक कई बार अनिश्चित हो जाती है. कई बार लंबा स्‍थगन. ऐसा सबके साथ होता होगा. एक दिन आप एक शब्‍द भी नहीं लिख्‍ा पाते और किसी दिन पूरे हज़ार शब्‍द लिख जाते हैं. इसका कोई औसत या हिसाब नहीं. हेमिंग्‍वे जैसे लोग अपवाद हैं. उनकी डेस्‍क के सामने एक चार्ट लगा होता था, जिसमें वह हर रोज़ नोट करते थे कि आप कितने शब्‍द लिख लिए. कभी साढ़े छह सौ तो कभी पंद्रह सौ. हर रोज़ के चार्ट के बाद वह महीने का औसत निकालते थे और अगर वह ठीकठाक रहा, तो ख़ुश होते थे, वरना कलपते थे, ख़ुद को कोसते थे और अपना औसत बढ़ाने की कोशिश करते थे.

बैठक से जुड़े हुए नखरे भी हैं. जैसे मैं थर्मस में चाय बनाकर अपने साथ रखता हूं. कई बार अलग-अलग तरह की चाय. रेगुलर, ग्रीन और लेमन तीनों. मूड अच्‍छा हुआ और माइग्रेन का ख़तरा न रहा, तो कॉफ़ी. यहां जैक केरुआक की याद आती है. वह लिखते समय खाने की कुछ चीज़ें लेकर बैठता था. हालांकि कई लोगों को निरर्थक लगेगा यह सब, क्‍योंकि एक तरह से आप क्‍या लिख रहे हैं, बहुत महान या कचरा लिख रहे हैं, इन सब बातों का इससे कोई लेना-देना नहीं, और मैं अभी कंटेंट पर बात कर भी नहीं रहा, अलबत्‍ता कंटेंट भी एक आदत ही होता है, ऐसा मेरा मानना है, फिर भी यह ज़रूर कि सारी कलाएं या लेखन एक नशे की तरह ही होता है और सारी आदतें नशों में ही तब्‍दील हो जाती हैं, वे अपने आप होने लगती हैं, इसलिए वे अनजाने ही एजेंट प्रोवोकेटर की भूमिका ले लेती हैं. 

कहानी पर काम करने की आदतें अलग हैं, कविताओं से अलग, उन पर कभी अगली बार बात करेंगे. इस समय 'काम करना' पर अटकाव है. क्‍या एक लेखक को अपनी रचनाओं पर काम करना चाहिए? यानी जब रचना स्‍वत:स्‍फूर्त तरीक़े से ख़ुद को लिखवा ले जाती है, तो क्‍या सायास उसकी तराशना, मरम्‍मत, पुनर्लेखन आदि करना चाहिए? कला निजी आदत और निजी अनुभव है, इसलिए उसका कोई नियम तो होता नहीं, हर कलाकार अपने लिए कुछ सरणियां तैयार करता है और उन्‍हीं के आधार पर इस प्रश्‍न से जूझता है. मुझे बाबा बोर्हेस बहुत पसंद हैं और उनकी कही बातें न केवल लेखक, बल्कि किसी भी कलाकार के लिए दिशासूचक होती हैं, लेकिन उनकी कुछ बातों से मैं कभी सहमत नहीं हो पाता, उनमें से एक यह है कि वह कहते हैं, जब आप अपनी रचनाओं पर बार-बार काम कर रहे होते हैं, तो ज़रूरी नहीं कि आप उसकी सुंदरता बढ़ा ही रहे हों, ज़्यादातर मौक़ों पर आप उसे बर्बाद कर रहे होते हैं. बाबा को ऐसे अनुभव हुए होंगे, जो वह ऐसा कहने पर विवश हुए, पर मेरे अनुभव अलग हैं. 

मैंने पिछले दिनों आर्ट ऑफ नॉवल पर कुछ बेहतरीन चीज़ें पढ़ी हैं, और उन्‍हें पढ़ते हुए ऐसे कई मुद्दों पर मैं अपनी राय से संतुष्‍ट भी हुआ. मैंने पहले भी कहा है कि कला स्‍वत:स्‍फूर्त नहीं होती, वह अत्‍यंत नियंत्रित अभिव्‍यक्ति है. स्‍वत:स्‍फूर्त होना सिर्फ़ एक भ्रम है. आप अपने चेतन में या अवचेतन में उसके बारे में सोचते रहते हैं, उसे पा लेना चा‍हते हैं, और पा लेते हैं. कुछ चीज़ें अनायास आपके पास आ जाती हैं, लेकिन वे इसलिए आती हैं कि कुछ दूसरी चीज़ें उनके लिए ज़मीन तैयार कर देती हैं. गेंदबाज़ी इसके लिए बढि़या उदाहरण है. बॉलर जानता है कि उसे इनस्विंग करानी है, तो बॉल को कहां टप्‍पा दिलाना होगा, कलाई को कैसे झटकना होगा. वह इन‍स्विंग फेंकना चाहता है, सो फेंकता है. यही उसका नियंत्रण है. इनस्विंग फेंकने की इच्‍छा के बावजूद अगर वह आउटस्विंग फेंक देता है, तो वह असफल है, अनियंत्रित है, कलाहीन है. भले उस आउटस्विंग पर उसे विकेट मिल जाए, लेकिन वह ख़ुद जानता है कि वह ग़लत है. संभव है कि अगली बार उसे इस ग़लती का खामियाजा भुगतना पड़े. वह एक स्‍वत:स्‍फूर्त गेंद का इंतज़ार नहीं कर सकता. उसकी एक चाही हुई इनस्विंगर अगर उसकी उम्‍मीद से ज़्यादा स्विंग हो जाती है, तो भी यह स्‍वत:स्‍फूर्त नहीं है, क्‍योंकि इसमें पिच का वह गड्ढा या पैच मददगार है, जो एक्‍स्‍ट्रा टर्न दे देता है या वह हवा जो गेंद पर सहायक रहम करती है. आज जितनी भी कलाएं हैं, उनमें बॉलिंग से ज़्यादा कलात्‍मक उदाहरण नहीं मिल सकता, कलात्‍मक नियंत्रित अभिव्‍यक्ति का.  और इस नियंत्रण के लिए उसे लगातार काम करना होता है, अभ्‍यास करना होता है. लेखक का काम करना गेंदबाज़ के काम करने से थोड़ा ज़्यादा कठिन है, क्‍योंकि लेखक को नतीजा तुरंत नहीं मिलता, बरसों लग जाते हैं, जबकि गेंदबाज़ अगले कुछ मिनटों में जान लेता है कि कितना परसेंट डिलीवर हुआ. 

ओरहन पमुक की नई किताब इसी किस्‍म के विषयों को छूती है. यह है हार्वर्ड में उनके लेक्‍चर्स का संग्रह, जो कुछ दिनों पहले ही रिलीज हुआ है- 'द नाइव एंड द सेंटीमेंटल नॉवलिस्‍ट'. फ्रे‍डरिक शिलर नामक दो सदी पुराने एक जर्मन लेखक के एक निबंध को आधार बनाकर उन्‍होंने लेखकों की दो श्रेणियां बनाई हैं- पहली नाइव, जो सीधा-सादा, भोला-भाला है, जो उन्‍हीं चीज़ों में यक़ीन करता है, जो उसके पास अपने पैरों पर चलकर आ जाती हैं. और दूसरी श्रेणी है- सेंटीमेंटल, जो बहुत रिफ्लेक्टिव होता है. वह अपने तरीक़े से सोचता है, और अपने इमोशंस और रिफ्लेक्‍शंस के सहारे उसमें इनोवेट करते जाता है. आधुनिक समय का अच्‍छा लेखक दोनों ही तरीक़ों के मिश्रण से बनता है.   

यह किताब पमुक के सबसे सुंदर कामों में से है, जो रचना-प्रक्रिया और पाठकीय-प्रक्रिया की कई अंधेरी गलियों को रोशन करती चलती है. इनके अलावा मिलान कुंडेरा की नई किताब 'एनकाउंटर' भी है, जो आर्ट ऑफ फिक्‍शन को विश्‍लेषित करने वाली उनकी सीरिज का नया हिस्‍सा है. पुरानी तीन किताबें हैं 'द आर्ट ऑफ़ नॉवल', 'टेस्‍टामेंट्स बीट्रेड' और 'द कर्टेन'. मेरी कोशिश होगी कि अगली पोस्‍ट्स में मैं इन पांचों किताबों पर बात करूं.