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Tuesday, June 12, 2012

नेरूदा और मातील्‍दा - एक प्रेमकथा

नेरूदा और मातील्‍दा, इस्‍ला नेग्रा के पीछे तट पर. 

पाब्‍लो नेरूदा और मातील्‍दा उर्रूतीया की प्रेमकथा, उनका संग-साथ, उनके संस्‍मरण, नोंकझोंक आदि मुझे बहुत आकर्षित करते हैं. दोनों के बारे में कुछ भी मिले, मैं खोज-खोजकर पढ़ता हूं. इनके प्रेम के उन्‍माद के किस्‍से, नेरूदा की कविताओं के कई अनछुए पहलओं की ओर ले जाते हैं.

निर्वासन के दिनों में पाब्‍लो मेक्सिको में थे और वहां उनकी तबीयत बिगड़ गई. चूंकि उनके शत्रु बहुत थे, उनके दोस्‍तों ने उनकी मिज़ाजपुर्सी के लिए किसी अत्‍यंत विश्‍वस्‍त को उनके साथ रखने का फ़ैसला किया. चिली का तानाशाह पाब्‍लो के पीछे पड़ा था और उसकी सा़जि़श पाब्‍लो के भोजन में ज़हर मिला देने की थी. ऐसे में पाब्‍लो के साथ किसी विश्‍वासपात्र का होना ज़रूरी था. उनका एक दोस्‍त एक संघर्षशील गायिका को जानता था, जो अगर पाब्‍लो के साथ रहे, तो तानाशाह को भनक भी न लगेगी. वह थी चिली की ही मातील्‍दा. साथ रहने के दौरान दोनों में प्रेम हो गया. मातील्‍दा मेक्सिको में ही बस गईं. लेकिन ठीक होने के बाद नेरूदा को मेक्सिको से भी भागना पड़ा. वह यूरोप पहुंच गए.

काफ़ी समय बाद उन्‍होंने किसी तरह व्‍यवस्‍था की कि मातील्‍दा भी यूरोप आ जाएं. उन्‍होंने मातील्‍दा को बर्लिन के पुस्‍तक मेले में बुलाया. नेरूदा, सारी व्‍यवस्‍था किसी ख़ुफि़या एजेंट की तरह करवाते थे. यानी एअरपोर्ट से एक गाड़ी मातील्‍दा को लेगी, रास्‍ते में उसे बदल दिया जाएगा, पहले वह दूसरी जगह पहुंचेंगी, वहां से तीसरी जगह और उसके बाद पहली जगह यानी जहां मुलाक़ात होनी थी. मातील्‍दा उत्‍साहित थीं. जब वहां पहुंचीं, तो नेरूदा और उनके दोस्‍तों को देख आतंकित हो गईं. नेरूदा ने उनकी मुलाक़ात तुर्की कवि नाजि़म हिकमत से कराई. नाजि़म, पाब्‍लो के उस प्रेम के बारे में जानते थे. वह मातील्‍दा को देर तक देखते रहे. अचानक छह फीट ऊंचे नाजि़म ने छोटी-सी मातील्‍दा को गोद में उठा लिया, उनका माथा चूमते हुए कहा, 'आय अप्रूव !'

मातील्‍दा दंग रह गईं. जिस रिश्‍ते को छिपाए रखने के लिए वह अपनी हर अभिव्‍यक्ति को नियंत्रित रखती थीं, उस रिश्‍ते के बारे में पाब्‍लो अपने दोस्‍तों से बेहिचक बात करते थे. थोड़ी देर बाद क्‍यूबा के कवि निकोलास गीयेन टहलते हुए आए और पाब्‍लो से कहा, 'तो यह है मातील्‍दा.' और रहस्‍यमय तरीक़े से मुस्‍कराते रहे. मातील्‍दा किताबों और दोस्‍तों में भटकती रही, नेरूदा अपने कार्यक्रमों में उलझे रहे.

शाम होने पर नेरूदा ने मातील्‍दा से कहा, 'गाड़ी तुम्‍हें होटल तक छोड़ देगी. जल्‍दी पहुंच जाओ. वहां तुम्‍हारे लिए एक तोहफ़ा रखा हुआ है.' दिन-भर के अनुभव से हैरान मातील्‍दा सोच में पड़ गईं कि उन्‍हें यूरोप रुकना चाहिए या लौट जाना चाहिए. जैसे ही वह होटल के अपने कमरे में पहुंची, भीतर नेरूदा और नाजि़म पहले से मौजूद थे. मातील्‍दा को हैरान देख दोनों ठहाका मारकर हंस पड़े. नाजि़म ने नाटकीय अंदाज़ में नेरूदा की ओर उंगली से इशारा किया और बोले, 'मैडम, ये है आपका तोहफ़ा. हमारे समय का सर्वश्रेष्‍ठ कवि.' और हंसते हुए ख़ुद कमरे से बाहर चले गए.

मातील्‍दा ने मेक्सिको में जिस नेरूदा को जाना था, वह जान बचाने की ख़ातिर सबसे छिपे बैठे बीमार नेरूदा थे. असली नेरूदा यहां बैठे थे. मुसीबत के सबसे गाढ़े पलों में भी गगनभेदी ठहाके लगाने वाले और अक्‍सर क़रीबी दोस्‍तों को इसी तरह चौंका देने वाले नेरूदा. अगले कुछ दिन दोनों ने यूरोप में साथ घूमते हुए बिताए. दोनों रोमानिया में जिस मकान में ठहरे थे, उसकी केयरटेकर एक रोमानियन महिला थी, जो बहुत स्‍वादिष्‍ट खाना बनाती थी. ये उसकी भाषा न समझ पाते, न ही वह इनकी भाषा समझ पाती. फिर भी वे आपस में बात करते, और बातों को संगीत की तरह सुनते. एक सुबह नाश्‍ते के दौरान पाब्‍लो ने केयरटेकर से अंडे उबालने के लिए कहा. अंडों की संख्‍या बताने के लिए उन्‍होंने दो उंगलियां उठाकर इशारा किया. केयरटेकर मुस्‍कराई और थोड़ी देर बाद ग्‍यारह उबले अंडों के साथ लौटी. उनके यहां दो उंगलियों का अर्थ दो नहीं, ग्‍यारह होता था. वे जितने दिन वहां रहे, नेरूदा उस केयरटेकर को देखते ही ठहाके लगाने लगते थे.

मेक्सिको में मातील्‍दा, नेरूदा के बच्‍चे की मां बनने वाली थीं, लेकिन स्‍वास्‍थ्‍य ख़राब हो जाने के कारण तीन माह का गर्भपात हो गया. उसके बावजूद मातील्‍दा, नेरूदा के साथ कोई लंबा भविष्‍य नहीं देख रही थीं. उनके लिए पाब्‍लो एक बहुत अच्‍छे दोस्‍त थे, जिससे बेशुमार चुहल की जा सकती है. जिसकी कविताओं को रोते हुए पढ़ा जा सकता है और किताब तकिए के नीचे रखकर सोया जा सकता है. उन शुरुआती दिनों के रिश्‍ते, अगंभीरता, व्‍यथा और तेज़ आकर्षण को नेरूदा के संग्रह 'द कैप्‍टन्‍स वर्सेस' की कविताओं में देखा जा सकता है. नेरूदा ने ये कविताएं मातील्‍दा के साथ यूरोप में बिताए समय में ही लिखी थीं. वह कविता लिखते, मातील्‍दा को उसकी पुर्जी थमाकर कहते, जब कोई भी पास न हो, तब पढ़ना. मातील्‍दा अपने कमरे में रात-रात भर एक ही कविता पढ़ती रहतीं. लेकिन वह डरने भी लगीं. उन्‍हें लगता था कि यह छिपा हुआ रिश्‍ता ज़्यादा नहीं चलेगा. एक दिन नेरूदा हमेशा के लिए चले जाएंगे. ऐसे किसी दुख को वह दूर से ही भगा देना चाहती थीं. कई दिनों की उथलपुथल के बाद उन्‍होंने घोषणा कर दी कि वह नेरूदा के साथ नहीं रहेंगी, मेक्सिको लौट जाएंगी. नेरूदा ने उन्‍हें मनाने की कोशिश की. उनके क़रीबी दोस्‍त गीयन ने इस बारे में मातील्‍दा से बात करनी चाही, लेकिन मातील्‍दा ने किसी की सुनने से इंकार कर दिया. 

एक दिन दोनों अलग हो गए. मातील्‍दा पेरिस आ गईं, उस मकान में जिसे नेरूदा ने उन्‍हीं के लिए किराये पर लिया था. वहां से उन्‍हें मेक्सिको रवाना होना था. नेरूदा यूरोप में भटकते रहे. उन्‍हें कुछ-कुछ दिनों में जगह छोड़नी होती थी. तमाम कोशिशों के बाद भी मातील्‍दा मेक्सिको का टिकट ख़रीदने की हिम्‍मत न जुटा पाईं. पेरिस में ही एक महीने रहीं. पीड़ा, अवसाद, दुख और उहापोह के बीच वह प्रतीक्षा करती रहीं कि शायद नेरूदा उन्‍हें एक तार कर दें, कोई चिट्ठी लिख दें या फिर किसी दिन फ़ोन ही कर दें. ऐसा कुछ न होता देख वह हताश हो गईं. उन्‍हें लौट जाने का अपना फ़ैसला ग़लत लग रहा था, लेकिन जितनी बेरुख़ी से वह नेरूदा को छोड़ आई थीं, उनकी हिम्‍मत नहीं हो रही थी कि वह ख़ुद ही अपने दुख को स्‍वीकार कर सकें और नेरूदा को खोजकर यह कह सकें कि तुम्‍हारे बिना नहीं रहा जा रहा.

जिस दिन उन्‍होंने मेक्सिको का टिकट ख़रीदा, उसी शाम उन्‍हें नेरूदा का फ़ोन आया. उनकी आवाज़ सुनते ही वह खिल उठीं. लेकिन नेरूदा ने रूखी सी आवाज़ में कट-टु-कट सिर्फ़ एक लाइन कही, 'कल दोपहर कहीं मत जाना. तुम्‍हारे नाम एक पार्सल भेजा है.' मातील्‍दा को लगा कि नेरूदा की नई किताब 'कान्‍तो जनरल' आने वाली थी, उन्‍होंने वही भिजवाई है. फिर भी नेरूदा का फ़ोन पाकर उन्‍हें बेतहाशा ख़ुशी हुई. उन्‍हें अच्‍छा लगा कि पाब्‍लो ने अभी तक उन्‍हें अपने जीवन से बाहर नहीं किया है. वह अगली दोपहर का इंतज़ार करने लगीं. शाम हो गई, कुछ नहीं आया. रात को अचानक दरवाज़े की घंटी बजी, मातील्‍दा ने लपककर दरवाज़ा खोला, तो सामने नेरूदा की एक प‍त्रकार मित्र खड़ी थी, जिससे इनकी भी अच्‍छी बनती थी. वह प्राग से, शाम वाली फ़्लाइट से आ रही थी.

थोड़ी देर बात करने के बाद मातील्‍दा ने पूछा, 'मेरा कोई पार्सल आने वाला था, क्‍या तुम्‍हीं लाई हो?'

दोस्‍त ने कहा, 'मैं ही तुम्‍हारा पार्सल हूं. मुझे पाब्‍लो ने ही भेजा है, अपने आप नहीं आई हूं.'

फिर दोस्‍त ने कहना शुरू किया, नेरूदा बीमार हो गए हैं. दुबले और क्‍लांत हैं. उनका मन नहीं लगता, वह चिड़चिड़े हो गए हैं. सारे दोस्‍त अब उनसे दूर भागने लगे हैं. उनसे बात करने जाओ, तो काटने को दौड़ते हैं. आज सुबह उनका फ़ोन आया. मुझे नींद से जगा दिया और कहा, तुम्‍हारा टिकट तैयार है. एअरपोर्ट पर मिल जाएगा. सीधे पेरिस पहुंचो और मातील्‍दा को मेरे पास ले आओ.

मातील्‍दा को यह सब सुन अच्‍छा लगा, लेकिन वह जताने लगीं कि उन्‍हें लौटना है. उन्‍होंने टिकट भी ख़रीद लिया है. वह पाब्‍लो के प्रस्‍ताव के बारे में सोचेंगी और मेक्सिको पहुंचकर उन्‍हें चिट्ठी लिख देंगी.

यह सुनकर दोस्‍त ज़ोर से हंसी और बोली, 'लगता है, तुम पाब्‍लो को अब भी नहीं जान पाई. इतना समय नहीं होता उसके पास. यह सुबह की टिकट है, हम दोनों की. सुबह हम जिनेवा पहुंच रहे हैं. वहां एअरपोर्ट के बाहर एक कैफ़े में पाब्‍लो हमारा इंतज़ार कर रहा होगा. और हां, सुन लो, ऐसे नहीं चलोगी, तो मुझे मजबूरन पेरिस से ही अपने कुछ और दोस्‍तों को बुलाना होगा. फिर हम सब तुम्‍हें जबर्दस्‍ती उठा ले जाएंगे. ऐसा पाब्‍लो ने ही कहा है. उसने सबको तैयार रहने को कहा है. बस, उन्‍हें बुलाने की देर है.'

मातील्‍दा वहीं सुबकने लगीं. अगली सुबह जिनेवा के उस कैफ़े में दोंनो प्रेमी तरुणों की तरह चिपके हुए थे और देर तक रोते रहे थे.


Saturday, April 21, 2012

पिकासो की प्रेमिकाएं






पिकासो की पेंटिंग 'सपना'. इसमें मैरी वॉल्‍टर मॉडल के रूप में हैं.

पिकासो का प्रेम-जीवन बहुत डरावना है. पिकासो ने कई बार प्रेम किया और हर बार वह ख़ुद प्रेम से दूर हुए. कई बार मुझे लगता है कि प्रेम भी उनके लिए एक प्रयोग था. वह न जाने किस चीज़ की तलाश कर रहे थे. उनके जीवन में कई प्रेम के बारे में पता चलता है, लेकिन सात प्रेमिकाओं ने उनकी कला पर गहरा प्रभाव डाला. पिकासो के कलात्‍मक जीवन में आलोचक सात मोड़ मानते हैं. द ब्‍लू पीरियड, द रोज़ पीरियड यानी गुलाब-काल, द न्‍यूड, क्‍यूबिज़्म, अफ्रीका से प्रभावित काल, क्‍लासिक दौर और सर्रियलिस्‍ट आदि हिस्‍से. हर प्रेम के बाद पिकासो के चित्रों में बदलाव आया. 


1904 : 
फरनांदे ओलिवर, पिकासो की पहली प्रेमिका थी. उसके साथ रहकर पिकासो ने 'द रोज़ पीरियड' पर काम किया. उस दौरान की अधिकांश पेंटिंग्‍स में जिस महिला की छवि है, वह ओलिवर ही है. दोनों नौ साल तक साथ रहे. पिकासो बहुत ईर्ष्‍यालु और पज़ेसिव प्रेमी थे. ओलिवर पर इतना संदेह करते थे कि कुछ घंटों के लिए बाहर जाना हुआ, तो ओलिवर को कमरे में बंद कर देते और बाहर से ताला लगा देते थे. ऐसा बरसों तक होता रहा, जब तक कि उनके जीवन में एवा गूल न आई. 


1913 :
एवा गूल के साथ भी पिकासो ओलिवर की तरह ही रहना चाहते थे, लेकिन यहां टकराव हुआ. उनका प्रेम-संबंध बहुत छोटा रहा. एवा ने दूर होने की धमकी दी, तो पिकासो ख़ुद ही दूर हो गए. एवा इसे सहन नहीं कर पाई, उसे टीबी हो गई. मनोरोगों और अवसाद से जूझते 1915 में उसकी मृत्‍यु हो गई. उसकी मृत्‍यु ने पिकासो को तोड़ दिया. क्‍यूबिज़्म पर किए गए तमाम कामों में आप पिकासो का एवा के प्रति प्रेम देख सकते हैं. क्‍यूबिज़्म में पिकासो पैशन से भरे हुए हैं.


1918 :
रूसी नर्तकी ओल्‍गा कोकलोवा से शादी करने से पहले पिकासो का ओल्‍गा की कई मित्रों से प्रेम रहा. ओल्‍गा रूसी नर्तकी थी और यूरोप के अभिजात्‍य में उसकी गहरी पैठ थी. उसने पिकासो को कई हाई-प्रोफ़ाइल लोगों से मिलाया, उनकी कला को पेरिस के एलीट के बीच प्रस्‍तुत किया. पिकासो मूलत: बोहेमियन स्‍वभाव के थे और ओल्‍गा पूरी तरह एलीट. दोनों में नहीं जमनी थी. नहीं जमी. ओल्‍गा से मुलाक़ात ही वह समय था, जब पिकासो ने बैलेरिना में पेंटिंग के प्रभावों को बदल दिया. उसी दौरान फिल्‍मकार ज़्यां कोक्‍त्‍यू से उनकी मित्रता गहरी हुई. कोक्‍त्‍यू ने कहीं लिखा, 'पिकासो मुझे रोज़ हैरत में डाल देते हैं. वह कई सुंदर आकार बनाते हैं, और घोषित सुंदरता से कुरूप आकारों की तरफ़ बढ़ते हैं. फिर वह सुंदर, सरल आकारों, चित्रों को रिजेक्‍ट कर देते हैं.' पिकासो ने यहां एक नया सौंदर्यशास्‍त्र गढ़ा था. लोगों ने जब उसे देखा, तो हैरान रह गए थे. उसे तुरत स्‍वीकृति नहीं मिली थी. यह ओल्‍गा के साथ पिकासो के प्रेम व कटु संबंधों का प्रतिफलन था. इनमें पिकासो का रंग-प्रयोग बहुत आक्रामक हो गया था. वहां ओल्‍गा भी अवसाद और पागलपन से घिर रही थी. 17 साल साथ रहने के बाद दोनों अलग हो गए. ओल्‍गा को नर्वस ब्रेकडाउन हो गया. वह विक्षिप्‍तों-सी हो गई. वह हमेशा उनका इंतज़ार करती रही.  ओल्‍गा को जब भी यह लगता कि पिकासो का प्रेम अब फलां लड़की के साथ चल रहा है, तो वह उस लड़की से संपर्क करती और पिकासो से दूर होने के लिए ध‍मकियां देती. धमकाते-धमकाते वह रोने लगती और धमकी, गुज़ारिश की भाषा में बदल जाती, 'मुझे मेरा पाब्‍लो लौटा दो.'  पिकासो ने उसे तलाक़ नहीं दिया था, क्‍योंकि ऐसा करने पर संपत्ति का आधा हिस्‍सा उसे देना होता. पिकासो धन के मामले में बेहद कंजूस थे. ओल्‍गा अपनी मृत्‍यु तक पिकासो की पत्‍नी बनी रही. 


1927 :
45 साल के पिकासो के जीवन में सत्रह साल की मैरी वॉल्‍टर आई. दोनों ने अपना प्रेम और रिश्‍ता गुप्‍त रखा. पिकासो उस समय ओल्‍गा के साथ रह रहे थे. वह किसी भी तरह इस रिश्‍ते को छुपा लेना चाहते थे, लेकिन वह अब तक सेलेब्रिटी बन चुके थे और ऐसा होना मुश्किल था. वह उनकी पेंटिंग्‍स के लिए मॉडल का काम करने लगी. पिकासो ने अपने घर के सामने एक मकान किराए पर लेकर मैरी को दिया. कुछ ही बरसों बाद उन्‍होंने एक महलनुमा स्‍टूडियो बनाया और मैरी वहां रहने लगी. 1935 में मैरी ने पिकासो की बेटी को जन्‍म दिया. इसके बाद ओल्‍गा सहित सभी को पिकासो के इस संबंध के बारे में जानकारी मिल गई. ओल्‍गा ने इसी घटना के बाद पिकासो को छोड़ दिया. मैरी हमेशा पिकासो से शादी करना चाहती थी. 'गेर्निका' बनाने के ठीक पहले क़रीब पांच साल तक पिकासो की पेंटिंग्‍स में बहुत चमकीले रंग, प्रसन्‍न चेहरे वाली एक युवती और आह्लाद के स्‍ट्रोक्‍स दिखते हैं. वे सब मैरी वॉल्‍टर है. चित्रों में अनूदित प्रेम. बेटी के जन्‍म के दो साल बाद पिकासो का एक और प्रेम होना था डोरा मार से. इस प्रेम के बारे में जानकारी मिलते ही मैरी बहुत दुखी हुई. वह अपनी बेटी के साथ दूर रहने चली गई. पिकासो ने कभी उससे शादी नहीं की, लेकिन हमेशा उसकी आर्थिक मदद करते रहे. 1977 में, पिकासो की मौत के चार साल बाद, बरसों लंबे अवसाद से परेशान होकर मैरी ने गले में फंदा डालकर आत्‍महत्‍या कर ली. 


1936 :
एक दावत में कवि पॉल एलुआर, पिकासो की मुलाक़ात फ्रेंच फोटोग्राफ़र डोरा मार से कराते हैं. डोरा बला की ख़ूबसूरत है और बहुत सुंदर स्‍पैनिश बोलती थी. पिकासो उसके भाषा पर प्रभुत्‍व से प्रभावित हो गए. पिकासो ने डोरा मार से प्रेम के बाद ही महान पेंटिंग 'गेर्निका' बनानी शुरू की. स्‍पैनिश गृहयुद्ध की विभीषिका पर आधारित यह पेंटिंग अगर आप सामने देखें, तो रोंगटे खड़े हो जाएंगे, लेकिन उस पेंटिग में भी एक सुंदर चेहरा है, लेकिन वह रो रहा है. वह डोरा मार है. डोरा मार फोटोग्राफर थी और उसने 'गेर्निका' की रचना-प्रक्रिया और उसकी निर्मिति की छवियां बनाईं. 'गेर्निका' के बारे में कही गई उसकी बातें आज भी सबसे ज़्यादा प्रामाणिक मानी जाती हैं. एक दिन मैरी वॉल्‍टर अचानक पिकासो के स्‍टूडियो पहुंची और वहां उसने डोरा मार को देखा. डोरा के साथ प्रेम की ख़बरें मैरी ने सुन रखी थीं. वहां दोनों में कहासुनी हुई. पिकासो ने कहा कि तुम दोनों आपस में तय कर लो, मुझे किसके साथ रहना चाहिए. वह कुर्सी लगाकर बैठ गए. दोनों प्रेमिकाओं की कहासुनी बाक़ायदा कुश्‍ती में बदल गई. उन्‍होंने एक-दूसरे के बाल खींचे, कपड़े फाड़ दिए, और एक-दूसरे का उठाकर पटक दिया. मैरी वॉल्‍टर ने अपमानित और पराजित महसूस किया और पिकासो के जीवन से बाहर चली गई. डोरा मार उनके साथ रही. पिकासो ने अपने संस्‍मरणों और इंटरव्‍यूज में कहा है, 'वह मेरे जीवन का सबसे सुंदर क्षण था, जब मैंने दो औरतों को मारपीट करते देखा, इस बात के लिए मारपीट कि मेरे साथ कौन रहेगा.' पिकासो हमेशा उन स्थितियों को पसंद करते थे, जब एक महिला, उन पर दावेदारी के लिए दूसरी को कोस रही होती थी. लेकिन सात साल बाद पिकासो डोरा मार से भी अलग हो गए. डोरा के लिए यह इतना बड़ा सदमा था कि वह रोती रही, रोती रही. वह इतना रोई कि उसे रोना रोकने के लिए दवाएं लेनी पड़ीं. उसके बाद वह कभी अवसाद से बाहर नहीं आ सकी. बीस साल इसी दुख में रहने के बाद उसके कुछ प्रेम और हुए, लेकिन पिकासो की जगह कोई न ले पाया. पिकासो ने अपनी पेंटिंग्‍स में हमेशा उसे रोती हुई सुंदरी के रूप में दिखाया था. डोरा मार को नहीं पता था कि पिकासो उसका वर्तमान नहीं, उसका भविष्‍य रंग रहे हैं. प्रेम में पागल हुई, धोखा खाई एक रोती हुई बर्बाद सुंदरी. पिकासो ने उसके लिए निजी पेंटिंग्‍स बनाई थीं. 1997 में डोरा ने अपनी मृत्‍यु तक उन्‍हें छिपाए-संभाले रखा था. 


1944 :
पिकासो 63 साल के थे, जब उनका प्रेम कला की छात्रा 23 वर्षीय जीलो से होता है. पिकासो से संबंध को जीलो ने प्रेम के साथ-साथ अपने कैरियर में बड़े बदलाव की तरह भी देखा. पिकासो के साथ उसने कला की बारीकियां सीखीं. पिकासो के लिए उसने आर्ट क्रिटीक का काम किया. मॉडल के अलावा वह पिकासो के आयोजनों की मेज़बान भी थी. डोरा मार से प्रेम के दौरान ही पिकासो का प्रेम जीलो के साथ हुआ और इसी कारण वह डोरा से अलग हुए. दोनों के अलग होते ही जीलो पिकासो के साथ रहने लगी. उसने भी पेंटिंग्‍स बनाईं और उसे नाम मिला, लेकिन पेरिस के कलाजगत का यह मानना था कि एक अत्‍यंत प्रतिभाशाली लड़की ने पिकासो से प्रेम करके ख़ुद को ख़त्‍म कर लिया है. अगर वह खु़द अकेले अपनी पेंटिंग्‍स पर काम करती, तो शायद उसे ज्यादा प्रसिद्धि मिलती. जीलो पेरिस में ही थी, जहां उसने पिकासो की रूसी नर्तकी पत्‍नी ओल्‍गा के पागलपन को झेला. ओल्‍गा ने पिकासो की प्रेमिकाओं में संभवत: जीलो पर ही सबसे ज़्यादा प्रहार किए. जीलो की स्थिति भी ओल्‍गा जैसी ही होने लगी. क़रीब दस साल तक साथ रहने के बाद वह पिकासो से अलग हो गई. अलगाव के बाद उसने किताब लिखी- लाइफ़ विद पिकासो, जिसकी लाखों प्रतियां बिकीं. पिकासो ने उस किताब का प्रकाशन रुकवाने के लिए कोर्ट में केस कर दिया था, लेकिन वह हार गए. जीलो ने उसके बाद पेंटर और लेखिका के रूप में अपना जीवन बिताया, और वह पिकासो की एकमात्र प्रेमिका थी, जिसने पिकासो से अलगाव के बाद अपना मानसिक संतुलन नहीं खोया. 


1953 :
पिकासो अब बूढ़े हो गए थे, लेकिन अब नवयुवतियों के प्रति उनका प्रेम और प्रगाढ़ हो रहा था. जीलो के साथ प्रेम के दौरान ही उनके कई छिटपुट संबंध बने, लेकिन 27 साल की जैकलीन रोके के आने से जीलो के साथ उनके संबंध समाप्‍त हो गए. रोके भी उनमें से थी, जिनसे पिकासो पहली ही नज़र में प्रेम कर बैठे. उसे प्रभावित करने के लिए एक दिन वह रोके के घर गए और उसके दरवाज़े पर चॉक से कबूतर का चित्र बनाया. उसके बाद वह छह महीने तक लगातार हर रोज़ रोके को गुलाब देते रहे. अंतत: रोके भी उनके प्रेम में पड़ गई. इस प्रेम को भी उन्‍होंने गुप्‍त रखा. जीलो ने अपने पति को तलाक़ दे दिया था और पिकासो से शादी करना चाहती थी. पिकासो ने ही उसे तलाक़ देने को कहा था, लेकिन उस दौरान उन्‍हें लगा कि जीलो सिर्फ उनके पैसों के कारण उनसे शादी करना चाहती है. पिकासो ने चोरी-छिपे रोके से शादी कर ली. यह पिकासो का आखि़री प्रेम था. दोनों 20 साल तक साथ रहे. पिकासो अब हर चीज़ से दूर हो चुके थे. बीमार और बूढ़े. सिर्फ़ चित्र बनाया करते. रोके को सामने रख उन्‍होंने 400 से ज़्यादा चित्र बनाए. रोके न केवल उनकी पत्‍नी थी, बुढ़ापे का सहारा, बल्कि उनकी सेक्रेटरी भी. 1973 में पिकासो की मौत के बाद उनकी जायदाद को लेकर विवाद हो गया्. जीलो, पिकासो के बच्‍चों की मां थी. उसने केस कर दिया. रोके क़ानूनी पत्‍नी थी. अंत में मामला सुलझाया गया और पिकासो की जायदाद से बनी संस्‍था 'म्‍यूसी पिकासो' की स्‍थापना हुई. यह नाम पिकासो की प्रेमिकाओं और प्रेरणाओं की स्‍मृति में रखा गया. रोके पिकासो से बहुत जुड़ी हुई थी. उनके मरने के बाद उनकी कला और उससे जुड़ी आर्थिकताओं को संभालती रही, लेकिन अकेलापन उसके लिए भारी था. वह पिकासो को याद कर हमेशा रोती. रुदन से अवसादग्रस्‍त होती. कभी हाइपर हो जाती. ऐसी ही, स्‍मृतियों के आक्रमण में ख़ुद को संभलने में अक्षम पा उसने ख़ुद को गोली मार ली. 


पिकासो ने सबसे प्रेम किया. उनका निजी जीवन था, उनका रवैया सही था या ग़लत, इस पर नैतिकतावादी कुछ भी कह सकते हैं. हम भी कह सकते हैं.

पर बहुधा मुझे लगता है, शायद पिकासो बहुत जुनूनी प्रेमी थे, इसीलिए उनका अलग होना उन स्त्रियों को सहन नहीं हुआ, जो ख़ुद उनसे अलग हो जाना चाहती थीं. शायद पिकासो ने उनके अनेक प्रश्‍नों को अनुत्‍तरित छोड़ दिया था. प्रेम में ऐसी दीवानगी उस समय भी आती है, जब आपका प्रेमी आपके प्रश्‍नों के जवाब नहीं देता. तब आप सिर्फ़ प्रेम के लिए नहीं जी रहे होते, बल्कि उन उत्‍तरों के लिए भी जी रहे होते हैं. 



(डायरी से.)

Tuesday, April 10, 2012

शब्‍द-बोध, दिशा-बोध




Painting : Ravindra Vyas, Indore.



कविता के भीतर कुछ शब्‍द लगातार कांपते रहते हैं. वे पत्‍तों की तरह होते हैं. हवा का चलना बताते हैं. दिशा-बोध कराते हैं. कांपते हुए शब्‍दों का दायित्‍व है कि वे दूसरे शब्‍दों को जगाए रखें, जिलाए रखें.

कविता के सौष्‍ठव और प्रभाव पर तभी फ़र्क़ पड़ता है, जब उन शब्‍दों के साथ अभ्‍यास व प्रयोग किया जाए. बाक़ी शब्‍द इतने सेंसिटिव नहीं होते.

कविता अपने में प्रयुक्‍त सारे शब्‍दों पर नहीं, महज़ कुछ शब्‍दों पर टिकी होती है. उन शब्‍दों से बनने वाले अदृश्‍य वातावरण पर टिकी होती है. क़रीब से देखें, तो अदृश्‍य पर सबकुछ नहीं टिक सकता. ध्‍वनि टिकती है. दृ श्‍य टिकता है. तरंग टिकती है. और आकाश भी इसी अदृश्‍य पर टिका है. बहुत दूर से पृथ्‍वी को देखें, तो पता चले कि पृथ्‍वी भी निराधार है. अदृश्‍य पर टिकी है.

इसलिए हर चीज़ को क़रीब से देखने की ज़रूरत भी नहीं. दूर होकर देखना बहुधा पूरा देखना है. यह उसी तरह है, जैसे बचपन में हम एक खेल खेलते थे. एक गेंद में रबर की रस्‍सी बंधी होती है. रबर का एक सिरा हम उंगली में बांध लेते, फिर गेंद को हाथ में पकड़ ठीक सामने फेंकते. गेंद तेज़ी से दूर जाती, उतनी ही तेज़ी से लौट आती. लौटती गेंद को पकड़ना आसान नहीं होता. यह उसे पकड़ लेने का खेल था.

कवि उसी गेंद पर बैठा होता है. वह जितनी तेज़ी से चीज़ के क़रीब जाता है, उतनी ही तेज़ी से लौट भी आता है. तेज़ी के इन्‍हीं पलांशों के बीच उसे अपनी स्थिरता का ग्रहण करना होता है. वे पल, पलांश ही उसकी काव्‍य-दृष्टि की मर्जना करते हैं.

* * *

(डायरी का एक टुकड़ा. अभी समालोचन पर मेरी डायरी के कुछ टुकड़े प्रकाशित हुए हैं. डायरी मेरे नोट्स हैं. पढ़ाई या न-लिखाई के दिनों में साथ रहती है. उसमें निजी ब्‍यौरे बहुत कम होते हैं. मेरे पास बहुत कम निज है.  जो निज है, वह इतना ज़्यादा निज है कि मैं उसे डायरियों को भी नहीं बताता.

बहरहाल, डायरी के उन टुकड़ों को पढ़ने के लिए आप नीचे दिए गए लिंक पर जा सकते हैं. ऊपर जो टुकड़ा लगा है, वह समालोचन की प्रस्‍तुति में शामिल नहीं है.)

समालोचन : निज घर : गीत चतुर्वेदी की डायरी

* * *

ऊपर लगी कलाकृति हमारे प्‍यारे मित्र रवींद्र व्‍यास की है. आज 10 अप्रैल उनका जन्‍मदिन है. उन्‍हें जन्‍मदिन की ढेरों शुभकामनाएं देते हुए यह सब उन्‍हें समर्पित. 


Friday, March 16, 2012

आंसू चांद की आंखों से नहीं, उसके थन से निकलते हैं दूध बनकर



Iwona Siwek-Front, Polish Artist.



मछली होना दुखद है
गहरे तैरती है फिर भी थाह नहीं पाती

पेड़ को अदृश्‍य हवा हिला देती है
मेरे हाथ नहीं हिला पाते

अथाह और अदृश्‍य में दुख की आपूर्ति है

मैं यहां नहीं होता तो सड़क का एक लैंप पोस्‍ट होता
मेरी आत्‍मा अगर मुझमें नहीं होती
तो जंगल के बहुत भीतर अकेले गिरता झरना होती

बारिश मुझसे ज़्यादा मेरी छतरियों को भाती है
पैदल चलना नृत्‍य की कामना है

छोटा ईश्‍वर दिन में सोता है
सारी रात ति‍तलियों का पीछा करता है

*  *  *

अतीत मातृभूमि है
वर्तमान मेरा निर्वासन
कोई सड़क कोई हवा मेरी मातृभूमि तक नहीं जाती
मैं अनजानी जगहों पर रहता है
श्रेष्‍ठतम रहस्‍य अपनी मासूम दृष्टि से मेरी पीठ पर घावों की भुलभुलैया रचते हैं

तुम्‍हारे जितने अंग मैं देखूंगा
उतनी कोमलता उनमें बरक़रार रहेगी
मेरी दृष्टि गीला उबटन है

जुलाई की बारिश मेरी नींद की गंगा है

पुरानी फ़र्शों पर पड़ी दरारें उनकी प्रतीक्षा हैं
जिन्‍होंने नयेपन में उनसे प्रेम किया था

हर दरार के भीतर कम से कम एक अंधेरा रहता है

पेंसिल का छिलका फूल बनने का हुनर है
टूटी हुई नोंक टूटे सितारों की सगेवाली है

छोटा ईश्‍वर हर अंग से बोलता है
उसके होंठ उपजाऊ हैं चुप का बूटा वहीं हरा खिलता है

*  *  *

मृत्‍यु सबसे शक्‍ितशाली चुंबक है
अपनी कार मैं नहीं चलाता
गंतव्‍य उसे अपनी ओर खींच लेता है

पुरानी छत की खपरैल पर तुम्‍हारे साथ बैठा मैं
दूर से तुम्‍हारी ओर झुके गुंबद की तरह दिखता हूं

नीमरोशनी में अधगीली सड़क पर पानी का डबरा
नदी का शोक है
तुम्‍हारे पदचिह्न ईंट हैं जिन्‍हें जोड़कर मैं अपना घर बनाऊंगा

भाषा के भीतर कुछ शब्‍द मुझे बेतहाशा गुदगुदी करते हैं
तुम्‍हारा संगीत हमेशा मेरी त्‍वचा पर बजता है
तुम्‍हारी आवाज़ के अश्‍व पर बैठ मैं रात के गलियारों से गुज़रता हूं

तुम्‍हें जाना हो तो उस तरह जाना
जैसे गहरी नींद में देह से प्राण जाता है
मौत के बाद भी थिरकती मुस्‍कान शव का सुहाग है

छोटा ईश्‍वर ताउम्र जीने का स्‍वांग करेगा
उम्र के बाद वह तुम्‍हारी गोद में खेला करेगा

*  * *

इमारतें शहरों की उदासी हैं
मैं इस शहर की सबसे ऊंची इमारत की छत पर टहलता हूं
आंसू चांद की आंखों से नहीं, उसके थन से निकलते हैं दूध बनकर
रात का उज्‍ज्‍वल रुदन है चांदनी

धरती और आकाश के बीच बिजली के तार भी रहते हैं

उबलते पानी के भीतर गले रहे चीनी के दाने त्‍वचा की तरह दिखते हैं
बालाखिल्‍य की तरह मैं अपनी भाषा से उल्‍टा लटका हूं
मेरी उम्‍मीदें गमले में उगे जंगल की तरह थीं
मिट्टी में जड़ की तरह धंसा मैं तुममें
जड़ होकर भी मैं चेतन था
इसीलिए चौराहों पर तुम्‍हें दिशाभ्रम होना था

ढलान पर खिला जंगली गुलाब अपने कांटों के बीच कांपता है
मेरी आत्‍मा कांपती है झुटपुटे में प्रकाश की तरह
कुछ दृश्‍यों को मैं सुंदर-सा नहीं बना पाता
चित्रकला की कक्षा में मैं बहुधा अनुपस्थित रहा

अकूत और अबूझ में पीड़ा का बहनापा है

घाव लगने पर छोटा ईश्‍वर सिगरेट सुलगाता है
अ-घाव के दिनों में कंकड़ों का चूरा बना पानी में बहाता है.


*  *  *

('छोटा ईश्‍वर' सीरिज़ की ये कविताएं नीत्‍शे के प्रति मेरा आदर है. आदर अनंत है. सीरिज़ अनादि है.
साथ में लगी पेंटिंग मेरी प्रिय पोलिश चित्रकार इवोना सिवेक-फ्रंट Iwona Siwek-Front की है.) 

Wednesday, March 7, 2012

तुम्हारा नाम उच्चारना तुम्हें हमेशा के लिए त्याग देना है





बेई दाओ मेरे प्रिय कवि हैं. 1989 में चीन से निर्वासित होने के बाद दुनिया के कई हिस्‍सों में रह-भटक कर कविता करने वाले बेई दाओ अब हांगकांग में रहते हैं और कविता के भीतर अपनी आत्‍मा की कैलीग्राफ़ी करते हैं. पहली नज़र में गूढ़ लगने वाले बेई दाओ को राजनीतिक कवि माना जाता है. पिछले कुछ बरसों से नोबेल पुरस्‍कार के दावेदार हैं, इस क़दर, जो कि उनके क़रीबी दोस्‍त बताते हैं, कि हर साल नोबेल की घोषणा के आसपास वह अपना फ़ोन बंद कर देते हैं, क्‍योंकि घोषणा से पहले यार-दोस्‍त-मीडियावाले-मुंहलगे पाठकगण इस तरह का फ़ोन कर-करके परेशान कर देते हैं कि देखना, इस बार तुम्‍हें ही मिलेगा. फिर घोषणा के बाद यह कह-कहकर कि अरे, इस बार भी नहीं. अगली बार तो पक्‍का मिलेगा, यक़ीन है. अकेला रहने वाला कवि ऐसे फोन कॉल्‍स से घबरा जाता है.

लेकिन अपने आप में यही एक बड़ा उदाहरण है कि उनके पाठकों को उन पर और उनकी कविता पर कितना यक़ीन है.

मैंने बेई दाओ की 36 कविताओं का हिंदी अनुवाद किया है. साथ में एक विस्‍तृत लेख भी है उन पर, और कविता के उपकरणों पर. सबद पर 'सबद पुस्तिका 7' के रूप में प्रकाशित हुआ है. नीचे दिए लिंक पर जाइए, कविताएं पढि़ए. एक विराट कवि के वैभव को देखिए.

हर बार की तरह यह सबद पुस्तिका भी पीडीएफ़ फॉर्मेट में डाउनलोड करने के लिए उपलब्‍ध्‍ा है. नीचे दिए 'सबद' के लिंक पर जाने के बाद 48 पेज की इस पुस्तिका को आप डाउनलोड कर सकते हैं, प्रिंट निकालकर पढ़ सकते हैं, और फ़ाइल में सुरक्षित रख सकते हैं.



नमक
(चिन सान लान्ग के साल्टवर्क नामक फोटोग्राफ़ को देखने के बाद)


निगेटिव पर काली रात का कोयला
लोगों के रोज़मर्रा के नमक में तब्दील हो जाता है
एक चिडिय़ा नई ऊंचाइयों को छूती है
छत पर लगे पैबंद
पृथ्वी को ज़्यादा दुरुस्त बनाते हैं

धुआं पेड़ों से भी ज़्यादा ऊंचाई पर पहुंचता है
यह जड़ों की स्मृति से निकलता है
भारी बर्फ़बारी की नक़ल करता हुआ
समय अपनी अमीरी का प्रदर्शन करता है
रोज़गार के अंधे कुएं
सुबह के दुख पर छलक-छलक जाते हैं

कांपती हुई चहारदीवारी पर चलती हुई शराबी हवा
सड़क पर गिर जाती है
कोहरे के भीतर कोई घंटी गूंजती है -
ऐसे कि बस धड़कता रह जाता है काग़ज़ का हृदय*


शीर्षकहीन-2

दुर्घटनाओं से भी ज़्यादा अपरिचित
मलबों से भी ज़्यादा संपूर्ण

तुम्हारा नाम उच्चारना
तुम्हें हमेशा के लिए त्याग देना है

यौवन के कीचड़ पीछे छूट गए हैं
घड़ी के भीतर कहीं
*

बेई दाओ 


Monday, February 27, 2012

मैं समंदर को प्रेम क्‍यों कहता हूं?






photo source : unknown (with apologies)
कल एक मित्र ने पूछा, 'जब भी प्रेम पर लिखते हो, उसमें समंदर ज़रूर आता है. क्‍यों?' 

मैंने कहा, 'पेड़ भी आते हैं. आसमान भी आ ही जाता है.' 

'लेकिन समंदर ज़्यादा आता है.' 

मैंने उसे कुछ कारण बताए. सारे तो मैं बता भी नहीं पाऊंगा. या उनका समय ही नहीं अब. पर समंदर मेरी निजी पसंद है. बहुत सारे लोगों को पसंद है, इसलिए निजता वैसी भी नहीं. कुछ ऐसी है, जैसे हवा सबकी निजी ज़रूरत है, फिर भी जीव होने के कारण मेरी विशेष ज़रूरत भी है. 

पहला कारण तो संभवत: यही है कि मैं मुंबई का हूं, वहीं पला-बढ़ा, वहीं हंसा-रोया. जब बहुत ख़ुश होता, तो समंदर के पास चला जाता. जब बहुत उदास होता, तो समंदर के पास चला जाता. किनारे जब अकेला बैठता, तो समंदर सशरीरी रूप में मेरी बग़ल में आ बैठता. किनारे जब किसी के साथ बैठता, तो समंदर हम दोनों के बीच एक पतली दरार की तरह अंड़स जाता. जिस समय निगाहों के आगे न होता, उसकी तस्‍वीर होती. भयानक चुप्‍िपयों के बीच मैंने समंदर की आवाज़ को स्‍मृति की तरह सुना है. तब से मेरा यक़ीन है कि आवाज़ें गीली होती हैं. 

इस समय भी जब यह लिख रहा हूं, कमरे में सिर्फ़ की-बोर्ड खटक रहा है, बीच-बीच में आदत के मुताबिक़ टाइप करते हुए मैं शब्‍दों को उच्‍चार भी रहा हूं. जैसे यही पंक्ति उच्‍चार कर टाइप की. और कोई बाहरी आवाज़ नहीं है. फिर भी मैं समंदर की गीली आवाज़ को कानों में टपकता पाता हूं. 

मैं अपनी हथेली का स्‍पर्श अपनी ही जीभ से करता हूं. अरब सागर का नमक मेरे स्‍वाद का अभिवादन करता है. 

मुझे तैरना नहीं आता. गहरे पानी से मैं हमेशा ख़ाइफ़ रहता हूं. डूबने के लिए किसी ट्रेनिंग की ज़रूरत नहीं पड़ती. उसे कोई नहीं सिखा सकता, इसलिए वह तैरने से भी ज़्यादा मुश्किल है. 

जितनी बार मैंने समंदर को देखा, पाया, वह सिर्फ़ ऊपर से ही बेज़ार रहता है, लगातार अस्थिर. एक ही दिशा में बार-बार दौड़ता हुआ. उसके भीतर की तस्‍वीरें देखी हैं. निस्‍तब्‍धता है. गहरी शांति. अपूर्व स्थिरता. लहरें गहराई का गुण नहीं. लहरें समंदर की त्‍वचा हैं, शल्‍कयुक्‍त. अस्थिरता आंखों का सुरमा है. चंचलता गहना है. शांति उपलब्धि है. स्थिरता को हमेशा एक अस्थिर चादर की दरकार होती है. लहरें सबकुछ बाहर फेंक देती हैं. गहराई सबकुछ समेट लेती है. 

प्रेम का स्‍वभाव भी कुछ ऐसा ही है. सारी बेचैनी ऊपरी होती है, भीतर कहीं प्रेम की शांति होती है. आप कितना भी लड़ रहे हों, भीतर एक स्थिरता होती है, इस अनुभूति से भरी कि प्रेम है, निश्‍िचत है, तभी यह अस्थिरता है. प्रेम हर चीज़ को लौटा देता है. प्रेम हर चीज़ को गहराई में समेट लेता है. प्रेम निराकार न होता, तो यक़ीनन उसका आकार समंदर जैसा होता. एक अस्थिर स्थिरता. एक स्थिर अस्थिरता. एक स्थिर गति. एक गतिमान स्‍थैर्य. यानी प्रेम. यानी समंदर. 

घंटों समंदर के किनारे अकेले बैठे रहने के बाद उभरने वाली ये अनुभूतियां अब भी साथ चलती हैं. इसीलिए समंदर अब भी साथ चलता है. दृष्टि में नहीं है. स्‍मृति में चलता है. जीवन में आप कितनी भी बुरी स्थिति में हों, प्रेम हमेशा आपके साथ चलेगा. दृष्टि में न चले, स्‍मृति में तो चलेगा ही. 

*
Pic by Diana Catherine
एक और कारण्‍ा है. वह ग्रीक मिथॉलजी से आता है. अफ्रोडाइटी ग्रीक मिथ में प्रेम, सौंदर्य और आनंद की देवी हैं. उसके पिता आसमान (यूरेनस) और मां दिन (दिएस) है. लेकिन वह दिएस से नहीं जन्‍मी थी. वह समंदर से जन्‍मी थी. बहुत सुंदर कथा है. विस्‍तार में नहीं जाऊंगा. यही कि एक द्वंद्व में यूरेनस का जननांग कटकर समंदर में गिर गया. लहरें झाग से भरी हुई थीं. झाग को लातिन में अफ्रोस कहते हैं. उस झाग से एक सुंदर युवती का जन्‍म या अवतरण हुआ. महान सुंदरी. अफ्रोस से निकलने के कारण उसका नाम अफ्रोडाइटी पड़ा. उस महान सुंदरी को प्रेम की देवी कहा गया. इस तरह प्रेम की देवी का जन्‍म समंदर के भीतर से होता है. अफ्रोडाइटी की सुंदरता के कारण युद्ध हुए. ख़ुद उसने कई युद्धों में भाग लिया. ट्रॉय के युद्ध में वह पेरिस के साथ थी. पेरिस के प्रेम ने उस युद्ध को जन्‍म दिया था. 

अफ्रोडाइटी, जिसने जीवन में अनंत बार प्रेम किया. प्रेम की शुद्धि और निष्‍ठा पर विमर्श चलाना सरपंचों का काम है, सहृदय सिर्फ़ उसका प्रेम देखेगा. मैं जब भी किनारे की झाग देखता हूं, मुझे अफ्रोडाइटी याद आती है. मैं झाग से निकलती एक देवी को देखता हूं और पाता हूं कि समय का गुज़र जाना हमारा भ्रम है. वह वहीं रहता है. कहीं नहीं जाता. जैसे हज़ारों साल पुराना वह ग्रीक समय कहीं नहीं गया. वह बांद्रा में बैंड स्‍टैंड के किनारे खड़ा रहता है. वह नरीमन पॉइंट पर खड़े होने पर मरीन ड्राइव के क्‍वीन्‍स नेकलेस की तरह दमकता रहता है. 

* 

ऋग्‍वेद कहता है कि हम सब जल की सं‍तति हैं. हम सब पानी से पैदा हुए हैं. समंदर के पानी से. अफ्रोडाइटी पानी से पैदा होती है. हम सब पानी से पैदा हुए हैं. हम सब अफ्रोडाइटी हैं. अफ्रोडाइटी प्रेम की देवी है. हम सब प्रेम के देव हैं. प्रेम के देवों को समंदर पैदा करता है. प्रेम को समंदर पैदा करता है. फिर क्‍यों न भला समंदर प्रेम का स्‍वामित्‍वबोधी रूपक हो? 

भाषा में मुझे नर-नारायण्‍ा का युग्‍म बड़ा मोहता है. सवाल आस्तिकताओं का नहीं, भाषा का है. नारायण, जिसका व्‍यावहारिक अर्थ विष्‍णु से लिया जाता है, लेकिन इसका शाब्दिक अर्थ है - वह जो पानी पर तैरता हो. जब यह कहा जाता है कि नर ही नारायण है, तो तुरंत मुझे ख़्याल आता है कि नर तो पानी पर तैरते हैं. भले तैरना न भी आए, तब भी. मन आपका सबसे बड़ा तैराक है. देह डुबो दोगे, मन को कैसे डुबोओगे? वह तो तिरता पार निकल जाएगा. डूबने की नई जगह का पता खोज लाएगा. उठो, नई जगह चलो. आप प्रेम में डूबते हैं, लेकिन प्रेम हमेशा तैरता रहता है. सबकुछ समंदर में डूबता है, लेकिन समंदर हमेशा तैरता रहता है. भले कहीं न पहुंचे. इस तरह समंदर ही नारायण है. वह जो पानी पर तैर सके. प्रेम भी यही है. हमेशा तैरता रहता है. भले कहीं न पहुंचे. 

पानी यानी नदी नहीं. जीवन की पहली नदी, (जिसे सही तरह से नदी कह सकते हैं, मुंबइया नाला टाइप नदियों से परे) जब देखी थी, तब तक मैं समंदर के इश्‍क़ में पड़ चुका था. और जब यह विचार आया कि अंतत: सारी नदियां, समंदर के मोह में ही धरातल पर तैरती हैं, तो लगा, मैं तो पहले ही गंतव्‍य में डूबा हूं. मैं नदी से समंदर की तरफ़ नहीं जाता, समंदर से नदियों की तरफ़ आया हूं. मैं उल्‍टे रास्‍तों का यात्री हूं. 

जब मैं ये सारी चीज़ें देखता हूं, तो समंदर को प्रेम से सिल देता हूं. दोनों एक हैं मेरे लिए. मेरी कविता और गद्य के लिए भी. 

पुराने ज़माने से कवियों को समंदर एक रूपक की तरह लुभाता रहा है. मुझे भी लुभाता है. ऐसे समय में मुझे नेरूदा का वह उद्घोष याद आता है, जब उन्‍होंने छद्म प्रयोगवादियों की ओर मुस्‍कान फेंकते हुए कहा था-- The Rose and The Moon are not alien to us. यानी सृष्टि के अंत तक दोनों ही प्रेम के प्रतीक बने रहेंगे, चाहे कितने भी नयेपन का आग्रह हो. 

ऐसे बहुत सारे कारण हैं, जिनके बारे में इत्‍मीनान से लिखूंगा, जिनने मेरे चेतन-अवचेतन में इस तरह के बिंब जिलाए हैं. और मेरे जिन दोस्‍तों को हमेशा यह गुप्‍तरोग रहता है कि तुम विदेशी साहित्‍य से प्रभावित हो, वे हैरत में पड़ जाएंगे कि अधिकांश बातें भारतीय मिथॉलजी से निकलकर आती हैं. 


(डायरी का हिस्‍सा, 21 फ़रवरी 2012)


Tuesday, May 3, 2011

प्रेम, कविता और शोपां





शोपां पियानो
18 जनवरी 2010
मोत्सार्ट के संगीत के बारे में कई विद्वानों का कहना है कि यह बहुत सोच-समझकर रचा गया संगीत है, दिमाग की सारी जटिलताओं को रूपायित करता हुआ; वहीं बीथोफन के संगीत के बारे में राय अलग है- कहा जाता है, वह संगीत बीथोफन के दिल से निकलता है और सीधे सुनने वालों के दिलों में समा जाता है। मुझे लगता है- बीथोफन का दिल जब आखिरी बार धड़का होगा, तब उसने थोड़ा-सा रक्त बरसों बाद आने वाले शोपां के दिल को नज़र किया होगा। शोपां को, देर रात, देर तक सुनने के बाद ऐसा ही महसूस होता है।

रूबीन्स्टीन का पियानो, शोपां का नॉक्टर्न। अगर श्रीकृष्ण ने बांसुरी के वेस्टर्न नोट्स बनाए होते, तो वे शोपां के नॉक्टर्न की तरह ही होते। (यह ख्याल ही कितना एब्सर्ड है कि बांसुरी को पियानो के नोट्स पर बजाया जाए।) 

नॉक्टर्न यानी रात के समय बजने वाला संगीत। अंधेरे में डूबा हुआ एक बगीचा। पत्तों की आवाज़ से हवा के चलने को महसूस करना। ज़मीन पर तारों की परछाईं देखना और आसमान में जो आकृतियां बनी हों, उन्हें ज़मीन पर उगे पेड़-बूटों की परछाईं की तरह महसूस करना। जब पैदल चलना, तो पत्तों की खदड़-खदड़ आवाज़ आना। कोई भी आवाज़ आने से पहले खुद को श्श्श्श् कहकर चुप करा देती है। वहीं बगीचे में थोड़ी सी गुंजाइश खोज लेना कि एक समंदर भी बन जाए। उसकी आवाज़ के भीतर उतरना। उसमें मिली एक-एक नदी को रेशे-रेशे की तरह अलग करना। उन्हें पहचाने बिना उन्हें फिर एक-दूसरे में मिला देना। वहीं एक टापू बना लेना और उसमें अकेले होने के विरुद्ध आवाज़ का एक बूटा रोपना। 

ये शोपां है।
मैं तुम्हारे पास हूं। तुम्हारी हथेली में उगली फंसाए।
तुम सबके पास हो।
पर मैं सबके पास नहीं
सिर्फ तुम्हारे पास हूं।
यही शोपां है।

वह बीजगणित के ‘माना कि एक्स बराबर वाय' को नकार देता है और बताता है कि अनुभूति और संगीत का कोई सिद्धांत नहीं होता। जो संगीत में भी सिद्धांतों और व्याकरणों का पालन करते हैं, वे दरअसल, किसी भी नए से घबराते हैं, वे पुराने से भी आतंकित हैं, वे मेड़ों से बंधे खेत में अनंत की खोज करते हैं।

नियमों को तोडऩा बहुधा एक नया नियम बन जाया करता है।

शोपां इससे दूर रहना सिखाता है।

‘मैंने अपने लिए नए नियम बनाए' यह कहने से बेहतर है यह कहना, ‘मैंने नियमों को ध्वस्त कर दिया और खुद को भी नियमों से आज़ाद रखा।'

शोपां अराजक नहीं है। बहुत अनुशासित और मापा हुआ है, फिर भी उसमें वह बनैलापन है, जो आपको उसके अनुशासन पर यकीन नहीं करने देता। 

दो परस्पर विरोधी चीज़ों को साध लेने वाले कलाकार हमेशा मुझे आकर्षित करते हैं।

कई बार मुझे लगता है कि यह दक्षिणोत्तर जैसी किसी नई दिशा की तलाश कर लेने जैसा है।

दो सौ साल पहले उसे पोलैंड से भागना पड़ा था। वह पेरिस में रहा। सारा संगीत उसने वहीं रचा। पर उसका दिल लगातार पोलैंड के लिए धड़कता। उसने कहा कि जब मैं मर जाऊं, तो मेरे दिल को मेरे शरीर से निकाल लेना और उसे पोलैंड में दफनाना। 39 साल की उम्र में जब वह मरा, तो उसकी इच्छा का सम्मान किया गया। उसका शरीर पेरिस में दफनाया गया, लेकिन उसका दिल निकालकर पोलैंड ले जाया गया। वह वहां दफन हुआ।

उस दिल से ऐसा संगीत न निकलता, तो कैसा निकलता? वह इस ख्याल को भी कितने म्यूज़िकल तरीके से खारिज करता है कि वह तब तक ही सुना जाएगा, जब तक वह गूंज रहा है।





21 जनवरी 2010
शोपां को सुनना सिर्फ शोपां को सुनना होता है। मोत्जार्ट को आप दूर बैठकर सुन सकते हैं, बीथोफन को सुनते हुए आप खुद ही धीरे-धीरे हर किस्म की ध्वनि से दूर होते जाते हैं। शोपां को मैं दूर से नहीं सुन पाता। उसमें इतनी बारीकियां हैं, इतनी छोटी-छोटी हरकतें हैं कि उसकी आवाज़ के पास अपने कान ले जाने होते हैं। इसीलिए मैं उसके लिए हेडफोन लगाता हूं। मैं उसका हर स्वर कानों से सुनना चाहता हूं। पहले कान सुनें, फिर वे तरंगें देह और आत्मा से लिपटें। संगीत अंग से भी ग्रहण होता है और अनंग से भी। 

शिव ने कामदेव को भस्म कर अनंग बना दिया था- वह विदेह हो गया था। फिर भी पार्वती जब भी संगीत बजाती थीं, वे दोनों महसूस करते थे कि अनंग कहीं पास ही है। देह खोने के बाद भी अनंग ने अपना व्यवहार नहीं खोया था। वह कैलाश के आसपास ही भटकता था। इसीलिए पार्वती को उस पर रहम आया था और वह शिव से आग्रह करती रहीं कि वह कामदेव के अनंग-शाप को वापस ले लें। पर शिव कहते, वह अनंग है, इसीलिए मनोज है। इसीलिए वह हर अंग का ओज है। वह विदेह है, इसीलिए हर देह से संयुक्त है।
कई बार मुझे लगता है कि पुराणों में जरूर कोई कथा ऐसी भी होगी, जिसमें संगीत को सशरीर उपस्थिति कहा गया होगा। और किसी शाप में उसने भी अपना रूप खो दिया होगा। जैसे कामदेव ने खोया, जैसे दक्ष ने खोया, जैसे शारंग ने खोया, जैसे आठों चिरंजीवियों ने खो दिया। हालांकि मैं अभी तक ऐसी किसी कथा तक नहीं पहुंच पाया हूं।

संगीत भी अनंग है, इसीलिए हर अंग में उसकी व्याप्ति है। पर मैं उसकी व्याप्ति को दिशा देना चाहता हूं। क्यों? मैं उसे एक मार्ग दिखाना चाहता हूं कि तुम यहां से प्रविष्ट हो और यहां जाओ। संगीत कभी आज्ञा नहीं मानता। और ग्राहक यानी उसे ग्रहण करने वाला अपनी पद्धति से बाहर नहीं निकलता।

इतालवी में प्रेम की एक परिकल्पना है, जिसे 'फीनो अमोरे' कहा जाता है यानी संपूर्ण प्रेम। यह दान्ते अलीगियेरी की रचनाओं से आया। ऐसा प्रेम, जिसमें शरीर का कोई अर्थ नहीं होता, अभिव्यक्ति और स्मृति का भी कोई अर्थ नहीं होता। आप जिससे प्रेम करते हैं, संभव है कि उसे आपने कभी देखा भी न हो, उससे कुरबत तो दूर की चीज़ है। न उससे बातें की हों, न ही कोई व्यवहार। पर उससे प्रेम करते हों। वह एक उपस्थिति हो, किंतु आपके भीतर। यह सिर्फ मन में किया जाने वाला प्रेम है। बाहर उसकी अभिव्यक्ति कैसे भी संभव है, लेकिन इसकी मौजूदगी केवल आपके भीतर है। यह प्रेम को भक्ति भी बना देता है। अपने यहां मीरा के रूप में ऐसे प्रेम का उदाहरण है।

संगीत से किया जाने वाला प्रेम फीनो अमोरे ही होता होगा। यह सिर्फ आपके भीतर रहता है। आप संगीत की देह को नहीं छू पाते, लेकिन वह आपकी आत्मा और देह को छूता रहता है। शोपां इसी तरह एक अनुपस्थित उपस्थिति में आता है। बहुत बारीक स्वरों, हल्की बुनावटों, छोटे-छोटे वाल्ट्ज और मादक नाक्टर्न्‍स में। उसे लोग 'पियानो का कवि' कहते हैं। बहुत ज्यादा चीजों का इस्तेमाल नहीं करता। प्रेम भी शायद ऐसा ही होता है। बजने के लिए ज्यादा साजों का प्रयोग नहीं करता। एक अकेली तान से ही बड़ा ऑर्केस्ट्रा खड़ा कर देता है। अकेली तान वाला ऑर्केस्ट्रा। उसी तरह कविता को भी दूरी से नहीं समझा जा सकता। आपको उसे समझने के लिए, उसके बहुत करीब, झुककर, निहुरकर जाना होता है। उसमें भी अकेली तान से बड़ा ऑर्केस्ट्रा बनता है। शोपां के पास भी इसी तरह जाना होता है। झुककर, निहुरकर, बहुत करीब। प्रेम, कविता और शोपां- तीनों एक ही गोत्र से निकले होंगे।

(मेरी डायरी के हिस्‍से. पहला हिस्‍सा कथादेश अक्‍टूबर '10 में 
और दूसरा हिस्‍सा दैनिक भास्‍कर में 3 मई '11 को प्रकाशित.) 



Sunday, April 17, 2011

ग़म की बारिश, नम-सी बारिश





वह भयानक रात थी, जब उसकी आंखें नशे से डोल रही थीं और वह रिसीवर पर बाक़ायदा चीख़ रहा था, 'हलो... गीतू... मैं गुरु... मैं बहुत अकेला हूं... प्‍लीज़, आज मेरे पास आ जाओ... आई नीड यू गीता...'. वह गि‍ड़गिड़ा रहा था. बरसों से एक डाह में जल रही गीता दत्‍त खि‍लखिलाईं और ज़हर बुझे तीरों से उस ख़रगोश को बींधकर रख दिया, 'आई स्टिल लव यू गुरु... पर तुम मेरे लिए नहीं, उस वहीदा के लिए तड़प रहे हो. उसे मद्रास फोन कर लो, शायद वह आ जाए. मैं नहीं आने वाली... किस मुंह से तुम मुझे बुला रहे हो...'

गीता नहीं आई. वहीदा दूर हो ही गई थी. काग़ज़ के फूल ख़ुशबू नहीं दे पाए थे. गुरुदत्‍त कई रातों से दुख के तंदूर में भुन रहे थे, कभी इस करवट, कभी उस करवट. उस रात अपनी पसंदीदा स्‍कॉच में उन्‍होंने नींद की बीसियों गोलियां मिला लीं. उससे पहले कभी राज कपूर को फोन करते, कभी देव आनंद को. दोनों ने आने से इंकार कर दिया. वह सिर्फ़ एक रात के लिए अपना अकेलापन किसी की गोद में रखकर देर तक रोना चाहते थे. देव के साथ 'प्रभात' के शुरुआती दिनों को याद करना चा‍हते थे. राज के साथ बंबई के समंदर के साथ की गई शैतानियों को सिमर भीतर से गीला होना चाहते थे. गीता से कहना चाहते थे कि उन्‍होंने उससे बेइंतहा प्‍यार किया है. वहीदा को बताना चाहते थे कि तुम मेरी कलाकृति हो और कलाकार को अपने सिर से ज़्यादा प्‍यारी होती है अपनी कलाकृति. उनकी इस तड़प को सनक माना गया. सबने अपने-अपने तरीक़े से इंकार कर दिया. 

गुरु ने बाहोश गोलियां खाईं और बेहोशी में जिस्‍म को छोड़ दिया. रूह आगे-आगे भागती रही (जैसे 'काग़ज़ के फूल' का आखिरी सीन), जिस्‍म वहीं पड़ा दुनियादार लोगों का इंतज़ार करता रहा. उस वक़्त उनका फोन लगातार बज रहा था. गीता दत्‍त उन्‍हें कॉल कर रही थीं कि हां गुरु, मैं अभी आ रही हूं... मद्रास से वहीदा रहमान ठीक उसी समय बहुत परेशान होकर लाइटनिंग कॉल बुक करा रही थीं- मि. गुरुदत्‍त पादुकोण के नाम. देव आनंद और राज कपूर भी आंखें मींचते हुए उन्‍हें कॉल करना चाह रहे थे. पौ फट चुकी थी. गुरु के चेहरे पर यक़ीन था- ख़ुद के मर जाने का यक़ीन. इस बात का यक़ीन कि कोई नहीं आएगा अब... बिछ़ड़े सभी बारी बारी. यह यक़ीन बहुत निर्णायक होता है. मरने में बहुत मदद करता है. इसी यक़ीन ने गुरुदत्‍त की लाश के होंठों को एक मुस्‍कान सौगात की. गुरु व्‍यंग्‍य भरी मुस्‍कान के साथ मरे थे- तिरछी मुस्‍कान. सबने जागने में देर कर दी थी. उस रात की सुबह बहुत रुक कर आई. कुछ घंटों के बाद पूरी दुनिया उनके दरवाज़े पर जमा थी और गुरुदत्‍त की रूह दरवाज़े पर दोनों हाथ फैलाए मद्धम-सी आवाज़ में गा रही थी- ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है... रोशनी उस रूह के पीछे से आ रही थी. आगे तो सब कुछ अंधेरा था. 

अंधेरा उसे बहुत प्‍यारा था. वह श्‍वेत-श्‍याम का जादूगर था. जितना श्‍वेत में खिलता था, उससे कहीं ज़्यादा श्‍याम में. वह अंधेरे में हिलती हुई एक परछाईं था. कोई उसे साफ़-साफ़ नहीं देख पाया. न गीता, न वहीदा और न ही ढाई घंटे के लिए हॉल में आने वाले दर्शक, जिनके अंधकार को रोशनी से भरने के लिए वह बरसों अपनी स्‍कॉच में अपने दिल के तमाम गलियारों में छाए अंधेरों का अर्क मिलाकर पीता रहा. उस अर्क को आंसू बनाकर बहाता रहा. 

उसे आंसू बहुत प्रिय था. गुरुदत्‍त उस बूंद का नाम था, जो आंसू की कोख से निकलता है और एक बारिश में बदल जाता है. वह ग़म की बारिश था. वह नम-सी बारिश था. वह गालों को छूकर किसी अतल में जा धंसा एक अनाम-सा आंसू था. जिंदगी में हम कई लोगों को छूते हैं. कइयों से गले मिल लेते हैं, लेकिन कोई एक छुअन ऐसी होती है, जो बाक़ी तमाम स्‍पर्शों को हीन बताती है और अपनी अद्वितीयता में ताक़त देती है. हम सिर्फ़ उस छुअन को याद कर पूरी उम्र निकाल देते हैं. ताउम्र हमारी पूंजी सिर्फ़ एक निगाह होती है जो दिल में बस जाती है, साये की तरह बदन को लपेटती है, जो वक़्त की धूप को अपनी छांह से चुनौती देती है, अपनी ठंडक में पुचकारती है, तपिश को बर्फ़ का दान देती है और जलती आंखों को नम फ़ाहे. ताउम्र हम सिर्फ़ एक मुस्‍कान को याद रखते हैं, जो किसी फुनगी की तरह उमगती है. हम सिर्फ़ एक हुलस में जीते हैं, जो फ़सल के बीचोबीच चुनरी लहराकर लहलहाती है. 

हम एक सच पर पूरी दुनिया वार देते हैं, एक झूठ पर ख़ुद को क़त्‍ल कर देते हैं. गुरुदत्‍त भी एक छुअन में जिये. वहीदा की उस निगाह में उन्‍होंने अपना घर बना लिया, जो पहली बार हैदराबाद में उन पर आ टिकी थी. उस आंसू में रहे, जो बंगाल के शरत और नॉर्वे के नट हैमसन को पढ़कर उनकी आंखों से निकले. उस भटकन में रहते थे, जो मुंबई के नंगी रातों में सड़क पर फिसली हुई होती है. 

कश्‍मीर की डल झील में डोलते हुए शिकारे में जब वहीदा ने उनके माथे पर चुंबन की रोली लगाई, तो उनकी आंखें छलछला गईं. उन्‍होंने कहा, गीता मुझे छोड़ गई है. तुम मत छोड़ना कभी. और वहीदा ने कुछ ही दिनों बाद उनका साथ छोड़ दिया. बिना पूरा सच बताए. गुरु को झूठ का यक़ीन नहीं था और सच का अंदेशा भी नहीं. वहीदा कैरियर के लिए बाहर की फिल्‍में साइन करने लगीं. फिल्‍म इंडस्‍ट्री भी इसी दुनिया की तरह क़दम-क़दम पर चालाक लोमड़ों से भरी पड़ी है. गुरु ने, उनके दोस्‍त अबरार अल्‍वी ने बार-बार समझाया कि तुम्‍हारी ज़रूरत गुरु को है. वहीदा ने अपने कैरियर और सपने गिनाए. उस दिन गुरु फिर टूटे. ऐसा टूटे कि फिर कभी जुड़ नहीं पाए. उनके माथे पर पड़ा आखिरी चुंबन चालबाज़ निकला. उसने माथे पर पड़ने वाली लकीरों को कई गुना बढ़ा दिया. 

गुरुदत्‍त की लगभग हर चिट्ठी माफ़ी से भरी होती. एक ख़रगोश जो अपनी नींद में बाड़े तोड़ निकल भागता हो, और अपनी जाग में लौटने पर कंटीली बाड़ों से माफि़यां मांगता हो. वह एक तड़पा हुआ दिल था. प्‍यार की तलाश में मारा-मारा फिरता. पानी के छींटों पर बैठकर दूर-दूर तक उड़ता.  दिल का कांच टूटने पर बनी किरचों पर लहू के क़तरों की तरह चस्‍पा रहता. वह दुनिया से सिर्फ़ एक चीज़ मांग रहा था- आओ, मुझे थोड़ा-सा समझो, थोड़ा-सा संभालो. दुनिया कह रही थी कि यह सनक का सुल्‍तान है. इसे कुछ मत दो. सिर्फ़ हंस दो. जबकि गुरुदत्‍त को उन रंगों से भी परहेज़ था जिन्‍हें हंसी के रंग कहते हैं. गुरुदत्‍त के आसपास की दुनिया उसे समझ नहीं पाई, वह जो चाहता था, नहीं दे पाई. एक दिन गुरु ने दुनिया की फ़ेहरिस्‍त से अपना नाम ख़ारिज कर लिया. 

(9 जुलाई 2007 को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित.)



Friday, November 12, 2010

आदत बदस्‍तूर





लिखने की आदतें के बाद कुछ मित्रों की चाह थी कि मैं अपनी आदतों के बारे में भी लिखूं. ऐसा करना आसान नहीं होता, क्‍योंकि आदतें इसीलिए आदतें होती हैं कि उन्‍हें आप ख़ुद नहीं पहचान पाते. कोई न कोई, कभी, दर्ज या अ-दर्ज तरीक़े से आपको टोकता है, टोक कर आपका ध्‍यान उसकी ओर ले जाता है और तब आप पाते हैं कि हां, यह तो सही कह रहा है, मैं तो ऐसा ही करता हूं. आदत अच्‍छी लगी, तो आप ज़ाहिरा तौर पर मान जाते हैं. अच्‍छी नहीं लगी, तो मुकर भी जाते हैं, फिर भी आदत बदस्‍तूर रहती है. 

जैसे पॉल ऑस्‍टर से किसी ने पूछा, अब लैपटॉप्‍स का ज़माना आ गया है, आप अभी भी अपने पुराने टाइप राइटर पर ही क्‍यों लिखते हैं? ऑस्‍टर कुछ देर सोच में पड़ गए और बोले, मैंने यह बात सोची ही नहीं थी कि मुझे लैपटॉप पर शिफ़्ट हो जाना चाहिए. निश्चित ही उन्‍हें अहसास होता होगा, जैसा कि उन्‍होंने बाद में कहा भी कि कंप्‍यूटर पर कॉपी एडिट करना ज़्यादा आसान होता है, लेकिन उनकी आदत में कंप्‍यूटर नहीं घुसता, तो नहीं घुसता. ड्राफ़्ट फ़ाइनल होने तक वह हर बार पूरी स्क्रिप्‍ट को फिर से टाइप करते हैं. यानी दस बार करेक्‍शंस किए, तो दस बार टाइपिंग. मैं सोचता हूं कि इस तरह न्‍यूयॉर्क ट्रायलॉजी पूरा करने में उन्‍हें कितना वक़्त लगा होगा.

पर मैं ऐसा नहीं करता. मेरी आदतें अभी भी बहुत मिली-जुली हैं और की-बोर्ड के कारण लंबे समय तक क़लम का साथ छूटे रहने के बाद भी पिछले कुछ बरसों में मेरा यह पक्‍का विश्‍वास हो गया है कि फा़इनल होने से पहले प्रिंट आउट्स पर क़लम के निशान होने ही चाहिए. कॉपी राइटिंग और एडिटिंग दोनों तरह से हो. पहले जितना कुछ ऑनलाइन हो सकता हो, उतना. फिर ऑफ़लाइन क़लम से. वह भी अपनी पसंदीदा हरी स्‍याही से. या फिर बैंगनी स्‍याही से. बिना लाइन वाले सादे काग़ज़ों पर. पॉल ऑस्‍टर की आदत दूसरी है. वह अपना सारा लेखन चार लाइन वाली नोटबुक में करते हैं, जैसी नोटबुक्‍स छोटी क्‍लासों में बच्‍चों को अंग्रेज़ी और कर्सिव में महारत के लिए दी जाती हैं. 

हालांकि मैं अपनी आदतों की तफ़सील में नहीं जाऊंगा, क्‍योंकि वह ख़ुद को भी अटपटा ही लगेगा और मैं देर तक सिर्फ़ अपने बारे में बोल भी नहीं पाऊंगा, दो-चार लाइनों बाद ही उसमें मेरे प्रिय लेखकों के प्रसंग आने लग जाएंगे. जैसा कि ऊपर के पैराग्राफ़ में ही हो गया है. 

कविता और कहानी लिखने के तरीक़े भी अलग-अलग हैं. छोटी और स्‍वत:स्‍फूर्त कविताएं एक बार में लिख ली जाती हैं, अगर उस समय कंप्‍यूटर पर हों, तो तुरंत टाइप हो जाता है, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है. कविताएं अचानक आती हैं, कई बार लंबे समय से दिमाग़ में चल भी रही होती हैं, लेकिन उन्‍हीं के बीच कोई अप्रत्‍याशित आती है. तब मेरी कोशिश होती है कि उसे पेंसिल से लिख लूं. और वे कुछ-कुछ पंक्तियों में होती हैं. तब जो किताब सामने है, उसके हाशिए पर, या अंत में प्रकाशक द्वारा फर्मे की सहूलियत के लिए छोड़े गए सादे पेजों पर नोट कर लेता हूं. फिर अगली फ़ुरसत में वे पेंसिल से ही डायरी या नोटपैड के सादे पेजों में चली जाती हैं, वहां जमा होती रहती हैं. कई बार इस तरह जमा होती रहती हैं कि बाद में पढ़ने पर यह समझ में नहीं आता कि यह पंक्‍ित क्‍यों लिखी थी. ख़ैर. कुछ कविताएं, पंक्‍ितयां देरी से खिलने वाले फूलों की तरह होती हैं. वे वैसी ही होती हैं, तो होती हैं. आप कुछ नहीं कर सकते. हां, उन पर ज़ोर-आज़माइश ज़रूर कर सकते हैं. इसी दौरान मैं एक बार उन्‍हें टाइप कर लेता हूं, प्रिंट ले लेता हूं और फिर उन पर काम. (कविता पर काम करना चाहिए या नहीं, मैं इस पर कुछ पंक्तियों बाद आऊंगा. यह एक दिलचस्‍प सवाल है, क्‍योंकि कई मित्र पर इस पर आपत्ति करते हैं, उनका मानना है कि कविता एक बार में ही जैसी लिखी जाए, वैसी ही होनी चाहिए, उस पर काम करने का अर्थ है कविता के आगमन के क्षणों की मन:स्थितियों या म्‍यूज़ का अनादर करना. मेरी नज़र में ऐसा नहीं है.)

काम का यह सिलसिला चलता ही रहता है. जब तक कि उससे एक ख़ास कि़स्‍म की विरक्ति न हो जाए. यहां विरक्ति, आसक्ति का ही समानार्थी है, जैसे मैंने पहले भी कई बार अतीत को भविष्‍य का समार्थी माना है. और समार्थी का संधि-विच्‍छेद मुझे एक और अर्थ देता है, वह है 'सम पर पहुंचाने वाला अर्थ.' जैसे मेरी एक कविता है 'माउथ ऑर्गन'. मैंने उसे सबसे पहले 97 में लिखा था, और बाद के बरसों में वह नोटपैड में यूं ही पड़ी रही. बीच के छह बरसों में जब मैंने लिखना लगभग बंद ही कर दिया था, तब मैं बीच-बीच में उसमें चला जाता, उसमें कुछ खदड़-बदड़ कर देता, जैसे सिम पर रखी हुई सब्‍ज़ी को आप जांचने के लिए उसमें यूं ही कलछुल फिरा दिया करते हैं. पर उससे कुछ हुआ नहीं. कविता की मूल संरचना और रेंज पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. दस साल बाद मैंने उसे टाइप किया और उसके प्रिंट पर काम करना शुरू किया, और तब मैं शायद उसके आरोह को छू पा रहा था,  मुझे यह नहीं याद था कि पहली बार मैंने उसे क्‍या सोचकर लिखना शुरू किया था, लेकिन दस साल बाद मैंने पाया कि इसकी कुछ पंक्तियों में अभी भी धड़कन बाक़ी है. और उसी धड़कन को और ज़्यादा पंप करने की ज़रूरत है. और यह तब तक चलता रहा, जब तक कि मैंने अपने संग्रह का आखि़री प्रूफ़ नहीं पढ़ लिया. उसमें तब भी बहुत बदलाव हुए थे. और वह संग्रह की उन कुछेक कविताओं में से है, जिनका पहले कभी प्रकाशन हुआ ही नहीं था. इन सबका अर्थ यह नहीं कि वह एक बहुत बड़ी और महान कविता हो गई, क्‍योंकि अब भी मैं उसमें अपने स्‍टैंटर्ड्स पर नहीं पहुंच पाया हूं. जब मैं रचनाओं से जुड़े हुए पृष्‍ठभौमिक तथ्‍यों के बारे में बात करता हूं, तो दरअसल रचना की रसोई की एक यात्रा करने जैसा होता है. चूंकि हमारे यहां रचनाओं की फिजि़क्‍स पर बात करने का कोई चलन ही नहीं है, सो इसे तुरंत एक नकरात्‍मक प्रवृत्ति की तरह देखा जाता है कि अरे देखो साब, फलां की एक किताब अभी छपी नहीं कि वह यह गिनाने लग गए हैं कि यह पांचवां ड्राफ़्ट है, इसे लिखने में मुझे चार साल लग गए या ब्‍ला-ब्‍ला. जबकि यह तो महज़ उसके फिजि़क्‍स का एक फ़ैक्‍ट है, जिसे लेखक उतनी ही सहजता से बताता है, जितना कि वह अपनी रचना में जाता है. सहजता एक दुर्लभ गुण है, केवल लेखक के रूप में ही नहीं, पाठक और साथी लेखक के रूप में भी हमें इसे सहर्ष, सगर्व आरोहित करना चाहिए. इसे एक लेखक की इन्‍वॉल्‍वमेंट के रूप में भी देखा जाना चाहिए. 

इसी सिलसिले में मुझे एक बार फिर विलियम फॉकनर याद आते हैं. उनसे एक बार पूछा गया कि आप अपनी किस किताब को सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं. उनका जवाब था, 'जिस किताब ने लिखने के दौरान मुझसे सबसे ज़्यादा संघर्ष कराया हो, जिसने सबसे ज़्यादा रुलाया हो, सबसे ज़्यादा मेहनत कराई हो. मैं अपनी रचनाओं की गुणवत्‍ता को इसी आधार पर मापता हूं. जैसे कि एक मां अपने उस बच्‍चे से सबसे ज़्यादा प्रेम करती है, जो उसकी बात नहीं मानता, बड़ा होकर अपराधी बन जाता है या चोरी-हत्‍याएं करने लगता है. मां को पता है कि अच्‍छा बेटा तो अच्‍छा ही है, वह बुरे काम नहीं करेगा, लेकिन यह जो बुरा बेटा है, इसे ज़्यादा प्‍यार करो, क्‍योंकि प्‍यार के कारण इसके सुधर जाने की संभावनाएं बची रहेंगी. उसी तरह एक लेखक अपनी सबसे शैतान, बदमाश, चंचल कृति की ओर देखता है.' उन्‍होंने 'द साउंड एंड द फ़्यूरी' को इसी श्रेणी में रखा, जिसे उन्‍होंने पांच अलग-अलग तरीक़ों से लिखा था और उम्र के आखि़री बरसों में बाक़ी चार वर्शन्‍स को भी छपवा देने के बारे में विचार किया था. और जहां तक मुझे याद पड़ता है, एक निबंध में उन्‍होंने बताया था कि इसका अंत उन्‍होंने पैंतीस से ज़्यादा बार लिखा था. इससे थोड़ा-सा कम काम उन्‍हें 'ऐज़ आय ले डाइंग' पर करना पड़ा था. और यहां यह कहना दिलचस्‍प होगा कि फॉकनर के जिस 'योक्‍नेपटाफ़ा' ने आगे चलकर माकोंदो और मालगुड़ी की रचना में प्रेरक भूमिका निभाई, छपकर आने के बाद उनके इस उपन्‍यासों पर कम ही लोगों ने ध्‍यान दिया था. 

हर लेखक अपने लिए लिखने का एक समय तय कर लेता है, लगभग, वह उसी समय लिखेगा या उस समय लिखने को लेकर ज़्यादा आरामदेह महसूस करेगा. जैसे कुछ ड्यूटी अवर्स की तरह नौ से पांच का समय चुन लेते हैं, कुछ दोपहर का. ज़्यादातर लोग सुबह जल्‍दी उठकर लिखते हैं. रॉबर्ट ब्‍लाय मेरे प्रिय अंग्रेज़ी कवियों में हैं और उनके ग़ालिब के अनुवादों को कई बार मैं इस शायर को आज दिनांक में समझने के लिए गाइड की तरह देखता हूं, उनकी सुबह लिखने की आदत हैरान करती है. वह सुबह पांच बजे उठते हैं, बिस्‍तर छोड़ने से पहले ही वह काग़ज़-क़लम लेकर एक कविता लिखते हैं. हर सुबह बिला नागा. जैसे सुबह की चाय. और पिछले पचास साल से वह हर सुबह ऐसा ही करते हैं. उनकी सुबह लिखी कविताओं का संग्रह 'मॉर्निंग पोएम्‍स' नाम से संकलित भी है. 

मेरे लिए सबसे आरामदेह समय रात का होता है, रात ग्‍यारह बजे के बाद. मुझे अंधेरा चाहिए. तेज़ रोशनी से मेरा माइग्रेन भड़क उठता है और मैं जिन चीज़ों से सबसे ज़्यादा डरता हूं, उनमें यह माइग्रेन भी है. दिन में कोई कमरा ऐसा नहीं होता, जहां पूरी तरह अंधेरा हो, और दिन में घर रहा भी नहीं जाता, काम पर जाना होता है. सो रात का समय सुविधाजनक होता है. नौकरी के घंटे बदलते-बढ़ते रहते हैं, इसलिए यह बैठक कई बार अनिश्चित हो जाती है. कई बार लंबा स्‍थगन. ऐसा सबके साथ होता होगा. एक दिन आप एक शब्‍द भी नहीं लिख्‍ा पाते और किसी दिन पूरे हज़ार शब्‍द लिख जाते हैं. इसका कोई औसत या हिसाब नहीं. हेमिंग्‍वे जैसे लोग अपवाद हैं. उनकी डेस्‍क के सामने एक चार्ट लगा होता था, जिसमें वह हर रोज़ नोट करते थे कि आप कितने शब्‍द लिख लिए. कभी साढ़े छह सौ तो कभी पंद्रह सौ. हर रोज़ के चार्ट के बाद वह महीने का औसत निकालते थे और अगर वह ठीकठाक रहा, तो ख़ुश होते थे, वरना कलपते थे, ख़ुद को कोसते थे और अपना औसत बढ़ाने की कोशिश करते थे.

बैठक से जुड़े हुए नखरे भी हैं. जैसे मैं थर्मस में चाय बनाकर अपने साथ रखता हूं. कई बार अलग-अलग तरह की चाय. रेगुलर, ग्रीन और लेमन तीनों. मूड अच्‍छा हुआ और माइग्रेन का ख़तरा न रहा, तो कॉफ़ी. यहां जैक केरुआक की याद आती है. वह लिखते समय खाने की कुछ चीज़ें लेकर बैठता था. हालांकि कई लोगों को निरर्थक लगेगा यह सब, क्‍योंकि एक तरह से आप क्‍या लिख रहे हैं, बहुत महान या कचरा लिख रहे हैं, इन सब बातों का इससे कोई लेना-देना नहीं, और मैं अभी कंटेंट पर बात कर भी नहीं रहा, अलबत्‍ता कंटेंट भी एक आदत ही होता है, ऐसा मेरा मानना है, फिर भी यह ज़रूर कि सारी कलाएं या लेखन एक नशे की तरह ही होता है और सारी आदतें नशों में ही तब्‍दील हो जाती हैं, वे अपने आप होने लगती हैं, इसलिए वे अनजाने ही एजेंट प्रोवोकेटर की भूमिका ले लेती हैं. 

कहानी पर काम करने की आदतें अलग हैं, कविताओं से अलग, उन पर कभी अगली बार बात करेंगे. इस समय 'काम करना' पर अटकाव है. क्‍या एक लेखक को अपनी रचनाओं पर काम करना चाहिए? यानी जब रचना स्‍वत:स्‍फूर्त तरीक़े से ख़ुद को लिखवा ले जाती है, तो क्‍या सायास उसकी तराशना, मरम्‍मत, पुनर्लेखन आदि करना चाहिए? कला निजी आदत और निजी अनुभव है, इसलिए उसका कोई नियम तो होता नहीं, हर कलाकार अपने लिए कुछ सरणियां तैयार करता है और उन्‍हीं के आधार पर इस प्रश्‍न से जूझता है. मुझे बाबा बोर्हेस बहुत पसंद हैं और उनकी कही बातें न केवल लेखक, बल्कि किसी भी कलाकार के लिए दिशासूचक होती हैं, लेकिन उनकी कुछ बातों से मैं कभी सहमत नहीं हो पाता, उनमें से एक यह है कि वह कहते हैं, जब आप अपनी रचनाओं पर बार-बार काम कर रहे होते हैं, तो ज़रूरी नहीं कि आप उसकी सुंदरता बढ़ा ही रहे हों, ज़्यादातर मौक़ों पर आप उसे बर्बाद कर रहे होते हैं. बाबा को ऐसे अनुभव हुए होंगे, जो वह ऐसा कहने पर विवश हुए, पर मेरे अनुभव अलग हैं. 

मैंने पिछले दिनों आर्ट ऑफ नॉवल पर कुछ बेहतरीन चीज़ें पढ़ी हैं, और उन्‍हें पढ़ते हुए ऐसे कई मुद्दों पर मैं अपनी राय से संतुष्‍ट भी हुआ. मैंने पहले भी कहा है कि कला स्‍वत:स्‍फूर्त नहीं होती, वह अत्‍यंत नियंत्रित अभिव्‍यक्ति है. स्‍वत:स्‍फूर्त होना सिर्फ़ एक भ्रम है. आप अपने चेतन में या अवचेतन में उसके बारे में सोचते रहते हैं, उसे पा लेना चा‍हते हैं, और पा लेते हैं. कुछ चीज़ें अनायास आपके पास आ जाती हैं, लेकिन वे इसलिए आती हैं कि कुछ दूसरी चीज़ें उनके लिए ज़मीन तैयार कर देती हैं. गेंदबाज़ी इसके लिए बढि़या उदाहरण है. बॉलर जानता है कि उसे इनस्विंग करानी है, तो बॉल को कहां टप्‍पा दिलाना होगा, कलाई को कैसे झटकना होगा. वह इन‍स्विंग फेंकना चाहता है, सो फेंकता है. यही उसका नियंत्रण है. इनस्विंग फेंकने की इच्‍छा के बावजूद अगर वह आउटस्विंग फेंक देता है, तो वह असफल है, अनियंत्रित है, कलाहीन है. भले उस आउटस्विंग पर उसे विकेट मिल जाए, लेकिन वह ख़ुद जानता है कि वह ग़लत है. संभव है कि अगली बार उसे इस ग़लती का खामियाजा भुगतना पड़े. वह एक स्‍वत:स्‍फूर्त गेंद का इंतज़ार नहीं कर सकता. उसकी एक चाही हुई इनस्विंगर अगर उसकी उम्‍मीद से ज़्यादा स्विंग हो जाती है, तो भी यह स्‍वत:स्‍फूर्त नहीं है, क्‍योंकि इसमें पिच का वह गड्ढा या पैच मददगार है, जो एक्‍स्‍ट्रा टर्न दे देता है या वह हवा जो गेंद पर सहायक रहम करती है. आज जितनी भी कलाएं हैं, उनमें बॉलिंग से ज़्यादा कलात्‍मक उदाहरण नहीं मिल सकता, कलात्‍मक नियंत्रित अभिव्‍यक्ति का.  और इस नियंत्रण के लिए उसे लगातार काम करना होता है, अभ्‍यास करना होता है. लेखक का काम करना गेंदबाज़ के काम करने से थोड़ा ज़्यादा कठिन है, क्‍योंकि लेखक को नतीजा तुरंत नहीं मिलता, बरसों लग जाते हैं, जबकि गेंदबाज़ अगले कुछ मिनटों में जान लेता है कि कितना परसेंट डिलीवर हुआ. 

ओरहन पमुक की नई किताब इसी किस्‍म के विषयों को छूती है. यह है हार्वर्ड में उनके लेक्‍चर्स का संग्रह, जो कुछ दिनों पहले ही रिलीज हुआ है- 'द नाइव एंड द सेंटीमेंटल नॉवलिस्‍ट'. फ्रे‍डरिक शिलर नामक दो सदी पुराने एक जर्मन लेखक के एक निबंध को आधार बनाकर उन्‍होंने लेखकों की दो श्रेणियां बनाई हैं- पहली नाइव, जो सीधा-सादा, भोला-भाला है, जो उन्‍हीं चीज़ों में यक़ीन करता है, जो उसके पास अपने पैरों पर चलकर आ जाती हैं. और दूसरी श्रेणी है- सेंटीमेंटल, जो बहुत रिफ्लेक्टिव होता है. वह अपने तरीक़े से सोचता है, और अपने इमोशंस और रिफ्लेक्‍शंस के सहारे उसमें इनोवेट करते जाता है. आधुनिक समय का अच्‍छा लेखक दोनों ही तरीक़ों के मिश्रण से बनता है.   

यह किताब पमुक के सबसे सुंदर कामों में से है, जो रचना-प्रक्रिया और पाठकीय-प्रक्रिया की कई अंधेरी गलियों को रोशन करती चलती है. इनके अलावा मिलान कुंडेरा की नई किताब 'एनकाउंटर' भी है, जो आर्ट ऑफ फिक्‍शन को विश्‍लेषित करने वाली उनकी सीरिज का नया हिस्‍सा है. पुरानी तीन किताबें हैं 'द आर्ट ऑफ़ नॉवल', 'टेस्‍टामेंट्स बीट्रेड' और 'द कर्टेन'. मेरी कोशिश होगी कि अगली पोस्‍ट्स में मैं इन पांचों किताबों पर बात करूं. 



Saturday, October 23, 2010

लिखने की आदतें

टाइम ने इस बार जोनाथन फ्रैंजन पर कवर स्‍टोरी दी है. बरसों बाद कोई लेखक टाइम के कवर पर आया है. फ्रैंजन का नाम सुना है, पर उसकी कोई किताब पढ़ी नहीं है. टाइम ने उस पर बढि़या लिखा है, ऐसा कि उसे पढ़ने की दिलचस्‍पी जग गई. इसी में पढ़ा कि एक लंबे राइटर्स ब्‍लॉक के दौरान जब फ्रैंजन कुछ नहीं लिख पा रहे थे, तो उन्‍होंने तंबाकू खाना शुरू कर दिया. यह आदत उनके लेखक दोस्‍त डेविड फॉस्‍टर वैलेस में थी. वैलेस की आत्‍महत्‍या के बाद वह आदत उनमें आ गई. उनकी एक और आदत के बारे में इसी से पता चला कि जब वह लिखते हैं, तो अपने पुराने डेल के लैपटॉप के आगे ज़ोर-ज़ोर से अपने डायलॉग्‍स बोलते हैं. छह घंटे के लेखन-सेशन के बाद उनका गला बैठ जाता है और यह लगभग रोज़ की बात है. उनका कहना है, ऐसा करने से उनके डायलॉग्‍स सरल, सहज, अमेरिकी बोलचाल की भाषा में हो जाते हैं. वे फिलिप रॉथ के डायलॉग्‍स को किताबी मानते हैं. लिखते समय अपना लिखना उच्‍चारने की आदत फॉकनर में भी थी. 

राइटर्स ब्‍लॉक से जूझने का लेखकों का तरीक़ा कई बार अद्भुत होता है. जैसे हारुकि मुराकामी ने तो पूरी एक किताब ही इस पर लिख दी है. उनके संस्‍मरणों की किताब व्‍हाट आय टॉक व्‍हेन आय टॉक अबाउट रनिंग   दौड़ने की उनकी आदत के बहाने की उनकी रचना-प्रक्रिया की पड़ताल है. अपनी किताबों के कई हिस्‍से उन्‍होंने इसी तरह दौड़ते हुए ही सोचे हैं. 

लिखते समय की कई अजीब आदतें हैं लोगों की. कई तो इतने अनुशासित होते हैं कि कल जहां छोड़ा था, वहीं से आज शुरू कर दिया. जैसे सलमान रूश्‍दी. वह सुबह उठने के बाद पहला काम जो करते हैं, वह है लिखना. टेबल पर पहुंच गए. कल क्‍या-क्‍या, कितना लिखा था, उसे पढ़ डाला. फिर आगे लिखने बैठ गए. तीन घंटे लिखने के बाद फ्रेश होने जाएंगे. फिर दुनियादारी. शाम को पेज तीन वाली जि़ंदगी में घुसने से पहले एक बार फिर पढ़ेंगे कि सुबह क्‍या-क्‍या लिखा था. फिर अगली सुबह छुएंगे. कोई करेक्‍शन हुआ, तो वह भी अगली सुबह. मिडनाइट्स चिल्‍ड्रन  लिखते समय वह नौकरी पर थे. पांच दिन नौकरी करते थे, पांचवीं शाम घर पहुंच घंटा-डेढ़ घंटा गरम पानी से नहाते, फिर लिखने बैठ जाते. सोमवार की सुबह तक सोते-जागते लिखते, फिर अपने काम पर चले जाते, पांच दिन के लिए. 

ओरहन पमुक ने अदर कलर्स  में बहुत दिलचस्‍प कि़स्‍से लिखे हैं अपनी ऐसी आदतों के बारे में. एक निबंध में वह कहते हैं- उन्‍हें घर में लेखन करना अजीब लगता था. उन्‍हें हमेशा एक दफ़्तर चाहिए होता, जो घर से अलग हो, जहां वह सिर्फ़ लिख सकें. (यह आदत कई लेखकों की रही है. इसके लिए उन्‍होंने घर के पास या तो कोई फ़्लैट ख़रीद लिया या किराये पर ले लिया और वहां काम किया.) ख़ैर, पमुक घर में लिखने की मजबूरी से अलग ही ढंग से निपटे. वह सुबह उठते, नहाते-धोते, नाश्‍ता करते, बाक़ायदा फॉर्मल सूट पहनते और पत्‍नी से यह कहकर कि अब मैं ऑफिस जा रहा हूं निकल पड़ते, पंद्रह-बीस मिनट सड़क पर टहलने के बाद वह वापस घर  लौटते, अपने कमरे में घुसते, और उसे अपना ऑफिस मान लिखने लग जाते. 

सुनने-पढ़ने में यह जितना आसान लग रहा है, उतना होता नहीं होगा. मैंने कुछ दोस्‍तों को यह तरीक़ा बताया है, और वे अब तक ऐसा नहीं कर पा रहे. घर पहुंचने के बाद घर, उन्‍हें हर तरह से घर ही लगता है. अब हम लोग जो घर में ही लिखते रहे हैं, लिख लेते हैं, लेखन के लिए दफ़्तर वाला चस्‍का लगा नहीं है, सो इस पूरी प्रताड़ना को समझने से भी बचे हुए हैं. लेकिन यह ज़रूर अचरज में डालता है कि ये सारे बड़े लेखक कितनी कमिटमेंट के साथ लिखते हैं. कोई नियमित दिन में बारह घंटे लिखता है जैसे पमुक इस्‍तांबुल के लिए, मारकेस सॉलीट्यूड के समय और बाद में भी सुबह नौ से दोपहर तीन बजे तक लिखते थे और उसके बाद पॉपुलर संगीत सुना करते थे. लिखते समय उनकी टेबल पर पीला गुलाब होना ज़रूरी था, यह तो कई बार कही गई बात है. 

पर मुझे सबसे अजीब आदत  हेमिंग्‍वे  की लगती है. वह आदमी खड़े-खड़े लिखता था, बैठकर लिख ही नहीं पाता था. उसने बाक़ायदा अपने लिए स्‍टडी बनवाई थी, लेकिन लिखने का काम बेडरूम में करता था. अपने लिए एक ऐसी डेस्‍क बनवाई थी, जिस पर उसके काग़ज़, टाइप राइटर और तुरंत काम में आने वाली किताबें रखे रहता. एक टांग मोड़कर, दूसरी अकेली टांग पर खड़े रहता. कभी इस पैर पर वज़न डालता, कभी उस पैर पर. इस दौरान पेंसिल से पुराने लिखे काग़ज़ों में करेक्‍शन करता रहता, इस बीच जब उसे लगता कि अब वह रौ में आ गया है, आनन-फानन टाइप करना शुरू कर देता. ओल्‍ड मैन एंड द सी   ऐसे ही लिखा गया है. दूसरे उपन्‍यास भी. एक लंबे राइटर्स ब्‍लॉक से निकलने के लिए उसने यह आदत पैदा कर ली थी, जो ऐसी चिपकी कि उससे अलग हो कुछ लिखा ही न जाता. 

राइटर्स ब्‍लॉक बहुत ख़राब चीज़ होती है. जो न कराए सो कम. जैसे क्रिकेटर फॉर्म खो जाने से ख़ाइफ़ रहते हैं, वैसे ही लेखक ब्‍लॉक से. वैसे, विलियम फॉकनर इस बारे में बहुत ही बेरहम बात करते हैं कि जो लेखक बहुत नखरे करते हैं, लिखने के लिए ढेर सारी मांग करते हैं, मन की शांति से लेकर धन की शांति तक, वे दरअसल फर्स्‍ट रेट लेखक होते ही नहीं, लिखने के लिए तो सिर्फ़ कुछ सादे काग़ज़ और एक छिली हुई पेंसिल की ज़रूरत होती है. फॉकनर आजोबा की यह सच्‍ची बात माथे पर बल डालने के लिए काफ़ी थी. पर एक दूसरे निबंध में यह भी पढ़ लिया कि इन्‍हीं फॉकनर आजोबा ने यह भी कहा था कि लेखक दिन-भर नौकरी और पैसे के जुगाड़ में लगा रहेगा, तो क्‍या खा़क लिखेगा. (यह उन्‍होंने तब कहा था, जब उन्‍हें पोस्‍ट ऑफिस की एक नौकरी से इसलिए निकाल दिया गया था कि वह ड्यूटी अवर्स में बैठकर किताब पढ़ते पकड़े गए थे.) 

यह सारी बातें तो मुझे इसलिए याद आईं कि कल दिन में किसी दोस्‍त से बात हो रही थी और मैं उसे बता रहा था कि मैंने चैट और एसएमएस करते हुए अपनी कविता या कहानी की पंक्तियां पाई हैं. फिर उन्‍हें पिरोया है. चीज़ों को सब अपनी-अपनी तरह पाते हैं, और कई चीज़ें कई दूसरे लोगों जैसे ही मिलती हैं. कुछ संयोग है, कुछ आदत की बात, कुछ हालात हैं, तो कुछ प्रेरणाओं का दबाव. आखि़र हम सब ही जानते हैं, हिकमत की कविताएं जेल में सिगरेट की डिब्बियों पर लिखी गई थीं.

ऐसी बहुत-सी स्‍मृतियां हैं. कई लेखकों की आदतें याद आ रही हैं. अब बस.  उन पर फिर कभी.  



Sunday, October 17, 2010

धरती पर सबसे अजनबी चीज़






क्या कभी हवा आकर मुझसे कहती है कि मानो, मैं बह रही हूं। मेरे अस्तित्व को मान लो। मेरे महत्व को भी। कभी वह पूछती है कि देखो, मेरे भीतर पानी के कण भी मौजूद हैं, तुमने देखा है कभी? कभी पानी ही आकर यह पूछता है कि मेरे भीतर भी हवा है, जानते हो? 

रात में पेड़ अपनी छांव कहां दे आते हैं? बचाकर रखते हैं? उन पेड़ों के लिए जो अपने पत्तों से विरत हो चुके हैं? 
ऐसे ही आत्मा आकर कभी नहीं बताती।

कहीं पढ़ा था कि आत्मा इस धरती पर सबसे अजनबी चीज़ है।

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एक बार नबोकोव एक क्लास में थे। टॉल्स्टॉय पर उनका लेक्चर था। वह बार-बार समझाना चाह रहे थे कि टॉल्स्टॉय का एसेंस क्या है। तभी उन्होंने क्लास की खिड़की के परदों को हटा दिया। तेज़ रोशनी भीतर आई। कमरा पूरी तरह रोशन हो गया। नबोकोव ने कहा, एग्जैक्टली, मैं यही बताना चाहता था, टॉल्स्टॉय यही हैं। अचानक आई इस रोशनी की तरह।

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एक फिक्शन राइटर के तौर पर हमें यह कोशिश कभी नहीं करनी चाहिए कि हम अपने कैरेक्टर्स के साथ सिम्पैथी का खेल खेलें। लिखते समय सहानुभूति से दूर रहें। यह पाठक का औज़ार है। 

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जब आप नहीं लिख रहे होते, तब आप क्या कर रहे होते हैं? मैं ज़्यादातर समय नहीं लिख रहा होता। ज़्यादातर मैं पढ़ रहा होता हूं, संगीत सुन रहा होता हूं, कोई फिल्म देख रहा होता हूं या यूं ही नेट सर्फ कर रहा होता हूं। मैंने पाया है, ईमानदारी से, कि जिन वक्तों में मैं नहीं लिख रहा होता, वह मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि असल में मैं उन्हीं वक्तों में लिख रहा होता हूं।

जब फिलिप ग्लास की आठवीं सिंफनी सुन रहा होता हूं, तो दरअसल, मैं खुद उस सिंफनी की रचना कर रहा होता हूं। इस तरह मैं खुद फिलिप ग्लास बन जाता हूं। जब मैं प्रैसनर को सुन रहा होता हूं, तो किस्लोवस्की बन जाता हूं। मैं उसके सिक्वेंस पढऩे लगता हूं। 

हर कला के मूल में संगीत है। बिना संगीत के किसी कला का अस्तित्व नहीं। सृष्टि चाहे ओम के नाद से बनी हो या बिग बैंग से, वह साउंड ऑफ म्यूजि़क ही रहा होगा।

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अच्छी चीज़ों का सबसे बड़ा गुण या अवगुण यह है कि आप पर उसका कोई भी असर पड़े, उससे पहले वह आपको भरमा देती है। अच्छी कविता तो सबसे पहले भरमाती है। वह आपके फैसला करने की क्षमता को कुंद करती है और फैसला देने की इच्छा के लिए उत्प्रेरक बन जाती है। वह तुरत आपके मुंह से यह निकलवाती है- यह क्या बला है भला? ऐसा कैसे हो सकता है? फिर वह धीरे-धीरे आपमें प्रविष्ट होती है। यही समय है, जब आपकी ग्रहण-क्षमता की परीक्षा होनी होती है। आप उसे अपने भीतर कितना लेते हैं, इसमें अच्छी रचना का कम, आपका गौरव ज़्यादा होता है। अगर आपको अच्छी चीज़ों की अच्छाई की ऐतिहासिकता का भान पहले से न हो, यानी उसे पढऩे-सुनने-देखने से पहले आपको यह पता न हो कि इसे समय ने बहुत अच्छे की श्रेणी में रखा है, तो आप  नाक सिकोड़ेंगे। उसकी अच्छाई का ज्ञान आपको उसे स्वीकार करने में मदद तो करता है, लेकिन हम कभी यह नहीं पता कर सकते कि उसे अच्छा माने जाने की प्रक्रिया उसे रचने की प्रक्रिया से भी ज़्यादा श्रमसाध्य रही होगी। 

बाज़ दफा, आप कई बार बिना किसी श्रम के भी चीज़ों को अच्छा मान लेते हैं, ऐसा भी होता है।

सही समय पर दी गई दाद, राग और आलाप की श्रेष्ठता से ज़्यादा, श्रोता के संस्कारों का परिचायक होती है।

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बनैलापन क्या होता है? वाइल्डनेस? किसी को जंगल का शेर वाइल्ड लग सकता है, तो किसी को जंगले में बंद शेर। आर्ट में टेम्ड वाइल्डनेस को ज़्यादा एन्ज्वॉय किया जाता है, क्योंकि वह उपस्थित में है, दृश्य के बीच है, यानी सभ्यता के बीच एक निश्चित परिमाण में। 

अगर आपके पास अनटेम्ड वाइल्डनेस है, तो उस पर ध्यान ही नहीं दिया जाएगा। उल्टे यह पूछा जाएगा कि वाइल्डनेस तो है ही नहीं। जंगल आपको तभी वाइल्ड लगेगा, जब आप शहर में खड़े होकर उसके अनुभवों के आधार पर जंगल को देखेंगे। जंगल के बीच रह रहे हों, या जंगल ने आपको अपने भीतर पूरी तरह समो लिया है, तो आप उसे वाइल्ड नहीं मानेंगे। 

यह जंगल की सफलता है।

वाइल्डनेस एक मांग होती है। एक उम्मीद और एक अवधारणा। मेरी पारिस्थितिकी में मेरी सहजता, आपकी अवधारणाओं के उलट एक नई अवधारणा बना देती है।

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अव्यवस्था के दबाव के बिना व्यवस्था की निर्मिति नहीं होती। इसलिए अव्यवस्था ऐतिहासिक अर्थों में उदात्त है। 

एक कहानी में मैं बहुत सारी चीज़ों को ले आया और उनसे बची बहुत सारी चीज़ों को मैंने बाहर रख दिया। या वे बाहर छूट गईं। असल दबाव उन बाहर छूट गई वस्तुओं का है। कहानी के भीतर बहुत सारी जगह है, लेकिन कहानी के बाहर तो कोई जगह है ही नहीं। इसे पृथ्वी और अंतरिक्ष के संबंध की तरह लिया जाए। अंतरिक्ष अनंत है, एटर्नल स्पेस, पर वहां उन चीज़ों के लिए कोई स्पेस नहीं है, जो पृथ्वी पर हैं। जो पृथ्वी पर टिकी हैं, वे पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण। इसी तरह कहानी का भी एक गुरुत्व बल है, जो चीज़ों को रोक लेता है, पर कहानी के बाहर चीज़ें भटक रही हैं और वे ज़्यादा हैं और वे एक निर्वात में हैं, नॉन-स्पेस में। 

वे चीज़ें लगातार आपके दरवाज़े खटखटाती हैं। और जितनी बार वे दस्तक देती हैं, कहानी के भीतर व्यवस्था मज़बूत होती जाती है। 

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कई जगहों पर पहली बार जाते ही सोच लेता हूं कि यहां दुबारा जाऊंगा। मुझे पता होता है, पहली बार में मैं उस जगह को नज़र-भर भी देख ना पाऊंगा। इसी तरह कई लोगों से पहली मुलाकात के वक्त ही सोच लेता हूं, इनसे दूसरी मुलाकात में बात करूंगा। पहली मुलाकात अक्सर चुप्पी, झिझक और संकोच से भरी होती है। कई लोगों से, कई जगहों से हर मुलाकात ऐसी ही होती है।

(पुरानी टीपें. चित्रकृतियां : अल्‍बेर्तो सावीनियो)


Monday, July 5, 2010

बाबा बोर्हेस - 2

कुछ लोग एकदम ही उल्‍टा रास्‍ता पकड़ते हुए, सबसे पहले यही तय करते थे कि किस तरह सारी बेकार किताबों को ठिकाने लगा दिया जाए. वे छह दीवारों वाले कमरों पर आक्रमण कर देते थे और अपनी पहचान इस तरह दिखाते थे, जो हमेशा झूठ नहीं हुआ करती थीं, नाक-भौं सिकोड़ते हुए किसी किताब का एकाध पन्‍ना पलट लेते थे और फिर किताबों से भरी पूरी दीवार की निंदा किया करते थे. 

बाबा बोर्हेस
द लाइब्रेरी ऑफ़ बैबल, 1941.

Saturday, December 19, 2009

फिर कविता के बारे में


पिछली पोस्‍ट पर कुछ बातें उठी हैं, उनके बारे में अपनी राय जल्‍द ही; इस बीच पोलिश कवि चेस्‍वाव मिवोश का एक टुकड़ा, जो कि उनकी किताब 'न्‍यू एंड कलेक्‍टेड पोएम्‍स: 1931-2001' (संस्‍करण : 2003) की प्रस्‍तावना से लिया गया है.


I strongly believe in the passivity of a poet, who receives every poem as a gift from his daimonion or, if you prefer, his Muse. He should be humble enough not to ascribe what is received to his own virtues. At the same time, however, his mind and his will should be alert. I lived amidst scenes of horror in the twentieth century-- that was a reality and i could not escape into a realm of  'pure poetry' as some descendants of French symbolism advised. Yet our hot-blooded reactions to inhumanity rarely result in texts artistically valid, even if such poems as my 'Campo dei Fiori', written in April 1943 in Warsaw when the ghetto was burning, continue to have some value.

I think that effort to capture as much as possible of tangible reality is the health of poetry. Having to choose between subjective art and objective art, I would vote for the latter, even if the meaning of that term is grasped not by theory but by personal struggle. I hope that my practice justifies my claim.

The history of twentieth century has prompted many poets to design images that conveyed their moral protest. Yet to remain aware of the weight of fact without yielding to the temptation to become only a reporter is one of the most difficult puzzles confronting a practitioner of poetry. It calls for a cunning in selecting one's means and a kind of distillation of material to achieve a distance to contemplate the things of this world as they are, without illusion. In other words, poetry has always been for me a participation in the humanly modulated time of my contemporaries.

(Photo by Judyta Papp, Krakow 2002)