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Sunday, April 24, 2011

दर्द के सुर में सबसे मधुर गीत





वह एक कांपती हुई आवाज़ थी. झरना नहीं, उससे फूटकर अलग हुई एक पतली-सी धार थी, जिसकी पोशाक मख़मल की थी. वह आवाज़ अवध की तहज़ीब थी. वैसी ही मिठास, वैसा ही नफ़ासत भरा दर्द. कई दुख छत पर खड़े होकर हल्‍ला करते हैं, कुछ दुख सिगड़ी में रखे अंगारे की तरह तपते रहते हैं. जो पास आता है, उसे जलाते नहीं, जिंदगी जी सकने लायक़ तपिश देते हैं. तलत महमूद का दर्द शालीन है. वह ख़ामोशी से आंखों से निकलकर दूर होता आंसू है. वह आपके घावों को सहलाता है और कहता है, 'महसूस करो, दर्द का स्‍वाद मीठा होता है.' (हैं सबसे मधुर वो गीत, जिन्‍हें हम दर्द के सुर में गाते हैं.) यही वह तपन है, जिसने तलत को तपन कुमार सिन्‍हा नाम भी दिया था. 

विरह से बड़ा कोई राग नहीं होता. सुर के सारे सोते इसी से फूटते हैं. एक हंसती हुई धुन आपके पैरों को थिरका सकती है. एक पनीली धुन आपके दिल के भीतर घुसती है और दिल के पैरहन की सारी सलवटों को साफ़ करती है-- रेशम के बुहारन से. संगीत के शब्‍दकोश को पलटकर खंगाल लें, वहां रेशम का अर्थ तलत लिखा हुआ मिलेगा. इस आवाज़ को खींचकर आप गगनचुंबी इमारत नहीं बना सकते, इस आवाज़ में आप हाई-पिच सुरंग भी नहीं सेंध सकते. उनकी आवाज़ पगडंडी है- पतली, तमाम हरियालियों के बीच रास्‍ते का आभास देती हल्‍की-सी लकीर. यह लकीर दुनिया के तमाम राजमार्गों से ज़्यादा भव्‍य है. अगर आप तलत को दिल से सुनते हैं, तो गर्व आपकी आंखों का सुरमा होगा. 

तलत का दर्द इंतज़ार का दर्द है. आपका कोई आपसे दूर है. आपका दिल मार डूबा जा रहा है. तलत को सुनिए. वह इलाज हैं. वही दर्द हैं. वही दवा हैं. शामे ग़म की क़सम खाइए और वे गीत ढूंढ़ लाइए, जिनके लिए आंखों के दिए जलते हैं. वह आपको दुनिया के भीड़-भड़क्‍के से निकाल ले जाएंगे, उस जगह जहां कोई न हो. जहां दर्द तलत बन जाता है, इश्‍क़ तो है ही तलत. जहां ख़ामोशी एक ग़ज़ल का क़ाफि़या बन जाती है, इंतज़ार उसकी बहर. तलत की आवाज़ हमारे भीतर के इसी इंतज़ार को हौसला देती है. 

(24 फरवरी 2007 को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित)



Sunday, April 17, 2011

ग़म की बारिश, नम-सी बारिश





वह भयानक रात थी, जब उसकी आंखें नशे से डोल रही थीं और वह रिसीवर पर बाक़ायदा चीख़ रहा था, 'हलो... गीतू... मैं गुरु... मैं बहुत अकेला हूं... प्‍लीज़, आज मेरे पास आ जाओ... आई नीड यू गीता...'. वह गि‍ड़गिड़ा रहा था. बरसों से एक डाह में जल रही गीता दत्‍त खि‍लखिलाईं और ज़हर बुझे तीरों से उस ख़रगोश को बींधकर रख दिया, 'आई स्टिल लव यू गुरु... पर तुम मेरे लिए नहीं, उस वहीदा के लिए तड़प रहे हो. उसे मद्रास फोन कर लो, शायद वह आ जाए. मैं नहीं आने वाली... किस मुंह से तुम मुझे बुला रहे हो...'

गीता नहीं आई. वहीदा दूर हो ही गई थी. काग़ज़ के फूल ख़ुशबू नहीं दे पाए थे. गुरुदत्‍त कई रातों से दुख के तंदूर में भुन रहे थे, कभी इस करवट, कभी उस करवट. उस रात अपनी पसंदीदा स्‍कॉच में उन्‍होंने नींद की बीसियों गोलियां मिला लीं. उससे पहले कभी राज कपूर को फोन करते, कभी देव आनंद को. दोनों ने आने से इंकार कर दिया. वह सिर्फ़ एक रात के लिए अपना अकेलापन किसी की गोद में रखकर देर तक रोना चाहते थे. देव के साथ 'प्रभात' के शुरुआती दिनों को याद करना चा‍हते थे. राज के साथ बंबई के समंदर के साथ की गई शैतानियों को सिमर भीतर से गीला होना चाहते थे. गीता से कहना चाहते थे कि उन्‍होंने उससे बेइंतहा प्‍यार किया है. वहीदा को बताना चाहते थे कि तुम मेरी कलाकृति हो और कलाकार को अपने सिर से ज़्यादा प्‍यारी होती है अपनी कलाकृति. उनकी इस तड़प को सनक माना गया. सबने अपने-अपने तरीक़े से इंकार कर दिया. 

गुरु ने बाहोश गोलियां खाईं और बेहोशी में जिस्‍म को छोड़ दिया. रूह आगे-आगे भागती रही (जैसे 'काग़ज़ के फूल' का आखिरी सीन), जिस्‍म वहीं पड़ा दुनियादार लोगों का इंतज़ार करता रहा. उस वक़्त उनका फोन लगातार बज रहा था. गीता दत्‍त उन्‍हें कॉल कर रही थीं कि हां गुरु, मैं अभी आ रही हूं... मद्रास से वहीदा रहमान ठीक उसी समय बहुत परेशान होकर लाइटनिंग कॉल बुक करा रही थीं- मि. गुरुदत्‍त पादुकोण के नाम. देव आनंद और राज कपूर भी आंखें मींचते हुए उन्‍हें कॉल करना चाह रहे थे. पौ फट चुकी थी. गुरु के चेहरे पर यक़ीन था- ख़ुद के मर जाने का यक़ीन. इस बात का यक़ीन कि कोई नहीं आएगा अब... बिछ़ड़े सभी बारी बारी. यह यक़ीन बहुत निर्णायक होता है. मरने में बहुत मदद करता है. इसी यक़ीन ने गुरुदत्‍त की लाश के होंठों को एक मुस्‍कान सौगात की. गुरु व्‍यंग्‍य भरी मुस्‍कान के साथ मरे थे- तिरछी मुस्‍कान. सबने जागने में देर कर दी थी. उस रात की सुबह बहुत रुक कर आई. कुछ घंटों के बाद पूरी दुनिया उनके दरवाज़े पर जमा थी और गुरुदत्‍त की रूह दरवाज़े पर दोनों हाथ फैलाए मद्धम-सी आवाज़ में गा रही थी- ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्‍या है... रोशनी उस रूह के पीछे से आ रही थी. आगे तो सब कुछ अंधेरा था. 

अंधेरा उसे बहुत प्‍यारा था. वह श्‍वेत-श्‍याम का जादूगर था. जितना श्‍वेत में खिलता था, उससे कहीं ज़्यादा श्‍याम में. वह अंधेरे में हिलती हुई एक परछाईं था. कोई उसे साफ़-साफ़ नहीं देख पाया. न गीता, न वहीदा और न ही ढाई घंटे के लिए हॉल में आने वाले दर्शक, जिनके अंधकार को रोशनी से भरने के लिए वह बरसों अपनी स्‍कॉच में अपने दिल के तमाम गलियारों में छाए अंधेरों का अर्क मिलाकर पीता रहा. उस अर्क को आंसू बनाकर बहाता रहा. 

उसे आंसू बहुत प्रिय था. गुरुदत्‍त उस बूंद का नाम था, जो आंसू की कोख से निकलता है और एक बारिश में बदल जाता है. वह ग़म की बारिश था. वह नम-सी बारिश था. वह गालों को छूकर किसी अतल में जा धंसा एक अनाम-सा आंसू था. जिंदगी में हम कई लोगों को छूते हैं. कइयों से गले मिल लेते हैं, लेकिन कोई एक छुअन ऐसी होती है, जो बाक़ी तमाम स्‍पर्शों को हीन बताती है और अपनी अद्वितीयता में ताक़त देती है. हम सिर्फ़ उस छुअन को याद कर पूरी उम्र निकाल देते हैं. ताउम्र हमारी पूंजी सिर्फ़ एक निगाह होती है जो दिल में बस जाती है, साये की तरह बदन को लपेटती है, जो वक़्त की धूप को अपनी छांह से चुनौती देती है, अपनी ठंडक में पुचकारती है, तपिश को बर्फ़ का दान देती है और जलती आंखों को नम फ़ाहे. ताउम्र हम सिर्फ़ एक मुस्‍कान को याद रखते हैं, जो किसी फुनगी की तरह उमगती है. हम सिर्फ़ एक हुलस में जीते हैं, जो फ़सल के बीचोबीच चुनरी लहराकर लहलहाती है. 

हम एक सच पर पूरी दुनिया वार देते हैं, एक झूठ पर ख़ुद को क़त्‍ल कर देते हैं. गुरुदत्‍त भी एक छुअन में जिये. वहीदा की उस निगाह में उन्‍होंने अपना घर बना लिया, जो पहली बार हैदराबाद में उन पर आ टिकी थी. उस आंसू में रहे, जो बंगाल के शरत और नॉर्वे के नट हैमसन को पढ़कर उनकी आंखों से निकले. उस भटकन में रहते थे, जो मुंबई के नंगी रातों में सड़क पर फिसली हुई होती है. 

कश्‍मीर की डल झील में डोलते हुए शिकारे में जब वहीदा ने उनके माथे पर चुंबन की रोली लगाई, तो उनकी आंखें छलछला गईं. उन्‍होंने कहा, गीता मुझे छोड़ गई है. तुम मत छोड़ना कभी. और वहीदा ने कुछ ही दिनों बाद उनका साथ छोड़ दिया. बिना पूरा सच बताए. गुरु को झूठ का यक़ीन नहीं था और सच का अंदेशा भी नहीं. वहीदा कैरियर के लिए बाहर की फिल्‍में साइन करने लगीं. फिल्‍म इंडस्‍ट्री भी इसी दुनिया की तरह क़दम-क़दम पर चालाक लोमड़ों से भरी पड़ी है. गुरु ने, उनके दोस्‍त अबरार अल्‍वी ने बार-बार समझाया कि तुम्‍हारी ज़रूरत गुरु को है. वहीदा ने अपने कैरियर और सपने गिनाए. उस दिन गुरु फिर टूटे. ऐसा टूटे कि फिर कभी जुड़ नहीं पाए. उनके माथे पर पड़ा आखिरी चुंबन चालबाज़ निकला. उसने माथे पर पड़ने वाली लकीरों को कई गुना बढ़ा दिया. 

गुरुदत्‍त की लगभग हर चिट्ठी माफ़ी से भरी होती. एक ख़रगोश जो अपनी नींद में बाड़े तोड़ निकल भागता हो, और अपनी जाग में लौटने पर कंटीली बाड़ों से माफि़यां मांगता हो. वह एक तड़पा हुआ दिल था. प्‍यार की तलाश में मारा-मारा फिरता. पानी के छींटों पर बैठकर दूर-दूर तक उड़ता.  दिल का कांच टूटने पर बनी किरचों पर लहू के क़तरों की तरह चस्‍पा रहता. वह दुनिया से सिर्फ़ एक चीज़ मांग रहा था- आओ, मुझे थोड़ा-सा समझो, थोड़ा-सा संभालो. दुनिया कह रही थी कि यह सनक का सुल्‍तान है. इसे कुछ मत दो. सिर्फ़ हंस दो. जबकि गुरुदत्‍त को उन रंगों से भी परहेज़ था जिन्‍हें हंसी के रंग कहते हैं. गुरुदत्‍त के आसपास की दुनिया उसे समझ नहीं पाई, वह जो चाहता था, नहीं दे पाई. एक दिन गुरु ने दुनिया की फ़ेहरिस्‍त से अपना नाम ख़ारिज कर लिया. 

(9 जुलाई 2007 को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित.)



Friday, April 4, 2008

आज महान गायक कुंदनलाल सहगल का जन्‍मदिन है...

सहगल एक तलाश का नाम है- अपने भीतर किसी चीज़ की तलाश। जैसे कस्तूरी की तलाश करता है मृग, वैसी ही बेचैनी। सहगल का वक्त देख लें। घड़ी में तूफ़ान आया लगता है। रात यहां हैं, सुबह वहां हैं, दिन में कहां होंगे, किसे पता है। भटकन है। फिसलन है। कभी जम्मू में हैं, कभी जालंधर, शिमला, मुरादाबाद, कानपुर, कलकत्ता, मुंबई, पुणे। सहगल दौड़ रहे हैं। चीज़ें हाथ से फिसल रही हैं। दर्द का दरिया ठाठें मार रहा है। सुर गले में कांटे पैदा कर रहे हैं। बड़ी ख़लिश है। इस तपिश को किस बुख़ार का नाम दिया जाए? उस शख़्स के दुख को समझा जाए, जिसे अपनी तलाश का इल्म नहीं। जिसे पता नहीं कि दिल में बेचैनी का बगूला आखि़र क्यों उठता है? दर्द कहां से आता है? पीर क्यों परबत-सी हो जाती है? ग़म की गंगा किस आकाश से आती है? दिल का हुड़दंग अंत में सितार के तार में सुरों से बंध जाता है। चुभन हारमोनियम के बटन में पनाह पाती है। संगीत के महादेव! खोलो अपनी जटाएं। थाम लो ग़म की इस गंगा को, जो सारे बंध तोड़ती हज़ारों मील ऊंचे आसमान से गिर रही है- लटपटाती हुई, ख़ब्तुलहवास! कुंदन, आ जाओ और थाम लो दुखों को। देखो, तुम्हारे जाने को बाद से वीरान है मौसीक़ी का मयकदा, ख़ुमो-सागर उदास है...

उन्हें हिंदी सिनेमा का पहला सुपरस्टार कहा गया। पाकिस्तानी शायर अफ़ज़ाल अहमद सैयद से शब्द उधार लें, तो कह सकते हैं, जैसे काग़ज़ मरा‍कशियों ने ईजाद किया था, हुरूफ़ फिनिशियों ने, सुर गंधर्वों ने, उसी तरह सिनेमा का संगीत सहगल ने ईजाद किया। दुनिया में कई रहस्य हैं। चुनौती देते। चुनौती सहगल भी दे गए हैं। फ़क़ीरों-सा बैराग, साधुओं-सी उदारता, मौनियों-सी आवाज़, हज़ार भाषाओं का इल्म रखने वाली आंखें, रात के पिछले पहर गूंजने वाली सिसकी जैसी ख़ामोशी, और पुराने वक़्तों के रिकॉर्ड की तरह पूरे माहौल में हाहाकार मचाती एक सरसराहट... बता दो एक बार, ये सब क्या है? वह कौन-सी गंगोत्री है, जहां से निकल कर आती है सहगल की आवाज़? पता कर लो, कहां से आता है सहगल का दर्द, जो सीने में हूक, आंखों में नमी और कंठ में कांटे दे जाता है? क्यों एक रुलाहट आंखों पर दस्तक देती है और बिना कुछ कहे तकती हुई-सी लौट जाती है? यह सुबह या दुपहरी की नहीं, सांझ के झुटपुटे की आवाज़ है, जिसका असर रात के साथ गहरा होता जाता है। अगर आप दिल से कमज़ोर हैं, आधी रात को सहगल मत सुनिए। उन्हें सुनना भाषा में तमीज़ को जीना है। आंख में आंसू का सम्मान करना है। दुख जो दिल के क़गार पर रहता है, उसे बीचो-बीच लाकर महल में जगह देनी है। दुख को जियो, तो जीने का शऊर आ जाता है।

सहगल चमचमाती हुई कामयाबी का नाम नहीं है, राख और धुएं का नाम है। बर्बादी का जश्न है, जो सूखते हुए पत्ते को नम हो जाने का मंत्र देता है। वह तपती हुई रेत है, जिस पर तलवे रखने से मज़बूती हासिल होती है। वह क़तरा-क़तरा अपनी मौत में घुसता है और अपनी अंजुरी में भरकर सूर्य को सुरों का अर्घ्य देता है। वह अपना घर जलाता है और सितारों को रोशनी का दान देता है। वह शरत् का देवदास है- असली देवदास, जिसमें बचाने के लिए, ख़त्म हो जाने का साहस है। देवदास हर दिल में रहता है। पारो हर लड़की में रहती है। सहगल हर नब्ज़ में बहता है। हर कंठ में कांटों की शक्ल में रहता है, हर उस हथेली में चुभन बनकर बसता है, जो किसी पुराने स्पर्श की याद में बिसूर रही होती है।

सहगल के बारे में कुछ खास बातें
1- सहगल की उदारता के कई कि़स्से मिलते हैं। कहते हैं कि न्यू थिएटर्स के ऑफिस से उनकी सैलरी सीधे उनके घर पहुंचाई जाती थी, क्योंकि अगर उनके हाथ में पैसे होते, तो आधा वह शराब में उड़ा देते, बाक़ी ज़रूरतमंदों में बांट देते। एक बार उन्होंने पुणे में एक विधवा को हीरे की अंगूठी दे दी थी।

2- सहगल बिना शराब पिए नहीं गाते थे। 'शाहजहां' के दौरान नौशाद ने उनसे बिना शराब पिए गवाया, और उसके बाद सहगल की जि़द पर वही गाना शराब पिलाकर गवाया। बिना पिए वह ज़्यादा अच्छा गा रहे थे। उन्होंने नौशाद से कहा, 'आप मेरी जि़ंदगी में पहले क्यों नहीं आए? अब तो बहुत देर हो गई।

3- सहगल को खाना बनाने का बहुत शौक़ था। मुग़लई मीट डिश वह बहुत चाव से बनाते थे और स्टूडियो में ले जाकर साथियों को भी खिलाते थे। यही नहीं, आवाज़ की चिंता किए बग़ैर वह अचार, पकोड़ा और तैलीय चीज़ें भी ख़ूब खाते थे। सिगरेट के भी ज़बर्दस्त शौक़ीन थे।

4- सहगल ने ग़ालिब की क़रीब बीस ग़ज़लों को अपनी आवाज़ का सोज़ दिया। ग़लिब से इसी मुहब्बत के कारण उन्होंने एक बार उनके मज़ार की मरम्मत करवाई थी।

5- सहगल पहले गायक थे, जिन्होंने गानों पर रॉयल्टी शुरू की। उस वक़्त प्रचार और प्रसार की दिक़क़्तों के बावजूद श्रीलंका, ईरान, इराक़, इंडोनेशिया, अफ़ग़ानिस्तान और फिजी में सुने जाते थे। आज भी 18 जनवरी को कई देशों में सहगल की याद में संगीत जलसे होते हैं।

6- वह विग लगाकर एक्टिंग करते थे। अभिनेत्री कानन देवी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है, 'साथी की शूटिंग के दौरान हवा के झोंके से उनकी विग उड़ गई और उनका गंजा सिर दिखने लगा। लेकिन सहगल अपनी धुन में मगन शॉट देते रहे। इस पर दर्शक हंस पड़े। सहगल झेंपने की जगह लोगों के ठहाकों में शामिल हो गए।

7- सहगल की क़द्र भारत से ज़्यादा पाकिस्तान में नज़र आती है। वहां जि़ला स्तर पर सहगल यादगार कमेटियां बनी हैं। सहगल की बरसी पर आम प्रशंसा बाक़ायदा लंगर लगाते हैं।

8- लता मंगेशकर सहगल की बड़ी भक्त हैं। वह चाहती थीं कि सहगल की कोई निशानी उनके पास हो। वह उनकी स्केल चेंजर हारमोनियम अपने पास रखना चाहती थीं, पर सहगल की बेटी ने उसे अपने पास रखते हुए सहगल की रतन जड़ी अंगूठी लता को दी। लता के पास आज भी वह निशानी है। कहते हैं कि कमउम्र में लता ने सहगल की एक फिल्म देखने के बाद उनसे शादी करने का ख्‍याल ज़ाहिर किया

9- रेडियो सीलोन पर हर सुबह 7:57 बजे सहगल के गाने चलते थे। जालंधर के पुश्तैनी मकान में जिस वक्त सहगल की मौत हुई थी, उस वक्त सुबह के 7:57 ही बजे थे। जिस्म चला गया था, फि़ज़ा में तैरती उनकी आवाज़ बाक़ी रह गई थी।

(नवरंग, दैनिक भास्कर 18 जनवरी 2007 से)

Thursday, April 3, 2008

आज सजन मोहे अंग लगा लो...


फिल्म प्यासा का एक गीत है, जिसमें एक जोगन सड़क किनारे खड़ी गा रही है- आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफल हो जाए...। इसे गीता दत्त ने गाया था। कलाकार जो करता है, जाने-अनजाने उसके जीवन से भी जुड़ जाता है। यह गीत, जो कीर्तन की तर्ज़ पर बना था, गीता दत्त की जिंदगी से इस क़दर चस्पा हो गया कि वह लाख छुड़ाने पर भी नहीं छुड़ा पाईं। इस गीत में सजन से गुहार है कि वह आए और उससे प्रेम करे। इस गीत में ईश्वर से गुहार है। उससे गुहार है, जो प्रेमी है और ईश्वर भी है। इसमें नश्वर जीवन के सफल हो जाने की कामना है, जो सिर्फ़ प्रेम के मिलने पर ही सफल हो सकता है। इसमें अंग लगा लेने की उत्कंठ इच्छा है, जो प्रेम का उत्थान बिंदु है। यह मीरा का प्रेम है, जिसके प्रेमी और ईश्वर दोनों एक हैं। प्रेमी से किया गया प्रेम और ईश्वर से किया गया प्रेम जब एक हो जाता है, तो वह अद्वितीय आध्यात्मिक ऊंचाई पा जाता है। प्रेम की उत्तेजना और भक्ति की पवित्रता एक हो जाती हैं। ऐसा सिर्फ़ गीता दत्त की आवाज़ में ही संभव हो पाता है। उनकी आवाज़ कांपती है। इस कंपकंपाहट को एक विरहिणी के रुदन में सुनिए, जो इतना रो रही है कि उसके कानों के कुंडल उसके आंसू के नमक और तपिश से सोने की भांति दमक रहे हैं। गीता दत्त की आवाज़ एक गीले गाल का नमक है, जिसे होंठों से नहीं, पलकों से चूमना होता है। जिस आवाज़ को कानों में नहीं, आंखों में पहनना होता है। जिस प्रेम को समझने के लिए सिर्फ़ प्रेम कर लेना ही काफ़ी नहीं होता, लकड़ी के लट्ठे की तरह प्रेम के ऊंचे प्रपात से गिरकर भी साबुत बहते रहना होता है।

गीता दत्त एक विरहिणी थी। किसी के दूर होने से तड़पती हुई। किसी के इंतज़ार में अपने होश का सौदा करती। अपनी नक़्क़ाशीदार आवाज़ को बेरहमी से खुरचती हुई। उससे छल करती हुई। कहा गया है कि उससे पहले वह एक ठंडी हवा थी, काली घटा थी। जब साज़ छेड़े गए, तो वह आ ही गई झूम के थी। बहुत कम उम्र में दो भाई के लिए एसडी बर्मन ने उनसे गवाया था कि मेरा सुंदर सपना बीत गया...। सपना सुंदर ही था। उम्र के एक मोड़ पर आने वाले सारे सपने सुंदर होते हैं। प्रेम एक कोंपल की तरह ताज़ा हरा होता है, जिसमें सुकून पहुंचाने वाली ठंडक होती है। बाज़ी के सैट पर गीता की मुलाक़ात गुरुदत्त से हुई और घरवालों के लाख विरोध के बावजूद गीता ने गुरु से शादी की। कुछ समय तक तो सबकुछ ठीक चला, फिर गुरु के जीवन में वहीदा आईं और गीता दत्त दूर होती चली गईं। जाने गीता ने क्या कही, जाने गुरु ने क्या सुनी, पर बात कुछ बनी नहीं। गुरु के साथ जो कम वक़्त गुज़ारा था, वह गीता के लिए एक सुंदर सपना ही था, जो पहले पहर ही बीत गया। उसके बाद गीता विरह की अगन को सीने से लगाए अपने अकेलेपन की गुफा में आंसुओं का नमक और शराब का रक्त पीते हुए ख़र्च हो गईं। वह लगातार इंतज़ार करती रहीं कि गुरु लौटकर आएंगे- उन्हें फिर अंग लगाएंगे, और उनका जनम सफल हो जाएगा। इसीलिए वह गाती रहीं, अपनी ठेठ बंगाली आवाज़ में, बाऊल के मीटर पर, प्यार, इंतज़ार, रंज, गुबार, याद और बुख़ार से पीडि़त बहार के गीत।

जो विरह को सहन करती है, उसके भीतर आग होती है। वह लड़ लेती है। जब कोई उसके विरह और संन्यास के ताप का अपमान करता है, तो वह भभक उठती है। गीता तड़पी और भभकी। गुरु को लगा कि यह हर वक़्त झगड़ा करती है। विरह को समझना बस के बाहर का होता है। जब कोई स्त्री बहती हुई आंखों से न जाओ सैंया, छुड़ा के बंहियां कहती है, तो जाते हुए क़दमों का फ़र्ज़ होता है कि आंखों की उस हिचकी की इज़्ज़त में बग़ावत कर दें और जाने के फ़ैसले को दरकिनार कर दें। पर जब क़दम ऐसा नहीं करते और बंहियां छुड़ाकर चले जाते हैं, तो किसी और का नहीं, प्रेम, तड़प, विरह और ताप का ही अपमान होता है। इस अपमान को कोई पुरुष कभी नहीं समझ सकता। इसे स्त्री ही जी सकती है, समझ सकती है। गीता दत्त इसी अपमान को झेलती रहीं, पर बची हुई उम्र में गाती रहीं। दर्द और आंसू के गीत। जब उनकी आवाज़ लचकती, पश्चिमी धुनों पर पतंग की तरह लहराती, जश्न की हांक लगाती किसी कोने से निकल केंद्र में आ जाती, तब भी एक दर्द उनकी आवाज़ की सीलन में पपड़ी-दर-पपड़ी उधड़ता रहता। ओपी नैयर ने उनसे तेज़ गाने गवाए, वे सफल भी हुए, पर गीता की आवाज़ का इंतज़ार, रुंधे हुए गले का नमक, लगातार गीली आंखें और सबकुछ पाकर सबकुछ खो बैठने की कुंठा-क्रोध कभी ओझल नहीं हो पाए।

काग़ज़ के फूल में रोशनी की एक हल्की-सी किरण है, जिसके बदन पर ग़र्द उड़ रही है। कैमरामैन वीके मूर्ति को वह ग़र्द फिल्माने में ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ी थी, पर गीता के शरीर पर वह ग़र्द त्वचा की तरह तहों में थी। कोई बदल गया था। किसी के वादे तेज़ हवा में काग़ज़ के पुरजों की तरह बिखर गए थे। और इसमें किसी आदमज़ाद का नहीं, वक़्त का दोष था। वह गा रही थीं- वक़्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे ना तुम, हम न रहे ना हम। जब कोई बदलकर दूर चला जाता है, इंतज़ार की आंखें थक जाती हैं, जब कोई बिजली प्यार की दुनिया को राख कर जाती है, तो न जिया जाता है और न मौत आती है। पहले प्यार का इंतज़ार होता है, फिर मौत का इंतज़ार। जब तक गुरु जीते रहे, गीता उनका इंतज़ार करती रही। और जब वह चले गए, तो मौत का। वह भी एक दिन आ गई, लेकिन वह सिर्फ़ उस गीता को ले जा पाई, जो पहले ही टूटे हुए दिल की आग में राख बन चुकी थी। उसे नहीं, जो नमक बनकर हम सबकी आंखों में बस चुकी है।
नवरंग, दैनिक भास्कर में 6 नवंबर को प्रकाशित.