Thursday, April 3, 2008

आज सजन मोहे अंग लगा लो...


फिल्म प्यासा का एक गीत है, जिसमें एक जोगन सड़क किनारे खड़ी गा रही है- आज सजन मोहे अंग लगा लो, जनम सफल हो जाए...। इसे गीता दत्त ने गाया था। कलाकार जो करता है, जाने-अनजाने उसके जीवन से भी जुड़ जाता है। यह गीत, जो कीर्तन की तर्ज़ पर बना था, गीता दत्त की जिंदगी से इस क़दर चस्पा हो गया कि वह लाख छुड़ाने पर भी नहीं छुड़ा पाईं। इस गीत में सजन से गुहार है कि वह आए और उससे प्रेम करे। इस गीत में ईश्वर से गुहार है। उससे गुहार है, जो प्रेमी है और ईश्वर भी है। इसमें नश्वर जीवन के सफल हो जाने की कामना है, जो सिर्फ़ प्रेम के मिलने पर ही सफल हो सकता है। इसमें अंग लगा लेने की उत्कंठ इच्छा है, जो प्रेम का उत्थान बिंदु है। यह मीरा का प्रेम है, जिसके प्रेमी और ईश्वर दोनों एक हैं। प्रेमी से किया गया प्रेम और ईश्वर से किया गया प्रेम जब एक हो जाता है, तो वह अद्वितीय आध्यात्मिक ऊंचाई पा जाता है। प्रेम की उत्तेजना और भक्ति की पवित्रता एक हो जाती हैं। ऐसा सिर्फ़ गीता दत्त की आवाज़ में ही संभव हो पाता है। उनकी आवाज़ कांपती है। इस कंपकंपाहट को एक विरहिणी के रुदन में सुनिए, जो इतना रो रही है कि उसके कानों के कुंडल उसके आंसू के नमक और तपिश से सोने की भांति दमक रहे हैं। गीता दत्त की आवाज़ एक गीले गाल का नमक है, जिसे होंठों से नहीं, पलकों से चूमना होता है। जिस आवाज़ को कानों में नहीं, आंखों में पहनना होता है। जिस प्रेम को समझने के लिए सिर्फ़ प्रेम कर लेना ही काफ़ी नहीं होता, लकड़ी के लट्ठे की तरह प्रेम के ऊंचे प्रपात से गिरकर भी साबुत बहते रहना होता है।

गीता दत्त एक विरहिणी थी। किसी के दूर होने से तड़पती हुई। किसी के इंतज़ार में अपने होश का सौदा करती। अपनी नक़्क़ाशीदार आवाज़ को बेरहमी से खुरचती हुई। उससे छल करती हुई। कहा गया है कि उससे पहले वह एक ठंडी हवा थी, काली घटा थी। जब साज़ छेड़े गए, तो वह आ ही गई झूम के थी। बहुत कम उम्र में दो भाई के लिए एसडी बर्मन ने उनसे गवाया था कि मेरा सुंदर सपना बीत गया...। सपना सुंदर ही था। उम्र के एक मोड़ पर आने वाले सारे सपने सुंदर होते हैं। प्रेम एक कोंपल की तरह ताज़ा हरा होता है, जिसमें सुकून पहुंचाने वाली ठंडक होती है। बाज़ी के सैट पर गीता की मुलाक़ात गुरुदत्त से हुई और घरवालों के लाख विरोध के बावजूद गीता ने गुरु से शादी की। कुछ समय तक तो सबकुछ ठीक चला, फिर गुरु के जीवन में वहीदा आईं और गीता दत्त दूर होती चली गईं। जाने गीता ने क्या कही, जाने गुरु ने क्या सुनी, पर बात कुछ बनी नहीं। गुरु के साथ जो कम वक़्त गुज़ारा था, वह गीता के लिए एक सुंदर सपना ही था, जो पहले पहर ही बीत गया। उसके बाद गीता विरह की अगन को सीने से लगाए अपने अकेलेपन की गुफा में आंसुओं का नमक और शराब का रक्त पीते हुए ख़र्च हो गईं। वह लगातार इंतज़ार करती रहीं कि गुरु लौटकर आएंगे- उन्हें फिर अंग लगाएंगे, और उनका जनम सफल हो जाएगा। इसीलिए वह गाती रहीं, अपनी ठेठ बंगाली आवाज़ में, बाऊल के मीटर पर, प्यार, इंतज़ार, रंज, गुबार, याद और बुख़ार से पीडि़त बहार के गीत।

जो विरह को सहन करती है, उसके भीतर आग होती है। वह लड़ लेती है। जब कोई उसके विरह और संन्यास के ताप का अपमान करता है, तो वह भभक उठती है। गीता तड़पी और भभकी। गुरु को लगा कि यह हर वक़्त झगड़ा करती है। विरह को समझना बस के बाहर का होता है। जब कोई स्त्री बहती हुई आंखों से न जाओ सैंया, छुड़ा के बंहियां कहती है, तो जाते हुए क़दमों का फ़र्ज़ होता है कि आंखों की उस हिचकी की इज़्ज़त में बग़ावत कर दें और जाने के फ़ैसले को दरकिनार कर दें। पर जब क़दम ऐसा नहीं करते और बंहियां छुड़ाकर चले जाते हैं, तो किसी और का नहीं, प्रेम, तड़प, विरह और ताप का ही अपमान होता है। इस अपमान को कोई पुरुष कभी नहीं समझ सकता। इसे स्त्री ही जी सकती है, समझ सकती है। गीता दत्त इसी अपमान को झेलती रहीं, पर बची हुई उम्र में गाती रहीं। दर्द और आंसू के गीत। जब उनकी आवाज़ लचकती, पश्चिमी धुनों पर पतंग की तरह लहराती, जश्न की हांक लगाती किसी कोने से निकल केंद्र में आ जाती, तब भी एक दर्द उनकी आवाज़ की सीलन में पपड़ी-दर-पपड़ी उधड़ता रहता। ओपी नैयर ने उनसे तेज़ गाने गवाए, वे सफल भी हुए, पर गीता की आवाज़ का इंतज़ार, रुंधे हुए गले का नमक, लगातार गीली आंखें और सबकुछ पाकर सबकुछ खो बैठने की कुंठा-क्रोध कभी ओझल नहीं हो पाए।

काग़ज़ के फूल में रोशनी की एक हल्की-सी किरण है, जिसके बदन पर ग़र्द उड़ रही है। कैमरामैन वीके मूर्ति को वह ग़र्द फिल्माने में ख़ासी मशक़्क़त करनी पड़ी थी, पर गीता के शरीर पर वह ग़र्द त्वचा की तरह तहों में थी। कोई बदल गया था। किसी के वादे तेज़ हवा में काग़ज़ के पुरजों की तरह बिखर गए थे। और इसमें किसी आदमज़ाद का नहीं, वक़्त का दोष था। वह गा रही थीं- वक़्त ने किया क्या हसीं सितम, तुम रहे ना तुम, हम न रहे ना हम। जब कोई बदलकर दूर चला जाता है, इंतज़ार की आंखें थक जाती हैं, जब कोई बिजली प्यार की दुनिया को राख कर जाती है, तो न जिया जाता है और न मौत आती है। पहले प्यार का इंतज़ार होता है, फिर मौत का इंतज़ार। जब तक गुरु जीते रहे, गीता उनका इंतज़ार करती रही। और जब वह चले गए, तो मौत का। वह भी एक दिन आ गई, लेकिन वह सिर्फ़ उस गीता को ले जा पाई, जो पहले ही टूटे हुए दिल की आग में राख बन चुकी थी। उसे नहीं, जो नमक बनकर हम सबकी आंखों में बस चुकी है।
नवरंग, दैनिक भास्कर में 6 नवंबर को प्रकाशित.

7 comments:

Anonymous said...

प्रेम को समझने के लिए सिर्फ़ प्रेम कर लेना ही काफ़ी नहीं होता...
जब कोई स्त्री बहती हुई आंखों से न जाओ सैंया, छुड़ा के बंहियां कहती है, तो जाते हुए क़दमों का फ़र्ज़ होता है कि आंखों की उस हिचकी की इज़्ज़त में बग़ावत कर दें और जाने के फ़ैसले को दरकिनार कर दें। पर जब क़दम ऐसा नहीं करते और बंहियां छुड़ाकर चले जाते हैं, तो किसी और का नहीं, प्रेम, तड़प, विरह और ताप का ही अपमान होता है। इस अपमान को कोई पुरुष कभी नहीं समझ सकता। इसे स्त्री ही जी सकती है, समझ सकती है।

ye bahut asadharan baat hai..bahut gehri aur bahut sachhi. aap hi likh sakte the aisa. meharbani karke krodhit na hon..me vastav me bahut imotional hoon aapki writings ko dekhkar. aur likhiye..

अनिल दुबे said...

गीत भैया...उफ़...आपने तो रुला ही दिया.गीता दत्त के जीवन को जिस तरह से आपने शब्दों में पिरोया है वह कमाल का है.मैं आज पहली बार आपके ब्लाग पर आया.अब अक्सर आया करुंगा.

sarita said...

sarita sharma said
geet maine hal hi mein vimal mitra ki bichde sabhi bari bari padhi hai jo guru ke kuch antim varshon ke bare mein hai.shadi ke bad guru nahin chahte the ki geeta gane gaye kyonki use ghar ya desh se bahar jana padta tha aur ghar bachon ko sambhalna mushkil ho gaya tha.geeta ka bhai videsh padhta tha jiske liye use paise ki jaroorat thi.us pustak ke anusar vahida guru ka platonic ya professional relation adhik tha.patrikayen aur kuch log lagatar geeta ko bhadkate rahte the aur vah bar bar roothkar man ke bhar chali jati thi.guru behad vyast the.donon mein pyar bhi tha takrar bhi.1 din depression mein gurudutt ne croron ka shandar bangla majdooron se tudwa diya aur hotel mein rahne laga.donon atmhatya ka bar bar prayas karte.geeta bahut dayalu bhi thi aur apni kamayi ko jarooratmand naukron ko de deti thi.kabhi kabhi apne aap mein bahut ache hone ke bad do log jodi ke roop mein safal nahin hote.

पारुल "पुखराज" said...

तीनो ही हमारे दिलों में आबाद हैं/रहेंगे .

pallav said...

Badhiyaa.

आशीष said...

Sir mujhe maf kijiye ye line main copy karne se apne apko rokh nhi paa rha hooon....

प्रेम को समझने के लिए सिर्फ़ प्रेम कर लेना ही काफ़ी नहीं होता...
जब कोई स्त्री बहती हुई आंखों से न जाओ सैंया, छुड़ा के बंहियां कहती है, तो जाते हुए क़दमों का फ़र्ज़ होता है कि आंखों की उस हिचकी की इज़्ज़त में बग़ावत कर दें और जाने के फ़ैसले को दरकिनार कर दें। पर जब क़दम ऐसा नहीं करते और बंहियां छुड़ाकर चले जाते हैं, तो किसी और का नहीं, प्रेम, तड़प, विरह और ताप का ही अपमान होता है। इस अपमान को कोई पुरुष कभी नहीं समझ सकता। इसे स्त्री ही जी सकती है, समझ सकती है।

बाबुषा said...

क्या कहा जाए ? क्यूँ न बस सिसका जाए..और सिसकी क्यूँ ...क्यूँ न एक बार जोर से रो लिया जाए ?

विरह ! विरह ! प्रेम को और गहरा देने वाला अद्भुत विरह ! एक बात कहूँ...कभी कभी मिलन जितना ही सुन्दर होता है विरह ! दो ध्रुव हैं..पर असीम सुन्दरता और संभावनाएं समेटे हुए ! आधी जान तो हलक में आ गयी पढ़ते -पढ़ते ..!