Thursday, May 19, 2011

नेह-नृत्य






जब कोई नाचता है, तो उसके भीतर क्या नाचता है? बुल्ला कहता था, उसकी देह कभी नहीं नाचती, नाचती तो रूह है। जैसे पृथ्वी के भीतर समंदर नाच पड़े, तो पृथ्वी भी तो नाचती हुई ही जान पड़ेगी। सो भीतर का नाच ही बाहर का नाच होता है। शकीरा को नाचते हुए देखें, तो लगता है कि मुर्शद को मनाने वाला बुल्ला नाच रहा है, शम्स के सामने रूमी नाच रहा है, स्कार्फ हिलाकर जीवन के तमाम अबूझ का अभिवादन करती इज़ाडोरा डंकन नाच रही है, थोड़ा-सा तुम नाच रही हो, थोड़ा-सा मैं नाच रहा हूं। एक देह में कितने सारे लोग लोग नाच रहे हैं। यह देह का नहीं, नेह का नृत्य है। नाचती देह है, नचाता नेह है।


दुनिया के सारे नेह को इकठ्ठा  किया जाए, एक जगह रख दिया जाए, तो वह उतना ही होगा, जितना एक व्यक्ति के भीतर होता है। यानी एक के भीतर का नेह, सारी दुनिया में समाए नेह जितना होता है। इसीलिए उसके नेह से हम इतनी जल्दी जुड़ जाते हैं। नेह में क्षिप्त होकर किया गया नृत्य इसीलिए कदमों को ताल की सौगात देने से रोक नहीं पाता। संभव है कि यह किसी व्यक्ति के लिए किया गया नेह न हो, बल्कि अ-व्यक्ति के लिए हो। जो व्यक्त है, वह व्यक्ति है। अ-व्यक्त भी बहुधा व्यक्ति ही है। नृत्य का नेह अ-व्यक्त के व्यक्ति बन जाने का नेह है। बुल्ला को तब तक यह पता नहीं था कि उसके भीतर का अ-व्यक्त क्या है, जब तक कि उसने नृत्य न किया। वह नाचा, इसीलिए वह अपने भीतर छिपे हुए खुद को जान पाया।


आप कितना भी प्रेम में डूबे हुए हों, हर समय आपके भीतर एक शख्स ऐसा रहता है, जिसे आप नहीं जानते। आप न तो खुद के सामने और न ही किसी और के सामने, उसे व्यक्त कर पाते हैं। उसके सामने भी नहीं, जो पूरी तरह व्यक्त और व्यक्ति बनकर आपके जीवन में बैठा हुआ है। यही अ-व्यक्ति प्रेम को बढ़ाते रहने का काम करता है। आप एक व्यक्ति से प्रेम कर रहे होते हैं, उसी के साथ-साथ एक अ-व्यक्ति से भी प्रेम कर रहे होते हैं। 


'इश्क दी नवियों नवी बहारमें बुल्ला कहता है कि हीर को रांझा मिल गया, फिर भी हीर खोई-खोई रहती है, वह रांझा को अपने भीतर खोजती रहती है। उसे सुध ही नहीं है कि रांझा उसके ठीक पास है। अगर व्यक्ति रांझा ठीक पास है, तो हीर किसमें खोई हुई है? कीनन, रांझा के अ-व्यक्ति में। यानी वह रांझा के उस हिस्से में खोई हुई है, जो अभी तक हीर की देह पर, आत्मा पर व्यक्त नहीं हुआ है। यानी रांझा या प्रेम की महा-कल्पना, जो रांझा की हकीकत से कहीं आगे हैं, उससे कहीं विशाल है। शाम के समय पडऩे वाली परछाईं की तरह, जिसमें वस्तु तो बहुत छोटी होती है, लेकिन जब रोशनी के बीच आती है, तो वस्तु के आकार से कई गुना लंबी परछाईं बना देती है। इसमें ज़ोर रोशनी पर है। भीतर की रोशनी अ-व्यक्त की एक विशालकाय परछाईं का निर्माण करती है।


तो हीर एक साथ दो से प्रेम करती जान पड़ती है- अपने जीवन में रांझा की व्यक्त उपस्थिति से और अपने मन में रांझा की अ-व्यक्त उपस्थिति से भी। यही अ-व्यक्त उपस्थिति ही प्रेम की उसकी प्यास और तलाश है। यह उसके जीवन से प्रेम को कभी समाप्त नहीं होने देगी। यह मन ही मन किया गया प्रेम हीर को नचाता है। यही बुल्ला को नचा देता है। यही रूमी को, मीरा को, यही माइकल जैक्सन, शकीरा और डंकन को भी। अ-व्यक्त से प्रेम के बिना कोई नृत्य संभव ही नहीं। इन सबमें अ-व्यक्त प्रेम, नेह के झरने की तरह रहता होगा।


 माइकल की डायरी का एक हिस्सा याद आता है- 'महाचेतना हमेशा सृजन के ज़रिए $खुद को अभिव्यक्त करती है। यह दुनिया विधाता का नृत्य है। नर्तक आते हैं, चले जाते हैं, लेकिन नृत्य हमेशा रहता है। जब मैं नाचता हूं, तो लगता है, कोई बहुत पवित्र चीज़ मुझे छूकर गुजरी है। मेरी आत्मा बहुत हल्की हो जाती है। लगता है, मैं ही चांद और सितारे हूं। मैं ही मुहब्बत हूं, मैं ही महबूब हूं। मैं ही मालिक हूं, मैं ही गुलाम हूं। मैं ही ज्ञान हूं और ज्ञानी भी मैं ही हूं। मैं नाचता जाता हूं और एक समय सृष्टि का शाश्वत नृत्य बन जाता हूं। सर्जक और सृष्टि आनंद के ऐक्य में विलुप्त हो जाते हैं। तब भी जो बचता है, वह सिर्फ नृत्य होता है।


यही नृत्य है, तो प्रेम भी यही है। यह जो नृत्य है, वही देह के भीतर नेह बनकर रहता है। प्रेम व्यक्त से ज्यादा अ-व्यक्त में वास करता है। इसीलिए तो आप कभी नहीं बता पाते कि प्रेम है, तो कितना है? बस, बहुत है। बहुत मतलब बहुत।



Tuesday, May 3, 2011

प्रेम, कविता और शोपां





शोपां पियानो
18 जनवरी 2010
मोत्सार्ट के संगीत के बारे में कई विद्वानों का कहना है कि यह बहुत सोच-समझकर रचा गया संगीत है, दिमाग की सारी जटिलताओं को रूपायित करता हुआ; वहीं बीथोफन के संगीत के बारे में राय अलग है- कहा जाता है, वह संगीत बीथोफन के दिल से निकलता है और सीधे सुनने वालों के दिलों में समा जाता है। मुझे लगता है- बीथोफन का दिल जब आखिरी बार धड़का होगा, तब उसने थोड़ा-सा रक्त बरसों बाद आने वाले शोपां के दिल को नज़र किया होगा। शोपां को, देर रात, देर तक सुनने के बाद ऐसा ही महसूस होता है।

रूबीन्स्टीन का पियानो, शोपां का नॉक्टर्न। अगर श्रीकृष्ण ने बांसुरी के वेस्टर्न नोट्स बनाए होते, तो वे शोपां के नॉक्टर्न की तरह ही होते। (यह ख्याल ही कितना एब्सर्ड है कि बांसुरी को पियानो के नोट्स पर बजाया जाए।) 

नॉक्टर्न यानी रात के समय बजने वाला संगीत। अंधेरे में डूबा हुआ एक बगीचा। पत्तों की आवाज़ से हवा के चलने को महसूस करना। ज़मीन पर तारों की परछाईं देखना और आसमान में जो आकृतियां बनी हों, उन्हें ज़मीन पर उगे पेड़-बूटों की परछाईं की तरह महसूस करना। जब पैदल चलना, तो पत्तों की खदड़-खदड़ आवाज़ आना। कोई भी आवाज़ आने से पहले खुद को श्श्श्श् कहकर चुप करा देती है। वहीं बगीचे में थोड़ी सी गुंजाइश खोज लेना कि एक समंदर भी बन जाए। उसकी आवाज़ के भीतर उतरना। उसमें मिली एक-एक नदी को रेशे-रेशे की तरह अलग करना। उन्हें पहचाने बिना उन्हें फिर एक-दूसरे में मिला देना। वहीं एक टापू बना लेना और उसमें अकेले होने के विरुद्ध आवाज़ का एक बूटा रोपना। 

ये शोपां है।
मैं तुम्हारे पास हूं। तुम्हारी हथेली में उगली फंसाए।
तुम सबके पास हो।
पर मैं सबके पास नहीं
सिर्फ तुम्हारे पास हूं।
यही शोपां है।

वह बीजगणित के ‘माना कि एक्स बराबर वाय' को नकार देता है और बताता है कि अनुभूति और संगीत का कोई सिद्धांत नहीं होता। जो संगीत में भी सिद्धांतों और व्याकरणों का पालन करते हैं, वे दरअसल, किसी भी नए से घबराते हैं, वे पुराने से भी आतंकित हैं, वे मेड़ों से बंधे खेत में अनंत की खोज करते हैं।

नियमों को तोडऩा बहुधा एक नया नियम बन जाया करता है।

शोपां इससे दूर रहना सिखाता है।

‘मैंने अपने लिए नए नियम बनाए' यह कहने से बेहतर है यह कहना, ‘मैंने नियमों को ध्वस्त कर दिया और खुद को भी नियमों से आज़ाद रखा।'

शोपां अराजक नहीं है। बहुत अनुशासित और मापा हुआ है, फिर भी उसमें वह बनैलापन है, जो आपको उसके अनुशासन पर यकीन नहीं करने देता। 

दो परस्पर विरोधी चीज़ों को साध लेने वाले कलाकार हमेशा मुझे आकर्षित करते हैं।

कई बार मुझे लगता है कि यह दक्षिणोत्तर जैसी किसी नई दिशा की तलाश कर लेने जैसा है।

दो सौ साल पहले उसे पोलैंड से भागना पड़ा था। वह पेरिस में रहा। सारा संगीत उसने वहीं रचा। पर उसका दिल लगातार पोलैंड के लिए धड़कता। उसने कहा कि जब मैं मर जाऊं, तो मेरे दिल को मेरे शरीर से निकाल लेना और उसे पोलैंड में दफनाना। 39 साल की उम्र में जब वह मरा, तो उसकी इच्छा का सम्मान किया गया। उसका शरीर पेरिस में दफनाया गया, लेकिन उसका दिल निकालकर पोलैंड ले जाया गया। वह वहां दफन हुआ।

उस दिल से ऐसा संगीत न निकलता, तो कैसा निकलता? वह इस ख्याल को भी कितने म्यूज़िकल तरीके से खारिज करता है कि वह तब तक ही सुना जाएगा, जब तक वह गूंज रहा है।





21 जनवरी 2010
शोपां को सुनना सिर्फ शोपां को सुनना होता है। मोत्जार्ट को आप दूर बैठकर सुन सकते हैं, बीथोफन को सुनते हुए आप खुद ही धीरे-धीरे हर किस्म की ध्वनि से दूर होते जाते हैं। शोपां को मैं दूर से नहीं सुन पाता। उसमें इतनी बारीकियां हैं, इतनी छोटी-छोटी हरकतें हैं कि उसकी आवाज़ के पास अपने कान ले जाने होते हैं। इसीलिए मैं उसके लिए हेडफोन लगाता हूं। मैं उसका हर स्वर कानों से सुनना चाहता हूं। पहले कान सुनें, फिर वे तरंगें देह और आत्मा से लिपटें। संगीत अंग से भी ग्रहण होता है और अनंग से भी। 

शिव ने कामदेव को भस्म कर अनंग बना दिया था- वह विदेह हो गया था। फिर भी पार्वती जब भी संगीत बजाती थीं, वे दोनों महसूस करते थे कि अनंग कहीं पास ही है। देह खोने के बाद भी अनंग ने अपना व्यवहार नहीं खोया था। वह कैलाश के आसपास ही भटकता था। इसीलिए पार्वती को उस पर रहम आया था और वह शिव से आग्रह करती रहीं कि वह कामदेव के अनंग-शाप को वापस ले लें। पर शिव कहते, वह अनंग है, इसीलिए मनोज है। इसीलिए वह हर अंग का ओज है। वह विदेह है, इसीलिए हर देह से संयुक्त है।
कई बार मुझे लगता है कि पुराणों में जरूर कोई कथा ऐसी भी होगी, जिसमें संगीत को सशरीर उपस्थिति कहा गया होगा। और किसी शाप में उसने भी अपना रूप खो दिया होगा। जैसे कामदेव ने खोया, जैसे दक्ष ने खोया, जैसे शारंग ने खोया, जैसे आठों चिरंजीवियों ने खो दिया। हालांकि मैं अभी तक ऐसी किसी कथा तक नहीं पहुंच पाया हूं।

संगीत भी अनंग है, इसीलिए हर अंग में उसकी व्याप्ति है। पर मैं उसकी व्याप्ति को दिशा देना चाहता हूं। क्यों? मैं उसे एक मार्ग दिखाना चाहता हूं कि तुम यहां से प्रविष्ट हो और यहां जाओ। संगीत कभी आज्ञा नहीं मानता। और ग्राहक यानी उसे ग्रहण करने वाला अपनी पद्धति से बाहर नहीं निकलता।

इतालवी में प्रेम की एक परिकल्पना है, जिसे 'फीनो अमोरे' कहा जाता है यानी संपूर्ण प्रेम। यह दान्ते अलीगियेरी की रचनाओं से आया। ऐसा प्रेम, जिसमें शरीर का कोई अर्थ नहीं होता, अभिव्यक्ति और स्मृति का भी कोई अर्थ नहीं होता। आप जिससे प्रेम करते हैं, संभव है कि उसे आपने कभी देखा भी न हो, उससे कुरबत तो दूर की चीज़ है। न उससे बातें की हों, न ही कोई व्यवहार। पर उससे प्रेम करते हों। वह एक उपस्थिति हो, किंतु आपके भीतर। यह सिर्फ मन में किया जाने वाला प्रेम है। बाहर उसकी अभिव्यक्ति कैसे भी संभव है, लेकिन इसकी मौजूदगी केवल आपके भीतर है। यह प्रेम को भक्ति भी बना देता है। अपने यहां मीरा के रूप में ऐसे प्रेम का उदाहरण है।

संगीत से किया जाने वाला प्रेम फीनो अमोरे ही होता होगा। यह सिर्फ आपके भीतर रहता है। आप संगीत की देह को नहीं छू पाते, लेकिन वह आपकी आत्मा और देह को छूता रहता है। शोपां इसी तरह एक अनुपस्थित उपस्थिति में आता है। बहुत बारीक स्वरों, हल्की बुनावटों, छोटे-छोटे वाल्ट्ज और मादक नाक्टर्न्‍स में। उसे लोग 'पियानो का कवि' कहते हैं। बहुत ज्यादा चीजों का इस्तेमाल नहीं करता। प्रेम भी शायद ऐसा ही होता है। बजने के लिए ज्यादा साजों का प्रयोग नहीं करता। एक अकेली तान से ही बड़ा ऑर्केस्ट्रा खड़ा कर देता है। अकेली तान वाला ऑर्केस्ट्रा। उसी तरह कविता को भी दूरी से नहीं समझा जा सकता। आपको उसे समझने के लिए, उसके बहुत करीब, झुककर, निहुरकर जाना होता है। उसमें भी अकेली तान से बड़ा ऑर्केस्ट्रा बनता है। शोपां के पास भी इसी तरह जाना होता है। झुककर, निहुरकर, बहुत करीब। प्रेम, कविता और शोपां- तीनों एक ही गोत्र से निकले होंगे।

(मेरी डायरी के हिस्‍से. पहला हिस्‍सा कथादेश अक्‍टूबर '10 में 
और दूसरा हिस्‍सा दैनिक भास्‍कर में 3 मई '11 को प्रकाशित.) 



Sunday, April 24, 2011

दर्द के सुर में सबसे मधुर गीत





वह एक कांपती हुई आवाज़ थी. झरना नहीं, उससे फूटकर अलग हुई एक पतली-सी धार थी, जिसकी पोशाक मख़मल की थी. वह आवाज़ अवध की तहज़ीब थी. वैसी ही मिठास, वैसा ही नफ़ासत भरा दर्द. कई दुख छत पर खड़े होकर हल्‍ला करते हैं, कुछ दुख सिगड़ी में रखे अंगारे की तरह तपते रहते हैं. जो पास आता है, उसे जलाते नहीं, जिंदगी जी सकने लायक़ तपिश देते हैं. तलत महमूद का दर्द शालीन है. वह ख़ामोशी से आंखों से निकलकर दूर होता आंसू है. वह आपके घावों को सहलाता है और कहता है, 'महसूस करो, दर्द का स्‍वाद मीठा होता है.' (हैं सबसे मधुर वो गीत, जिन्‍हें हम दर्द के सुर में गाते हैं.) यही वह तपन है, जिसने तलत को तपन कुमार सिन्‍हा नाम भी दिया था. 

विरह से बड़ा कोई राग नहीं होता. सुर के सारे सोते इसी से फूटते हैं. एक हंसती हुई धुन आपके पैरों को थिरका सकती है. एक पनीली धुन आपके दिल के भीतर घुसती है और दिल के पैरहन की सारी सलवटों को साफ़ करती है-- रेशम के बुहारन से. संगीत के शब्‍दकोश को पलटकर खंगाल लें, वहां रेशम का अर्थ तलत लिखा हुआ मिलेगा. इस आवाज़ को खींचकर आप गगनचुंबी इमारत नहीं बना सकते, इस आवाज़ में आप हाई-पिच सुरंग भी नहीं सेंध सकते. उनकी आवाज़ पगडंडी है- पतली, तमाम हरियालियों के बीच रास्‍ते का आभास देती हल्‍की-सी लकीर. यह लकीर दुनिया के तमाम राजमार्गों से ज़्यादा भव्‍य है. अगर आप तलत को दिल से सुनते हैं, तो गर्व आपकी आंखों का सुरमा होगा. 

तलत का दर्द इंतज़ार का दर्द है. आपका कोई आपसे दूर है. आपका दिल मार डूबा जा रहा है. तलत को सुनिए. वह इलाज हैं. वही दर्द हैं. वही दवा हैं. शामे ग़म की क़सम खाइए और वे गीत ढूंढ़ लाइए, जिनके लिए आंखों के दिए जलते हैं. वह आपको दुनिया के भीड़-भड़क्‍के से निकाल ले जाएंगे, उस जगह जहां कोई न हो. जहां दर्द तलत बन जाता है, इश्‍क़ तो है ही तलत. जहां ख़ामोशी एक ग़ज़ल का क़ाफि़या बन जाती है, इंतज़ार उसकी बहर. तलत की आवाज़ हमारे भीतर के इसी इंतज़ार को हौसला देती है. 

(24 फरवरी 2007 को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित)