Saturday, October 23, 2010

लिखने की आदतें

टाइम ने इस बार जोनाथन फ्रैंजन पर कवर स्‍टोरी दी है. बरसों बाद कोई लेखक टाइम के कवर पर आया है. फ्रैंजन का नाम सुना है, पर उसकी कोई किताब पढ़ी नहीं है. टाइम ने उस पर बढि़या लिखा है, ऐसा कि उसे पढ़ने की दिलचस्‍पी जग गई. इसी में पढ़ा कि एक लंबे राइटर्स ब्‍लॉक के दौरान जब फ्रैंजन कुछ नहीं लिख पा रहे थे, तो उन्‍होंने तंबाकू खाना शुरू कर दिया. यह आदत उनके लेखक दोस्‍त डेविड फॉस्‍टर वैलेस में थी. वैलेस की आत्‍महत्‍या के बाद वह आदत उनमें आ गई. उनकी एक और आदत के बारे में इसी से पता चला कि जब वह लिखते हैं, तो अपने पुराने डेल के लैपटॉप के आगे ज़ोर-ज़ोर से अपने डायलॉग्‍स बोलते हैं. छह घंटे के लेखन-सेशन के बाद उनका गला बैठ जाता है और यह लगभग रोज़ की बात है. उनका कहना है, ऐसा करने से उनके डायलॉग्‍स सरल, सहज, अमेरिकी बोलचाल की भाषा में हो जाते हैं. वे फिलिप रॉथ के डायलॉग्‍स को किताबी मानते हैं. लिखते समय अपना लिखना उच्‍चारने की आदत फॉकनर में भी थी. 

राइटर्स ब्‍लॉक से जूझने का लेखकों का तरीक़ा कई बार अद्भुत होता है. जैसे हारुकि मुराकामी ने तो पूरी एक किताब ही इस पर लिख दी है. उनके संस्‍मरणों की किताब व्‍हाट आय टॉक व्‍हेन आय टॉक अबाउट रनिंग   दौड़ने की उनकी आदत के बहाने की उनकी रचना-प्रक्रिया की पड़ताल है. अपनी किताबों के कई हिस्‍से उन्‍होंने इसी तरह दौड़ते हुए ही सोचे हैं. 

लिखते समय की कई अजीब आदतें हैं लोगों की. कई तो इतने अनुशासित होते हैं कि कल जहां छोड़ा था, वहीं से आज शुरू कर दिया. जैसे सलमान रूश्‍दी. वह सुबह उठने के बाद पहला काम जो करते हैं, वह है लिखना. टेबल पर पहुंच गए. कल क्‍या-क्‍या, कितना लिखा था, उसे पढ़ डाला. फिर आगे लिखने बैठ गए. तीन घंटे लिखने के बाद फ्रेश होने जाएंगे. फिर दुनियादारी. शाम को पेज तीन वाली जि़ंदगी में घुसने से पहले एक बार फिर पढ़ेंगे कि सुबह क्‍या-क्‍या लिखा था. फिर अगली सुबह छुएंगे. कोई करेक्‍शन हुआ, तो वह भी अगली सुबह. मिडनाइट्स चिल्‍ड्रन  लिखते समय वह नौकरी पर थे. पांच दिन नौकरी करते थे, पांचवीं शाम घर पहुंच घंटा-डेढ़ घंटा गरम पानी से नहाते, फिर लिखने बैठ जाते. सोमवार की सुबह तक सोते-जागते लिखते, फिर अपने काम पर चले जाते, पांच दिन के लिए. 

ओरहन पमुक ने अदर कलर्स  में बहुत दिलचस्‍प कि़स्‍से लिखे हैं अपनी ऐसी आदतों के बारे में. एक निबंध में वह कहते हैं- उन्‍हें घर में लेखन करना अजीब लगता था. उन्‍हें हमेशा एक दफ़्तर चाहिए होता, जो घर से अलग हो, जहां वह सिर्फ़ लिख सकें. (यह आदत कई लेखकों की रही है. इसके लिए उन्‍होंने घर के पास या तो कोई फ़्लैट ख़रीद लिया या किराये पर ले लिया और वहां काम किया.) ख़ैर, पमुक घर में लिखने की मजबूरी से अलग ही ढंग से निपटे. वह सुबह उठते, नहाते-धोते, नाश्‍ता करते, बाक़ायदा फॉर्मल सूट पहनते और पत्‍नी से यह कहकर कि अब मैं ऑफिस जा रहा हूं निकल पड़ते, पंद्रह-बीस मिनट सड़क पर टहलने के बाद वह वापस घर  लौटते, अपने कमरे में घुसते, और उसे अपना ऑफिस मान लिखने लग जाते. 

सुनने-पढ़ने में यह जितना आसान लग रहा है, उतना होता नहीं होगा. मैंने कुछ दोस्‍तों को यह तरीक़ा बताया है, और वे अब तक ऐसा नहीं कर पा रहे. घर पहुंचने के बाद घर, उन्‍हें हर तरह से घर ही लगता है. अब हम लोग जो घर में ही लिखते रहे हैं, लिख लेते हैं, लेखन के लिए दफ़्तर वाला चस्‍का लगा नहीं है, सो इस पूरी प्रताड़ना को समझने से भी बचे हुए हैं. लेकिन यह ज़रूर अचरज में डालता है कि ये सारे बड़े लेखक कितनी कमिटमेंट के साथ लिखते हैं. कोई नियमित दिन में बारह घंटे लिखता है जैसे पमुक इस्‍तांबुल के लिए, मारकेस सॉलीट्यूड के समय और बाद में भी सुबह नौ से दोपहर तीन बजे तक लिखते थे और उसके बाद पॉपुलर संगीत सुना करते थे. लिखते समय उनकी टेबल पर पीला गुलाब होना ज़रूरी था, यह तो कई बार कही गई बात है. 

पर मुझे सबसे अजीब आदत  हेमिंग्‍वे  की लगती है. वह आदमी खड़े-खड़े लिखता था, बैठकर लिख ही नहीं पाता था. उसने बाक़ायदा अपने लिए स्‍टडी बनवाई थी, लेकिन लिखने का काम बेडरूम में करता था. अपने लिए एक ऐसी डेस्‍क बनवाई थी, जिस पर उसके काग़ज़, टाइप राइटर और तुरंत काम में आने वाली किताबें रखे रहता. एक टांग मोड़कर, दूसरी अकेली टांग पर खड़े रहता. कभी इस पैर पर वज़न डालता, कभी उस पैर पर. इस दौरान पेंसिल से पुराने लिखे काग़ज़ों में करेक्‍शन करता रहता, इस बीच जब उसे लगता कि अब वह रौ में आ गया है, आनन-फानन टाइप करना शुरू कर देता. ओल्‍ड मैन एंड द सी   ऐसे ही लिखा गया है. दूसरे उपन्‍यास भी. एक लंबे राइटर्स ब्‍लॉक से निकलने के लिए उसने यह आदत पैदा कर ली थी, जो ऐसी चिपकी कि उससे अलग हो कुछ लिखा ही न जाता. 

राइटर्स ब्‍लॉक बहुत ख़राब चीज़ होती है. जो न कराए सो कम. जैसे क्रिकेटर फॉर्म खो जाने से ख़ाइफ़ रहते हैं, वैसे ही लेखक ब्‍लॉक से. वैसे, विलियम फॉकनर इस बारे में बहुत ही बेरहम बात करते हैं कि जो लेखक बहुत नखरे करते हैं, लिखने के लिए ढेर सारी मांग करते हैं, मन की शांति से लेकर धन की शांति तक, वे दरअसल फर्स्‍ट रेट लेखक होते ही नहीं, लिखने के लिए तो सिर्फ़ कुछ सादे काग़ज़ और एक छिली हुई पेंसिल की ज़रूरत होती है. फॉकनर आजोबा की यह सच्‍ची बात माथे पर बल डालने के लिए काफ़ी थी. पर एक दूसरे निबंध में यह भी पढ़ लिया कि इन्‍हीं फॉकनर आजोबा ने यह भी कहा था कि लेखक दिन-भर नौकरी और पैसे के जुगाड़ में लगा रहेगा, तो क्‍या खा़क लिखेगा. (यह उन्‍होंने तब कहा था, जब उन्‍हें पोस्‍ट ऑफिस की एक नौकरी से इसलिए निकाल दिया गया था कि वह ड्यूटी अवर्स में बैठकर किताब पढ़ते पकड़े गए थे.) 

यह सारी बातें तो मुझे इसलिए याद आईं कि कल दिन में किसी दोस्‍त से बात हो रही थी और मैं उसे बता रहा था कि मैंने चैट और एसएमएस करते हुए अपनी कविता या कहानी की पंक्तियां पाई हैं. फिर उन्‍हें पिरोया है. चीज़ों को सब अपनी-अपनी तरह पाते हैं, और कई चीज़ें कई दूसरे लोगों जैसे ही मिलती हैं. कुछ संयोग है, कुछ आदत की बात, कुछ हालात हैं, तो कुछ प्रेरणाओं का दबाव. आखि़र हम सब ही जानते हैं, हिकमत की कविताएं जेल में सिगरेट की डिब्बियों पर लिखी गई थीं.

ऐसी बहुत-सी स्‍मृतियां हैं. कई लेखकों की आदतें याद आ रही हैं. अब बस.  उन पर फिर कभी.  



30 comments:

अशोक कुमार पाण्डेय said...

मैने सुना है कि रांगेय राघव भी खड़े होकर लिखते थे…अपनी ग़रीबी में भी कुछ जुगाड़ निकाला था

मुझे लगता है ऐसी सनकें एक कमिटेड लेखक के लिये ज़रूरी सा तत्व हैं…

अपन लोग शायद अफ़ोर्ड नहीं कर सकते इतना सब…शायद वह कमिटमेंट भी नहीं…

इंट्रेस्टिंग पीस है यार…सोचा था कल पढ़ूंगा पर रोक नहीं पाया…

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

Likhne ke sath padi hui aadaten chhutti bhi nahi jaldi..kai sare lekhkon ki adat se parichay hua aapki is post ke dwara...shukriya

अजित वडनेरकर said...

बेहतरीन पोस्ट....और अमृतलाल नागर तो उम्र भर या तो तख्ती पर लिखते रहे या बोलकर लिखाते रहे...

देवेन्द्र पाण्डेय said...

..लेखन के प्रति अपनी गंभीरता को आँकने का अवसर प्रदान करती उम्दा पोस्ट।

गिरिराज said...

मुझे लगता है 'राईटर्स ब्लॉक' नामक संघटना का जन्म किसी लेखक के भीतर, उसके मन-मस्तिष्क में नहीं, किसी मनोविश्लेषक के क्लिनिक में हुआ था। मनोविज्ञान के लोकप्रिय होने और इंडस्ट्री बनने ने (जो पश्चिम में ही संभव था, किसी ने लिखा है कि फ्रॉयड के बाद यानि मनोविश्लेषण के जन्म के बाद कन्फेशन बॉक्स की जगह सायकेट्रिस्ट के क्लिनिक ने ले ली) लेखकों में हमेशा से रहे इन न-लिखने के दौरों को एक 'फिनॉमिना' बना दिया बल्कि एक तरह की कमोडिटी। तमाम औपनिवेशिक/पश्चिमी लेगेसी के बावजूद भारतीय लेखकों की न-लिखने के दौरे की 'पैथोलॉजी' बिल्कुल भिन्न है। कथादेश के नये अंक में हिन्दी के सर्वाधिक पश्चिम-प्रवण लेखकों में एक वैद कहते हैं - ऐसे दौर आते है चले जाते हैं!

विमलेश त्रिपाठी said...

बहुत दिलचस्प बातें... कई अपनी आदतों को मैने लेख पढ़ते हुए याद किया..इसके पहले मेरा ध्यान इनपर न गया था...
गीत भाई आपका आभार

चन्दन said...

बेहतरीन पोस्ट!

जब लिखना शुरु किया तभी एक मित्र ने सुझाया कि प्रतिभा और कुछ नहीं, मेहनत का ही एक सुन्दर नाम है. और इन महान लेखको के बारे में जब जब जानने को मिलता है, दुबारा दुबारा पढ़ने को मिलता है, तब तब लगता है कि कहाँ गलती हो रही है? कमिटमेंट में कोई कमी है यह तो मानने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता पर रूटीन जॉब या दूसरी मुश्किलें ऐसे नियम बनाने नहीं दे रहीं हैं. वरना, यह जानना कितना सुखद है कि इतने नामचीन लोग कितनी मेहनत और लगन से काम करते थे/है. रोज लिखना, नियम से भी ज्यादा इस पर भी निर्भर करता है कि आपके पास लिखने के लिये कुछ है भी या नहीं? कुछ से मेरा अर्थ ‘विषय’ से है.

राईटर्स ब्लॉक वाली बात. मुझे लगता है कि जिस थीम पर हम काम करने से डरते हैं, या लगता है कि will it be received properly or not? वहाँ जरूर डर लगता है- लिखें या ना लिखें टाईप का. खासकर उपन्यास लिखते हुए. इस पोस्ट ने काफी कुछ दुबारा सोचने पर बल डाला. आभार.

मनीषा पांडे said...

हांलाकि लेनिन लेखक तो नहीं थे इस या उस किसी भी तरह से, लेकिन उन्‍हें भी खड़े खड़े लिखने की आदत थी। एक किताब, शायद साम्राज्‍यवाद, पूंजीवाद की चरम अवस्‍था ही, उन्‍होंने पूरी की पूरी खड़े खड़े ही लिखी थी। राइटर्स ब्‍लॉक का तो क्‍यूं कहूं, मुझे लगता है कि मेरे साथ ये कहीं लाइफ टाइम ब्‍लॉक न हो जाए। न तूफान आता है, न ब्‍लॉक कटता है।

डॉ .अनुराग said...

दिलचस्प ......कमलेश्वर की "जो मैंने जिया" में भी उन्होंने भी एक किस्से का जिक्र किया है जिसमे उनका एक राइटर दोस्त बदहाली में उनके यहाँ रहने आया .उसके टाइप राइटर की खड खड से वे डिस्टर्ब रहे ....अल्टिमेटली उन्हें कहना पढ़ा भाई कुछ ओर जुगाड़ ढूंढो......

हाँ राइटर्स ब्लोक पर विस्तृत चर्चा की जानी चाहिए ......

anurag vats said...

लिखने के बारे में, न लिख पाने के बारे में, अलग-अलग वक़्त और ढंग-ढब से लेखन की प्रेरणाओं के बारे में यहाँ के 'इशारे'काबिलेगौर हैं.

एक लेखक की ग्रीन-रूम में झांकना कितना हौलनाक हो सकता है इसे गिरिराज नामक टिप्पणीकर्ता 'कथादेश' के अंक से जिन लेखक का हवाला देकर बता रहे हैं, वे उनकी छपी हुई तीन डायारियों को भी पढ़ लें, जहां यह पंक्ति ''ऐसे दौर आते है चले जाते हैं!'' के बरक्स हजारों जगहों पर रायटर'स ब्लाक से ही निकलने की ज़द्दोजहद दर्ज है.

ज्ञान की एक शाखा- मनोविज्ञान- के लिए टिप्पणीकर्ता का यह कहना कि यह 'लोकप्रिय' होकर 'इंडस्ट्री' बन गई, प्रकारांतर से ज्ञान और लोक-रूचि के प्रति उनके नज़रिए को स्पष्ट करनेवाला है.इससे मेरे भीतर यह जिज्ञासा बलवती हुई कि गिरराज सरीखे उस टिप्पणीकर्ता का भी नाम जान लूँ जिन्हें यहाँ इस तरह कोट किया गया है ''किसी ने लिखा है कि फ्रॉयड के बाद यानि मनोविश्लेषण के जन्म के बाद कन्फेशन बॉक्स की जगह सायकेट्रिस्ट के क्लिनिक ने ले ली''. अंतिम बात यह कि न लिखने के दौर महज 'फिनॉमिना' नहीं हैं, लिखने की तैयारी भी हैं.इसकी गणना 'कमोडिटी' में करना टिप्पणीकर्ता के कैशोर्य सोच की सूचना देता है. जैसे रचना-प्रक्रिया के इस अभिन्नतम हिस्से (लिखने, न लिख पाने, अलग-अलग ढंग-ढब से लेखन की प्रेरणाओं के बारे में यहाँ के 'इशारे' ) के सन्दर्भ में उनका यह कथन भी कि ''मुझे लगता है 'राईटर्स ब्लॉक' नामक संघटना का जन्म किसी लेखक के भीतर, उसके मन-मस्तिष्क में नहीं, किसी मनोविश्लेषक के क्लिनिक में हुआ था।''

इन टिप्पणीकर्ता पर भोलेपन में हम आस्था टिका बैठे तो दोस्तोयेव्स्की, वर्जिनिया वुल्फ और इतालो स्‍वेवो जैसे रचनाकारों को पढ़ना बन्द करना होगा, क्योंकि उन्हें ये निश्चय ही पैथ-लैब का बताएँगे.

girirajk said...

1. It was Foucault (a juvenile for sure!) who saw psychoanalysis as a modern, scientific form of confession.

Foucault writes:

"We have since become an extraordinarily confessing society. Confession has spread its effects far and wide: in the judicial system, in medicine, in pedagogy, in familial relations, in amorous relationships, in everyday life and in the most solemn rituals; crimes are confessed, sins are confessed, thoughts and desires are confessed, one's past and one's dreams are confessed, one's childhood is confessed; one's diseases and problems are confessed;..."

This forms a strong criticism of psychoanalysis, representing the modern, scientific form of confession. The authors at http://www.academyanalyticarts.org/milch&rosen.htm put it in plainest terms:

"For Foucault, both Christian confession and psychoanalysis enjoin one to speak, to reveal, to disclose, in the former to a priest, in the latter to the analyst."

2. From the 'Industry': 3-4 of the numerous. May cost USD 25 to begin with.

http://www.newsu.org/conquering-writers-block

http://silviahartmann.com/writers-block-help.php

http://njtoday.net/2010/10/22/writer%E2%80%99s-block-help-is-on-the-way/

http://www.ehow.com/how_18024_rid-writers-block.html

3. The 'phenomenon' was created by the modern psychoanalysis industry not the 'problem' itself:

लेखकों में हमेशा से रहे इन न-लिखने के दौरों को एक 'फिनॉमिना' बना दिया

4. Beckett had no problem in getting himself analyzed. Virgina might have welcomed some help.

Ashis Nandy says in the same Kathadesh issue: even the parttion victims and survivors in India didn't go to psychiatrists. Every culture has its own patholog(ies).

abcd said...

in line to anuraag ji's comment-
-looking at writer's block in dry and harsh way to an extent of calling it a commodity is such brilliant example of "lack of patience" ,wherein not allowing the writer to enjoy his phases or may be moods or not allowing him to survive even the-law of averages .

"writer's block " का नाम्करण सन्सकार विग्यान द्वारा किया गया है कह कर इसे कला से बेदखल क्यो किया जाय ?!
नाम्करण ही किया होगा न (यदी किया होगा तो !),परीस्थितिओ और लक्शणॊ का निर्माण तो नही ही किया होगा/
what's in a name.नाम्करण सन्स्कार सतही सा विशय सा लग रहा है /

हर बात पे केह्ते हो कि तू क्या है............??!!लेखन और लेखको के प्रती प्रेम की पाती जैसी ब्लोग-पोस्ट पे controversial comment करने को भी commodity की ही तरह इस्तेमाल किया जाता सा लग्ता है /

कैलाश वानखेड़े said...

गीत जी आपका मनपूर्वक शुक्रिया .. जो चाहिए वह मिला .गजब का सहज तरीका है आपका ,,,हमारा बहाना है की नौकरी करते हुए लिखना भी कष्टदायक है.सबकी अपनी अपनी मज़बूरी है .

ravi said...

likhte rhen... ek yahi aadat bani rahni chahiye. bahut rochak jaankari. geetji mera mail id aapke paas hai. kahani bhejne wale the. kya hua...? -ravi buley

anurag vats said...

श्रीमान जीके जी,

अभिनन्दन!

सामान्य अध्ययन से सबको पता है कि फूको उस पश्चिमी लेगेसी से ही आते हैं जिसे आपने हमारे ज्ञान-चक्षु खोलने से पहले भिन्न नोशन के साथ कोट किया है और अब शिरोधार्य किए बैठे हैं...ओह, बनारसी जयशंकर प्रसाद याद आ गए : 'यह विडंबना आरी सरलते, तेरी हसी उडाऊं मैं !' ...इस लेगेसी पर हमें नाज है गुरु...लेकिन इसे सरलमति से जहां तहां मत चिपकाइए...वहां तो बिलकुल नहीं जहां इसका सन्दर्भ नहीं बनता...लेखक के अपने लिखने/न लिखने को लेकर कही गई बातें उसकी रचना-प्रक्रिया का अभिन्न हिस्सा है उसे, इतनी हिकारत से देखने की और उस सन्दर्भ में वैद जैसे रचनाकारों को कोट करने से पहले, आप वैद की तीनों डायारियां पढ़ जाइये...देखिये कितना विलाप है उनमें और ढूंढिए कि वह कितना आपके लफ़्ज़ों में कम या भिन्न है पश्चिम से....दूसरे, दोस्तोयेव्स्की/वुल्फ/बेकेट सरीखे रचनाकारों से मनोविज्ञान में काम करने वालों ने अंतर्दृष्टि पाई है, इससे न मुझे इनकार है न आपको, लेकिन मूल्य-निर्णय करते हुए मैं किसी साहित्य-दृष्टि को 'आशीष-दृष्टि' पर ज़्यादा तवज्जो देना चाहूँगा...बाकी बातें श्री abcd ने कही है...मुझे वह महत्वपूर्ण लगती हैं...

मोहन वशिष्‍ठ 9991428447 said...

सिर बहुत अच्छी जानकारी मिली बहुत अच्चा लगा इस तरह कि आदतों के बारे में जानकार जानकारी के लिए आपको धन्यवाद बहुत इंट्रेस्टिंग पोस्ट के लिए आपको बधाई

गिरिराज said...

फूको के बारे में अपने ज्ञान के लिये टिप्पणीकार अपनी पहली टिप्पणी देखें। संदर्भ भी मिलेगा।

भारत की पश्चिमी लेगेसी और पश्चिम की पश्चिमी लेगेसी के फर्क के लिये बिब्लियो लम्बी बनेगी। इसके लिये पोस्ट-कोलोनियलिज्म के नुक्त-ए-नज़र से हुए अनेक अध्ययनों की ओर 'भी' रुख किया जा सकता है। वैसे उन तमाम अध्ययनों को भी टैरी ईगल्टन जैसे मार्क्सवादी अधीर किशोर अक्सर 'पोस्ट कोलोनियल एकेडेमिक इंडस्ट्री'कहते हैं।

अन्य से/के ऑब्सेसन पर सामग्री प्रचुर है; 'किशोर' 'सरलमति' आदि समझने के लिये भी मनोविश्लेषण (भी) काम आ सकता है।

प्रकाशन व्यवसाय ने प्रेमचंद/टैगोर को भी उनके कॉपीराईट मुक्त होने के बाद 'कमोडिटी' बना दिया है - यह कहना अगर प्रेमचंद/टैगोर से या यथार्थवाद/रस्यचेतना से या प्रकाशन से हिकारत है, तो हिकारत और मति में कौन किसकी 'हंसी उडाये'विडंबने?

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मेरे ख़याल से वैद ने अपनी तीन किताबें पढ़ने के बाद 2009-10 में जो कहा है, कहा होगा। क्यूं न वैद साहब को अपनी किताबें दुबारा पढ़ने के लिये कहा जाय?

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वर्जीनिया को जिंदगी में कम-से-कम एक बार न्यूरोसिस के लिये भर्ती किया गया था। उनके जैसे न्यूरोसिस के एक्यूट रोगी का केस बिल्कुल भिन्न था।

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For instance, Henry Ey, a French psychiatrist at Bonneval, related that between 1921 and 1937 only 6 per cent of patients suffering from schizophrenia and chronic delirium were discharged from his institution. The comparable figure for the period from 1955 to 1967, after the introduction of chlorpromazine, was 67 per cent. Between 1955 and 1968 the residential psychiatric population in the United States dropped by 30 per cent.

(SOURCE: wiki)

Virginia died in 1941.

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2001 के एक आँकडे के मुताबिक यूएस में 45000 सॉयकेट्रिस्ट थे जरूरत से तीन गुना ज्यादा। 2003 में भारत में 2500-5000 के बीच बताये जाते हैं। कम या ज़्यादा? यह एक मतिमंद सांस्कृतिक प्रश्न भी हो सकता है

anurag vats said...

आदरणीय गिरिराज जी,

सादर वन्दे !

आपके द्वारा हँसुए के ब्याह में गाया गया खुरपी का यह गीत ( अब तक तीन खण्डों में) निहायत बेसुरा होने के बावजूद मैं सुनता रहा. इसके लिए मैं स्वयं का कृतज्ञ हूँ और आपको मेरा कृतज्ञ होना चाहिए. बारात में 'खुरपी-खुरपी' करने वाले एक आप ठहरे, दूसरा आप पर कान देकर मैं हुआ. अब तो देखिये हम बारात से बाहर हो कर जामा-मस्जिद चले आए. और आप और हम बस एक-दूसरे को यह किस्सा भर सुनाने पर आमादा हैं कि साहब दिल्ली में तो कोई शायर बचा नहीं. एक आप ठहरे और आप भी क्या हैं !

बहरहाल, फूको की मान्यता मेरे लिए रोली तो है नहीं कि मैं उसे घिसुं और शिरोधार्य करूँ. आपने उनके हवाले से फैसले दिए थे. मैंने उससे असहमति जताई. इससे आपका ज्ञान झलक गया और मेरा अज्ञान. मुद्दा मुर्दा हो गया.

अरे महोदय, मुद्दा लिखने की आदतें थी, उसका रोचक बखान था, उस दरम्यान आने वाली रुकावटें और सहूलियतों का अनेक लेखकों के हवाले से जिक्र था....आप उसे लेखक की रचनात्मक मनोभूमि से से न जोड़कर मनोविश्लेषक के क्लिनिक से जोड़ने बैठ गए. पीढ़े के बगल में आपने फूको नामक अढेसिव रखा और लगे लगाने जोड़ पर. बिनाका गीतमाला की तरह लिंकमाला यहाँ चेप कर आपने, जिक्र उनका बयान अपना वाला धोखा भी बनाया. हालांकि उसका मूल उद्देश्य मुझ मतिमंद का ज्ञानवर्धन था. लेकिन महोदय, आप जिनके लेखन और जीवन के बारे में नन्हें-नन्हें पाराग्राफ में कह रहे हैं, उनसे मेरी असहमति है ही नहीं. हाँ, मैं ज्ञान की किसी शाखा को धंधा नहीं बोलना चाहता. और न ही लेखकों की रचना-प्रक्रिया को महज पण्य वस्तु माने में मेरी रूचि है. अगर होती तो मैं मसलन वैद के उपन्यासों के साथ-साथ उनकी डायारियों को महत्वपूर्ण जानकर नहीं पढ़ता और आप तो कुछ पन्नों के उनके साक्षात्कार पर ही लट्टू हो कर यहाँ मुझे आईना दिखाने पर तुले हैं.

महोदय ऐसा आप खुरपी-गान की वजह से करते हैं...मैं भी कितना खाली हूँ कि संगत करने बैठ जाता हूँ पीढ़े पर...और अपने पास तो कोई अढेसिव भी नहीं. बहरहाल मैं लिंकमाला से काम चलाऊंगा...

फिर बात होती है...किसी अन्य बारात में...

girirajk said...

गीत भाई आपकी पोस्ट /बज्ज़ etc पे कौन क्या कमेन्ट करे इसके लिए कोई गाइडलाइन टिप्पणीबाज से बनवा लें :-)
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मैंने पोस्ट के 'एक हिस्से ' पर बात की जिसमें मेरी दिलचस्पी थी . ब्लाक को उसमें राईटर के छोर से नहीं (जो पोस्ट में एक तरह से हो चुका था )दूसरे छोर से देखने की कोशिश की. इसे शायद किसी के लिखे में दिलचस्पी लेना, उसे महत्त्वपूर्ण मानना और उसकी बात को आगे बढ़ाना कहते हैं पर मति जांचने वाले वीर -प्रौढ़ों को इतना भारी षड़यंत्र कैसे मंज़ूर हो :(
मोरल पुलिस की तर्ज़ पर 'मति -पुलिस' वालों का डंडा कहाँ चल जाये क्या भरोसा.
जो डंडेबाज वैद से ज्यादा उनके बारे में जानते हैं , वो हमारे जैसे मतिमदों ने क्या पढ़ा नहीं पढ़ा उसकी ख़ुफ़िया रिपोर्ट तो जेब में लिए घूमते ही होंगे.

Sanjeet Tripathi said...

दिलचस्प

अविनाश said...

आज दिनांक 3 नवम्‍बर 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट लिखने की आदत शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए जनसत्‍ता पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें।

बारिशरस में डूबी दिल्‍ली

अविनाश said...

आज दिनांक 3 नवम्‍बर 2010 के दैनिक जनसत्‍ता में संपादकीय पेज 6 पर समांतर स्‍तंभ में आपकी यह पोस्‍ट लिखने की आदत शीर्षक से प्रकाशित हुई है, बधाई। स्‍कैनबिम्‍ब देखने के लिए जनसत्‍ता पर क्लिक कर सकते हैं। कोई कठिनाई आने पर मुझसे संपर्क कर लें।

बारिशरस में डूबी दिल्‍ली

Shah Nawaz said...

आपका लेख जनसत्ता के आज के संस्करण में प्रकाशित हुआ है. आप इसे जनसत्ता-रायपुर के ऑनलाइन संस्करण में प्रष्ट न. 4 पर पढ़ सकते हैं.

http://www.jansattaraipur.com/

अवधूत - Avadhoot said...

Nice to see Bhau Padhye in your list of favourite writers. You may like to visit- bhaupadhye.blogspot.com
Thanks.

Geet Chaturvedi said...

@Avadhoot
भाऊ को जानने के लिए अच्‍छी जगह बनाई आपने. बहुत ज़रूरी काम.
अविनाश जी और शाह नवाज़ का शुक्रिया.

अल्पना वर्मा said...

बहुत ही रोचक आदतें हैं राईटर्स ब्लोक दूर करने हेतु.
यह बात भी सीखने को मिली कि अगर नियमित लेखन करना है तो लिखने के लिए समय तय कर लेना भी एक बेहतर विकल्प है.[इसके विपरीत सच तो यह भी है लिखने का कोई समय नहीं होना चाहिए..ख्याल तो कभी भी कहीं भी आते जाते हैं]

सोनू said...

कृष्ण बलदेव वैद की नई कहानी "विफलदास का लकवा" (नया ज्ञानोदय, अगस्त 2007) राइटर्स ब्लॉक के ही इर्द-गिर्द है। इसमें विफलदास अपनी इस परेशानी का क्या ईलाज करते हैं, यह बताने की ज़रूरत कृष्णजी ने नहीं समझी है। बस अख़ीर में एकदम इतना-सा बताया गया है की विफलदास कामयाब हो जाते हैं।


"ऐसे दौर आते है चले जाते हैं!"
यह बात उनकी इस कहानी से तो बिल्कुल संगत है।

L.Goswami said...

दिलचस्प..पोस्ट भी...टिप्पणियाँ भी...:-)

mamta vyas bhopal said...

बहुत ही रोचक विषय पर बात चली है | जितने निराले लेखक उतने ही निराले उनके ढंग | लिखना दरअसल क्या है ? जब भाव , अहसास आपके मन में उमड़े तो उन्हें अभिव्यक्त करना है | उस समय आप आप जहाँ है जिस हाल में है आपको अपने भावों को कहीं ना कहीं व्यक्त करना ही होगा | जो वो इक बार वापस चले गए तो लौट के नहीं आते | किसी को होटल के वातानुकूलित कमरे में ही लिखना आता है | जैसे हमारे फिल्म लेखक | तो कोई लेखक या कवि रात के स्याह सन्नाटों में अकेले ही अपने भावो को शब्दों का जामा पहना देता है |
किसी के मन में विश्वसुन्दरी को देख कर भाव जागते है तो कोई सड़क किनारे पत्थर तोड़ती स्त्री में खूबसूरती देख कर उस पर कविता रच देता है | सारे खेल मन के भावों के हैं | आपका मन कब किस बात से प्रेरित हो जाये और मन की धरती पर कब कोई सुन्दर रचना का अंकुर फूटे कौन जानता है |
सुन्दर रचनाये तभी रची गयी जब मन भावों से भर गए | आपके होंठ मुस्काए आखों में चमक आये और आप उस भाव को व्यक्त करने के लिए बैचेन हो जाये | लेकिन जब कवि या लेखक खुद को मशीन बना लेते है | तो उनकी रचनाओं में रूखापन आने लगता है |धन के लिए नहीं मन के लिए हो लेखन तो बात बने | रचना ऐसी हो जो सिर्फ आखों को ना छुए मन को भी स्पर्श करे | खुद जीये फिर लिखे तो बात बने | और गजल हो उठे | मिले किसी से नजर तो समझो गजल हुई | रहे ना अपनी खबर तो समझो गजल हुई |

sarita sharma said...

लेखकों से जुडी कुछ दिलचस्प बातें बताने के लिए धन्यवाद.न लिखने की अवधि भी स्वाभाविक और जरूरी है.कई बार पुराने विषय चुक जाते हैं और नया अभी लिखे जाने के लिए तैयार नहीं होता है.कई साल पहले राजेंद्र यादव ने न लिखने के कारण किताब लिखी थी.मगर उसके बाद भी उनका लेखन चालू न हो सका.लेखकीय जीवन अक्सर बहुत लंबा नहीं चल पता है.बड़े बड़े लेखकों को नया लिखने की बजाय पुराणी रचनाओं को भुनाते देखा जा सकता है.सबसे बुरा हल मंचीय कवियों का है.श्रोता उंही कविताओं को सुन सुन कर पाक जाते हैं. विलियम फॉकनर की बात बहुत सही लगी कि लेखक दिन-भर नौकरी और पैसे के जुगाड़ में लगा रहेगा, तो क्‍या खा़क लिखेगा'.हमें आपसे लंबे सृजनात्मक जीवन की अपेक्षा है.इतने सरे अन्य लेखकों से जुड़े रहेंगे तो कुछ न कुछ नया लिखते ही रहेंगे.