Thursday, February 14, 2013

तुम्‍हारी मुस्‍कान तुम्‍हारे होंठों में छिपी / अनकही बातों की दरबान है




चित्र मेरी प्रिय फोटोग्राफ़र Anna Aden का, जिसके खींचे हर चित्र पर मैं फि़दा हूं.


एक कविता, आज के दिन के लिए. ख़ास 

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नि:शब्‍द


आज एक नि:शब्‍द का उच्‍चारण करो 

जिस शब्‍द से बनी थी यह सृष्टि 
उसे बो दो अपने बग़ीचे में 
कुछ दिनों में वह एक पौधा बन जाएगा 
उसे तुम अपनी दृष्टि से सींचना

मैं मेहनतकश विद्यार्थी हूं तुम्‍हारे प्रेम का 
हर वक़्त इम्‍तहानों की तैयारी में लगा हुआ 
तुम्‍हारी ख़ामोशी के सीने पर
तिल की तरह उगे हैं मेरे कान

जिन पंक्तियों की मैंने प्रतीक्षा की
वे जमा हैं तुम्‍हारे होंठों की दरारों में
तुम्‍हारी मुस्‍कान 
तुम्‍हारे होंठों में छिपी 
अनकही बातों की दरबान है

किसी किताब के पन्‍ने पर
कोई बहुत धीरे-धीरे खेता है नाव 
आधी रात तुम्‍हारे कमरे में गूंजता है 
पानी का कोरस 

तुम्‍हारी आंख के भीतर एक मछली 
तैरना स्‍थगित करती है 
तलहटी को घूरते हुए गाती है बेआवाज़

पानी कभी नया नहीं होता और प्रेम भी 
फिर भी कुछ बूंदों को हम हमेशा ताज़ा कहते हैं 

जब मन पर क़ाबू न हो 
तो याद करना 
कैसे तेज़ बारिश के बीच अपनी छतरी संभालती थी 

कभी-कभी चिडि़या हवा में ऐसे उड़ती है 
जैसे करामाती नटों के खेत से चुरा ले गई हो 
अदृश्‍य डोर पर चलने का हुनर 

जोगनों की तरह साधना करती हो 
तुम पर आ-आ बैठती हैं ति‍तलियां 
जो दीमक तुम पर मिट्टी का ढूह बनाती है
उन्‍हें तुम सितारों-सा सम्‍मान देती हो

तुम्‍हारे कमरे में एक बल्‍ब 
दिन-रात जलता है 

इस वक़्त तुम्‍हारे कमरे में होता
तो तुम्‍हारी आंखों के भीतर झांकता 
आंखें आत्‍मा की खिड़की हैं 

इच्‍छादेह की सबसे ईमानदार कृति है  
देह इस जीवन का सबसे बड़ा संकट है 

ऐसे चूमूंगा तुम्‍हें कि
तुम्‍हारा हर अनकहा पढ़ लूंगा 
होंठ दरअसल मन की आंखें हैं


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Saturday, December 8, 2012

कवि जहां से देखता है, दरअसल, वह वहीं रहता है





आपके टिकने की जगह या 'पोजीशन' का सवाल, लेखन में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है। फ़र्ज़ कीजिए, हम पांच कवियों को एक गुलाब या एक लाश देते हैं और उस पर लिखने के लिए कहते हैं। जिस 'पोजीशन' से वे उस पर लिखेंगे, वही 'पोजीशन' उन्हें एक-दूसरे से अलग करेगी। कुछ लोग इसे 'एक लेखक द्वारा अपनी आवाज़ पा लेना' कहते हैं। अपनी पोजीशन पाने में बहुत समय लगता है और मेरा मानना है कि लेखन में यही बुनियादी चुनौती भी है। एक बार आपने अपनी पोजीशन पा ली, लेखन अपने आप खुलने लगता है, हालांकि उस समय नई चुनौतियां खड़ी हो जाती हैं। मेरी कविताओं के मामले में बेचैनी यही थी कि इस दहलीज़ वाली पोजीशन से अरबी भाषा में कविता कैसे लिखी जाए।

आज मैं इस पूरी यात्रा का वर्णन कर पा रही हूं, लेकिन उस समय तो मैं उस बेचैनी को साधारण तौर पर निराशा ही मान लेती थी।
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ईमान मर्सल अरबी की श्रेष्‍ठतम कवियों में से एक हैं. उनकी तीस कविताओं का अनुवाद और कविता पर लिखा उनका गद्य पढ़ने के लिए यहां जा सकते हैं.

सबद पुस्तिका 8 - ईमान मर्सल की कविताएं

इधर किए गए कामों में इन कविताओं का अनुवाद करना बहुत संतोषजनक अनुभव रहा.


Friday, September 7, 2012

समय का कंठ नीला है






इज़राइली फोटोग्राफ़र कैटरीना लोमोनोसोव का की एक कृति. 



प्रेम के दिन टूट जाने के दिन होते हैं। शुरू में ऐसा लगता कि सबकुछ फिर से बन रहा है, लेकिन प्रेम, बैबल के टॉवर की तरह होता है। सबसे ऊंचा होकर भी अधूरा कहलाता है।

जब मनुष्‍यों ने बैबल का टॉवर बनाना शुरू किया था, तब ईश्‍वर बहुत ख़ुश हुआ था. धीरे-धीरे टॉवर आसमान के क़रीब पहुंचने लगा. ईश्‍वर घबरा गया. उसे लगा, मनुष्‍य उसे ख़ुद में मिला लेंगे. वे सारे मनुष्‍य एक ही भाषा में बात करते थे. ईश्‍वर ने उनकी भाषा अलग-अलग कर दी. उनमें से कोई भी एक-दूसरे को नहीं समझ पाया. सब वहीं लड़ मरे.

जैसे मनुष्य की रचना ईश्वर ने की है, उसी तरह प्रेम की अनुभूति की रचना भी उसी ने की होगी। ईश्वर शैतान से उतना नहीं डरता होगा, जितना मनुष्य से डरता है। उसी तरह वह मनुष्य से इतना नहीं डरता होगा, जितना वह प्रेम से डरता है। वह प्रेम को बढ़ावा देता है, और प्रेम जैसे-जैसे ऊंचाई पर जाता है, आसमान छू लेने के क़रीब पहुंच जाता है, ईश्वर उस प्रेम से घबरा जाता है। उसके बाद वह दोनों प्रेमियों की भाषा बदल देता है। जब तक दोनों प्रेमियों की भाषा एक है, तब तक वे प्रेम की इस मीनार का निर्माण करते चलते हैं। जिस दिन उनकी भाषा अलग-अलग हो जाती है, उसी दिन वे एक-दूसरे को समझना बंद कर देते हैं और उस मीनार की अर्ध-निर्मित ऊंचाई से एक-दूसरे को धक्का मारकर गिरा देते हैं।

नीचे गिरने के बाद हम पाते हैं कि हमारे सिवाय और कोई चीज़ नीचे नहीं गिरी।

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यह हिस्‍सा है मेरे आने वाले उपन्‍यास 'रानीखेत एक्‍सप्रेस' का.
इसका एक अंश 'सबद' पर प्रकाशित हुआ है.
पूरा अध्‍याय पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें.

सबद पर 'रानीखेत एक्‍सप्रेस'