Monday, December 29, 2008

अंधेरे में कोहरा

हर पलंग के पास एक बुरा सपना होता है. कमर टिकाते ही जकड़ ले. हर घर में कुछ बूढ़ी रूहें रहती हैं. रात की नीरवता में किचन में कॉफ़ी की गिरी बोतल उठाने में पीठ पर आ लदें. हर नींद में एक ग़फ़लत होती है और हर ग़फ़लत एक भय को साथ ले आती है. सच होने का बीज हर सपने में छिपा होता है, चाहे अच्‍छा, चाहे बुरा. जैसे सच होने का यह बीज ही नींद के भीतर बेनियाज़ी से पैर हिलवा देता हो और लगता हो, बस, अभी एक खाई में गिर जाना है.

एक कामयाब नींद क्‍या होती है? उसमें प्रवेश कर लेना या सुबह ख़ुद को, अपनी जाग में सही-सलामत पा लेना? मेरी जाग क्‍या है? एक अनियंत्रित नींद ही तो है. अपनी जाग में ही ख़ुद को सही-सलामत पा लेने की क्‍या गारंटी? एक नाकाम नींद, एक नाकाम जाग... बीते कई दिनों का अफ़साना है.

एक बूढ़ा आया था. बता गया, रोज़ रात वह एक ऐसी गोली खाता है, जिससे उसके सपनों का बनैलापन ख़त्‍म हो जाता है. कहता है, स्‍मृतियों से परेशान है. उसकी गोली वाली विलक्षणता, स्‍मृतियों के जि़क्र मात्र से उड़ गई. मैंने कहा, शिव को स्‍मृतियों का संहारक कहा जाता है. हर जन्‍म में ब्रह्मा को शिव की स्‍तुति करनी होती है, ताकि वह खो चुकी स्‍मृति पा सकें. उसने अपनी किसी कहानी का जि़क्र करते हुए कहा, दुनिया का सारा साहित्‍य स्‍मृति और उसके परिष्‍कार से बनता है. स्‍मृतियों को बचाने के लिए लिखा जाता है. तो क्‍या लिखना शिव को चुनौती देने जैसा है?

उसे विदा करने के लिए सिगरेट की दुकान तक जाता हूं. बेतहाशा कोहरा है. अंधेरे में कोहरा. भवों पर बूंदों का आभास होता है. ठंडी पड़ गई नाक को उलटी हथेली से छूता हूं. बहुत भीतर से एक सांस छोड़ता हूं... जैसे सदियों वह फेफड़े में फंसी रही. गुलाबी कार्डिगन पहने एक स्‍त्री जा रही है. एक कार वाला बार-बार उसके पास अपनी कार खड़ी कर देता है. वह पलटकर देखती है, फिर आगे बढ़ जाती है. मैं दुकान वाले से माचिस मांगता हूं और बिना सिगरेट जलाए मुंह से निकलता कोहरा देखता हूं. कार थोड़ा आगे रुक गई है. स्‍त्री वहीं खड़े-खड़े शायद सुबक रही है. कार वाला उसे शॉल ओढ़ा रहा है और वह उसे झटक कर दूर कर रही है. वह शायद शॉल नहीं, किसी ताज़ा स्‍मृति को झटक रही है.

पूरी धरती ही एक पलंग है.

मैं प्रसन्‍न रहना चाहता हूं, पर पाता हूं, ज़्यादातर समय सिर्फ़ सन्‍न हूं.

Tuesday, December 9, 2008

माउथ ऑर्गन

भूले को फिर याद करने के सिलसिले में
याद करता ढंग से माउथ ऑर्गन बजाना
देर तक की पीं-पीं
सुनता भाषा सीखने के क्रम में
ता-ता करते बच्चे की कोशिश जैसे
कैलेंडर पर गोले लगे दिनों को
छोटे-छोटे छेदों से पार कर दूं
ऐसे कि लय की गांठ में बांधूं इलेक्ट्रॉनों-सी भटक-भवानी याददाश्त

बूढ़े के कमज़ोर फेफड़े बताते माउथ ऑर्गन के बारे में
टेप में लपेट लीं मैंने वे धुनें
सीधा-साफ़ जिन्हें छोड़ आया था वह तैरता हवा में
सुन जिन्हें याद आ जाती कोई बिसरेली हिचकी
पलट-पलट देखता पलटते रास्तों को
जिनकी दुर्गमता की सिंफनी बातों में कंपोज़ करता
हवा में कुछ लिखती अरैंजर उंगलियों से

कहता टेढ़े-मेढ़े रास्तों पर चलते लगा हमेशा
सीधे बिल्कुल सीधे
चला जा रहा सीधमसीधे

बार-बार चूमता अपने पैर वह आज
कहता हर नोटेशन पैर की तरह दिखता है
जिस पर सभ्‍यता के धड़ ने की है यह यात्रा
सिंथ के सारे बटनों पर अचानक फिराता उंगली
महज़ एक तार या बटन होता है गड़बड़
सदियां सरक जाती हैं उस तक पहुंचने में
बाक़ी सारे बटन तो महज़ बाक़ी बटन होते हैं

पीड़ा-भय को नहीं, छालों को दो मान्यता
महलों को नहीं मिस्त्री हाथों को
राम को मत दो शिवधनुष तोड़ने का श्रेय
विदेह शारंग को देख सको ऐसी दृष्टि पाओ
सुरों से नहीं असुरों से समझना
मिथिहास के सारे विदेह कोप नहीं क्यों
दैवीय षड्यंत्रों के भाजन हैं

जिसे वह बूझ नहीं सकता
धुएं से आचमन करता है उसके आगे

एक काला बिलौटा अचानक सड़क बीच
भौंचक तकता है दौड़ती गाडि़यों को
उसके दिमाग़ का नहीं पता मुझे
शरीर का संतुलन वह खो रहा है
इस गाड़ी के नीचे आ जाएगा अभी
अभी एक टायर धमका गया है

भौंचक है बिलौटा भौंचक है
रफ़्तार के आगे बेबस है

भीतर और बाहर की देहरी पर बैठा मैं
रोक देता हूं माउथ ऑर्गन बजाना
टेढ़े रास्ते हर किसी को नहीं लगते सीधे
शंख में फूंकी हर वायु ध्वनि नहीं बनती
फिर लगातार बजाता हूं माउथ ऑर्गन तब तक
उस पार सलामत पहुंच जाए बिलौटा

अबूझ के समक्ष प्रार्थना का एक और पद है यह

जिससे लड़ना मुश्किल है
कैसे निभ सकती है मित्रता उससे
माउथ भी क्या है सिवाय एक ऑर्गन के
शत्रु हैं जो मेरे कभी नहीं दिखते
हर छेद से निकली फूंक उसे खोजा करती बस

लौट आने के इंतज़ार में हम भूल जाते जिसकी दग़ाबाज़ी
त्वचा के मोम को बाल देखता छालों-विदेहों को
उसके प्रकाश में
अंतिम निर्वासन का पाथेय जमा करता है
पोटली में गठियाता है उन शब्दों को
जिन्हें चबाएं तो देह में
उगल दें तो सड़क पर ख़ून बहा करता है
कितना समस्यामूलक है सरलीकरण यह
एक ही वक़्त में एक ही शख़्स नायक होता है खलनायक भी

देहरी पर बैठा मैं बजा रहा माउथ ऑर्गन
वह जो दिखता नहीं, बिलाया जाने किस तल में
कैसे पहुंचूं उस तक पहले बूझ तो लूं
ज़रूरी है लाऊं? वे प्रैक्टिकल किताबें बेस्टसैलर
इक्कीसवीं सदी के मैनेजमेंट गुरुओं की
जिनमें हो टेढ़े को सीधा जानने का हुनर साफ़मसाफ़

***

Friday, October 31, 2008

अतल में

हर उदासी की शुरुआत तालियों से होती है. सबसे होहराती धुनों में भी उदासी खोज लेता हूं. कितौ धुनें ही खोज लाती हैं और सामने पटक देती हैं. गिरकर छितराई हुई उदासी, जो गिरने के बाद भी चढ़ी रहती है. यानी इसी तरह उदास करता है. उसके यहां जो पियानो बजता है, या ड्रम खड़कता है, तो लोग उत्‍साह खोजते हैं, मुझे बिना खोजे उदासी मिलती है.

'एक पीली शाम,
पतझर का ज़रा अटका हुआ पत्‍ता,
शांत,
मेरी भावनाओं में
तुम्‍हारा मुखकमल...'

ऐसी उदासी पर मैं सबसे उदास कविता नहीं लिख सकता, पढ़ सकता हूं, निरुपमा दत्‍त का नाम ले यह नहीं कह सकता कि मैं बहुत उदास हूं.

'अब गिरा
अब गिरा वह
अधर में अटका हुआ आंसू
सांध्‍य तारक-सा
अतल में.'

आंखें बंद कर यानी सुनता हूं. सोचता हूं कि ताली बजाना एक बहुत अपमानजनक/कारक क्रिया है. वाह-वाह करने वाले आखि़र अब तक अपने घर क्‍यों नहीं चले गए?



Friday, October 24, 2008

साथ-साथ क्‍यों नहीं?

मेरी बातों में छल्‍ले बनते थे और तुम्‍हारे बालों में. जब मैं सिगरेट का धुआं उड़ाता था, तो उससे भी छल्‍ले बनते थे. लोग कहते कि इसकी बातों के छल्‍ले में मत पड़ना, हसंते-हंसते फंसा लेता है. मैं कहता था, दरअसल, बात के छल्‍लों से ज़्यादा घातक तुम्हारे बालों के छल्‍ले हैं. उन्‍हें देखकर ही मेरी बातों में छल्‍ले पड़ा करते हैं.

हम एक पत्‍थर पर बैठे थे. और ओस से गीली घास पर नंगे पैर चलते हुए हमने एक, दूसरे पत्‍थर तक जाने का तय किया.

तुमने कहा- मेरे भीतर भाव हैं, मैं भावों की उंगली पकड़ वहां तुमसे पहले पहुंच जाऊंगी.

मैं हंसा- मुझे भावों पर भरोसा नहीं. विचार हैं मेरे पास. दुनिया की सबसे मोटी किताबें मैंने ही लिखी हैं. मेरे लिए वहां पहले पहुंचना ज़्यादा आसान है.

तुम भाव पर चलीं, मैं विचार पर.

ओस सूख चुकी है, घास भी. न पीछे का वह पत्‍थर नज़र आता है, न आगे वाला पत्‍थर. तुम भी आसपास नहीं दिखतीं. कहां चली गईं तुम? क्‍या तुम उस पत्‍थर तक पहुंच गईं? क्‍या हम दोनों ही उस पत्‍थर तक नहीं पहुंच पाए?

हम एक-दूसरे से पहले क्‍यों पहुंचना चाहते थे, साथ-साथ क्‍यों नहीं? बताओ.

Wednesday, October 15, 2008

??? ??? ??? !!!

??? ... !!! **)(
:(
0-365
आइला झप्‍पा आइला झप्‍पा
बड़े सिपाही जी का ढेटा
हुड़ हुड़ हुप्‍पा फूल के कुप्‍पा
बड़ा सिकंदर वाह वाह.
गड़बड़झाला गले में माला
बड़ा सिकंदर हाय हाय.
:(   :(    :(    :(   :(
%^%777&&&889534
..............................................................................................................................................

don't you cry tonight, i still love you babe'.
for amitav ghosh.



Wednesday, October 8, 2008

जैसे सांस

धूप के कटोरे में पड़ी पानी की बूंदें
भाप बन जाती हैं जैसे
हवा बन जाते हैं मेरे शहर के लोग

शहर एक बुरी हवा था
मुहल्ले-पाड़े जैसे आंच के थपेड़े
बुख़ार के फेफड़ों से निकली
उसांसें थीं गलियां

इन गलियों में
जीवाणुओं की तरह रहते थे लोग
जिनकी आबादी का पता
दंगों, भूकंपों और बम-विस्फोटों में मारे गयों
की तादाद से चलता था

बरामदों में टंगे कपड़े
कपड़े नहीं मनुष्य थे दरअसल
सूखते हुए
इसी तरह जोड़े से छूट गई अकेली चप्पलों, टूटी साइकिलों, बुझ चुकी राहबत्तियों
सेंगदाने की पुल्लियों, गिरकर आकार खो चुके टिफिन बक्सों, उड़ते हुए पुर्जों
चलन खो चुके शब्दों-सिक्कों
और अपने गिरने को बार-बार स्थगित करते
अनाम तारों को भी
मनुष्य मानना चाहिए

सुने जाने के इंतज़ार में हवा में भटकती सिसकियों को भी

इस तरह करें मर्दुमशुमारी
तो उन लोगों की तादाद कहीं ज़्यादा है
जिन्हें हमें मनुष्य मानना है

जितने लोग मरते थे
उतने ही पैदा हो जाते
आम बोलचाल में इसे उम्मीद का
समार्थी कहा जाता

पर जैसा कि मैंने बताया
शहर एक बुरी हवा है
(पानी का जि़क्र तो मैंने किया ही नहीं
पाड़े के नलके पर सिर फूटा करते हैं पानी पर
वो अलग
भले उसे सूखकर हवा बन जाना हो एक दिन
अच्छी, बुरी जैसी भी)

जाने कौन सदी से बह रही है ये हवा
जिसमें ऐसे उखड़ते हैं लोग
जैसे सांस उखड़ती है.

Friday, October 3, 2008

ब्‍लॉग जगत में कुमार अंबुज का स्‍वागत है...

हिंदी कवि कुमार अंबुज भी अब ब्‍लॉग जगत में आ गए हैं. नवें दशक में कविता की जो पीढ़ी आई, उसमें कुमार अंबुज मुझे सबसे गहरे कवि के रूप में दिखते हैं, प्रभावित करते हैं और प्रेरित करते हैं.
'कुमार अंबुज' नाम से ही अपना ब्‍लॉग, उन्‍होंने कुछ दिनों पहले बनाया था, लेकिन उस पर विधिवत पोस्‍ट आज डाली है. उसे यहां पढि़ए और उनका स्‍वागत कीजिए.
अब पढि़ए उनकी एक कविता-


कोई है मांजता हुआ मुझे

कोई है जो मांजता है दिन-रात मुझे
चमकाता हुआ रोम-रोम
रगड़ता
ईंट के टुकड़े जैसे विचार कई
इतिहास की राख से
मांजता है कोई

मैं जैसे एक पुराना तांबे का पात्र
मांजता है जिसे कोई अम्‍लीय कठोर
और सुंदर भी बहुत
एक स्‍वप्‍न कभी कोई स्‍मृति
एक तेज़ सीधी निगाह
एक वक्रता
एक हंसी मांजती है मुझे

कर्कश आवाज़ें
ज़मीन पर उलट-पलटकर रखे-पटके जाने की
और मांजते चले जाने की
अणु-अणु तक पहुंचती मांजने की यह धमक
दौड़ती है नसों में बिजलियां बन
चमकती है

धोता है कोई फिर
अपने समय के जल की धार से
एक शब्‍द मांजता है मुझे
एक पंक्ति मांजती रहती है
अपने खुरदरे तार से.

(कुमार अंबुज के चौथे संग्रह 'अतिक्रमण' से).

Tuesday, September 30, 2008

अंधेरे की परिक्रमा


थकान इतनी छायादार हो सकती है, उससे पहले कभी महसूस नहीं हुआ था। मैं थकान के नीचे लेट गया। आंखें बंद किए। निर्मल जी की एक पंक्ति दिमाग़ में लगातार गूंजती रही- `जीवन में असफल होने का फ़ायदा यह है कि मेरे पास अपने होने के अलावा और कुछ नहीं है, और मेरे पास जब सिर्फ़ `मैं´ है, तो उसका मैं लिखने में ही इस्तेमाल कर पाऊंगा।´

वह कौन-सा पेड़ था, जिसमें से थकान चूती थी? जिसके नीचे लोहे की एक बेंच पर मैं लेटा था। वे छोटे-छोटे फूल थे या छोटे-छोटे पत्ते, जो पेड़ से झरे थे और आकर उसके बालों में उलझ गए थे। पीले टुकड़े। जिनका झरना सृष्टि की सबसे निश्शब्द क्रिया थी, जाकर उसके बालों में अटक जाना सबसे शालीन घुसपैठ। ख़ुद को धरती में जाकर रोपने की बजाय उसके बालों में रोप देना प्रेम का सबसे छोटा बीज ही कर सकता है। उस वक़्त तुम्‍हारे बाल तुम्‍हारे चेहरे पर आ गए थे, और तुम्‍हारी वह तस्‍वीर याद आ गई थी, जो स्विट्ज़रलैंड में खींची थी, जब तुम पानी के जहाज़ के डेक पर खड़ी होकर सिगरेट का पैकेट देख रही थीं.

रात इतनी अंधेरी नहीं थी कि मैं अंधेरे से घबराऊं। चांद इतना बड़ा भी नहीं था कि दो उंगलियों के बीच लेने से कतराऊं। पर ठीक उसी क्षण मुझमें थकान आ गई थी। भीतर ही भीतर कोई उस पराजय पर हंस रहा था। हंसते हुए कह रहा था- ले, फिर तुझको मात मिली।

लाइब्रेरी के सामने सड़क की रेलिंग पर बैठकर एक दिन हमने सूरज को डूबते हुए देखा था। वह जगह सूरज को भी बहुत पसंद थी। हर रोज़ वहीं आकर डूबता था। हम उसे धीरे-धीरे पहाड़, उसके आसपास की हरियाली, कहीं-कहीं डिब्बों की तरह बने मकानों और उड़ते-उड़ते औचक ही मुड़ जाने वाले परिंदों के लैंडस्केप में खोते हुए देख रहे थे।

उसने पूछा- यह डूबते हुए बाय भी नहीं कहता?

मैंने कहा- जो कहता है, हम उसे सुन नहीं पाते।

उसने कहा- सुनते हैं, तभी तो शाम को अंत माना जाता है। सुना नहीं है, न जाने किस गली में जि़ंदगी की शाम हो जाए...

मैंने कहा- ऐसा नहीं है। डूबना, दरसअल एक निहायत सच्ची कि़स्म की उम्मीद है।

उसने कहा- लेकिन तुम्हारी उम्मीद तो मैं हूं?

मैंने कहा- हां, तुम मेरी सूरज हो और मैं पृथ्वी की तरह तुम्हारी परिक्रमा करता हूं। तुम्हीं में डूबता हूं और तुम्हीं से उग आता हूं। जैसे, ऐसे ही किसी लैंडस्केप से उगती है सुबह।

उसने कहा- तुम चलते पुर्जे हो। अच्छे-से जानते हो कि तुम्हारे भीतर अंधेरा भरा है, और तुम्हें रोशनी की परिक्रमा करनी है।

एक पल में तुमने साबित कर दिया था कि मैं अंधेरे से भरा हूं। यह भी मानोगी कि अंधेरा कितना भी गाढ़ा हो जाए, रहता वह अकेला ही है? रोशनी कभी उसकी मित्र नहीं बन पाती, बस उसे चीरते हुए गुज़र जाती है। मानोगी कि इस दुनिया में पहले अंधेरा आया था और उसके अकेलेपन पर रहम करने के लिए पीछे-पीछे रोशनी आई थी?

प्रेम के इस सौरमंडल में मैं पृथ्वी की तरह तुम्हारे चारों ओर घूमता हूं। हमसे बाहर एक मिल्की वे है, उससे बाहर एक बहुत बड़ी आकाशगंगा, उसके बाहर जाने कितनी आकाशगंगाएं... ये सब भी घूम रही हैं। लेकिन इनके पास कोई सूरज नहीं। ये अभी भी अंधेरे के ही चारों ओर घूम रही हैं।

मैं, जो तुम्हें प्रकाश मान तुम्हारे चारों ओर घूम रहा हूं, क्या वृहत्तर रूप से अंधकार की ही परिक्रमा कर रहा हूं?

पर वह तो मैं ख़ुद ही हूं।

आज जब मैं यहां अकेला लेटा हूं, थकान के इस पेड़ के नीचे, किताबों का बस्ता ज़मीन पर फेंक, तो कोई पत्ता क्यों नहीं गिरता? इच्छा, पीड़ा, प्रेम, उम्मीद का वह पत्ता? जिसका आवाह्न तुम्हारे खुले हुए केश करते थे। कहां गया वह पत्ता, क्या मेरे अकेलेपन, अंधेरे और शून्यता से टकराकर लौट गया, पेड़ और मेरे बीच किसी अतल में लटका हुआ-सा? तुम क्यों नहीं हो यहां? क्या पत्तों की डंठल में गोंद बनकर खो गई हो? पलकों से छूकर पत्तों को हरा करती हो? जब आसमान पर चिपके सारे तारों की गोंद सूख जाएगी, तो क्या करोगी?

तुम रोशनी क्यों थीं, जो एक पल में खो जाती है? जो चमक से हुलसाती है, फिर चपलता से हट जाती है? जो जितनी तेज़ी से आती है, उतनी ही तेज़ी से लौट भी जाती है?

आज मैं यहां अकेला हूं और थकान के इस पेड़ को घूर-घूरकर देख रहा हूं। इस पर अब भी कोई नाम नहीं खुदा। उस दिन तुम्हारा बहुत मन था कि इसके मोटे तने पर हम दोनों का नाम खुदा हो।

तुमने कहा- तुम चाक़ू क्यों नहीं हो? मैं तुम्हें उठाती और इस पेड़ पर हम दोनों का नाम गोद देती। हमारा प्रेम चाक़ू की नोंक पर उगा हुआ दरख़्त होगा.

मैंने पूछा- चाक़ू ही क्यों?

तुमने कहा- कुछ भी। मतलब इस वक़्त तुम्हें लोहा होना चाहिए था। तलवार होते, तो भी चल जाता।

मैंने कहा- नहीं, मैं लोहा नहीं हूं। कभी लोहा बना भी, तो तलवार का लोहा नहीं बनूंगा। वह प्रेम के खि़लाफ़ बोलती है।

तुमने पूछा- फिर क्या बनोगे मेरे प्लास्टिक के भालू?

मैंने कहा- मिट्टी हूं मैं। लोहा बनने की उम्मीद से बहुत दूर। फिर भी कभी लोहा बना, तो बहुत छोटी कील का लोहा बनूंगा। चाक़ू और तलवार हमेशा बांटने का काम करते हैं। छोटी-सी कील ही होती है, जो जोड़ती है, अपनी नगण्यता और लघुता में भी।

मैं आज तक नहीं समझ पाया, उसके बाद तुम रोने क्यों लगी थी?

क्या तुम्हारी आकांक्षाओं में कीलों की कोई जगह नहीं थी? या किन्हीं पुरानी कीलों का दर्द उग आया था, जिनसे देह और दुपट्टा दोनों छिदे हुए थे? क्यों रोई तुम इतना कि तब से जो मेरी हिचकी बंधी है, पृथ्वी का आधा पानी पी लेने के बाद भी जाती नहीं? क्या लघु और नगण्य होने की मेरी आकांक्षा से इतना घात हुआ? पर यह तो हर सूरज जानता है कि उसके चारों ओर घूमता ग्रह उससे छोटा ही होता है। पेड़ को देखते हुए क्यों रोईं तुम? क्या नहीं जानती थीं कि पेड़ को देखते हुए रोना, पेड़ बनकर रोने जैसा ही है? कि रोते हुए अंधेरे को देखना, रोशनी से घात करना है? क्या वह रोना अंधेरे की उदारता और रोशनी की चपलता के बीच एक को चुनने का क्षण था और क्षण-भर का रोना, दरअसल, कभी क्षण-भर का रोना होता ही नहीं।

कितनी देर तक रोती रहीं तुम? सुबकते हुए। बिलखते, फिर बिखरते। मैं कैसे कहूं कि मेरी हथेलियां कभी इतनी बड़ी नहीं हो पाईं कि एक बार, पूरा का पूरा, तुम्हें सहेज सकता उसमें?

क्‍यों कहा था तुमने, एक दिन लौटकर आऊंगी मैं, जैसे सदियों बाद भी अचानक, लौटकर आती हैं स्मृतियां। तुम मुझे भूल जाने के लिए मत याद रखना। अपनी कही हर बात को झूठ होते देखना रोशनियों का प्‍यारा शग़ल होता है.

आज मैं यहां अकेला लेटा हूं और बाक़सम, बेंच मुझे बहुत गीली लग रही है। रोने की वह आवाज़ इसकी सलाखों में एक शाश्वत ठंडक बनकर रहने लगी है। उस दिन जब तुम रोई थीं, मैं भीतर से हार गया था। देखो, न मैं चाक़ू बन पाया, न तलवार। न ही छोटी वाली कील। सच, तुम सच रोई थीं। मिट्टी में लोहा हो सकता है, लेकिन लोहे के गुण नहीं।

आज मैं यहां अकेला बैठा हूं। मैं इतनी देर तक अंधेरे को घूरता रहा हूं कि मेरी भूरी पुतली का रंग काला हो गया है। अंधेरे के कनस्तर में बार-बार झांकता हूं। कहीं जुगनू भी चमक जाए, इस उम्मीद से। ताकि रोशनी में तुम दिख जाओ।

तुम इतनी देर तक आसमान को घूरती रही कि एक दिन तुम्‍हारी आंखों का रंग नीला हो गया. तुमने कहा, तुम्‍हारी आंखें अंतरिक्ष हैं और बाहर से देखने पर उसमें आसमान चिपका हुआ लगता है. तुम बार-बार सिर झुकाती हो और अंतरिक्ष में झांकने लगती हो. जैसे कोई एक कील, सितारों के झुरमुट में कहीं खो गई हो...

आज मैं यहां अकेला लेटा हूं और रोशनी की लकीर, सूरज की डूब, थिर होकर पत्तों का गिरना ढूंढ़ रहा हूं। ढूंढ़ रहा हूं एक बहुत छोटी कील, जिससे इस पेड़ के तने पर कोई नाम गोद सकूं...

(शुरू हुई एक कहानी का कोई तो भी हिस्‍सा, पेंटिंग- हेनरी मातीस)

उबासी के बीच कोई उदासी


बहुत दिनों बाद दफ़्तर पहुंचे, तो किताबों के दो पैकेट आए पड़े थे. कुछ किताबों की काफ़ी दिन से प्रतीक्षा थी. एमस ओज़ (पुराने हिब्रू उच्‍चारण के अनुसार आहमोस आउस) की 'हाऊ टु क्‍योर अ फैनेटिक' और डेविड ग्रॉसमैन की 'द येलो विंड'. ये दोनों इज़राइली लेखक बहुत पसंद हैं. और कुछ कवि भी. अमीख़ाई के बाद मिशोल, शेरन हास, लीसा कात्‍स, रोनी सॉमेक, रामी सारी. ये लिस्‍ट भी ख़ुद को याद दिलाने के लिए, क्‍योंकि अभी घर के कबाड़ से अहमद नदीम क़ासमी की एक पुरानी कहानी खोजने के चक्‍कर में हास और सॉमेक की कुछ बेहद प्रिय कविताओं का झेरॉक्‍स मिल गया. सौ-सवा सौ पन्‍नों का धूल-भरा पुलिंदा. नाक सुड़कसूं हो गई है. धूल सहन नहीं इसे. जबकि किताबों की कि़स्‍मत में यह धूल हथेली की जीवन रेखा की तरह गाढ़ी है. देखिए, 'द प्रेस एंड अमेरिका' भी मिल गई, और दूबोई की हिंदू मैनर्स वाली किताब भी. पिछले साल जब खोजा, तब नहीं मिली थी. अभी भी इसकी धूल नाक के रोओं पर झूल रही है. आक्‍छी. पर क़ासमी नहीं मिले. वह अगले अगले साल मिलेंगे, यूं ही, हाथ से लिखे पीले पन्‍नों से झांकते, जब उनको नहीं खोजा जा रहा होगा. काफ़्काई उकताहट और बेहनाम दायानी टाइप की बुझेली खीझ लिए बैठे पढ़ने. पर लिखने लग गए. फि़ज़ूल. अब अंबर्तो ईको टाइप का 'मैं कैसे लिखता हूं' थोड़े पढ़ा जाएगा. पढ़ा तो जाएगा.

पढ़ा / तो / जाएगा/ (काम से).


घोंघा बसंत.
थोथा बसंत.
पतरे पर खड़ा होकर नाचता बसंत.
अनंत महंत.
संत बसंत.
इतिहास का अंत.
सबर का भी.

(कोई असंसदीय शब्‍द लिखने का मन हो गया. किसको संबोधित करूं? हिस्‍स. भाव का फन-फ़नी विलक्षण अभाव. गाली खाने को कोई समर्थ गुसाईं भी नहीं परकटता. रात के तीसरे पहर एक 'निहायत शरीफ़' आदमी का मन गाली देने को क्‍यों करता है? नोप्‍स. डॅन कॉल इट नाइट, बडी.)

चलो, अक्‍टूबर से पहले नोवेंबर रेन. जीएनआर को सुनिए. सुनिए, जब रोज़ का गला और स्‍लैश का गिटार टनकता है, तो इलेक्‍ट्रॉन, प्रोटॉन क्‍या, उलझे-न पकड़ आए बोसॉन भी झनक-झनक जाते हैं. पूछूं- झनके क्‍या, और इयाऊं-झियाऊं करते गाल को भीतर से चुभलाते चच्‍चा-चाची सब निकल लिए, तो पचका हो जाएगा. सच बात है न, सर विदिया कक्‍का?

Thursday, September 18, 2008

इमरे कर्तेश की दुनिया से बाहर














कहते हैं कि इमरे कर्तेश को पढ़ने के तुरंत बाद वैसे भी कुछ करने का मन नहीं करता. एक अजीब कि़स्म का अवसाद, घुटने मोड़कर बैठी हुई चुप्पी, हथौड़े की तरह पूरे वजूद पर आ गिरा अकेलापन, अपने होने पर सकुचाता कोई लजीला संवाद, अचानक चीख़ में बदल गई कोई कराह और कुछ बेहद अमूर्त कि़स्म के सवाल आपको बड़े फूहड़ तरीक़े से खींच ले जाते हैं, बाल्कनी में खड़े होकर आप अपने आप में और बेकार होते रहते हैं. पिकासो के पास ब्लू पीरियड था. कर्तेश आपको ग्रे पीरियड में ले जाते हैं. धूल से भरा हुआ, मटमैले रंग का, जहां त्वचा पर बरसों पहले चिपकी गीली मिट्टी त्वचा जैसी ही झुर्रीदार दिखने लगती है.

पार्क में पत्थर की बेंच पर बैठी हर चीज़ पत्थर नहीं होती. पर दिखने वाली और न दिखने वाली हर चीज़ को धीरे-धीरे पत्थर में बदलते जाना है. दिखने वाले और न दिखने वाले पत्‍थर में. बेंच पर बैठकर देह से अलग होती एक औरत थोड़ी देर बाद पत्थर बन जाती है, फिर उस पर किसी हवा, किसी पानी का असर नहीं होता. जब वह उड़ती है, तो पत्थर की तरह उड़कर कहीं लगती है और जब टूटती है, तो पत्थर की तरह. पत्थर की तरह टूटना सबसे बुरा होता है. जुड़ने की कोई उम्मीद बाक़ी नहीं रहती. पर टूटे हुए टुकड़ों के पास भी आकार होता है, टूटा हुआ आकार. बच्चे उनसे सात चिप्पी खेलते हैं. एक अद्भुत आकार वाला पत्थर देव बन जाता है. एक पत्थर धमकाने के काम आता है और एक डरा हुआ, हमेशा के लिए बेंच के पास ही दुबक कर सदियों लंबी एक नींद में चला जाता है. सदियों बाद उठकर वह इन वक़्तों की गवाही देगा, यह बताएगा कि कैसे एक पत्थर की बेंच पर बैठकर रोती हुई एक औरत पत्थर की बन गई थी और उसके बाद पत्थर की तरह टूट गई थी.

और उसके पास बैठा पुरुष हवा की तरह हल्का होता है. उसके टूटने की कोई आवाज़ नहीं होती. वह अपने जुड़ने की तलाश नहीं करता कभी. उसका टूटा हुआ चेहरा भी जुड़े हुए चहरे जैसा ही भरम देता है. वह कहना चाहता है, लेकिन सांय-सांय से ज़्यादा कोई आवाज़ नहीं निकल पाती. कहने की तमाम कोशिशों के बाद जो कहा जा सके, वह नहीं होता, जिसे कहने के बारे में सोचा था.

कहानी दोनों के पास होती है. दोनों अपनी कहानी के साथ चलना चाहते हैं, लेकिन वह असंभव लगता है. दोनों अपनी कहानी को नए सिरे से लिखना चाहते हैं, लेकिन वह भी असंभव लगता है. हर निजी कहानी दरअसल कभी न सुनाई जा सकने वाली कहानी होती है. जैसे ही कुछ बोलने के लिए हम मुंह खोलते हैं, आंखें उसी वक़्त खुल जाती हैं. कहानी ख़त्म हो चुकी होती है. हम हमेशा दूसरों की कहानियों में रहते हैं. उनकी कहानी सुनते हैं, उसे ही लिखते हैं. उसी के बीच अपने कुछ प्रसंग जोड़कर बुनकरों का इल्म पाने की कोशिश करते हैं. जो हाथ लगता है, वह भटकते हुए शब्दों का गुच्छा-भर होता है.

कभी उस प्रोटॉन की मजबूरी के बारे में सोचा है, जो चाहे कितनी बग़ावत कर ले, रहना उसे इलेक्ट्रॉन के दायरे में ही है. उसी के केंद्र में भटकना है, अभिशप्त गति से. उस समुद्र को क्यों कोसना, जो अपने ही पानी में डूब मरा हो. बदबख़्गी का ऐसा आलम तो उस आदम के पास भी नहीं, जिसके पास सिर्फ़ एक ही जन्नत थी, जिसने सिर्फ़ एक ही जन्नत खोई थी. बदबख़्त होना क्या होता है, उस आदम से पूछो, जिसके पास कई जन्नतें थीं और हर जन्नत को वह ऐसे खोता रहा, जैसे देह सांस खोती है. पीछे मुड़कर देखना रूमानी प्रतीक हो सकता है, पर यह कितना घातक होता है, उस ऑर्फियस से पूछो, जो स्वर्ग से अपनी बीवी को लौटा कर ला रहा था और पृथ्वी पर पांव रखते ही उसने पीछे मुड़कर देखा कि वह आ रही है या नहीं और उसका सिर कटकर गिर गया. देवदूतों ने उससे वादा मांगा था कि वह पीछे मुड़कर नहीं देखेगा.

पीछे मुड़कर देखना अकेलेपन को चुनौती देना होता है. दूसरों की कहानी को झांककर देखना अपनी कहानी न कह पाने का शोक होता है.

और अकेलापन क्या होता है. एक हथौड़ा ही न, जो पत्थर पर गिरता है, तो पत्थर टूटकर बिखर जाता है. लोहे पर गिरता है, तो लोहा और मज़बूत हो जाता है. सब कुछ तो मेरे चारों ओर ही है. अकेलापन किस बात का? किस घड़ी अकेले होते हैं हम? स्मृतियां अकेला होने देती हैं क्या? डर, आशंका, अनजाने आई कोई मुस्कान या माइग्रेन की तड़तड़ अकेले होने देते हैं? जो मर चुके हैं, वे तो मेरे अकेलेपन में कभी साथ नहीं छोड़ते. जो अब भी कहीं जी रहे हैं, वे मेरे अकेलेपन का साथ देने नहीं आते.

`स्क्रीम ऑफ द आंट्स´ के अंत में एक पात्र बताता है: `मैं अकेले-अकेले पूरी दुनिया घूम आया, मैंने सबसे ऊंचे पहाड़ पार किए, सातों समंदरों को लांघा, रेगिस्तानों और दलदलों से गुज़रा और एक दिन मैं लौट आया. मैंने देखा, जो मैं खोज रहा था, वह पत्तियों से लटकती पानी की बूंद में छिपी थी, पंखुडि़यों पर उसका पता लिखा था.´

(इमरे कर्तेश की `फेटलेस´ और `लिक्विडेशन´ पढ़ने के बाद उससे जुदा कुछ बिंब. हमेशा की तरह धूल-धुंधले. पेंटिंग मार्क शाशा की है. उनकी वेबसाइट से साभार.)

Friday, September 12, 2008

नकार का कोबेन, निराशा का रीज़्झी


कर्ट कोबेन और बोरिस रीज़्झी में क्या समानता है?

रीज़्झी नए रूस का कवि था. वह रूस, जो अपने बिखरे हुए सपनों, कटे हुए डैनों के साथ लाल चौक के बाहर एक पेड़ की फुनगी पर लटका हुआ था, गिरने-गिरने को. और गिरने से बड़ी विडंबना कि इस गिरने से वह हुलस रहा था. अपने सपनों को इतिहास की सबसे फूहड़ गालियां देता हुआ. रीज़्झी उस रूस की नई पीढ़ी का प्रतिनिधि था. आंख झपकते इस पीढ़ी की हुलसित होहराहट अवसाद से भरी बड़बड़ाहट में बदल गई. दूसरे के अंगों पर फेंकी गई गालियां रपटकर अपने ही अंगों पर आन गिरीं. निराशा, नकार (नेगेशन फॉर नेगेशन वाला तो क़तई नहीं) अराजकता और अपराध की अंधेरी काली बस्तियों में यह पीढ़ी शरण लेती है. रीज़्झी उस पीढ़ी की कविता लिखता है. जिस सदी के शुरुआती बरसों में रूस में मायकोवस्की उम्मीद की कविता लिख रहे थे, उसी सदी के आखि़री बरसों में उसी देश का एक नौजवान अंधेरे को सबसे खुरदुरी आवाज़ दे रहा था. वह सारी चीज़ों को नकार रहा था, लेकिन उसे नहीं पता था कि हामी किसकी भरी जाए. 2001 में रीज़्झी ने जब आत्महत्या की, तो उसकी उम्र 26 साल थी. सामाजिक-पारिवारिक असफलताएं और उससे उपजे अवसाद उसे ड्रग्स की तरफ़ ले गए, और ड्रग्स अवसाद के चरम पर.

कर्ट कोबेन नए अमेरिका का गायक था. 1994 में उसने 27 की उम्र में आत्महत्या कर ली थी, जिस समय वह अपनी प्रसिद्धि के चरम पर था. इसकी मौत के प्रत्यक्ष कारण भी ड्रग्स और अवसाद ही थे. वह जॉन बॉन जॉवी, गन्स एन रोजेस, मैटेलिका और एरोस्मिथ का दौर था. कर्ट कोबेन अपने बचपन के दोस्तों के साथ हार्ड रॉक बैंक `निर्वाना´ लेकर आया, जिसने रॉक और मेटल संगीत का पूरा चेहरा ही बदल दिया. कोबेन ने अपने संगीत को `ग्रूंज रॉक´ कहा. उसका संगीत तीखी धुनों, ग़ुस्सैल इलेक्ट्रिक गिटार और असमंजस के शोर से बनता है. उसमें बीच-बीच में आई चुप्पी एक नाकाम तलाश और अनुत्तरित दस्तक के बाद घुटने मोड़कर बैठ जाने की स्थिति है और फिर सनक कर, बौखलाहट में उछाली गई गाली है. ऐसी अंट-शंट अवस्था में ज़रूरी नहीं होता कि कहा गया हर शब्द अपने साथ एक निश्चित कि़स्म का अर्थ ढोता हो. यह अमेरिका की वह पीढ़ी है, जिसकी झेरॉक्स प्रतियां दूसरे देशों में एक्सपोर्ट की जाती हैं. इसका दहकता हुआ लिबीडो, नायकों की तलाश में दर-द भटकते तीसरी दुनिया टाइप के देशों के दुर्बल, हीन नौजवानों को पुचकार-पुचकार पुकारता है. रॉक संगीत अनियंत्रित और निरुद्देश्य विरोध का संगीत है. कोबेन का संगीत भी नकार का संगीत है, लेकिन रीज़्झी की तरह (और हमारे पढ़े-देखे-सुने कई अल्हड़ क्रांतिकारी प्रोटोटाइप-से) ही कोबेन भी कभी नहीं जान पाया कि आखि़र हामी किसके लिए भरी जाए. जब वह चीख़कर कहता है, `अ मुलैट्टो, एन अल्बीनो, अ मस्कीटो, माय लिबीडो´, तो यह कोई प्रतीक नहीं, उसकी पूरी पीढ़ी के निरर्थक भटकाव का शोर होता है.

नौजवान देशों को अपनी नौजवानी और सपनों पर हमेशा फख़्र होता है, लेकिन उन्हें कभी इसकी चिंता नहीं होती कि नौजवानी की इस नवऊर्जा को परनालों में बहने से कैसे रोका जाए. कोबेन और रीज्‍झी दोनों को ही भटका हुआ युवा माना गया था. भटके हुए युवा अपराध करते हैं, लेकिन ये भटके हुए दो युवा संगीत रचते हैं, कविता करते हैं. तो क्‍या संगीत और कविता अपराध हैं ?  अगर नहीं, तो फिर यह किस्‍म का भटकाव है ? क्‍या यह एक भटकी हुई दुनिया के बीच अपनी राह खोजने का रचनात्‍मक भटकाव है, जिसका कला में विस्‍फोट होता है ? और एक दिन यह अहसास होता है कि हमारी इस खोज को यह भटकी हुई दुनिया कोई मान्‍यता ही नहीं दे रही, तब आत्‍मघात होता है? कलाकार का आत्‍मघात समूची दुनिया को दी गई चेतावनी होती है कि देख लो, तुम भटकी हुई हो. तुम मुझे सहेज ही नहीं पाई. जब कोई अपने आप ख़ुद को ख़ारिज करता है, तो वह दरअसल, ख़ुद के अलावा सबको ख़ारिज कर रहा होता है.

बहरहाल, कविता और संगीत की दो बड़ी प्रतिभाओं (जिनका बड़ा हिस्सा अब हमेशा अनएक्सप्लोर्ड ही रहेगा) की झलक देखिए. पहले रीज़्झी की कविता `ट्राम´ और नीचे निर्वाना का गीत `स्मेल्स लाइक टीन स्पिरिट´.


ट्राम : बोरिस रीज़्झी

अतीत में जाना है तो
बेहतर है एक ट्राम पकड़ लो
जो घंटियां बजाती चलती है
जिसकी पटरी पर
कोई बेवड़ा, गंदला स्कूली बच्चा
सनक गई लड़की और
पोपलर की पत्तियां बिछी होती हैं

पांच या छह स्टॉप्स के बाद
हम 1980 में पहुंच जाते हैं
जहां बाईं ओर मार कारख़ाने हैं
दाईं ओर मार कामगार
अरे उतर कर देख भी लो लल्लू
चिंता मत करो
क्या बुदबुदा रहे हो तुम, शकी हो,
ऐसा जो भी कुछ है हमने नबोकोव से पाया है
वह ज़मींदार का बेटा था
हम लोग तो जूठन हैं
ये क्या, तुम्हारे चेहरे पर आंसू
अरे छोड़ो भी, मुस्कराओ यार

हमारा स्टॉप ये है-
जहां देखो वहां पोस्टर, बैनर
नीला आसमान, लाल नेकटाई
किसी की शोकयात्रा है, साजि़ंदे बजा रहे हैं
उनके साथ तुम भी गुनगुनाओ सीटी बजाते हुए
और उस ख़ूबसूरत आवाज़ में खो जाओ
खो जाओ अपने लैदर जैकेट में,
उसकी जेबों में हाथ डाले
उस रास्ते पर जहां अलगाव कभी ख़त्म नहीं होता
उदासी कभी ख़त्म नहीं होती जिस सड़क पर
जो जाती है उस घर तक
जहां तुम पैदा हुए थे
सूर्यास्त, अकेलेपन, नींद और
पत्तियों के झड़ने के बीच पिघलते हुए
लौटना किसी मारे जा चुके सिपाही की तरह.

स्‍मेल्‍स लाइक टीन स्पिरिट : निर्वाना (नेवरमाइंड से)

Tuesday, September 9, 2008

चादर, पैर और दिल्ली की डकार

दिल्ली एक बहुत बड़ी चादर लग रही थी, जिसमें से अनगिन पैर बाहर निकले हुए थे. चादर में न अंट पाने का दोष पैरों को देना ग़लत है. नींद में ग़ाफि़ल उन लोगों को खोजना चाहिए, जिन्होंने चादर का ऊपरी सिरा कहीं दांतों में खोंच रखा है. मैं पैदल चलता था और दिल्ली नाम की चादर से बाहर निकले, बिना नाम वाले पैरों से टकराकर लटपटा जाता.

कुछ ख़ाली घंटे नेमत की तरह आते हैं, और उनमें किसी नामधारी से मिलना नेमत को शर्मिंदा करने जैसा होता है, कुछ ऐसा ही सोचकर मैं सड़क के एक किनारे खड़ा था. पचास किताबों का बोझ मामूली नहीं होता. कंधे पर टांगकर चलना ख़ुद से कोई बदला चुकाने जैसा होता. और ख़ाली घंटे नेमत होते हैं, और ये नेमत आपको ईश्वर भेजता है, और ईश्वर नेमतें भेजने के मामले में बहुत कंजूस होता है, फ़रिश्तेपन की प्रतीक्षासूची में खड़ी आत्माएं ऐसा बताकर गई थीं.

और वह जो ऑटो रिक्शा वाला था, वैसी ही किसी सूची में खड़ा दिखता था. स्वभाव के विपरीत मेरे मुंह से शब्द झरने लगे. वह भी बोल रहा था. मेरी भाषा उसके सामने, भाषा सीखने के क्रम में किसी बच्चे की त-त, प-प से ज़्यादा नहीं लग रही थी. वह मोलभाव कर रहा था और मैं उसे आशंकित कर रहा था कि मैं बिना किराया दिए भाग भी सकता हूं. मयूर विहार, नहीं, पश्चिम विहार, अरे, द्वारका चलो यार, छोड़ो, आईटीओ तक ही. एक काम करो, मंडी हाउस छोड़ देना. श्रीराम बुक सेंटर.

वह सलाह दे रहा था कि पहले सोच लो. और मैं सोच रहा था कि कुछ घंटे अचानक ख़ाली मिल जाएं, तो वाणी कैसी तो खड़बड़ा जाती है, खोपड़ी वैताग जाती है. करें क्या, दिमाग़ बोंब मारता है. मैं उसके रिक्शे में जमा हुआ था और बाहर खड़ा वह अभी भी नक्की कर लेना चाहता था कि कहां और कितने में उतारेगा मुझे.

हो सकता है, दो मिनट बाद ही उतर जाऊं मैं.
मेरी बात सुनकर वह बमकने-सी अवस्था में आने लगा- आप तो अभी उतर जाओ. गड़बड़ आदमी लगते हो.
तो ये भी मेरी गड़बड़ी ताड़ गया. इस गड़बड़ी का क्या किया जाए, जो छिपाए नहीं छिपती. जिसे मैं अपने सीधेपन का छत्रगौरव मानता हूं, वह सामने वाले को गड़बड़ कि़स्म की धूर्तता क्यों लगती है?

सारी धूर्तता को रिवील करते हुए मैंने उसे यूं ही दिल्ली घुमाने के लिए कह दिया. और वह घुमाता भी रहा. इंडिया गेट के सामने ले जाकर बोले कि ये इंडिया गेट है, तो 'तिच्या आईला, देऊ का कानाखाली' जैसा कोई रापचिक बोलवचन मुंह से फूटने-फूटने को होता, पर वासुदेव कृष्ण टाइप का मुस्कानिज़्म रोक-रोक लेता. आंख निकलकर नाक तक आती और स्वांग में रोम-रोम का साझा होता.

एक जगह थककर सड़क किनारे पेड़ तले लेट जाने का मन हुआ. इस तरह खुले में पता नहीं कब लेटा था. आंख खुले, तो नींद आती है और आंख बंद हो, तो अनिद्रा. मारकेस के नॉवेल की वह लड़की, जो मिट्टी खाती है और पूरे गांव की नींद भी. पर छांव भली लगती है. घास पर और भी लोग लेटे हैं. उन सबके पांव चादर से बाहर हैं.

पास बैठकर बीड़ी फूंकता ऑटोवाला अपने घर की कहानी सुना रहा है. दिल्ली की बेदिली के कि़स्से. मैंने एक घर ख़रीदा. पटपड़गंज में. एक जाट ने उस पर क़ब्‍ज़ा कर लिया. मुझे सामान सहित घर से निकाल दिया. कुछ दिन मेरे पूरे परिवार ने ऐसे ही सड़क के किनारे जीवन जिया.
सामने एक दूसरा ऑटोवाला सवारी से भाड़े की किचकिच कर रहा है. ये वाला कहता है कि सब एक जैसे हैं.
उससे एक बीड़ी लेकर किनारे का जीवन जीता हूं. उससे कहता हूं, पैर दिखा.
अचकचा जाता है.
अबे, पैर दिखा.
अपना और उसका पैर एक साथ रखता हूं और कहता हूं, देख, दोनों एक-से हैं. दोनों पर चादर से बाहर रहने के निशान हैं, सूखी हुई चमड़ी पर बाहर रहने की सफ़ेद धारीदार आदत है.
आंख फिर नाक तक आती है और उलटकर लौटकर जाती है. स्साला. गड़बड़ आदमी है. कुछ ऐसा ही सोचा उसने और पैर पीछे खींच लिया. फिर सकुचाकर पूछा- कहां रहते हो?

बग़ल में लेटी अरस्तू की आत्मा को उसका सवाल दिलचस्प लगता है. वह मेरी देह में आ जाता है और कहता है-
मैं अपने शब्दों में रहता हूं. मेरे शब्दों की छत इन दिनों टपकती है. तुम ही बताओ, कोई टपकती छत के नीचे कितने दिनों तक रह सकता है?
हम तो खुले आसमान के नीचे रह लेते हैं. टपकती छत से क्या गुरेज़!
अरस्तू की आत्मा ओझा को चंवर डुलाती है. उचक कर पेड़ पर टंग जाती है. ये सारे दार्शनिक दिल्ली के ऑटोवालों से क्यों नहीं मिल लिए आकर?

उबासी की पत्ती उड़ते हुए आती है. पिछली कई रातों से थकान के बाद भी बिस्तर पर जागी हुई सिलवटें हैं बस. मिट्टी खाने वाली बच्ची नींद भी खा जाती है.
एक राउंड और. एक्सीलरेटर और ब्रेक का संतुलन बनाते वह फिर अपने मकान से बेदख़ली का कि़स्सा सुनाने लगता है.
मैं उसके और अपने पैर देखता हूं. दोनों एक जैसे ही तो हैं. पर वह नहीं मानता.
ख़ाली घंटे ईश्वर नेमत से देता है. और मैं ऐसे ही बचे किसी घंटे में फिर दिल्ली नाम की चादर से बाहर निकले, बिना नाम वाले पैरों से टकराता लड़खड़ाता भटकता हूं. उम्मीद से कि इस चादर के नीचे कहीं कोई जगह मुझे भी मिल जाए.

मकान से बेदख़ली का कि़स्सा जारी रहता है. किसी ऐसी लिपि में, जिसे पढ़े जाने की उम्मीद भी बाक़ी नहीं. किसी ऐसी आवाज़ में, जो डकार और ठहाकों के समय में गूंगी-बहरी हो चुकी.

Sunday, September 7, 2008

झोंक या झक का आज-टाइप रंग

जो नहीं समझ सका
तुम्‍हारी चुप्‍पी
व‍ह क्‍या समझेगा तुम्‍हारे बोल?

कितना बुरा था यह सुनना
मैं तुमसे प्‍यार करता हूं
हंड्रेड परसेंट
और सच है ये सच
हंड्रेड परसेंट

नहीं, कहन का तरीक़ा नहीं था यह
माप लेने की नपी-तुली साजि़श थी

अब कम से कम
आसमान से गिरती हर शै को गाली मत दो
पुरानी किताबों में पढ़ा है मैंने
बौराई बारिश की तरह
कभी-कभार पंखुरियां भी बरसती थीं
***
(काग़ज़ पर गिरकर फैल गए, किसी झोंक या झक के आज  वाले रंग के  बीच  आईं कुछ बेतरतीब पंक्तियां.)


और एनिग्‍मा का सेडनेस.



Sunday, August 31, 2008

काज़ुको शिराइशी की दुनिया में


जापानी कविता पढ़ चुके लोगों के लिए काज़ुको शिराइशी नाम नया नहीं होगा. 1931 में कनाडा के वैं‍कूवर में जन्‍मी शिराइशी को मां-बाप द्वितीय विश्‍वयुद्ध के ठीक पहले जापान ले गए. सत्रह की उम्र से कविताएं लिखनी शुरू कीं. कविताएं एलेन गिंसबर्ग से गहरे तक प्रभावित. 'न्‍यू डायरेक्‍शंस' से छपे इनके संग्रह के बैक कवर पर टिप्‍पणी में इन्‍हें 'जापान की एलेन गिंसबर्ग' कहा गया है.

1973 में आयोवा यूनिवर्सिटी के राइटिंग प्रोग्राम में एक साल तक रहने के बाद उनकी कविता में कई बदलाव आए. 78 में 'सीज़न्‍स ऑफ सैक्रेड लस्‍ट' छपकर आया, जिसने उन्‍हें अंतरराष्‍ट्रीय स्‍तर पर स्‍थापित कर दिया. उनकी कविताएं गहरे अमूर्तन की कविताएं हैं, भीतर के संघर्षों की. कविता के भीतर जीवन के एक नए दर्शन की तलाश. मार्च 88 में वह भारत भवन में हुए 'कविता एशिया' के लिए भोपाल आई थीं.


वह आदमी

वह आदमी कभी नहीं रुकेगा
पता नहीं कब से भागना शुरू किया है उसने
अभी एक पल को किसी इमारत की खिड़की से
झांक रहा था उसका सिर
वह दीवार पर दौड़ता है
वह सड़क पर दौड़ता है
सड़क जब समंदर में जाकर ख़त्‍म हो जाती है
वह पानी पर दौड़ने लगता है

ये जो आदमी दौड़ता जाता है दौड़ता जाता है
और जो कभी रुकेगा नहीं
उसे रखती हूं मैं
अपनी कॉपियों में
अपनी दराज़ में
अपने अंधेरे में
और मरते रहते हैं मेरे दिन
और ख़त्‍म नहीं होतीं मेरी रातें.



गली

तब की बात है जब हम भीतर त्‍वचा तक गीले
चल रहे थे रहस्‍य से भरे एक क़स्‍बे की अंधेरी गली में
बारिश. बेहद ठंडा मौसम.
हमारे पास रेनकोट थे और एक काला छाता.
कितनी तेज़ी से झोंका ख़ुद को टैक्‍सी पकड़ लेने के लिए
कोई मतलब नहीं, वे रुकी ही नहीं
अंतत: हमने पैदल चलना शुरू किया
भीगे हुए भीतर तक कस कर चिपके हुए
और सोचते रहे भविष्‍य ने कैसे दिन छिपा रखे हैं हमारे वास्‍ते

हालांकि मैंने
उस गर्म होटल, ताप को साझा करती हमारी देह
बेशुमार शब्‍दों और प्‍यार के तरीक़ों के बारे में
कभी कुछ याद नहीं किया.


फुटबॉल का खिलाड़ी


वह फुटबॉल का खिलाड़ी है
गेंद को किक मारता है हर रोज़
एक रोज़

उसने किक मारकर प्‍यार को ऊपर आसमान में पहुंचा दिया
वह वहीं रह गया
चूंकि वह कभी नीचे नहीं आया
लोगों को लगा यह सूरज है
या चांद या फिर कोई नया सितारा

मेरे भीतर एक गेंद है
जो कभी नीचे नहीं आती
लटकी रहती है आसमान के बीचोबीच
आप देख सकते हैं उसे लपट बनते हुए
प्‍यार या सितारा बनते हुए




तोता

मैंने कहा- मैं तुमसे प्‍यार करती हूं
तुमने जवाब दिया- मैं तुमसे प्‍यार करता हूं
मैंने कहा- मैं नफ़रत करती हूं तुमसे
तुमने जवाब दिया- मैं नफ़रत करता हूं तुमसे
मैंने पूछा- अब हम अलग हो जाएं क्‍या?
तुम तोता ही रहे हमेशा
दोहराते रहे मेरे शब्‍दों को जस का तस
इसीलिए ऐसा आया एक समय
जब हमें तलाक़ लेना पड़ा.

(सारी कविताएं 'सीज़न्स ऑफ सैक्रेड लस्‍ट' से)

Thursday, August 28, 2008

क्‍यों सोचें?

कई बार यही नहीं समझ आता कि हम क्या कर रहे हैं. वे क्या कर रहे हैं, समझना, ऐसे में मुश्किल नहीं जान पड़ता? अपना अमूर्तन हमेशा सुहाता है. उनका अमूर्तन भ्रम में डालता है. जैसे मेरी अमूर्त बातों को, मुंह बिचकाकर या बिराकर निकल लेते हैं आप लोग. लेखक तो होता ही मध्यवर्गीय जीव है, जो लिखता इसलिए है कि अपने भीतर की किसी मुंहबिराऊ मुद्रा से ख़ुद बच निकले और अपनी नागरिक अकर्मण्यताओं और उससे झुंझलाए अपराधबोध को दूसरे में (प्रत्या)रोपित कर आंख मलते विजयीभाव से वाह-वाह की ध्वनियों को टप्पा लेते आते देखे. अक्सर यह प्रत्यारोपण फ़ेल हो गई सर्जरी की तरह होता है, जिसका सारा दोष सॉइल की निरोधी फ़र्टिलिटी के माथे गिरता है. रोपण, सींचन, अंखुअन, स्फुरण जैसी बॉटैनिकल (कितौ बायोटेक्निकल) क्रियाएं होते-होते रह जाती हैं, प्रैक्टिकल के अभाव में पिक्टोरियल डिक्शनरी देख थ्योरी से ही काम-भर का पंखा झल जाता है. बीज-गुरु मन की किसी गांठ में बिसूरते पड़ रहते हैं कितौ लुंगी की गांठ से सरक लेते हैं. वाह-वाह की ध्‍वनि भी ऑडिबल नहीं रह जाती.

और पाठक भी भाभड़ा (कितौ छप्पनटिकली), ऐसा सैडिस्टिक अप्रोच लिए विचरता है कि बेचारा मध्यवर्गीय लेखक आज-इतिहास की न जाने कितनी त्रासदियों पर यौगिक रुदन करता है, और पाठक उस पर पेंसिल कितौ की-बोर्ड से वाह-वाह टीपता, 'इसकी तो ले ली' वाले भाव में एक स्माइली, सरेस-मय, चिपकाकर कल्टी मार लेता है.

विजय किसकी होती है, रो-रोकर आंख मलते विजयीभाव से फिरकीदार वाह-वाही टप्पों को तकते राइटर महोदय की या रोने पर आंख दबाकर खींस निपोरती सरेस-मय स्माइली वाले टीपक-कुलदीपक की... इस पर कभी सोचना नहीं चाहिए.

सोचना तो इस पर भी नहीं चाहिए कि कैसे मारे जाओगे? जम्मू में मुसलमान बनकर या कश्मीर में हिंदू बनकर? म्यूनिख़ में इज़राइली बनकर या गाज़ा में फ़लीस्तीनी बनकर? मुंबई में बिहारी बनकर या उड़ीसा में ईसाई बनकर? बिहार में बाढ़ में बहकर या गुड़गांव में मॉल के मलबे में दबकर? ज़्यादा लोगों के बीच कम बनकर या कम के बीच उपेक्षित भरकम बनकर? तमगे लगाए कलग़ीदार फ़ौजी की तानाशाही में या लहसन-प्याज़ नुमा लोकतंत्रवादी बहुमत की तानाशाही में?

सोच-सोचकर थरूर ने हाथी, बाघ और सेलफोन को जोड़ दिया और बार-बार बताया कि देश का मध्यवर्ग सोचता नहीं, सिर्फ़ शौचता है. कि सोचे बिना शौच के सहारे भी यह मध्यवर्ग कुछ बरसों में पूरी दुनिया पर छा जाएगा, राज करेगा, फिफ्थ एवेन्यू में नया मकान ख़रीदेगा, ट्रैफलगर में कोठी बनाएगा, अंटी दाबकर सबको ठांसेगा और बिना आवाज़ के खांसेगा. लेकिन उसकी वर्तमान राजनीतिक उदासीनता धीरे-धीरे राजनीतिक नासमझी में बदल जाएगी, यह नहीं सोचा कहीं. यह भी नहीं कि दुनिया का भावी सबसे शक्तिशाली मध्यवर्ग अकाल नहीं, एक राजनीतिक मृत्यु मरेगा.

मरना तो है ही, सो सोचना क्या? और मरना इतना सस्ता हो गया है कि सोचना बिल्कुल नहीं चाहिए. दो रुपए की चाय पर छुरा पेट में उतर जाए, या 'फ़ेल होन पर क्यों डांटा' पर बाप की टंगड़ी चिर जाए, कि 'फ़ुटपाथ पर क्यों सोते हो, साहबज़ादे की गाड़ी तो चढ़ेगी ही' से लेकर 'झोपड़ी में क्यों रहते हो, एक दिन तो उखड़ेगी ही' तक, 'ग्राम जोकहरा, जवार भकुरा, जि़ला आरा में रह लो कितौ लैबीरिन्थ, 9, पेडर रोड पर, खाना इसी मुंह है जाना उसी लोक' तक, किसी भी बात पर मरना हो सकता है. इसलिए किसी भी व्यक्ति, परिवार, समूह, समाज, समुदाय, राज्य अथवा राष्ट्र को नहीं सोचना चाहिए. सोचने से लीवर ख़राब होता है, प्रोस्टेट बढ़ जाता है.

सोच लिया, तो क़ै होने लगती है. फिर काग़ज़ के पन्ने हों या वेब के, गन्हाने लगते हैं. फिर क़ै का वर्गीकरण हो जाता है. विशेष गंधों के गंजियाहेपन पर. रंगों की रंगदारी पर. उम्दा, बेहतरीन, आभार, जमाए रखिए, उखाड़ दिया, दिखा दिया, चमका दिया छाप तेल से टीप के दीप बाले जाते हैं. या फिर 'काय ग पाटील बरं हाय काय, काल जे काही पाहिलं ते खरं हाय काय' (क्यों पाटील साब, सब ठीक तो है, एक बात बताइए, जो कल आपको करते देखा, वह सच है क्या) की तर्ज़ पर चमका जाएंगे कि पाटील नाम के बच्चू, तुमने भी सोच के नाम पर बहुत शौच की है. तुम्हारे गन्हाने की जिन्नाती बोतल खोलूं क्या?

सोचालय की दीवार वैताग कर भहरा जाती है. बास्‍टर्ड ऑफ इस्‍तान्‍‍बुल (कितौ गोधरा, जम्‍मू, मेरठ, मुंबई, भिवंडी, बेहरामपाड़ा) को कहां खोजे?

रोपण कहां हुआ, अंखुआया क्या? नहीं, बस टिपियाया. :) :D और कलट लिए.

बीज भी अंखुआता है और कीड़ा भी. जगह अलग-अलग होती है.

बीज-गुरु मन की किसी गांठ से लुंगी की गांठ की यात्रा पर निकलते हैं, बिना दिशाशूल देखे.

सींकदार झाड़ू को छितराकर कमर पर बांध लेने से तो मोर नहीं बन जाएंगे कि बारिश पड़े, तो छमाछम नाच आ जाए. या फिर हथेली पर ही कभी पृथ्वी का पौधा उगाएंगे? धन का पौधा उगते तो कंप्राडोर / कारपारेट जि़ंदगी में बहुत देखा है. पृथ्वी का पौधा बताओ, तो जानें. अब माइकल जैक्सन को कौन समझाए कि दुनिया भर का घाव 'हील' करने को चीख़ रहे हो, जिन्नाती बोतल तो तुम्हारी भी बनी पड़ी है? हम तो अपने हीलों-हवालों में ही रहेंगे. (एक स्‍माइली ब्‍लैक एंड व्‍हाइट- सरेस-मय.)

मन हो तो सुन लीजिए. नीचे लिरिक्स भी हैं. देखिए, कुछ बुझाता है क्या? कुछ अंखुआता है क्या? पर ख़बरदार, सोचिएगा मत. सोचने से लीवर ख़राब हो जाता है. प्रोस्टेट बढ़ जाता है.



Heal The World

There's A Place In
Your Heart
And I Know That It Is Love
And This Place Could
Be Much
Brighter Than Tomorrow
And If You Really Try
You'll Find There's No Need
To Cry
In This Place You'll Feel
There's No Hurt Or Sorrow

There Are Ways
To Get There
If You Care Enough
For The Living
Make A Little Space
Make A Better Place...

Heal The World
Make It A Better Place
For You And For Me
And The Entire Human Race
There Are People Dying
If You Care Enough
For The Living
Make A Better Place
For You And For Me

If You Want To Know Why
There's A Love That
Cannot Lie
Love Is Strong
It Only Cares For
Joyful Giving
If We Try
We Shall See
In This Bliss
We Cannot Feel
Fear Or Dread
We Stop Existing And
Start Living

Then It Feels That Always
Love's Enough For
Us Growing
So Make A Better World
Make A Better World...

Heal The World
Make It A Better Place
For You And For Me
And The Entire Human Race
There Are People Dying
If You Care Enough
For The Living
Make A Better Place
For You And For Me

And The Dream We Were
Conceived In
Will Reveal A Joyful Face
And The World We
Once Believed In
Will Shine Again In Grace
Then Why Do We Keep
Strangling Life
Wound This Earth
Crucify Its Soul
Though It's Plain To See
This World Is Heavenly
Be God's Glow

We Could Fly So High
Let Our Spirits Never Die
In My Heart
I Feel You Are All
My Brothers
Create A World With
No Fear
Together We'll Cry
Happy Tears
See The Nations Turn
Their Swords
Into Plowshares

We Could Really Get There
If You Cared Enough
For The Living
Make A Little Space
To Make A Better Place...

Heal The World
Make It A Better Place
For You And For Me
And The Entire Human Race
There Are People Dying
If You Care Enough
For The Living
Make A Better Place
For You And For Me

Heal The World
Make It A Better Place
For You And For Me
And The Entire Human Race
There Are People Dying
If You Care Enough
For The Living
Make A Better Place
For You And For Me

Heal The World
Make It A Better Place
For You And For Me
And The Entire Human Race
There Are People Dying
If You Care Enough
For The Living
Make A Better Place
For You And For Me

There Are People Dying
If You Care Enough
For The Living
Make A Better Place
For You And For Me

There Are People Dying
If You Care Enough
For The Living
Make A Better Place
For You And For Me

Tuesday, August 26, 2008

ख़ालीपन को निराश करने के कुछ निजी टोटके

ख़ुश होना कोई टोटका होता है, या कोई कोशिश, जिसमें बार-बार 'नो' के डिब्बे में सही का निशान लगाना होता है। और कभी छल से निहुरकर 'यस' के डिब्बे की तरफ़ देखें, तो पाते हैं कि वह उसी तरह काग़ज़ से गिर गया है, जैसे अंतोनियोनी की किसी फिल्म में बारीकी से अतल में गिरता गुलाब का कोई टुकड़ा। मन करता है, वेनिस के पानी में छपाकें मारने का, तो इल्म होता है किसी रोमन मिथ का, कि प्रेम की देवी को जब पहली बार विरह का शाप मिला, तो वह इस क़दर रोई कि शहर पनीले हो गए।


किसी कॉलेज के कैंपस में ऊपर से बरसती बारिश और नीचे से उछलते कीचड़ के बीच, प्लास्टिक की कुर्सी पर बैठकर, छूट गई छुअन का ताप कंधे पर महसूस करते खिंचवाई तस्वीर को देखकर ख़ुश होने की कोशिश भी 'नो' के डिब्बे की तरफ़ ले जाती है और कॉलरा का फ्लोरेंतीनो दिखाई पड़ता है, जिसने अपने कंधे आज तक उचका रखे हैं, क्योंकि जब पहली बार वह छुअन उसके कंधे पर आकर बैठी थी, तो विस्मय, हर्ष और स्वीकार की कोमलता में उसके कंधों का वही पहला रिस्पॉन्स था। लगातार सफ़ेद होती मूंछ बताती है कि उम्र एक अंधेरी सुरंग है महज़. बेरंग, बदरंग।


या कि वान गॉग का आर्ल्स का कमरा देखते रहें, जहां पीले के बीच उभरा हुआ हरा भी बेनूरी में थककर पीला हो जाता है, जहां पलंग पर एक ख़ालीपन रहता है, गोकि यह उसी की पलंग हो और कमरे में एक ख़ालीपन विचरता है गोकि यह उसी का कमरा हो, और बग़ल की मेज़ पर बिसूरती दवा की बोतल जैसे जानती हो कि यह उसकी मेज़ नहीं है। दीवार पर लटकी तस्वीरें, कपड़े, तौलिए बारहा कोशिश करते हैं कि वे ख़ालीपन को निराश कर दें। पर एक तस्वीर क्या होती है ख़ालीपन को निराश करने वाली? एक मैं क्या होता हूं? भरे-भरे का अस्तित्व तो इसीलिए है कि ख़ालीपन कहीं ढंका-तुपा रह जाए।


एक बेपरवाह फुसफुसाहट औचक आती है, कहती है कि सच हमेशा बेआरामी से भरा होता है और सिर झुकाकर अंगूठे से फ़र्श को खोदते रहने की क्रिया हमेशा ख़ुशी से ख़ाली रहती है। पैरों को अपराधबोध होता है कि वे चलने तक से मना कर देते हैं, नाचना तो दूर की बात है।

वैसे, अपराधबोध से भरा होना भी एक तरह से ख़ालीपन ही होता है. क्‍या ये ख़ालीपन को निराश करने लायक़ हो सकता है?


जॉर्ज माइकल की केयरलेस व्हिस्‍पर.

Monday, August 25, 2008

महमूद दरवेश की डायरी से



बैरूत पर हुए इज़राइली हमले के दौरान लिखी महमूद दरवेश की डायरी के टुकड़े





होटल कमोदोर जहां विदेशी पत्रकारों का हुजूम लगा रहता है, एक अमेरिकी पत्रकार मुझसे पूछता है:
- इन दिनों क्या लिख रहे हैं कवि महोदय?
- मैं अपनी चुप्पी लिख रहा हूं।
- आपका मतलब यह है कि इस वक़्त बंदूक़ों को ही बोलना चाहिए?
- हां, क्योंकि उनकी आवाज़ मेरी आवाज़ से ज़्यादा ऊंची है।
- तो आप क्या कर रहे हैं?
- स्थिरता को पुकार रहा हूं।
- क्या आप यह युद्ध जीत जाएंगे?
- नहीं। अहम बात है डटे रहना। डटे रहना अपने आप में जीत होती है।
- उसके बाद क्या होगा?
- नए युग की शुरुआत।
- फिर आप वापस कविता लिखना कब शुरू करेंगे?
- बंदूक़ों को थोड़ा चुप हो जाने दीजिए। जब मेरी चुप्पी का विस्फोट होगा। चुप्पी, जिसमें ये सारी आवाज़ें घुली हुई हैं। जब मैं अपने लिए एक भाषा तलाश लूंगा।
- तब तक आपकी कोई भूमिका नहीं?
- नहीं, कविता में मेरी इस वक़्त कोई भूमिका नहीं। मेरी भूमिका कविता से बाहर है। मेरी भूमिका वहां होने में है, नागरिकों और लड़ाकों के बीच।

कुछ बुद्धिजीवियों को यह मौक़ा पुराने हिसाब-किताब चुकता करने के लिए सही लगा। वे पत्रकारों के सामने ही एक-दूसरे पर छींटे उछालने लगे। हमें उन पर व्यर्थ में चिल्लाना पड़ा, 'चुप हो जाइए। बकवास बंद कीजिए। बैरूत पर क़ब्ज़ा करने वाले लेखक नहीं हैं। बुरे से बुरा क्या होगा, आपके लेखन को साहित्य नहीं माना जाएगा। अच्छे से अच्छी स्थिति में मान भी लिया, तो इससे आपका लेखन लड़ाकू जहाज़ उड़ाने वाली तोप तो नहीं हो जाएगा।'

पर वे पलटकर बोले, 'नहीं, यही सही समय है यह तय करने का कि कोई कवि या कविता क्रांतिकारी है या नहीं। कविता है, तो उसे इसी समय जन्म लेना चाहिए, वरना उससे जन्म लेने का अधिकार छीन लेना चाहिए।'

मैं फिर चिल्लाया, 'तो फिर आपने होमर को 'ईलियड' और 'ओडिसी' लिखने का अधिकार क्यों दे दिया? लेखको, हर कोई एक ही तरीक़े से प्रतिक्रिया नहीं करता। अगर कोई ठीक युद्ध के बीच में लिख सकता है, तो उसे लिखने दीजिए। कोई बाद में लिखना चाहता है, तो बाद में सही। जहां तक मेरा मानना है, तो वह यह है कि - जो घायल हैं, प्यासे हैं, जो पानी, रोटी या छत की तलाश में भटक रहे हैं, वे आपसे कविता नहीं मांग रहे। जो लड़ रहे हैं, उन्हें अपनी जान की फि़क्र है, आपकी कविता की नहीं। इस समय में सबसे बड़ी चीज़ जो आप कर सकते हैं, वह यह है कि उन प्यासों के लिए बीस लीटर पानी खोज लाइए। रोटी इकट्ठी करके उजड़े हुए लोगों के पास चलिए। इस युद्ध में हम हाशिए पर हैं, नगण्य। इस समय मानवीय प्रतिबद्धता चाहिए लेखको, कलात्मक सुंदरता नहीं।'

कौन हैं वे कवि, जो सर पर मंडराते युद्धक विमानों, बम विस्फोटों, सड़क पर जमा लाशों के बीच कमरे में बैठे कविता लिखते रहते हों?
ये बहस चलती रही। बाहर भी। और भीतर भी।
...
इसके बाद भी पाकिस्तान से आए मेरे पुराने दोस्त फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ पूछते हैं, 'सारे कलाकार कहां चले गए?'
'कौन-से कलाकार, फ़ैज़?
'बैरूत के कलाकार.'
'उनका क्या करोगे?'
'भई, उन्हें इस युद्ध की विभीषिका को शहर की दीवारों पर रंगकर दिखाना चाहिए।'
'तुम्हें दिखता नहीं फ़ैज़, शहर में दीवारें बची हैं क्या? सारी दीवारें तो ज़मींदोज़ हो गईं।

Saturday, August 16, 2008

एलियन

एलियन

उगता हुआ सूरज उस औरत की तरह लगता है हमेशा
जो सुबह उठकर चाय के लिए पानी गर्म करती है

कार, बस, ट्रेन और हवाई जहाज़ में
विंडो सीट पर बैठने की जि़द करता हूं हमेशा
बाहर देखते हुए नए सिरे से जांचता हूं पुरानी बात
कि धरती और आसमान सब जगह एक ही हैं

रुदन को पवित्र मानते हुए भी
खेल से बाहर रोती बच्ची को खिझाता हूं हमेशा
उसकी पीठ पर मारता हूं एक धौल
इस तरह अभ्‍यस्त हो जाएगी वह
पीठ पर वार झेलने की रिवायत से

छोकरों से भरी जीप में से मस्ती में निकला कोई हाथ
धक्का देकर गिरा देता है साइकल से
क़तार में पीछे से मारता है कोई सिर पर टपली
उठकर झाड़ता हूं कपड़े सहेजता हूं साइकल
सिर घुमाकर पीछे नहीं देखता
आंखें मूंद बुदबुदाता हूं कोई प्रार्थना हमेशा
तुम तक लौट जाएंगी तुम्हारी गालियां और सारी गोलियां

जिनको कभी ग़ुस्सा नहीं आता
अचरज करते हैं
आत्मा वाले मुस्कराते हैं
मेरे लिए नहीं खुलते आत्मा के दरवाज़े कभी
उसकी चाभी को कामुक स्त्रियों ने वक्षों के बीच छुपा रखा है

गाल, ज़मीन और उंगली की पोर पर पड़े आंसू को
ग़ौर से देखता हूं फिर डायरी में नोट करता हूं
आंसू की कोई परछाईं नहीं होती
वह पृथ्वी पर बाहर से आया कोई जीव है

पेंटिंग : सिद्धार्थ

Friday, August 15, 2008

स्‍वाधीन इस देश में चौंकते हैं लोग एक स्‍वाधीन व्‍यक्ति से

रघुवीर सहाय
........................




इस अंधेरे में कभी-कभी
दीख जाती है किसी की कविता
चौंध में दिखता है एक और कोई कवि
हम तीन कम से कम हैं, साथ हैं

आज हम
बात कम काम ज़्यादा करना चाहते हैं
इसी क्षण
मारना या मरना चाहते हैं
और एक बहुत बड़ी आकांक्षा से डरना चाहते हैं
जि़लाधीशों से नहीं

कुछ भी लिखने से पहले हंसता और निराश
होता हूं मैं
कि जो मैं लिखूंगा वैसा नहीं दिखूंगा
दिखूंगा या तो
रिरियाता हुआ
या गरजता हुआ
किसी को पुचकारता
किसी को बरजता हुआ
अपने में अलग सिरजता हुआ कुछ अनाथ
मूल्‍यों को
नहीं मैं दिखूंगा

खंडन लोग चाहते हैं या कि मंडन
या फिर केवल अनुवाद लि‍सलिसाता भक्ति से
स्‍वाधीन इस देश में चौंकते हैं लोग
एक स्‍वाधीन व्‍यक्ति से

बहुत दिन हुए तब मैंने कहा था लिखूंगा नहीं
किसी के आदेश से
आज भी कहता हूं
किंतु आज पहले से कुछ और अधिक बार
बिना कहे रहता हूं
क्‍योंकि आज भाषा ही मेरी एक मुश्किल नहीं रही

एक मेरी मुश्किल है जनता
जिससे मुझे नफ़रत है सच्‍ची और निस्‍संग
जिस पर कि मेरा क्रोध बार-बार न्‍योछावर होता है

हो सकता है कोई मेरी कविता आखि़री कविता हो जाए
मैं मुक्‍त हा जाऊं
ढोंग के ढोल जो डुंड बजाते हैं उस हाहाकार में
यह मेरा अट्टहास ज़्यादा देर तक गूंजे खो जाने के पहले
मेरे सो जाने के पहले
उलझन समाज की वैसी ही बनी रहे

हो सकता है कि लोग लोग मार तमाम लोग
जिनसे मुझे नफ़रत है मिल जाएं, अहंकारी
शासन को बदलने के बदले अपने को
बदलने लगें और मेरी कविता की नक़लें
अकविता बन जाएं. बनिया बनिया रहे
बाम्‍हन बाम्‍हन और कायथ कायथ रहे
पर जब कविता लिखे तो आधुनिक
हो जाए. खींसे बा दे जब कहो तब गा दे

हो सकता है उन कवियों में मेरा सम्‍मान न हो
जिनके व्‍याख्‍यानों से सम्राज्ञी सहमत हैं
घूर पर फुदकते हुए संपादक गदगद हैं

हो सकता है
हो सकता है कि कल जब कि अंधेरे में दिखे
मेरा कवि बंधु मुझे
वह न मुझे पहचाने, मै न उसे पहचानूं
हो सकता है कि यही मेरा योगदान हो कि
भाषा का मेरा फल जो चाहे मेरी हथेली से ख़ुशी से चुग ले
अन्‍याय तो भी खाता रहे मेरे प्‍यारे देश की देह.

Tuesday, August 12, 2008

किताब के पहले पन्‍ने पर दस्‍तख़त-सा आदमी







श्रीधर वाकोड़े कौन है, मुझे नहीं पता, पर इसका नाम मैं बरसों से पढ़ता आ रहा हूं। मेरी कई किताबों के शुरुआती पन्नों पर मराठी में उसके दस्तख़त हैं। उसे देखने की इतनी आदत पड़ गई है कि कई बार मैं उसकी तरह दस्तख़त करना चाहता हूं।

अरिहंता ने बताया था कि वह चिकनी का पप्पा है। चिकनी कौन है? उससे बातचीत में पता लगा, आगे किसी बिल्डिंग में रहती है और यहां बस पकड़ने आती है और यहां के लड़के उसे टापने में कोई क़सर नहीं बाक़ी रखते।

अरिहंता कौन है? सिर्फ़ इतना जानता हूं कि मुलुंड चेक नाके के पास उसकी रद्दी की दुकान थी, जो अब वहां नहीं है। उसका असली नाम भी नहीं पता। उसके दुकान का नाम था अरिहंता पेपर मार्ट, तो मेरी स्मृति में उसका नाम यही बस गया है।

मैंने उससे कहा था, मुझे उसके घर ले चलेगा? तो उसे लगा कि मैं भी चिकनी की क़तार में हूं। मैंने कहा, नहीं, उसके बाप के पास? वह बोला, सब लड़की के पीछे और तू बाप के पीछे, सही है बावा।

पर अरिहंता कभी लेकर नहीं गया। मैंने भी फिर कभी पूछा नहीं। श्रीधर वाकोड़े उसके यहां अपनी किताबें बेचता रहा और मैं वहां से उन किताबों को ख़रीदता रहा। यह सिलसिला बारह-तेरह साल पहले शुरू हुआ था। श्रीधर वाकोड़े के दस्तख़त वाली पहली किताब जो मिली थी, वह थी मारकेस की 'नो वन राइट्स टु द कर्नल'। इस तरह उसने मारकेस से परिचय कराया। उस संग्रह की एक कहानी उस वक़्त भी मुझे बहुत पसंद आई थी, वह थी 'ट्यूज़डे सीस्टा'। वह अब भी मेरी पसंदीदा कहानी है। बाद में मारकेस को और पढ़ा, तो पता चला, वह उनकी भी पसंदीदा है। बर्गमान की 'द मैजिक लैंटर्न' और बुनुएल की 'द लास्ट साय' भी वहीं मिली। 'पिकासो इन इंटरव्यूज़', इनग्रिड बर्गमैन की मराठी में आत्मकथा, मैरी पिकफोर्ड, डगलस फेयरबैंक्स, विवियन ली और क्लार्क गैबल की जीवनियां। और एक नई-नवेली एलन सीली की 'द एवरेस्ट होटल'। इन सबमें श्रीधर वाकोड़े अपनी लचकदार साइन और पेंसिल के निशानों के साथ मौजूद है। जहां दुख और उदासी की सबसे गहरी पंक्तियां हैं, किसी मटमैले पुच्छल तारे की तरह उसकी पेंसिल वहां से ज़रूर गुज़री है। जिन पन्नों पर आंख गीली हो जाए, उन पन्नों को शायद बार-बार पढ़ा गया। उनके किनारे मुड़े हुए रहे होंगे, क्योंकि तिकोना मोड़ अब भी वहां निशान में है। उसकी किताबें उसके और मेरे बीच जाने कैसा रिश्ता बनाती हैं।

वह क्या था, कोई कलाकार या कोई संघर्षरत फिल्मकार या कोई नाटककार, अभिनेता, कोई लेखक-कवि या फिर कोई साधारण पाठक? किसी साधारण पाठक के पास तो ये किताबें मिलने से रहीं। कोई नामचीन रहा होगा, इसमें भी शक है, क्योंकि बिल्कुल पास के अरिहंता के लिए वह सिर्फ़ चिकनी का पप्पा था। फिर क्या था वह? अरिहंता की दुकान रोड वाइडेनिंग में उजड़ गई और अरसे से मुंबई अपने से छूटी हुई है। अब रद्दी की दुकानें भी दिखती नहीं। जो दिखती हैं, उनमें अख़बार, फेमिना, कॉस्मो मिलती हैं, कहीं दबाकर रखी कोई पुरानी डेब या पीबी।

जिन किताबों को कोई भी पढ़ा-लिखा शान से अपनी शेल्फ़ में लगाकर रखे, उन किताबों को वह बाक़ायदा पढ़कर या बरसों संभालकर, एक दिन रद्दी में क्यों बेच आता था? एक दोस्त से यह बात की, तो वह जि़ंदगी और मौत के अद्वैत में लग गया- हर किताब को एक दिन रद्दी की दुकान में जाना होता है।

कई बार लगता है कि वह शब्दों से बाहर निकल गया कोई पात्र है, जो शुरुआती ख़ाली पन्ने पर सिर उचकाकर उपस्थिति दर्ज करा रहा हो। या मौन में भटक गया मनुष्‍य हो। या ड्रामे के ठीक पहले परदा खींचने वाला हाथ है, जिसकी उंगलियों की झलक तक हमको नहीं दिख पाती। या कैमरे की नज़र से छूट गया एक भरा-पूरा लैंडस्केप हो या एडिटिंग टेबल पर कट कर गिर गया कोई दृश्य हो। वह आलमारी से निकलकर फुटपाथ पर पहुंच गई कोई किताब ही रहा हो। मेरी किताबों के बीच वह किसी असहाय किसान की तरह लगता है, जिस पर एक-एक टुकड़ा ज़मीन बेचने का बज्जर गिरा हो। अशोक के बाद कलिंग पर राज करने वाले राजा खारवेल की तरह, इतिहास में जिसके पास कोई जीवन नहीं बचा, हाथीगुफा की दीवारों पर गुदा नाम बचा बस। वैसे ही, श्रीधर वाकोड़े भी कोई जीवन था या सिर्फ़ किताबों पर लिखा हुआ एक नाम?

जब भी किताबी कोना पर जाता हूं, श्रीधर वाकोड़े बेसाख़्ता याद आता है। क्‍या आपकी किताबों में भी कोई श्रीधर वाकोड़े रहता है?

Monday, August 11, 2008

भाषा के मानचित्र में एक निर्वासित कवि का देश.



महमूद दरवेश समकालीन अरबी दुनिया के सबसे बड़े कवि थे. एक ऐसे देश के कवि, जिसका अस्तित्‍व सिर्फ़ शब्‍दों और भाषा में है. हज़ारों लेखों, भाषणों में उन्‍हें फ़लीस्‍तीन की दिलो-जु़बां कहा गया. वह अपने देश की लड़ाई लड़ते रहे, अपनी ज़मीन को अपना कह सकने की लड़ाई. कुछ उनके साथ रहे, कुछ उनके खि़लाफ़. संबंधों का विकेंद्रीकरण ऐसे ही होता है. एक इंटरव्‍यू में उन्‍होंने कहा था, जीते-जी अपने लिए एक राष्‍ट्र नहीं पा सका मैं, सिर्फ़ इसका सुकून है कि मैंने अपनी भाषा में अपने लिए एक राष्‍ट्र बनाया, अपनी मातृभूमि के सीवान उसी भाषा में पहचाने. कई बरस जेल में गुजारने के बाद उन्‍हें निर्वासित होना पड़ा. और वह इतना लंबा चला, कि एक कविता में उन्‍होंने लिखा- अब निर्वासन की लत लग गई है. वह मूलत: लिरिकल कवि थे. प्रेम और विद्रोह के गीत गाते. उनकी कई कविताएं, मसलन रीता और राइफल, मैं जहां से आया, मेरे शब्‍द आदि अरबी दुनिया में बाक़ायदा गाए और गुनगुनाए जाते हैं. लोकप्रियता इतनी कि उनकी कविता या भाषण सुनने के लिए अस्‍सी हज़ार की भीड़ इकट्ठी हो जाए. मेरे पास एक वीडियो था, जिसमें वह नेरूदा पर बोल रहे हैं, उनकी कविताओं को अरबी अनुवाद सुना रहे हैं और एक लाख के क़रीब भीड़ हर चौथी लाइन पर तालियों के शोर में तब्‍दील हो रही है.

उनकी कविताएं बाग़ी तेवर की हैं, लेकिन 90 के बाद की कविताएं मिस्टिक या रहस्‍यवादी प्रवृत्ति की हैं. निर्वासन के दिनों में उन्‍होंने अंग्रेज़ी और फ्रेंच सीखी और इनसे जुड़े मिथक उनकी कविता में तेज़ी से आए. आलोचकों ने उन पर भटकने का आरोप लगाया, पर उनकी लोकप्रियता में कोई कमी नहीं आई. उनका कहना था, मैं ख़ुद की आलोचना करता हूं और हमेशा ख़ुद को एक सीढ़ी ऊपर उठाना चाहता हूं. लेकिन इसका मतलब यह क़तई नहीं कि मैंने पहले जो कविताएं लिखीं, उनके लिए मुझमें कोई अफ़सोस या क्षमायाचना का भाव हो. वह स्‍वर मेरी कविता की टेक है, जो नई कविताओं में भी बरक़रार है. अच्‍छा कवि वही होता है, जो बहुत ज़्यादा पढ़े और समय-समय पर दूसरों से प्रभावित भी हो.

कल उनके निधन पर कबाड़ख़ाना में कुछ कविताएं लगाई गई थीं. आज यहां प्रस्‍तुत है एक कविता और डायरी से एक पीस. कविता उनकी शब्‍दयात्रा का आख्‍यान है और जबकि डायरी ख़ूबसूरत गद्य का नमूना. उस पीस में आया मच्‍छर क्‍या है, वे लोग भली-भांति समझ जाएंगे, जिन्‍होंने सत्‍ता के असली रूपों को बहुत क़रीब से देखा हो. आप अपना ब्‍लडग्रुप बदलवा लें, सत्‍ता आपको नहीं काटेगी. यह पीस अनुवाद करते समय मुझे मायकोवस्‍की की वह कविता बार-बार याद आई (जो उन्‍होंने आखि़री दिनों में सोवियत व्‍यवस्‍था में फैली और निर्णायक रूप से घातक साबित हुई भ्रष्‍ट अफ़सरशाही पर लिखी थी), '... शार्क मछलियों को मैंने छका दिया, फलां-फलां ख़तरनाक जानवरों से मैं बच निकला, पर जिन्‍होंने मुझे मारा, वे खटमल थे.'


मेरे शब्‍द

जब मिट्टी थे मेरे शब्‍द
मेरी दोस्‍ती थी गेहूं की बालियों से

जब क्रोध थे मेरे शब्‍द
ज़ंजीरों से दोस्‍ती थी मेरी

जब पत्‍थर थे मेरे शब्‍द
मैं लहरों का दोस्‍त हुआ

जब विद्रोही हुए मेरे शब्‍द
भूचालों से दोस्‍ती हुई मेरी

जब कड़वे सेब बने मेरे शब्‍द
मैं आशावादियों का दोस्‍त हुआ

पर जब शहद बन गए मेरे शब्‍द
मक्खियों ने मेरे होंठ घेर लिए.


मच्‍छर और आपका ब्‍लडग्रुप

मच्‍छर, मेरी भाषा में हमेशा स्‍त्रीलिंगी है और गॉसिप से ज़्यादा जानलेवा है. वह न केवल आपका ख़ून चूसती है, बल्कि एबसर्डिटी के खि़लाफ़ आपको एक लड़ाई में झोंक देती है. और बुख़ार की तरह हमेशा अंधेरे में आती है. किसी जंगी जहाज़ की तरह वह झिन-झिन, घुं-घुं करती है, जिसे आप निशाने पर उसके हमले के बाद सुन पाते हैं. निशाना आपका ख़ून है. आप उसे खोजने के लिए बत्‍ती जला देते हैं और वह आपकी हैरानी की सबसे ऊंची अटारी पर जाकर खो जाती है. वहां किसी दीवार पर बैठ वह सुस्‍ता रही होती है, सुरक्षित, शांतिपूर्ण, स्‍वीकार्य. आप उसे अपने जूते से मार देना चाहते हैं, पर वह याचना करती है, बचकर भाग निकलती है, और फिर एक आत्‍महंता जि़द के साथ दुबारा आप तक आ जाती है. आप फिर कोशिश करते हैं, और फिर हार जाते हैं. चीख़-चीख़कर उसे बददुआएं देते हैं, वह कान तक नहीं धरती. आप मीठी ज़बान में उससे शांतिवार्ता करते हैं: तुम सो जाओ, उसके बाद मैं भी सो जाऊंगा. आपको लगता है कि आपने उसे मना लिया है, बत्‍ती बुझाकर आप सो जाते हैं. भले उसने आपको ढेर सारा ख़ून चूस रखा हो, वह फिर अपनी झिन:झिन, घुं-घुं शुरू कर देती है, अगले हवाई हमले की घोषणा में. और आपको अनिद्रा के साथ एक दूसरी लड़ाई में झोंक देती है. एक बार फिर आप बत्‍ती जलाते हैं और कोई किताब पढ़ने लगते हैं, ताकि अनिद्रा और उससे, दोनों से लड़ा जा सके. वह खुले हुए पन्‍ने पर आकर बैठ जाती है और आप पुलक उठते हैं कि चलो, अब ये फंसी जाल में. आप ज़ोर-से किताब बंद करते हैं. मैंने उसे मार डाला... मैंने उसे मार डाला. जीत का जश्‍न मनाने के लिए जब आप किताब दुबारा खोलते हैं, तो पाते हैं, वहां न तो मच्‍छर है, और न ही शब्‍द. पन्‍ना पूरी तरह सफ़ेद और ख़ाली है. मेरी भाषा में हमेशा स्‍त्रीलिंगी अभिव्‍यक्ति पाने वाली मच्‍छर कोई रूपक नहीं है, बल्कि एक कीट है, जो आपके ख़ून से प्‍यार करता है. वह बीस मील दूर से भी आपके ख़ून को सूंघ सकती है, और उससे युद्धविराम का सिर्फ़ एक ही रास्‍ता है, आप अपना ब्‍लडग्रुप बदलवा लें.

Friday, August 8, 2008

घर में पीजै, मीर को पढि़ए, वहीं सो जाइए

फ़ज़ल ताबिश को उर्दू का बांका और कड़वा शायर कहा जाता है. उनकी फक्‍कड़ जि़ंदगी और बेपरवाह तबीयत के बहुत कि़स्‍से हैं. शायरी का एक संग्रह 'रोशनी किस जगह से काली है' ख़ासा चर्चित था. एक उपन्‍यास 'वो आदमी' की भी बराबर बात होती है. उनके अदब से कुछ चीज़ें यहां पेश हैं. देखिए इनका बांकपन...


ग़ज़ल

शखि़्सयत है कि सिर्फ़ गाली है
जाने किस शख़्स ने उछाली है

शहर दर शहर हाथ उगते हैं
कुछ तो है जो हर एक सवाली है

जो भी हाथ आए टूट कर चाहो
हार कर ये रविश निकाली है

मीर का दिल कहां से लाओगे
ख़ून की बूंद तो बचा ली है

जिस्‍म में भी उतर के देख लिया
हाथ ख़ाली था अब भी ख़ाली है

रेशा रेशा उधेड़ कर देखो
रोशनी किस जगह से काली है

दिन ने चेहरा खरोंच डाला था
जब तो सूरज पे ख़ाक डाली है.


ग़ज़ल 2

दिल कहे दीवाना बनकर दरबदर हो जाइए
दूसरा दिल हो कि शाम आ पहुंची घर को जाइए

कौन सी आवारगी यारी कहां की सरख़ुशी
घर में पीजै मीर को पढि़ए वहीं सो जाइए

आने वाले वसवसे बीते दिनों से भागकर
कुछ न बन पाए तो रस्‍तों में कहीं खो जाइए

हमको सब मालूम है मालूम होने का भरम
बस ये औलादें ही बस में हैं यही बो जाइए

घर के दीवारों के गिरने की ख़बर मुझको भी है
आप ख़ुश होना अगर चाहें तो ख़ुश हो जाइए

मांगिए हर एक से उसके गुनाहों का हिसाब
और सारे शहर में सबके ख़ुदा हो जाइए.


उस देस में

धूप अपना बिस्‍तर लपेटकर
हमारे छत पर नहीं रखती
सफ़र पर जाने के आखि़री लम्‍हे तक जाड़े
रहते हैं हमारे घर
लोटते-पोटते हैं मगर जाते वक़्त
कुछ भी छोड़ कर नहीं जाते गर्मियों के लिए

हमारे घर आते हैं पैसे
दौलतमंद रिश्‍तेदारों की तरह खड़े-खड़े
रोकना चाहते हैं हम उन्‍हें
उन्‍हें जाना होता है पार्टी, डिनर या लंच में
कौन बुलाता है पैसों को दावतों में

हमारे घर आती है मौत
बैठती है पलंग पर ज़मीन पर कुर्सियों पर
ले जाती है हमारे किसी को
धूप, जाड़े, रिश्‍तेदारों और
पैसों के देस में

न जाने वहां क्‍या होता है
अब्‍बा तुम ख़त लिखना
बहन, भाई और मां तो अनपढ़ थे.


सफ़र

रात जब हर चीज़ को चादर उढ़ा दे
ढांप ले काले परों में
आग लपटों-सी ज़बानें
अज़दहे जब अपने अंदर बंद कर लें
तब उसी काले समय में
तुम घरों की क़ब्र से बाहर निकलना
और बस्‍ती के किनारे
ख़ाब में ख़ामोश बहते आदमी-से
आके मुझको ढूंढ़ना
मैं वहीं तुम सबसे कुछ आगे मिलूंगा
और अंधेरा-सा तुम्‍हारे आगे-आगे मैं चलूंगा

रोशनी लेकर चलूंगा तो मुझे
तुमसे भी पहले और कोई ढूंढ़ लेगा.

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