Thursday, March 27, 2008

कौन नीरो के साथ, कौन रोम के साथ...


मैं जानना चाहता हूं
जब रोम जल रहा था
और नीरो बजा रहा था बांसुरी
तब कौन लोग थे उसके आसपास
कौन थे जो सुन रहे थे बांसुरी की धुन
कौन थे
जिनकी आंखें चुंधिया रही थीं
आग से निकलती रोशनी से

मैं जानना चाहता हूं
कौन थे जो पढ़ रहे थे
नीरो के हुनर के क़सीदे
कौन थे जो शोलों को हवा कर रहे थे

कितनी आरामदेह रिहाइशें हवन हुईं उस अग्नि में
कितनी शानदार इमारतें तब्‍दील हो गईं राख के ढेर में
कितने लोगों की हड्डियां बिखर गईं
जैसे धूल
कितने शरीर पिघल गए मोमबत्तियों की तरह

कितने महानाट्य
कितनी दुखांत रागिनियां
प्रेम और निराशा के कितने गीत
उम्‍मीद और छलिया लालच की कितनी छवियां
बदल गईं एक निरर्थक शून्‍यता में
एक भयावह आग से घबराए कितने सपने
लापता हो गए वजूद के पन्ने से

मैं जांचना चाहता हूं
रोम के विनाश से जुड़े सारे रेकॉर्ड्स को
या शायद किसी भी तरह पाना चाहता हूं
दुनिया की सबसे बड़ी आग के पेट में समा गए
लोगों, ढांचों, चीज़ों की फ़ेहरिस्तें

या सिर्फ़ इतना जानना चाहता हूं
जब लगी थी आग
कौन थे वो लोग जो नीरो के साथ थे
कौन थे रोम के साथ.

- ज़ीशान साहिल.

ज़ीशान के साथ मेरा परिचय इस कविता के ज़रिए हुआ था। चार-पांच साल पहले। ये अनुवाद तभी किया था। उससे पहले उनके समकालीन अफ़ज़ाल अहमद सैयद को पढ़ा था। पहल ने एक पुस्तिका जारी की थी, 'शायरी मैंने ईजाद की', उसमें। अफ़ज़ाल, ज़ीशान, सईदुद्दीन, सारा शग़ुफ़्ता ये सारे लगभग एक ही पीढ़ी के कवि हैं। सबने लिखने की शुरुआत सन 75 के आसपास की। आज़ादी के बाद की यह वह पीढ़ी थी, जिसने टूटे हुए सपनों के साथ तरुणाई में प्रवेश किया था। ये सपने पहले इश्‍क़ी ग़ज़लों में बदले, फिर ग़ुस्सैल नज़्मों में। ज़ीशान ने कराची को समर्पित कई कविताएं लिखी हैं। लेकिन ये नज़्में सिर्फ़ कराची की ही नहीं, उन सभी शहरों की हैं, जो कराची की तरह जी रहे हैं। ज़ीशान कहते भी हैं, ये कविताएं मेरी नहीं, मेरे घर, परिवार, मोहल्ले, शहर, देश और उससे बाहर रह रहे दुनिया के उन सभी लोगों की कविताएं हैं, जिनके घबराए हुए सपने वजूद के पन्‍नों से लापता हो रहे हैं।

पाकिस्‍तान पिछले कुछ समय से बराबर ख़बरों में रहा। वहां के मित्र कह रहे थे, उन्‍होंने हाल का सबसे डरावना दिसंबर देखा है, जिसके बारे में ख़बरें कम ही उछलीं। ये कविता बराबर मेरी स्‍मृति में आती रही। पिछले दिनों ज़ीशान से बात हो रही थी। कराची से फोन पर। पाकिस्‍तान के हालात पर भी बात हुई। मैंने इस कविता का भी जि़क्र किया। मैंने पूछा, रोम तो समझ में आ जाता है, ये बताइए, नीरो कौन है...

ज़ीशान हंसते हुए बोले, उसकी बांसुरी की आवाज़ मुंबई में भी गूंज रही है, दिल्‍ली में भी..., बस, हमें तय करना है कि हम किसके साथ होंगे, नीरो या रोम...
*****

20 comments:

बोधिसत्व said...

अच्छा है भाई...

Pratyaksha said...

बहुत सही !

mm said...

Badiya hi. well aapne bhi Blog bna he dala Badhai ho.

mm said...

Badiya hi. well aapne bhi Blog bna he dala Badhai ho.

Samartha Vashishtha said...

ज़ीशान की सुंदर कविता और उसके बाद अच्छी टिप्पणी। आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा।

Samartha Vashishtha said...

ज़ीशन की सुंदर कविता और उसके ऊपर अच्छी टिप्पणी। आपका ब्लॉग देखकर अच्छा लगा।

Ek ziddi dhun said...

शुरुआत से ही बड़ी उम्मीद जगा दी है आपने, नीरो हमारे घरों में घुस तो आए हैं...अफजाल की पहल वाली कविताओं का अनुवाद वीरेन डंगवाल जी ने किया था क्या? वो किताब मेरे पास थी, मोतोर्क्य्क्ले चोरी हुई, उसकी बैग में चली गयी...आप ब्लॉग की दुनिया में न रंगना यहाँ अपने ही रंग में रहना, सबको फायदा होगा...

Geet Chaturvedi said...

sabhi ka shukria. dhiresh, afzaal ko lekar pahal wala kaam Vijay Kumar ne kiya tha.

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

are bhaiya aapka bhi blog idhar hai..kya bat hai ji....

Arun Aditya said...

swaagat hai. itni achchhi shuruaat ke liye badhaai.

miHir pandya said...

Geet ji, yahan media wale bahut hain. hamein blog ki duniya me kahanikaar aur anuvadak Geet ki jyada zaroorat hai.
khushamdeed!!!

संजय.पुनीता said...

maja aa gaya. kya entry mari hai sir. bilkul punjabi style hai.

sanjay mishra

सचिन लुधियानवी said...

कसम उठवा लो मैं नहीं था
मैं तो तब भी सो रहा था और जीशान को याद कर रहा है कुछ इस तरह

ए परिंदो! किसी शाम उड़ते हुए
रास्ते में अगर वो नज़र आये तो
गीत बारिश का कोई सुनाना उसे
ए सितारो! यूं ही झिलमिलाते हुए
उसका चेहरा दरीचे में आ जाये तो
बादलों को बुला कर दिखाना उसे
ए हवा! जब उसे नींद आने लगे
रात अपने ठिकाने पे जाने लगे
उसके चेहरे को छू कर जगाना उसे
ख्वाब से जब वो बेदार होने लगे
फूल बादलों में अपने पिरोने लगे
मेरे बारे में कुछ न बताना उसे

Geet Chaturvedi said...

शुक्रिया सबका. संजय जी, अरुण जी, हरे, मिहिर. सचिन, यह भी ज़ीशान की ही नज़्म है. और इसका इस्‍तेमाल वहां प्रेमपत्रों में बहुत किया जाता है, ऐसा लरकाना का मेरा एक दोस्‍त बता रहा था.

योगेंद्र कृष्णा said...

स्वागत है भाई गीत जी, बधाई ।

सचिन लुधियानवी said...

गुरु अपन तो अभी भी प्रेमपत्रों वाली उमरिया में ही हैं सो नीरो तक नहीं पहुंचे बस परिंदो से ही बतिया रहे हैं.... उम्मीद है आपकी मुंबइया भाषा का छोंका भी ब्लॉग रंगों को गहरा करेगा... ब्लॉगिंग की खूबसूरती में चार "चांद" लगाएगा.... गुस्सा मत होइएगा यह चांद आपकी वाली नहीं है... वह तो पहले ही नुमायां है और क्या खूब दिख रही है... कान पकडी

Nandini said...

are waah ji. aapka bhi blog. ham ne to pehale kabi dekha hi nahi. par kavita bahut jordar di hai. aap likhte rahiye, ham ate rahengay.
nandini dubey

Nandini said...

aap valantine day wala lekh bhi apne blog par daliya na. hame bahoot pasand hai wo lekh. bhaskar me aya tha. us se net jagat ke log bhi labh paaenge padh pane ka. ham to kai din se blog duniya ke chhakker hi laga rahe hain.

सुभाष नीरव said...

पहली बार देख रहा हूँ आपका ब्लाग। बहुत सुंदर!

मनीषा पांडेय said...

Blog ki dunia me bahut-bahut swagat hai Geet. Aaj hi apka blog dekha. Most welcome.