Wednesday, July 23, 2008

रोशनी किस जगह से काली है


फाउंटेन से नरीमन पॉइंट तक पहली बार टैक्सी की थी। वह रास्ता पहले पैदल पसंद था। दोनों तरफ़ किताबें लगी होती थीं। दोस्त ने बताया, अब नहीं होतीं। अब क्या-क्या नहीं होता यहां पर? मुस्कराहट के अलावा कुछ नहीं लौटता।

लोग वैसे ही दौड़ते हैं, लेकिन उनकी हांफ की आवाज़ अब नहीं सुनाई देती। ज़्यादातर जाम और हॉर्न चीख़ते हैं। जहांगीर के बाहर हमेशा बारिश रहती है और छोकरों के स्केच गीले हो जाते हैं। खादी ग्रामोद्योग का बोर्ड उतर गया है और यह बिल्डिंग एलआईसी की है, जिसे अब सिटी बैंक के नाम से जानते हैं लोग। अब लोकल में चाथी सीट भी नहीं मिलती। महीने में एक भी फिल्म नहीं देख पाता। किताबें ख़रीदने जाओ, तो लगता है, फि़ज़ूलख़र्ची है। घड़ी इतनी बार ख़राब हो चुकी कि अब और ठीक कराने का मन नहीं करता।

और वह पीपुल्स बुक हाउस के सामने की चाय की दुकान?
वह भी वैसी ही है, लेकिन दस मिनट में उठा देता है वो।
वही जो पूछता था, आप राइटर हो क्या? हां बोलने पर स्पेशल चाय बनाता था?
नहीं, अब वह नहीं है। उसका बेटा बैठता है।

एशियाटिक की सीढि़यां?
वे तो बिछी हुई हैं, वैसे ही।
एक बूढ़ा दोस्त बैठता था न वहां? अस्सी-पचासी का था तब।
अब पता नहीं, कहां है। मराठी का कवि था। बहुत परेशान रहता था। पता नहीं, किन-किनको गालियां बकता था। एक दिन बोला, कविता बंद। फिर एक दिन- पीना बंद। फिर एक दिन- खाना बंद। फिर दिखा नहीं वह। मैं अभी भी सीढि़यों पर बैठता हूं।

मैंने सिगरेट सुलगाई और तीली समंदर में फेंक दी। लहरें सिर पटक रही थीं। मलाबार हिल की तरफ़ रोशनी जगमगा रही थी। यहां फुटपाथ बहुत चौड़ा हो गया था। स्मृतियों की फ़र्श से साफ़। लोग अनुशासित थे। जोड़े में बैठकर प्रेम करते थे।
बहुत दुखी था?
पांच साल से मैं उसे लगभग उन्हीं कपड़ों में देखता रहा। अभी भी दो रुपए वाली टिकटिक पेन से लिखता था। पेपर और किताब पढ़ने एशियाटिक आता था। कहीं से आया कोई और बोला- तेरी कविता मनुष्यविरोधी है। क्या पता, मज़ाक़ में कहा कि क्या, उसको सनाका लग गया। भवानी सरक गई उसकी। येड़ा। कविता लिखना बंद।
आप जिंदगी-भर लिखते रहो, कभी भी, कोई भी आएगा और आपको मनुष्य विरोधी कह देगा, सांप्रदायिक कह देगा, पूंजीवादी कह देगा, घटिया, ग़लीज़ और दो कौड़ी का कह देगा और कोई धीमा ज़हर आपकी नसों में उतार देगा। भवानी तो सरकेगी ही।

पूरा इलाक़ा चमकता है अब? मैंने पूछा।
हम्म।
सामने मलाबार हिल, उधर कफ परेड, इधर नरीमन पॉइंट। झकास है, नहीं क्या? रोशनी ही रोशनी?
यह सिर्फ़ रोशनी को देखने का समय नहीं है, यह देखो कि रोशनी किस जगह से काली है।
मुझे फ़ज़ल ताबिश और आंद्रेई वाइदा एक साथ याद आ गए। कोई मेलोड्रामेटिक बैकग्राउंड स्कोर नहीं।

यहां अब सेंगदाने वाले नहीं दिखते?
उसने कहा, समय हो गया। बीएमसी ने पूरा इलाक़ा साफ़ कर दिया है। स्वच्छ मुंबई। आइसक्रीम वाले भी नहीं। भुट्टे भी नहीं। समंदर के किनारे सेंगदाने नहीं, अजीब लगता है। तुमने देखा, यहां अब कबूतर भी नहीं हैं?
काफ़ी देर से वहां कुछ ग़ायब-ग़ायब लगता था। सच, वहां कबूतर नहीं थे। उनकी फड़फड़ाहट, उनकी गूं, दाना फेंकने वाले बुज़ुर्ग और शौकि़या, कुछ नहीं।
ये बिल्डिंग वालों को प्रॉब्लम होती है। कबूतर उनके यहां गंदगी कर देते हैं। तो उन्होंने रसूख़ चलाया। कबूतर ग़ायब। नरीमन पॉइंट साफ़-सुंदर, चौड़ा हो गया।
ऊंची बिल्डिंग की तरफ़ देखा। हर बाल्कनी में एसी था। कपड़े कम ही जगह सूख रहे थे। हवा लेने कोई खड़ा नहीं दिखता।

ये इलाक़ा कभी भी तुम्‍हारा नहीं था.
पर कबूतर हमारे थे, सेंगदाने... समंदर भले उनका था, लहरें हमारी थीं, पानी और पत्‍थर... ये सिर पटकना हमारा था... बैठना, खड़े हो जाना और टहलना हमारा था... एक दिन समंदर से पानी और पत्थर भी छीन लिया जाएगा... बैठना और हमारा टहलना भी...

फिर पता नहीं क्यों, वह बोला
ग़रीब लहरों पर पहरे हज़ार होते हैं
समंदर की तलाशी कोई नहीं लेता...
उसे समंदर में उछालने के लिए कोई कंकड़ नहीं मिला। आधी पी सिगरेट ही उछालते हुए बोला...
बोलो... भवानी सरकेगी कि नहीं?
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10 comments:

कुश एक खूबसूरत ख्याल said...

पढ़ते पढ़ते ना जाने किस प्रवाह में बह गया... बहुत सुंदर लिखा है आपने

vijaymaudgill said...

क्या बात है जी, मज़ा आ गया। चलिए कोई बात नहीं आप अख़बार में नहीं लिखते तो न सही, लेकिन हमारे पढ़ने के लिए और सीखने के लिए आपका ब्लाग ही बहुत है। क्योंकि हमें तो शब्दों की रवानगी चाहिए, जो हमें आप दे रहे हैं। बहुत-2 बधाई सच में बहुत खूब लिखा। सच कहूं तो अब रोशनी, रोशनी रही ही नहीं, वो तो पूरी की पूरी काली हो गई है और काली करने वाले लोग भी हम में से ही हैं। क्योंकि उनको क़ुदरत अच्छी नहीं लगती।

kalism said...

wah geet ji bahut achcha laga

Ashok Pande said...

उत्तम प्रवाहमान गद्य. अच्छा है. बहुत अच्छा.

Udan Tashtari said...

ग़रीब लहरों पर पहरे हज़ार होते हैं
समंदर की तलाशी कोई नहीं लेता...


--बेहद खूबसूरत...बहुत उम्दा...वाह!

Rajesh Roshan said...

इस लेखनी को कौन सी विधा कहूं, नहीं पता.. एक बात पता है, जबरदस्त लिखा है। एक दम हिलौरे लेती हुई, कभी सपाट सी तो कभी एक दम से अंदर धंस जाती है यह। बहुत ही बढि़या।

Ek ziddi dhun said...

`kaya janu, kya jadu hai...`

anurag vats said...

आप जिंदगी-भर लिखते रहो, कभी भी, कोई भी आएगा और आपको मनुष्य विरोधी कह देगा, सांप्रदायिक कह देगा, पूंजीवादी कह देगा, घटिया, ग़लीज़ और दो कौड़ी का कह देगा और कोई धीमा ज़हर आपकी नसों में उतार देगा। ...is takleef ko ukerna zaroori hai...is smirti-khand ke liye tatkaal sahi ki ye panktiyan yaad aa rhi hai...ek kaali chattan hai/jis pr betahasha dhara/apna sir patakti hai/ lekin hila nhin pati/sirf chattan rh-rh kar/dhul jati hai...patia pr likhne laut aaye aap...shukriya...

समर्थ वाशिष्ठ / Samartha Vashishtha said...

waah!

जितेन्द़ said...

अतीत ही है जो जीने के लि‍ए इंधन का काम करती है, साथ ही वर्तमान के बदलाव को परखने के लि‍ए यह एक औजार भी है। आपने यूं ही नहीं लि‍खा होगा- ये इलाक़ा कभी भी तुम्‍हारा नहीं था.
पर कबूतर हमारे थे, सेंगदाने... समंदर भले उनका था, लहरें हमारी थीं, पानी और पत्‍थर... ये सिर पटकना हमारा था... बैठना, खड़े हो जाना और टहलना हमारा था... एक दिन समंदर से पानी और पत्थर भी छीन लिया जाएगा... बैठना और हमारा टहलना भी...
ऐसे में कि‍सी की भी भवानी सरक सकती है !