Monday, March 9, 2009

सेब का लोहा

पत्थर भी अपने भीतर थोड़ी मोम बचा कर रखता है
ख़ुद आग में होता है बुझ जाने का हुनर
जब वह अपने आग होने से थक जाती है
गिरते हुए कंकड़ को अभय दे
अंगुल भर खिसक जाता है समुद्र एक दिन
सबसे हिंसक पशु की आंखों की कोर पर एक गीली लकीर
धीरे-धीरे काजल की तरह दिखने लगती है
सबसे क्रूर इंसान भी रोता है
और प्रार्थना में एक दिन उठाता है हाथ

पत्थर आग पानी और जानवर अभिनय नहीं जानते
मैं जानता हूं

मुझे सेब की फांक पर उग आया लोहा कह लो
या पहिए और पटरी के बीच से कभी फ़ुरसत से निकली चिंगारी
या तमाम माफि़यों से भरी वह प्रार्थना जिसका मसौदा सदियों से अपनी जेब में रखते आया
पढ़े जाने के माकूल वक़्त का इंतज़ार करते

जो कुछ छोड़े जा रहा हूं
क्‍या उसके बदले सिर्फ़ एक माफ़ी काम की होगी
जिसे पढ़ना होगा पुरखों नहीं संततियों के आगे
बताना होगा कि मेरी हथेलियां बहुत छोटी थीं
छिटकते समय को सहेज लेने के वास्ते

सिर्फ़ एक रास्ता काफ़ी नहीं इस जगह से घर को
सिर्फ़ एक जड़ से नहीं मिला छतनार को जीवन
सिर्फ़ एक बार नहीं बना था परमाणु बम
सिर्फ़ एक अर्थ से नहीं चलता रोज़गार शब्‍दों का
सिर्फ़ नीयत ही काफ़ी नहीं होती हर बार
बिना चले गठिया का पता नहीं चलता

मैं भय विनाश भूख और त्रासदी से निकला हूं
सिर्फ़ एक अनुभव से नहीं समझा जा सकता जिन्हें
सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाक़ू नहीं बनता

कोई आता है हांक लगाता पुकारता मेरा नाम
एक उबासी से करता हूं उसका स्वागत फिर ढह जाता हूं
एक दिन वह बना लेता है उपनिवेश
मेरी देह और दिमाग़ के टू-रूम फ़्लैट में
फिर छिलके-सा उतार दिया जाता हूं
किसी आरोप या बिना किसी आरोप के

मेरी राजनीतिक उदासीनता राजनीतिक नासमझी में बदल जाती है
हर इच्छा एक नागरिक उदासीनता की तरफ़ ले जाती है

शरीर में लोहे की कमी है सड़कों और खदानों में नहीं
इसीलिए अपने हिस्से का सेब कभी नहीं फेंकता मैं
थोड़ा-सा मनुष्य भी है मुझमें
जो सदियों पुरानी धुनों पर गाता है भ्रम के गीत

कोई और रहता है मेरे भीतर
जो लिखता है कविता या गाता है
जब वह मेरे सामने आता
मिलता नहीं कोना जहां अकेले बैठ थोड़ी देर सचमुच रो सकूं मैं
अभिशप्‍त भटकता हूं
जैसे लिखे जाने से पहले खो गई किसी पंक्ति की तलाश में
तभी झमाझम बरसती हैं स्मृतियां
भूल जाता हूं पिछली बार कहां रख छोड़ा था छाता

शब्‍द के उच्चारण या नाद से निकली सृष्टि में
क्‍यों बार-बार भूल जाना कि
इतिहास से पहले भी जीवन था
बोली जाने वाली भाषा से पहले समझी जाने वाली
उससे भी पहले एक आंसू उससे भी पहले एक पीड़ा
उन्हीं के अवशेषों की भाषा लिखता हूं

मुझको पढ़ना बार-बार पढ़ी जा चुकी किताब-सा आसान नहीं
मेरा हर व्यवहार एक विचार है
हर हरकत एक इशारा
मैं आधी समझी गई पंक्ति हूं
अभी आधा काम बाक़ी है तुम्‍हारा

(पूर्वग्रह में प्रकाशित)

22 comments:

Arun Aditya said...

अद्भुत, हमेशा की तरह।

अंशुमाली said...

कविता पसंद आई गीतजी।

vijay gaur/विजय गौड़ said...

kavita purvgrah mai padh lee thi jeet ji. dubara se padhna bhi achha laga. sundar hai. badhai.

शिरीष कुमार मौर्य said...

गीत तुम्हारी इधर की कविताओं में वो दिखाई देने लगा है जिसे पुरानी हिंदी में "प्रगीत" कहते हैं। क्या खयाल है? यह कविता पहले भी कई बार पढ़ी है - अच्छी कविता है।

Ashok Pande said...

अच्छी कविता. बहुत दिनों बाद कुछ पढ़वाया आपने. थैंक्स!

Bahadur Patel said...

मैं भय विनाश भूख और त्रासदी से निकला हूं
सिर्फ़ एक अनुभव से नहीं समझा जा सकता जिन्हें
सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाक़ू नहीं बनता

geet bhai yah poori kavita behtareen hai.
pahali bar to ise aapase gwalior me sangaman me pwa ki kavya goshthi me suna. bahut achchha paath kiya tha.
doosari baar ise purvagrah me padha to padhane me aanand aya.
aur aaj yahan padhane aur dekhane me tiguna anand aaya.
dhanywaad.
badhai.

Geet Chaturvedi said...

ख़्याल का ही तो पता नहीं चल रहा, शिरीष.
शुक्रिया, पसंद आई.
अरुण जी, अंशुमाली जी, अशोक जी, विजय जी और बहादुर जी, आप सभी का धन्‍यवाद.

मोहन वशिष्‍ठ said...

सर जी बहुत ही अच्‍छी और प्रभावशाली कविता लिखी है आपने आपका कोई सानी नहीं है मेरा सलाम आपकी खिदमत में

होली पर्व की आपको और सभी आगंतुकों को परिवार सहित हार्दिक शुभकामनाएं

vipin choudhary said...

beautiful poem

Bahadur Patel said...

आपको और आपके परिवार को होली मुबारक

दर्पण साह 'दर्शन' said...

सेब की फांक पर उभरे लोहे से चाक़ू नहीं बनता
adbhoot....

मोना परसाई "प्रदक्षिणा" said...

"मुझे सेब की फांक पर उग आया लोहा कह लो"
मर्मस्पर्शी संवेदनाओं और गहरे प्रतीकों ने रचनाको सार्थक अर्थ प्रदान किया है .

महेन said...

कल से कई बार पढ़ चुका हूँ

vijaymaudgill said...

गीत जी। मैं क्या कहूं आपसे कविता के बारे में। समझ में नहीं आ रहा।
पता नहीं क्यों जब भी आपकी किसी रचना को पढ़ता हूं तो गुम सा हो जाता हूं। ये सोचने पर मजबूर हो जाता हूं कि आप क्या हो। कितना कुछ चलता रहता है आपके अंदर। आपकी हर रचना मुझे पता नहीं कहां से कहां ले जाती है।
आप मुझे डिस्टर्ब करते हो। हा हा हा....

मुझको पढ़ना बार-बार पढ़ी जा चुकी किताब-सा आसान नहीं
मेरा हर व्यवहार एक विचार है
हर हरकत एक इशारा
मैं आधी समझी गई पंक्ति हूं
अभी आधा काम बाक़ी है तुम्‍हारा

धन्यवाद रचना पढ़वाने के लिए

कुमार अम्‍बुज said...

दरअसल, यहाँ कमेण्‍ट करना कुछ अधूरा कहना है। बल्कि एक सूचना ही देना है इसलिए कई बार उतना उत्‍साह नहीं होता जितना होना चाहिए।

बहरहाल, तुम्‍हारी यह कविता तुम्‍हारी अब तक की कविताओं से कुछ आगे है। एक अच्‍छी कविता में इतनी सारी धातुओं,वनस्‍पतियों, आवाजों और अज्ञात तत्‍वों का मिश्रण होता है कि उसका विश्‍लेषण करना अंतत: हास्‍यास्‍पद कवायद हो सकती है।

शायद तुम याद रखना चाहोगे कि तुम सबसे पहले एक कवि हो। शुभकामनाएं।

anupsethi said...

प्‍यारे गीत,

कुमार अंबुज जी की बात ठीक है. यहां यही दर्ज हुआ समझो कि कव‍िता पढ़ी.

मैं पंक्ति पंक्ति पढ़ता जाता हूं. शब्‍द श्‍ाब्‍द पर टिकता जाता हूं. द्वार की तरह खुलते जाते. जाता, चला जाता, चला ही जाता, शुरुआत से भी पहले, अंत के भी बाद. अपना सारा रग रेशा धो निचोड़ कर सूखने डाल दूं. आंख मूंद कर बैठूं जब तुम कव‍िता सुना कर शब्‍दों से बाहर निकलो.

प्रदीप कांत said...

पत्थर भी अपने भीतर थोड़ी मोम बचा कर रखता है
ख़ुद आग में होता है बुझ जाने का हुनर
जब वह अपने आग होने से थक जाती है
गिरते हुए कंकड़ को अभय दे
अंगुल भर खिसक जाता है समुद्र एक दिन
सबसे हिंसक पशु की आंखों की कोर पर एक गीली लकीर
धीरे-धीरे काजल की तरह दिखने लगती है
सबसे क्रूर इंसान भी रोता है
और प्रार्थना में एक दिन उठाता है हाथ

- लम्बी किन्तु एक अच्छी कविता हालांकि ज्यादा विश्लएशण अखर रहा है.

Geet Chaturvedi said...

अंबुज जी, अनूप जी, आप दोनों का शुक्रिया. यह दर्ज होना भी काफ़ी है.
प्रदीप जी, विजय, महेन, मोहन, मोना जी, विपिन जी और दर्शन जी का भी आभार कि पढ़ी.

pratibha said...

Bahut sundar kavita. Sachmuch Abhinay to ham jante hain na pathar] na samandar, na aag, na kroor pashu. we sab sahaj hain sirf ham nahi. Badhai.

vinay vaidya said...

इस कविता को पढ़ने के बाद आपका लोहा मानना पड़ेगा ।

shahbaz said...

hamesha ki trh behtreen, adbhut, vilakshan, 2 4 pnktiyon mein vishleshan qatyi sambhav nahi hai..... shukriyaa itni achhi kavita padhwane ke liye

स्वप्नदर्शी said...

शुक्रिया इतनी अच्छी कविता साझा करने के लिए!