Saturday, December 19, 2009

फिर कविता के बारे में


पिछली पोस्‍ट पर कुछ बातें उठी हैं, उनके बारे में अपनी राय जल्‍द ही; इस बीच पोलिश कवि चेस्‍वाव मिवोश का एक टुकड़ा, जो कि उनकी किताब 'न्‍यू एंड कलेक्‍टेड पोएम्‍स: 1931-2001' (संस्‍करण : 2003) की प्रस्‍तावना से लिया गया है.


I strongly believe in the passivity of a poet, who receives every poem as a gift from his daimonion or, if you prefer, his Muse. He should be humble enough not to ascribe what is received to his own virtues. At the same time, however, his mind and his will should be alert. I lived amidst scenes of horror in the twentieth century-- that was a reality and i could not escape into a realm of  'pure poetry' as some descendants of French symbolism advised. Yet our hot-blooded reactions to inhumanity rarely result in texts artistically valid, even if such poems as my 'Campo dei Fiori', written in April 1943 in Warsaw when the ghetto was burning, continue to have some value.

I think that effort to capture as much as possible of tangible reality is the health of poetry. Having to choose between subjective art and objective art, I would vote for the latter, even if the meaning of that term is grasped not by theory but by personal struggle. I hope that my practice justifies my claim.

The history of twentieth century has prompted many poets to design images that conveyed their moral protest. Yet to remain aware of the weight of fact without yielding to the temptation to become only a reporter is one of the most difficult puzzles confronting a practitioner of poetry. It calls for a cunning in selecting one's means and a kind of distillation of material to achieve a distance to contemplate the things of this world as they are, without illusion. In other words, poetry has always been for me a participation in the humanly modulated time of my contemporaries.

(Photo by Judyta Papp, Krakow 2002)

10 comments:

अजित वडनेरकर said...

मुझे अंग्रेजी की समझ नहीं है। फिर भी हिमाकत पढ़ने की है। ... और वह भी आप जैसे धुरंधर के ब्लाग पर आकर कवि के कथ्य को समझने की चेष्टा!!!
ये पंक्तियां-
I lived amidst scenes of horror in the twentieth century-- that was a reality and i could not escape into a realm of 'pure poetry' as some descendants of French symbolism advised.
समझ में आईं।

Amit said...

गीत भाई,
अजित भईय्या से पुर्णतः सहमत / wikipedia में कवी की obituaries से काफी जानकारी मिली,इस टुकड़े के करीब सारे reference मिल.milosz के बार मे काफी जानकारी मिली...गुनाहगार आप होे.इस टुकड़े को मेरा heading है "अंतर-्द्वंद्व" / गौतम बुद्ध हमेशा मूर्ति पूजा के खिलाफ थे लेकिन सब से बड़ी विडम्बना यही है की उनके बाद उनकी भी मूर्ति बना दी गयी.यही हाल milosz़ का भी लगता है,history के खिलाफ थे ,कविओं को tuners कहते थे ,फिर भी भाई लोग उनको हिस्टरी की तरह पढ़ रहे है / गीत भाई,objective and subjectiveे में फर्क समजह नहीं आया मुजहे.

pratibha said...

poetry has always been for me a participation in the humanly modulated time of my contemporaries...

pratibha said...

poetry has always been for me a participation in the humanly modulated time of my contemporaries...

Anonymous said...

बोल्‍ड ब्‍लेक पंक्‍तीयां पहले की पोस्‍ट में उठे प्रश्‍नों का उत्‍तर तो नही । बहुत शातिर है आप

अशोक कुमार पाण्डेय said...

जवाब तुमने अपनी स्टाईल में दिये /दिलवाये हैं। लम्बी कहानी वाले सवाल पर भी तुम निर्मल को ला चुके हो। ख़ैर

देखो यहां तक मुझे भी कोई शक़ नहीं कि कविता अंततः एक कला फ़ार्म है। निश्चित तौर पर उस टुकडे को सबसे पहले कविता होना चाहिये। लेकिन अगर वह समाज की बेहतरी, एक विकल्प के निर्माण जैसे कार्यभारों का हिस्सा बनना चाहती है तो उसे सिर्फ़ असहमति की मिमियाहट या कोई टेपेस्ट्री जैसा रचने ( शायद अमेरिका के संदर्भ में नोबेल लेते समय हेराल्ड पिंटर ने टेपेस्ट्री आफ़ लाईज़ का इस्तेमाल किया था क्या हम टेपेस्ट्री ओफ़ असहमति रच रहे हैं…इतनी उलझाव भरी, महीन,नाज़ुक कि…) से आगे जाना होगा।

दरअसल मेरा साफ़ मानना है कि सामाजिक-राजनैतिक आलोडनों के बिना जनता की चेतना के स्तर का उन्नयन नहीं हो सकता और न ही कविता (ख़ास तौर पर तथाकथित विरोध और विकल्प की कविता) की ग्राह्यता का विस्तार। ज़मीन से जुडने जैसा क्लीशे नहीं अपनाऊंगा लेकिन इतना तो ज़रूर है कि अगर आप वाकई व्यापक असहमति की कविता लिख रहे हैं तो वह शून्य से नहीं उपजेगी।

लेकिन यह सब सिर्फ़ उन कविओं के लिये जो वाकई सामाजिक-राजनैतिक प्रतिबद्धता की कविता लिखना चाहते हैं। जिन्हें इतिहास में अमर और वर्तमान में सर्वत्र आदरणीय होना है वे जितनी महीन नक्काशी करेंगे उतने महान होंगे और व्यवस्था को स्वीकार्य। अब ये कहूंगा तो मुस्करायेंगे भाई लोग ( कि साले तुम से पाकिस्तानी कवि का भी कोट न लाया गया, इंग्लैण्ड अमेरिका का कहां से लाओगे) - तय तो करना ही है कि आपकी पालिटिक्स क्या है।

anurag vats said...

ashokji ki baton se yah dhwanit hota hai ki we kavita ke zariye wyakt chintaon ke prati jitne asawdhan hain, utna hi unmen aaye gestures ko lekar utsahit...yh kavita ko kuch km karke padhne kii wajah se zyada hota hai, bjay ki use km samjhne ke!...milosz ki yh pankti shayad unhen kuch vipreet prerna de...''our hot-blooded reactions to inhumanity rarely result in texts artistically valid''...

कामता प्रसाद said...

अशोक जी से अपनी भी पूरी सहमति बनती है कि जनपक्षधर कविता शून्‍य से नहीं पैदा होती।
शेष कहा सुना जा चुका है। विंडो7 डालिये तो ब्‍लॉग्‍स के लिए और खूबसूरत यूनीकोड फोंट्स मिल जाएंगे।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

अनुराग जी कविता की समझ की मेरी सीमा ज़रूर हो सकती है। पर निश्चित तौर पर मै कविता के ज़रिये व्यक्त असहमतियों से कतई असहमत नहीं , चिंतायें अगर व्यक्त नहीं होंगी तो क्या होगा? परंतु मेरी चिंता यह है कि जब कविता में यह सब इतना धीमे से, इतना नक्काशीपूर्ण तरीके से और इतना छुपछुपा के आता है कि पढने वाले के लिये असहमतियों और चिन्ताओं से ज़्यादा मत्वपूर्ण वे नक्काशियां हो जाती हैं, कानों और दिमाग़ तक वे चिंतायें पहुंचती ही नहीं तो कवि के असली सरोकार पर सवाल उठता ही है।
मै हाट ब्लडेड रिएक्शन की बात नहीं कर रहा, पर रिएक्शन तो हो? और आर्टिस्टिकली वैलिड तेक्स्ट से ज़्यादा मैं सोशियो पोलिटिकली वैलीड टेक्स्ट पर विश्वास करता हूं। कोई एसा वैलिडिटी टेस्ट नहीं है जो समय-समाज-राजनीति निरपेक्ष हो।

Amit said...

geet bhai,

nayi post kab lagaoge ?