Monday, June 13, 2011

कुछ कांच हैं, कोई आईना...






Iwona Siwek Front. Krakow. Poland.
कुछ इंसान कांच की तरह होते हैं। उनके सामने खड़े हो जाएं, तो उनके पार का सब कुछ दिखाई देता है। पारदर्शिता का चरम है यह।

और कुछ लोग आईने की तरह होते हैं। उनके सामने खड़े हों, तो पार का कुछ नहीं दिखता। जो दिखता है, वह आपका ही प्रतिबिंब होता है।

दोनों का मूल तत्व कांच ही होता है, लेकिन वे अपने व्यक्तित्व के साथ कुछ ऐसे प्रयोग कर लेते हैं, कि उनका व्यवहार बदल जाता है। हम अक्सर उन लोगों का खोज रहे होते हैं, जिनके पार का सब कुछ साफ-साफ दिखाई दे रहा हो। हम अपनी छवि से सबसे ज्यादा प्रेम करते हैं, आईने में खुद को देखना पसंद भी करते हैं, लेकिन बोलता हुआ आईना तकलीफदेह स्थितियों में डाल देता है। इसलिए संभव है कि ज्यादातर लोग उन लोगों से दूर भागते हैं, जो उनके लिए आईने जैसा काम करते हों। 

दोनों श्रेणियों में से श्रेष्ठ कौन है, यह सब तो देखने वाले की मन:स्थिति और उद्देश्य के हिसाब से बदलता रहता है।  एक ऐसा व्यक्ति, जो आपकी नज़र को दूर तक यात्रा करने का मौक़ा दे और दूसरा व्यक्ति जो आपकी नजरों को परावर्तित कर दे, उसे वापस आप ही तक भेज दे!

जीवन में कुछ स्थितियां ऐसी आती हैं, जब आपको आईने जैसे लोग पसंद आते हैं। वह महत्वपूर्ण समय अपनी खोज का होता है। कुछ कहानियों में या प्रेरक प्रसंगों में पढ़ा है कि फलां व्यक्ति ने मुझे बताया कि मैं क्या चीज़ हूं, अगर वह नहीं होता, तो मुझे कभी पता ही नहीं चलता कि मेरे भीतर कितनी संभावनाएं थीं। यानी किसी एक व्यक्ति ने उनके जीवन में आईने का काम किया। आपको अपने जीवन में ऐसे ज्यादा लोग नहीं मिल सकते। पर जब भी मिलेंगे, वे आपको ख़ुद को पहचानने में मददगार साबित होंगे।

कांच की तरह पारदर्शी लोग आपको हर जगह मिलेंगे। दरअसल, उनका होना भी आपके लिए बहुत जरूरी है, क्योंकि जैसे, आईने आपको बताते हैं कि आप क्या हैं, उसी तरह कांच आपको बताते हैं कि दुनिया क्या है। जब आप उनके सामने खड़े होते हैं, तो उनके पार एक पूरी दुनिया दिख रही होती है। उसमें अच्छा-बुरा, सही-गलत सब होता है। वे एक दृश्य बनाते हैं। उस दृश्य में उसका पूरा अब तक का सफर होता है, जीवन के वे हर पहलू होते हैं, जिन्हें आप उसके ज़रिए देख रहे होते हैं।

जिंदगी सवालों की आकाशगंगा है, लेकिन दो ही सवाल ऐसे होते हैं, जिनके भीतर हर जवाब की चाभी छुपी होती है। पहला सवाल है- मैं क्या हूं? और दूसरा सवाल है- जो मैं नहीं हूं, वह क्या है? यानी मेरे इतर जो भी कुछ मेरी दृष्टि के दायरे में आ रहा है, वह सब क्या है? पहले सवाल का जवाब आपको आईने जैसा व्यक्ति देगा। दूसरे सवाल का जवाब आपको कांच जैसे व्यक्ति के पार देखने पर पता चलेगा। हालांकि पार के उस दृश्य में आपको जो भी दिख रहा होगा, उसे पढऩे की क़ूवत आपको आईने जैसे व्यक्ति से ही मिलेगी।

यानी दूसरे जवाब को पाने का रास्ता भी वही बताएगा, जिसने आपको पहले का जवाब दिया है। बस, दृश्य कोई और उपस्थित करेगा। अगर आपको पहले सवाल का जवाब नहीं पता, तो दूसरे का जवाब कभी नहीं पता चलेगा। आप अंधकार को तभी पहचान सकते हैं, जब आपने प्रकाश का अनुभव किया हो। वरना सारी दुनिया तो एक जैसी ही है। हमारी प्रवृत्ति होती है कि हम पहले सवाल से भागते हैं और दूसरे सवाल का जवाब तुरंत पा लेना चाहते हैं। दूसरे सवाल का जवाब आपको भौतिक जगत में तुरंत बड़ी सफलता दे देता है, इसीलिए अगर उसकी ओर आकर्षण ज्यादा हो, तो स्वाभाविक ही है। अगर कोई हमें यह अहसास करा दे कि हम क्या हैं, तो हम उससे विमुख होने लगते हैं। इसीलिए हम आईनों से दूर भागते हैं और पारदर्शी कांच के पार देख लेने का हुनर तुरंत अपने भीतर पैदा कर लेना चाहते हैं। खुद को समझने और जिंदगी को समझने की राह में इससे बड़ी भूल कोई और हो सकती है क्या? अब आप ही बताइए।

(2 अप्रैल 2011 को दैनिक भास्‍कर में प्रकाशित.)



11 comments:

देवेन्द्र पाण्डेय said...

व्यक्ति का स्वभाव होता है कि जो हमें आईना दिखाता है हम उसको पूरी तरह जान लेना चाहते हैं। असरकारी भी वही आईने होते हैं जो खुद पारदर्शी होते हैं। यह अलग बात है कि ऐसे आईने दुर्लभ होते हैं।

निवेदिता said...

पहली बार आपको पढ़ा ,बहुत अच्छा लगा ...
शायद पारदर्शी काँच की तुलना में लोग आईना नहीं देखना चाहते ,क्योंकि अपनी कमी देखना कौन चाहेगा ...... आभार !

Neelesh Pandey said...

बहुत बढ़िया गीत भाई. पढ़कर मज़ा आ गया. मुंबई की जुबां में इसे "झक्कास" कहते हैं. मुझे यदि आपत्ति है तो वो आखिरी लाइन से जहाँ आपने लिखा है की "खुद को समझने और जिंदगी को समझने की राह में इससे बड़ी भूल कोई और हो सकती है क्या? अब आप ही बताइए।" . मेरा मानना है की ज़िन्दगी को समझना इस ब्रम्हांड को समझने जैसा है. आपकी आज की समझ कल गलत हो जाती है. सब कुछ "Relative" होता है. शायद इस ब्रम्हांड में कुछ गलत नहीं है और कुछ सही नहीं है. सब कुछ वक़्त के साथ बदल जाता है....ठीक ब्रम्हांड की तरह जो हर पल बदलता रहता है. :)

Raj said...

क्या उम्दा नजरिया ...
बहुत सुन्दर ...
गुज़रा जितनी बार आपके द्वार(ब्लॉग) से ,
झुक जाता है शीश स्वयं आभार से|
आभार........

abcd said...

कल रात उसे कत्ल कर दिया गया यारो /
सुना है वो शहर मे आइने बेचता था //

sumeet "satya" said...

लेकिन अगर शीशे के सामने पारदर्शी कांच को रख भी दिया जाये तो भी तो कुछ नहीं ही दिखेगा

sumeet "satya" said...

लेकिन बेहद उम्दा लेख

ChandraPrakash said...

PAHALI BAR PADHANE KA AWASAR PRAPT HUA, ATYANT HI PRABHAWIT KIYA AAP K LEKH NE,
EK VASTU ROJ MARRA K JIWAN ME HAMESA UPAYOG AATI HAI,USAKE MADYAM SE BRAHMND K SABASE BUDHDHAJIVI VARG KO AAP NE HARA KR USE SUCH ME AAINA DHIKHA DIYA,,,,,,,,,,,,

KISHORE DIWASE said...

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विजय गौड़ said...

पारदर्शी होना आईने की पहली शर्त है। कम से कम उस सतह का तो जरूर ही जो आईना होना चाहती है। सिर्फ़ पारदर्शी होने भर से ही काम फिर भी बनता नहीं। सतह की एकरूपता जो माइक्रोन के कईयों हिस्से को साधने वाली हो, उसकी अनुपस्थिति में तो बेढ़गी तस्वीर दिखाने वाला आईना शायद किसी को भी न भाये। खैर अभी यही कि यथार्थ उतना ही नहीं जितना हम देख रहे होते हैं- पेड़ों के हिलने के साथ कांपते पत्तो से हवा बहती है या कि हवा के बहने से पत्ते कांपते हैं ?

डिम्पल मल्होत्रा said...

जो कांच जैसे लोग होते है वो लोग दोस्त होते है..