Sunday, October 17, 2010

धरती पर सबसे अजनबी चीज़






क्या कभी हवा आकर मुझसे कहती है कि मानो, मैं बह रही हूं। मेरे अस्तित्व को मान लो। मेरे महत्व को भी। कभी वह पूछती है कि देखो, मेरे भीतर पानी के कण भी मौजूद हैं, तुमने देखा है कभी? कभी पानी ही आकर यह पूछता है कि मेरे भीतर भी हवा है, जानते हो? 

रात में पेड़ अपनी छांव कहां दे आते हैं? बचाकर रखते हैं? उन पेड़ों के लिए जो अपने पत्तों से विरत हो चुके हैं? 
ऐसे ही आत्मा आकर कभी नहीं बताती।

कहीं पढ़ा था कि आत्मा इस धरती पर सबसे अजनबी चीज़ है।

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एक बार नबोकोव एक क्लास में थे। टॉल्स्टॉय पर उनका लेक्चर था। वह बार-बार समझाना चाह रहे थे कि टॉल्स्टॉय का एसेंस क्या है। तभी उन्होंने क्लास की खिड़की के परदों को हटा दिया। तेज़ रोशनी भीतर आई। कमरा पूरी तरह रोशन हो गया। नबोकोव ने कहा, एग्जैक्टली, मैं यही बताना चाहता था, टॉल्स्टॉय यही हैं। अचानक आई इस रोशनी की तरह।

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एक फिक्शन राइटर के तौर पर हमें यह कोशिश कभी नहीं करनी चाहिए कि हम अपने कैरेक्टर्स के साथ सिम्पैथी का खेल खेलें। लिखते समय सहानुभूति से दूर रहें। यह पाठक का औज़ार है। 

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जब आप नहीं लिख रहे होते, तब आप क्या कर रहे होते हैं? मैं ज़्यादातर समय नहीं लिख रहा होता। ज़्यादातर मैं पढ़ रहा होता हूं, संगीत सुन रहा होता हूं, कोई फिल्म देख रहा होता हूं या यूं ही नेट सर्फ कर रहा होता हूं। मैंने पाया है, ईमानदारी से, कि जिन वक्तों में मैं नहीं लिख रहा होता, वह मेरे लिए ज़्यादा महत्वपूर्ण है, क्योंकि असल में मैं उन्हीं वक्तों में लिख रहा होता हूं।

जब फिलिप ग्लास की आठवीं सिंफनी सुन रहा होता हूं, तो दरअसल, मैं खुद उस सिंफनी की रचना कर रहा होता हूं। इस तरह मैं खुद फिलिप ग्लास बन जाता हूं। जब मैं प्रैसनर को सुन रहा होता हूं, तो किस्लोवस्की बन जाता हूं। मैं उसके सिक्वेंस पढऩे लगता हूं। 

हर कला के मूल में संगीत है। बिना संगीत के किसी कला का अस्तित्व नहीं। सृष्टि चाहे ओम के नाद से बनी हो या बिग बैंग से, वह साउंड ऑफ म्यूजि़क ही रहा होगा।

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अच्छी चीज़ों का सबसे बड़ा गुण या अवगुण यह है कि आप पर उसका कोई भी असर पड़े, उससे पहले वह आपको भरमा देती है। अच्छी कविता तो सबसे पहले भरमाती है। वह आपके फैसला करने की क्षमता को कुंद करती है और फैसला देने की इच्छा के लिए उत्प्रेरक बन जाती है। वह तुरत आपके मुंह से यह निकलवाती है- यह क्या बला है भला? ऐसा कैसे हो सकता है? फिर वह धीरे-धीरे आपमें प्रविष्ट होती है। यही समय है, जब आपकी ग्रहण-क्षमता की परीक्षा होनी होती है। आप उसे अपने भीतर कितना लेते हैं, इसमें अच्छी रचना का कम, आपका गौरव ज़्यादा होता है। अगर आपको अच्छी चीज़ों की अच्छाई की ऐतिहासिकता का भान पहले से न हो, यानी उसे पढऩे-सुनने-देखने से पहले आपको यह पता न हो कि इसे समय ने बहुत अच्छे की श्रेणी में रखा है, तो आप  नाक सिकोड़ेंगे। उसकी अच्छाई का ज्ञान आपको उसे स्वीकार करने में मदद तो करता है, लेकिन हम कभी यह नहीं पता कर सकते कि उसे अच्छा माने जाने की प्रक्रिया उसे रचने की प्रक्रिया से भी ज़्यादा श्रमसाध्य रही होगी। 

बाज़ दफा, आप कई बार बिना किसी श्रम के भी चीज़ों को अच्छा मान लेते हैं, ऐसा भी होता है।

सही समय पर दी गई दाद, राग और आलाप की श्रेष्ठता से ज़्यादा, श्रोता के संस्कारों का परिचायक होती है।

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बनैलापन क्या होता है? वाइल्डनेस? किसी को जंगल का शेर वाइल्ड लग सकता है, तो किसी को जंगले में बंद शेर। आर्ट में टेम्ड वाइल्डनेस को ज़्यादा एन्ज्वॉय किया जाता है, क्योंकि वह उपस्थित में है, दृश्य के बीच है, यानी सभ्यता के बीच एक निश्चित परिमाण में। 

अगर आपके पास अनटेम्ड वाइल्डनेस है, तो उस पर ध्यान ही नहीं दिया जाएगा। उल्टे यह पूछा जाएगा कि वाइल्डनेस तो है ही नहीं। जंगल आपको तभी वाइल्ड लगेगा, जब आप शहर में खड़े होकर उसके अनुभवों के आधार पर जंगल को देखेंगे। जंगल के बीच रह रहे हों, या जंगल ने आपको अपने भीतर पूरी तरह समो लिया है, तो आप उसे वाइल्ड नहीं मानेंगे। 

यह जंगल की सफलता है।

वाइल्डनेस एक मांग होती है। एक उम्मीद और एक अवधारणा। मेरी पारिस्थितिकी में मेरी सहजता, आपकी अवधारणाओं के उलट एक नई अवधारणा बना देती है।

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अव्यवस्था के दबाव के बिना व्यवस्था की निर्मिति नहीं होती। इसलिए अव्यवस्था ऐतिहासिक अर्थों में उदात्त है। 

एक कहानी में मैं बहुत सारी चीज़ों को ले आया और उनसे बची बहुत सारी चीज़ों को मैंने बाहर रख दिया। या वे बाहर छूट गईं। असल दबाव उन बाहर छूट गई वस्तुओं का है। कहानी के भीतर बहुत सारी जगह है, लेकिन कहानी के बाहर तो कोई जगह है ही नहीं। इसे पृथ्वी और अंतरिक्ष के संबंध की तरह लिया जाए। अंतरिक्ष अनंत है, एटर्नल स्पेस, पर वहां उन चीज़ों के लिए कोई स्पेस नहीं है, जो पृथ्वी पर हैं। जो पृथ्वी पर टिकी हैं, वे पृथ्वी के गुरुत्व बल के कारण। इसी तरह कहानी का भी एक गुरुत्व बल है, जो चीज़ों को रोक लेता है, पर कहानी के बाहर चीज़ें भटक रही हैं और वे ज़्यादा हैं और वे एक निर्वात में हैं, नॉन-स्पेस में। 

वे चीज़ें लगातार आपके दरवाज़े खटखटाती हैं। और जितनी बार वे दस्तक देती हैं, कहानी के भीतर व्यवस्था मज़बूत होती जाती है। 

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कई जगहों पर पहली बार जाते ही सोच लेता हूं कि यहां दुबारा जाऊंगा। मुझे पता होता है, पहली बार में मैं उस जगह को नज़र-भर भी देख ना पाऊंगा। इसी तरह कई लोगों से पहली मुलाकात के वक्त ही सोच लेता हूं, इनसे दूसरी मुलाकात में बात करूंगा। पहली मुलाकात अक्सर चुप्पी, झिझक और संकोच से भरी होती है। कई लोगों से, कई जगहों से हर मुलाकात ऐसी ही होती है।

(पुरानी टीपें. चित्रकृतियां : अल्‍बेर्तो सावीनियो)


15 comments:

शरद कोकास said...

बढ़िया टीप है गीत भाई .. एंजॉय ।

शिरीष कुमार मौर्य said...

गीत प्यारे ज़ोरदार....

घनश्याम कुमार 'देवांश' said...

bahut accha laga padhkar....ek sath kai bhaavbhoomiyon ka sparsh!!!!!

विमलेश त्रिपाठी said...

बेहद प्रभावशाली....

anurag vats said...

precise and prolific.

मनीषा पांडे said...

सुंदर, बहुत सुंदर। कितना प्‍यारा लिखा है।

Geet Chaturvedi said...

सारे मित्रों का शुक्रिया.

हरे प्रकाश उपाध्याय said...

kya bat hai...

डॉ .अनुराग said...

अभी "मै वह हूं जो तुम्हारे बाए जगती है हर सुबह" के हेन्गोवर से नहीं निकल पाया था सर जी........ओर फिर ये ......

kailash wankhede said...

kahan kahan le gaye aap,,,,bahti nadi ki dhar me paya khud ko,,manmohak rachna.

Geet Chaturvedi said...

शुक्रिया अनुराग जी, पसंद करने के लिए. कैलाश और हरे का भी शुक्रिया.

देवेन्द्र पाण्डेय said...

सुंदर दर्शन।

स्वप्निल कुमार 'आतिश' said...

der lag gayi is blogh tak aane me.... anurag jee kee charcha ne yahaan laa chhoda...dil hai ki jane ko man nahi raha..isliye follow kar raha hun blog... behad shandaar dimaagi khurak hai yahaan .....

रंजना said...

उफ़....लाजवाब कोट...सभी अनमोल मानिक से,जिन्हें सहेज कर अपने पास रख लेना है...

किन शब्दों में आभार और अनुभूति व्यक्त करूँ ..समझ नहीं पा रही..

सुशीला पुरी said...

वाह !!!