Friday, November 12, 2010

आदत बदस्‍तूर





लिखने की आदतें के बाद कुछ मित्रों की चाह थी कि मैं अपनी आदतों के बारे में भी लिखूं. ऐसा करना आसान नहीं होता, क्‍योंकि आदतें इसीलिए आदतें होती हैं कि उन्‍हें आप ख़ुद नहीं पहचान पाते. कोई न कोई, कभी, दर्ज या अ-दर्ज तरीक़े से आपको टोकता है, टोक कर आपका ध्‍यान उसकी ओर ले जाता है और तब आप पाते हैं कि हां, यह तो सही कह रहा है, मैं तो ऐसा ही करता हूं. आदत अच्‍छी लगी, तो आप ज़ाहिरा तौर पर मान जाते हैं. अच्‍छी नहीं लगी, तो मुकर भी जाते हैं, फिर भी आदत बदस्‍तूर रहती है. 

जैसे पॉल ऑस्‍टर से किसी ने पूछा, अब लैपटॉप्‍स का ज़माना आ गया है, आप अभी भी अपने पुराने टाइप राइटर पर ही क्‍यों लिखते हैं? ऑस्‍टर कुछ देर सोच में पड़ गए और बोले, मैंने यह बात सोची ही नहीं थी कि मुझे लैपटॉप पर शिफ़्ट हो जाना चाहिए. निश्चित ही उन्‍हें अहसास होता होगा, जैसा कि उन्‍होंने बाद में कहा भी कि कंप्‍यूटर पर कॉपी एडिट करना ज़्यादा आसान होता है, लेकिन उनकी आदत में कंप्‍यूटर नहीं घुसता, तो नहीं घुसता. ड्राफ़्ट फ़ाइनल होने तक वह हर बार पूरी स्क्रिप्‍ट को फिर से टाइप करते हैं. यानी दस बार करेक्‍शंस किए, तो दस बार टाइपिंग. मैं सोचता हूं कि इस तरह न्‍यूयॉर्क ट्रायलॉजी पूरा करने में उन्‍हें कितना वक़्त लगा होगा.

पर मैं ऐसा नहीं करता. मेरी आदतें अभी भी बहुत मिली-जुली हैं और की-बोर्ड के कारण लंबे समय तक क़लम का साथ छूटे रहने के बाद भी पिछले कुछ बरसों में मेरा यह पक्‍का विश्‍वास हो गया है कि फा़इनल होने से पहले प्रिंट आउट्स पर क़लम के निशान होने ही चाहिए. कॉपी राइटिंग और एडिटिंग दोनों तरह से हो. पहले जितना कुछ ऑनलाइन हो सकता हो, उतना. फिर ऑफ़लाइन क़लम से. वह भी अपनी पसंदीदा हरी स्‍याही से. या फिर बैंगनी स्‍याही से. बिना लाइन वाले सादे काग़ज़ों पर. पॉल ऑस्‍टर की आदत दूसरी है. वह अपना सारा लेखन चार लाइन वाली नोटबुक में करते हैं, जैसी नोटबुक्‍स छोटी क्‍लासों में बच्‍चों को अंग्रेज़ी और कर्सिव में महारत के लिए दी जाती हैं. 

हालांकि मैं अपनी आदतों की तफ़सील में नहीं जाऊंगा, क्‍योंकि वह ख़ुद को भी अटपटा ही लगेगा और मैं देर तक सिर्फ़ अपने बारे में बोल भी नहीं पाऊंगा, दो-चार लाइनों बाद ही उसमें मेरे प्रिय लेखकों के प्रसंग आने लग जाएंगे. जैसा कि ऊपर के पैराग्राफ़ में ही हो गया है. 

कविता और कहानी लिखने के तरीक़े भी अलग-अलग हैं. छोटी और स्‍वत:स्‍फूर्त कविताएं एक बार में लिख ली जाती हैं, अगर उस समय कंप्‍यूटर पर हों, तो तुरंत टाइप हो जाता है, लेकिन ऐसा बहुत कम होता है. कविताएं अचानक आती हैं, कई बार लंबे समय से दिमाग़ में चल भी रही होती हैं, लेकिन उन्‍हीं के बीच कोई अप्रत्‍याशित आती है. तब मेरी कोशिश होती है कि उसे पेंसिल से लिख लूं. और वे कुछ-कुछ पंक्तियों में होती हैं. तब जो किताब सामने है, उसके हाशिए पर, या अंत में प्रकाशक द्वारा फर्मे की सहूलियत के लिए छोड़े गए सादे पेजों पर नोट कर लेता हूं. फिर अगली फ़ुरसत में वे पेंसिल से ही डायरी या नोटपैड के सादे पेजों में चली जाती हैं, वहां जमा होती रहती हैं. कई बार इस तरह जमा होती रहती हैं कि बाद में पढ़ने पर यह समझ में नहीं आता कि यह पंक्‍ित क्‍यों लिखी थी. ख़ैर. कुछ कविताएं, पंक्‍ितयां देरी से खिलने वाले फूलों की तरह होती हैं. वे वैसी ही होती हैं, तो होती हैं. आप कुछ नहीं कर सकते. हां, उन पर ज़ोर-आज़माइश ज़रूर कर सकते हैं. इसी दौरान मैं एक बार उन्‍हें टाइप कर लेता हूं, प्रिंट ले लेता हूं और फिर उन पर काम. (कविता पर काम करना चाहिए या नहीं, मैं इस पर कुछ पंक्तियों बाद आऊंगा. यह एक दिलचस्‍प सवाल है, क्‍योंकि कई मित्र पर इस पर आपत्ति करते हैं, उनका मानना है कि कविता एक बार में ही जैसी लिखी जाए, वैसी ही होनी चाहिए, उस पर काम करने का अर्थ है कविता के आगमन के क्षणों की मन:स्थितियों या म्‍यूज़ का अनादर करना. मेरी नज़र में ऐसा नहीं है.)

काम का यह सिलसिला चलता ही रहता है. जब तक कि उससे एक ख़ास कि़स्‍म की विरक्ति न हो जाए. यहां विरक्ति, आसक्ति का ही समानार्थी है, जैसे मैंने पहले भी कई बार अतीत को भविष्‍य का समार्थी माना है. और समार्थी का संधि-विच्‍छेद मुझे एक और अर्थ देता है, वह है 'सम पर पहुंचाने वाला अर्थ.' जैसे मेरी एक कविता है 'माउथ ऑर्गन'. मैंने उसे सबसे पहले 97 में लिखा था, और बाद के बरसों में वह नोटपैड में यूं ही पड़ी रही. बीच के छह बरसों में जब मैंने लिखना लगभग बंद ही कर दिया था, तब मैं बीच-बीच में उसमें चला जाता, उसमें कुछ खदड़-बदड़ कर देता, जैसे सिम पर रखी हुई सब्‍ज़ी को आप जांचने के लिए उसमें यूं ही कलछुल फिरा दिया करते हैं. पर उससे कुछ हुआ नहीं. कविता की मूल संरचना और रेंज पर कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा. दस साल बाद मैंने उसे टाइप किया और उसके प्रिंट पर काम करना शुरू किया, और तब मैं शायद उसके आरोह को छू पा रहा था,  मुझे यह नहीं याद था कि पहली बार मैंने उसे क्‍या सोचकर लिखना शुरू किया था, लेकिन दस साल बाद मैंने पाया कि इसकी कुछ पंक्तियों में अभी भी धड़कन बाक़ी है. और उसी धड़कन को और ज़्यादा पंप करने की ज़रूरत है. और यह तब तक चलता रहा, जब तक कि मैंने अपने संग्रह का आखि़री प्रूफ़ नहीं पढ़ लिया. उसमें तब भी बहुत बदलाव हुए थे. और वह संग्रह की उन कुछेक कविताओं में से है, जिनका पहले कभी प्रकाशन हुआ ही नहीं था. इन सबका अर्थ यह नहीं कि वह एक बहुत बड़ी और महान कविता हो गई, क्‍योंकि अब भी मैं उसमें अपने स्‍टैंटर्ड्स पर नहीं पहुंच पाया हूं. जब मैं रचनाओं से जुड़े हुए पृष्‍ठभौमिक तथ्‍यों के बारे में बात करता हूं, तो दरअसल रचना की रसोई की एक यात्रा करने जैसा होता है. चूंकि हमारे यहां रचनाओं की फिजि़क्‍स पर बात करने का कोई चलन ही नहीं है, सो इसे तुरंत एक नकरात्‍मक प्रवृत्ति की तरह देखा जाता है कि अरे देखो साब, फलां की एक किताब अभी छपी नहीं कि वह यह गिनाने लग गए हैं कि यह पांचवां ड्राफ़्ट है, इसे लिखने में मुझे चार साल लग गए या ब्‍ला-ब्‍ला. जबकि यह तो महज़ उसके फिजि़क्‍स का एक फ़ैक्‍ट है, जिसे लेखक उतनी ही सहजता से बताता है, जितना कि वह अपनी रचना में जाता है. सहजता एक दुर्लभ गुण है, केवल लेखक के रूप में ही नहीं, पाठक और साथी लेखक के रूप में भी हमें इसे सहर्ष, सगर्व आरोहित करना चाहिए. इसे एक लेखक की इन्‍वॉल्‍वमेंट के रूप में भी देखा जाना चाहिए. 

इसी सिलसिले में मुझे एक बार फिर विलियम फॉकनर याद आते हैं. उनसे एक बार पूछा गया कि आप अपनी किस किताब को सबसे ज़्यादा पसंद करते हैं. उनका जवाब था, 'जिस किताब ने लिखने के दौरान मुझसे सबसे ज़्यादा संघर्ष कराया हो, जिसने सबसे ज़्यादा रुलाया हो, सबसे ज़्यादा मेहनत कराई हो. मैं अपनी रचनाओं की गुणवत्‍ता को इसी आधार पर मापता हूं. जैसे कि एक मां अपने उस बच्‍चे से सबसे ज़्यादा प्रेम करती है, जो उसकी बात नहीं मानता, बड़ा होकर अपराधी बन जाता है या चोरी-हत्‍याएं करने लगता है. मां को पता है कि अच्‍छा बेटा तो अच्‍छा ही है, वह बुरे काम नहीं करेगा, लेकिन यह जो बुरा बेटा है, इसे ज़्यादा प्‍यार करो, क्‍योंकि प्‍यार के कारण इसके सुधर जाने की संभावनाएं बची रहेंगी. उसी तरह एक लेखक अपनी सबसे शैतान, बदमाश, चंचल कृति की ओर देखता है.' उन्‍होंने 'द साउंड एंड द फ़्यूरी' को इसी श्रेणी में रखा, जिसे उन्‍होंने पांच अलग-अलग तरीक़ों से लिखा था और उम्र के आखि़री बरसों में बाक़ी चार वर्शन्‍स को भी छपवा देने के बारे में विचार किया था. और जहां तक मुझे याद पड़ता है, एक निबंध में उन्‍होंने बताया था कि इसका अंत उन्‍होंने पैंतीस से ज़्यादा बार लिखा था. इससे थोड़ा-सा कम काम उन्‍हें 'ऐज़ आय ले डाइंग' पर करना पड़ा था. और यहां यह कहना दिलचस्‍प होगा कि फॉकनर के जिस 'योक्‍नेपटाफ़ा' ने आगे चलकर माकोंदो और मालगुड़ी की रचना में प्रेरक भूमिका निभाई, छपकर आने के बाद उनके इस उपन्‍यासों पर कम ही लोगों ने ध्‍यान दिया था. 

हर लेखक अपने लिए लिखने का एक समय तय कर लेता है, लगभग, वह उसी समय लिखेगा या उस समय लिखने को लेकर ज़्यादा आरामदेह महसूस करेगा. जैसे कुछ ड्यूटी अवर्स की तरह नौ से पांच का समय चुन लेते हैं, कुछ दोपहर का. ज़्यादातर लोग सुबह जल्‍दी उठकर लिखते हैं. रॉबर्ट ब्‍लाय मेरे प्रिय अंग्रेज़ी कवियों में हैं और उनके ग़ालिब के अनुवादों को कई बार मैं इस शायर को आज दिनांक में समझने के लिए गाइड की तरह देखता हूं, उनकी सुबह लिखने की आदत हैरान करती है. वह सुबह पांच बजे उठते हैं, बिस्‍तर छोड़ने से पहले ही वह काग़ज़-क़लम लेकर एक कविता लिखते हैं. हर सुबह बिला नागा. जैसे सुबह की चाय. और पिछले पचास साल से वह हर सुबह ऐसा ही करते हैं. उनकी सुबह लिखी कविताओं का संग्रह 'मॉर्निंग पोएम्‍स' नाम से संकलित भी है. 

मेरे लिए सबसे आरामदेह समय रात का होता है, रात ग्‍यारह बजे के बाद. मुझे अंधेरा चाहिए. तेज़ रोशनी से मेरा माइग्रेन भड़क उठता है और मैं जिन चीज़ों से सबसे ज़्यादा डरता हूं, उनमें यह माइग्रेन भी है. दिन में कोई कमरा ऐसा नहीं होता, जहां पूरी तरह अंधेरा हो, और दिन में घर रहा भी नहीं जाता, काम पर जाना होता है. सो रात का समय सुविधाजनक होता है. नौकरी के घंटे बदलते-बढ़ते रहते हैं, इसलिए यह बैठक कई बार अनिश्चित हो जाती है. कई बार लंबा स्‍थगन. ऐसा सबके साथ होता होगा. एक दिन आप एक शब्‍द भी नहीं लिख्‍ा पाते और किसी दिन पूरे हज़ार शब्‍द लिख जाते हैं. इसका कोई औसत या हिसाब नहीं. हेमिंग्‍वे जैसे लोग अपवाद हैं. उनकी डेस्‍क के सामने एक चार्ट लगा होता था, जिसमें वह हर रोज़ नोट करते थे कि आप कितने शब्‍द लिख लिए. कभी साढ़े छह सौ तो कभी पंद्रह सौ. हर रोज़ के चार्ट के बाद वह महीने का औसत निकालते थे और अगर वह ठीकठाक रहा, तो ख़ुश होते थे, वरना कलपते थे, ख़ुद को कोसते थे और अपना औसत बढ़ाने की कोशिश करते थे.

बैठक से जुड़े हुए नखरे भी हैं. जैसे मैं थर्मस में चाय बनाकर अपने साथ रखता हूं. कई बार अलग-अलग तरह की चाय. रेगुलर, ग्रीन और लेमन तीनों. मूड अच्‍छा हुआ और माइग्रेन का ख़तरा न रहा, तो कॉफ़ी. यहां जैक केरुआक की याद आती है. वह लिखते समय खाने की कुछ चीज़ें लेकर बैठता था. हालांकि कई लोगों को निरर्थक लगेगा यह सब, क्‍योंकि एक तरह से आप क्‍या लिख रहे हैं, बहुत महान या कचरा लिख रहे हैं, इन सब बातों का इससे कोई लेना-देना नहीं, और मैं अभी कंटेंट पर बात कर भी नहीं रहा, अलबत्‍ता कंटेंट भी एक आदत ही होता है, ऐसा मेरा मानना है, फिर भी यह ज़रूर कि सारी कलाएं या लेखन एक नशे की तरह ही होता है और सारी आदतें नशों में ही तब्‍दील हो जाती हैं, वे अपने आप होने लगती हैं, इसलिए वे अनजाने ही एजेंट प्रोवोकेटर की भूमिका ले लेती हैं. 

कहानी पर काम करने की आदतें अलग हैं, कविताओं से अलग, उन पर कभी अगली बार बात करेंगे. इस समय 'काम करना' पर अटकाव है. क्‍या एक लेखक को अपनी रचनाओं पर काम करना चाहिए? यानी जब रचना स्‍वत:स्‍फूर्त तरीक़े से ख़ुद को लिखवा ले जाती है, तो क्‍या सायास उसकी तराशना, मरम्‍मत, पुनर्लेखन आदि करना चाहिए? कला निजी आदत और निजी अनुभव है, इसलिए उसका कोई नियम तो होता नहीं, हर कलाकार अपने लिए कुछ सरणियां तैयार करता है और उन्‍हीं के आधार पर इस प्रश्‍न से जूझता है. मुझे बाबा बोर्हेस बहुत पसंद हैं और उनकी कही बातें न केवल लेखक, बल्कि किसी भी कलाकार के लिए दिशासूचक होती हैं, लेकिन उनकी कुछ बातों से मैं कभी सहमत नहीं हो पाता, उनमें से एक यह है कि वह कहते हैं, जब आप अपनी रचनाओं पर बार-बार काम कर रहे होते हैं, तो ज़रूरी नहीं कि आप उसकी सुंदरता बढ़ा ही रहे हों, ज़्यादातर मौक़ों पर आप उसे बर्बाद कर रहे होते हैं. बाबा को ऐसे अनुभव हुए होंगे, जो वह ऐसा कहने पर विवश हुए, पर मेरे अनुभव अलग हैं. 

मैंने पिछले दिनों आर्ट ऑफ नॉवल पर कुछ बेहतरीन चीज़ें पढ़ी हैं, और उन्‍हें पढ़ते हुए ऐसे कई मुद्दों पर मैं अपनी राय से संतुष्‍ट भी हुआ. मैंने पहले भी कहा है कि कला स्‍वत:स्‍फूर्त नहीं होती, वह अत्‍यंत नियंत्रित अभिव्‍यक्ति है. स्‍वत:स्‍फूर्त होना सिर्फ़ एक भ्रम है. आप अपने चेतन में या अवचेतन में उसके बारे में सोचते रहते हैं, उसे पा लेना चा‍हते हैं, और पा लेते हैं. कुछ चीज़ें अनायास आपके पास आ जाती हैं, लेकिन वे इसलिए आती हैं कि कुछ दूसरी चीज़ें उनके लिए ज़मीन तैयार कर देती हैं. गेंदबाज़ी इसके लिए बढि़या उदाहरण है. बॉलर जानता है कि उसे इनस्विंग करानी है, तो बॉल को कहां टप्‍पा दिलाना होगा, कलाई को कैसे झटकना होगा. वह इन‍स्विंग फेंकना चाहता है, सो फेंकता है. यही उसका नियंत्रण है. इनस्विंग फेंकने की इच्‍छा के बावजूद अगर वह आउटस्विंग फेंक देता है, तो वह असफल है, अनियंत्रित है, कलाहीन है. भले उस आउटस्विंग पर उसे विकेट मिल जाए, लेकिन वह ख़ुद जानता है कि वह ग़लत है. संभव है कि अगली बार उसे इस ग़लती का खामियाजा भुगतना पड़े. वह एक स्‍वत:स्‍फूर्त गेंद का इंतज़ार नहीं कर सकता. उसकी एक चाही हुई इनस्विंगर अगर उसकी उम्‍मीद से ज़्यादा स्विंग हो जाती है, तो भी यह स्‍वत:स्‍फूर्त नहीं है, क्‍योंकि इसमें पिच का वह गड्ढा या पैच मददगार है, जो एक्‍स्‍ट्रा टर्न दे देता है या वह हवा जो गेंद पर सहायक रहम करती है. आज जितनी भी कलाएं हैं, उनमें बॉलिंग से ज़्यादा कलात्‍मक उदाहरण नहीं मिल सकता, कलात्‍मक नियंत्रित अभिव्‍यक्ति का.  और इस नियंत्रण के लिए उसे लगातार काम करना होता है, अभ्‍यास करना होता है. लेखक का काम करना गेंदबाज़ के काम करने से थोड़ा ज़्यादा कठिन है, क्‍योंकि लेखक को नतीजा तुरंत नहीं मिलता, बरसों लग जाते हैं, जबकि गेंदबाज़ अगले कुछ मिनटों में जान लेता है कि कितना परसेंट डिलीवर हुआ. 

ओरहन पमुक की नई किताब इसी किस्‍म के विषयों को छूती है. यह है हार्वर्ड में उनके लेक्‍चर्स का संग्रह, जो कुछ दिनों पहले ही रिलीज हुआ है- 'द नाइव एंड द सेंटीमेंटल नॉवलिस्‍ट'. फ्रे‍डरिक शिलर नामक दो सदी पुराने एक जर्मन लेखक के एक निबंध को आधार बनाकर उन्‍होंने लेखकों की दो श्रेणियां बनाई हैं- पहली नाइव, जो सीधा-सादा, भोला-भाला है, जो उन्‍हीं चीज़ों में यक़ीन करता है, जो उसके पास अपने पैरों पर चलकर आ जाती हैं. और दूसरी श्रेणी है- सेंटीमेंटल, जो बहुत रिफ्लेक्टिव होता है. वह अपने तरीक़े से सोचता है, और अपने इमोशंस और रिफ्लेक्‍शंस के सहारे उसमें इनोवेट करते जाता है. आधुनिक समय का अच्‍छा लेखक दोनों ही तरीक़ों के मिश्रण से बनता है.   

यह किताब पमुक के सबसे सुंदर कामों में से है, जो रचना-प्रक्रिया और पाठकीय-प्रक्रिया की कई अंधेरी गलियों को रोशन करती चलती है. इनके अलावा मिलान कुंडेरा की नई किताब 'एनकाउंटर' भी है, जो आर्ट ऑफ फिक्‍शन को विश्‍लेषित करने वाली उनकी सीरिज का नया हिस्‍सा है. पुरानी तीन किताबें हैं 'द आर्ट ऑफ़ नॉवल', 'टेस्‍टामेंट्स बीट्रेड' और 'द कर्टेन'. मेरी कोशिश होगी कि अगली पोस्‍ट्स में मैं इन पांचों किताबों पर बात करूं. 



12 comments:

मनोज पटेल said...

कंटेंट भी एक आदत ही होता है, .......... सारी कलाएं या लेखन एक नशे की तरह ही होता है और सारी आदतें नशों में ही तब्‍दील हो जाती हैं. बहुत खूब. दिलचस्प जानकारी के लिए शुक्रिया. पामुक और कुंदेरा की किताबों पर आपकी पोस्ट का इंतज़ार रहेगा.

अपूर्ण said...

'सहजता एक दुर्लभ गुण है, केवल लेखक के रूप में ही नहीं, पाठक और साथी लेखक के रूप में भी हमें इसे सहर्ष, सगर्व आरोहित करना चाहिए|'


पूरी तरह से सहमत हूँ|

डॉ .अनुराग said...

ओर मुझे लिखने वाली की ईमानदार स्वीकारोक्ति बड़ी भली लगती है .....तभी मेरी अलमारी में औटोबायोग्राफी सबसे ज्यादा है ......
वैसे बकोल गुलज़ार "आदते भी अजीब होती है "

अशोक कुमार पाण्डेय said...

GURU...APAN IS BAAT SE SAHMAT KI - मैंने पहले भी कहा है कि कला स्‍वत:स्‍फूर्त नहीं होती, वह अत्‍यंत नियंत्रित अभिव्‍यक्ति है. स्‍वत:स्‍फूर्त होना सिर्फ़ एक भ्रम है. आप अपने चेतन में या अवचेतन में उसके बारे में सोचते रहते हैं, उसे पा लेना चा‍हते हैं, और पा लेते हैं. कुछ चीज़ें अनायास आपके पास आ जाती हैं, लेकिन वे इसलिए आती हैं कि कुछ दूसरी चीज़ें उनके लिए ज़मीन तैयार कर देती हैं.

DOOSARA...TUM GAVAH THAHRE APANI (DUR)BUDDHI BHII RAAT ME HII JAGATII HAI...Kya apna lekhan NISACHARI Pravrit kii abhivyakti hai? Kiran to yahi kahtii hai!

अनिल कान्त said...

मुझे अगले लेख की प्रतीक्षा रहेगी

अरुण देव said...

Aanand aa gaya.bdhai.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

Intezar!

विमलेश त्रिपाठी said...

बेहतरीन और दिलचस्प ( आपके गंभीर अध्ययन और मनन का रेंज प्रभावित करते हैं)...बस यही कहूंगा।।
आभार....

Geet Chaturvedi said...

शुक्रिया आप सभी का, दोस्‍तो.

varun jha said...

लिखने की आदतें ........

sarita sharma said...

कोई भी आदत अपनाई जाए क्या लिखा गया वाही महत्त्वपूर्ण है.वैसे मुझे किसी का रात भर जागकर लिखना बहुत कष्टसाध्य लगता है क्योंकि दिन में उस नींद की भरपाई कर पाना कठिन होता है.दिनभर की नौकरी के बाद इतनी उर्जा कहाँ बची रहती है कि ६-७ घंटे तक फिर कम पर लगा जाए.यह तो दोहरी शिफ्ट में काम करना हुआ.

mamta vyas bhopal said...

हो सकता है आप सभी बुद्धिजीवी सही कह रहे हो | लिखने के लिए अनुशासन या सिध्दांत अपनाने होते होगे | साधना करनी होती होगी | लेकिन मैंने बहुत पहले कहीं पढ़ा था की | साऊथ के इक छोटे से गाँव में इक महिला दिन भर अपने घर के काम करती थी | दूसरों के घर भी जाकर काम करती थी | और रात को जब दुनिया सो जाती थी वो रसोई घर में बैठ कर सुन्दर कवितायें लिखती थी | शायद वो अपने काम की थकन और दर्द की चुभन से इस तरह निजात पाती होगी |
वो कहीं कुर्सी टेबल वाले वातानुकूलित कमरे में नहीं थी | ना कोई नेम और फेम की जरुरत थी उसे | बस यूँ ही उसका दिल भरा होगा भावों से और कविता बही होगी आखों से , चुपचाप -----बहुत सालों बाद उसकी सभी कविताओं को छापा गया जो विलक्षण थी | अद्भ्रुत थी |
जो महिलाये अपने पूरे मनोयोग से भोजन बनाती है | अपना पूरा कृतित्व और स्नेह उस भोजन में डालती है | घर को सजाती है | रिश्तों को निभाती है | दर्द सह कर भी ऊपर ऊपर मुस्काती है | बच्चों को जनम देती है | और उन्हें इन्सान बनाती है | क्या वो किसी लेखक या किसी कवि की तरह जिन्दगी को नहीं लिख रही होती है ?
रोज रोज टूट कर मिट कर फिर से बन जाना | क्या ये कविता नहीं ? हाँ वो जो लिखती है उसे कोई पढ़ता नहीं | वो बेस्ट सेलर भी नहीं होती | लेकिन सच्ची जरुर होती है |
और लिखना क्या है ? जब भाव उमड़े गले तक भरे , आखों से बहे और चल पड़े चुपचाप ...| बिना किसी आदत के, बिना अनुशासन के बिना किसी नियम के ...| ये भी लेखन है |