Saturday, May 17, 2008

हमें माफ़ कर दो, वरना हम तुम्हें गोली मार देंगे

राख-इराक़

बहुत सारे हथियारों के साथ
वे दनदनाते हुए घुसेंगे आपके घर में
और कहेंगे कि सारे हथियार निकाल फेंको
उन पर सिर्फ़ हमारा हक़ है
वे आपको रास्ते में रोक लेंगे और
नाक पर पिस्तौल सटाकर कहेंगे
जेब में जितने भी हों पैसे
हमें दे दो
पैसों पर सिर्फ़ हमारा हक़ है
वे आधी रात को फ़रमान जारी करेंगे
अपनी औरतों को भेज दो हमारे तंबुओं में
ख़ूबसूरत औरतों पर सिर्फ़ हमारा हक़ है

वे मासूम बच्चों की आंखों में गोली मारेंगे
बिना ज़ाहिर किए कि उन आंखों से उन्हें डर लगता है
वे बुज़ुर्गों की ज़ुबानों पर छुरी चलाएंगे
और दूर खड़े होकर खिजाएंगे
वे पीठ से बांध देंगे आपके हाथ और
किसी महिला की चड्ढी से ढांप देंगे आपका मुंह
और कहेंगे कि ढूंढ़ लीजिए वह राह
जिस पर चलना है आपकी सरकार को

आपके गले में पट्टा बांधकर कहेंगे
सिर्फ़ हांफो ज़ुबान निकाल कर
कराहने, रोने या चीख़ने की हिम्मत न करना
हमें तफ़रीह का मन है

और एक दिन जब उनका मन भर जाएगा
वे आपकी कनपटी पर लगाएंगे बंदूक़
और दुख के साथ कहेंगे
हमें माफ़ कर दो इन सबके लिए
वरना हम तुम्हें गोली मार देंगे
(2004 में लिखी गई, प्रगतिशील वसुधा में प्रकाशित)

18 comments:

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

....बच्चू, तुमने बहुत दिल जला दिया! अब अमरीश पुरी का डायलोग या मधु पर अजय देवगन के साथ फिल्माया गया 'दिलजले' का 'शाम है धुंवा-धुंवा' गीत भी काम नहीं करता. जुम्मा-जुम्मा चार दिन ब्लॉग लिखते हुआ नहीं और होशियारी करते होप्प?
...अब अगर तुमने हमसे ज़्यादा अच्छी पोस्ट लिखी, ब्लॉगवाणी में 'ज्यादा पसंद किए गए' की लिस्ट में आए, या दनादन 'सबसे ज़्यादा पढ़े गए' लोगों की लिस्ट में आए, तो हम तुम्हें गोली मार देंगे; बल्कि इराक़ वाले आत्मघाती कार बम बन जायेंगे!!! ओइम फट स्वाहा! क्रमांक-११११. यह कोड नंबर है.

विजयशंकर चतुर्वेदी said...

मुझे मुम्बई के दंगों पर लिखी अपनी एक कविता याद आ गयी. उसकी चन्द लाइनें-

'एक बुजुर्ग सिपाही नल बाज़ार में सीटी बजा रहा था
उसका जूनियर पिस्तौल का निशाना परख कर आ रहा था.'

Dr.Parveen Chopra said...

जैसे बच्चा मेले में जाकर हैरान सा घूमता फिरता रहता है मेरा हाल भी आप धुरंधर कवियों एवं लेखकों के बीच में कुछ ऐसा ही है.....आप सब इतनी बढिया बढिया रचनायें लिखते हो कि मेरे पास तो उन की तारीफों के पुल बांधने के लिये शब्दों रूपी सरिया भी सही मात्रा में उपलब्ध नहीं होता।

काकेश said...

बहुत अच्छी कविता.

दिनेशराय द्विवेदी said...

सुंदरम्,शिवम्,सत्यम्।

Udan Tashtari said...

दिल को छू गई आपकी रचना. बहुत उम्दा गीत भाई.

sushant jha said...

आपको आज दुवारा पढ़ रहा हूं...

Geet Chaturvedi said...

काकेश जी, दिनेश जी, समीर जी, सुशांत जी और डॉक्‍टर प्रवीण जी, आप सभी का आभार.
विजय भैया, मज़ा आ गया आपके विट से. भई, मैं तो लिखकर देता हूं, आप मुझसे कई गुना बेहतर कवि और लेखक हैं. आपको पढ़-पढ़कर बहुत कुछ सीखा है. चाहे कविता हो या पत्रकारिता.
आपकी ये पंक्तियां पढ़कर 'अयोध्‍या नहीं, हम जा रहे थे दफ़्तर' याद आ गई. कभी उसे 'आज़ाद लब' पर पढाइए.

अरुण said...

ये आप कविता करते हो , लगता है जल्द ही कविताओ पर सरकारी बैन लगने वाला है :)
बहुत शानदार रचना

Lavanyam - Antarman said...

" वे मासूम बच्चों की
आंखों में गोली मारेंगे
बिना ज़ाहिर किए कि
उन आंखों से उन्हें डर लगता है "--
बहुत खूब !
ज़ुल्म सहे ,
वो भी अपराधी कहलाता है -
- लावण्या

Manish said...

बढ़िया लिखा आपने...

Arun Aditya said...

जितनी बार पढो, हर बार भीतर से हिला देती है यह कविता। आततायियों का चेहरा यूं ही खारोचते रहो।

गौरव सोलंकी said...

वे मासूम बच्चों की आंखों में गोली मारेंगे
बिना ज़ाहिर किए कि उन आंखों से उन्हें डर लगता है


यूं ही पढ़वाते रहिए राख, आग, चिंगारियाँ...

Geet Chaturvedi said...

अरुण जी, लावण्‍या जी, मनीष जी, गौरव जी, बहुत बहुत शुक्रिया आप सबका.
मासूमियत ही होती है, जो आततायी को सबसे ज्‍यादा डराती है.
ग्रेट डिक्‍टेटर देखने के बाद नाजि़यों ने कहा था कि चैपलिन से जिस मासूमियत से हिटलर का मज़ाक़ बनाया है, उससे डर लगता है. उसके बाद वे चैपलिन को मारने की साजि़श करने लगे थे.
ख़ैर, आभार आप सबका. :)

कुमार आलोक said...

samrajyavaad ke khatme ke liye aise hee alakh jagate rahe apnee kavitaaon aur geeton se ...ujaalaa hoga..phir koi iraq ya afgaanistaan hamlog nahee hone denge...bahut sundar..dil ko chune waali nahee balki faad dene waali kavitaa hai aapkee..

कुमार आलोक said...

ek baar comment post kiya prakasheet nahee huaa....

amerki aatankwaad aur samrajyavaad ko khatm karne kee dishaa main yeh kavitaa missile kaa kaam karegee , dil ko chune waali nahee balki dil ko tar tar kar dene waali kavitaa hai geet bhai saheb...brekth ne kaha thaa shayad ....kya zulmaton ke daur main bhee geet gaye jayenge ...haan zulmaton ke daur me hee geet gaye jayenge...

महेन said...

इस कविता को किसी तस्वीर की ज़रूरत नहीं है हुज़ूर्। यहां तो ख़ुद पूरा कोलाज खींच दिया है आपने। आतंकवादियों से भी ज़्यादा आतंकित कर दिया आपने।
और हाँ शिव बटालवी के बारे में भी पढ़ा। जिसका गला पाश जैसा कवि पकड़ सकता हो उसे पढ़ने से रोक नहीं पा रहा अपने-आप को। मगर पंजाबी नहीं आती न।

sarita sharma said...

हर युद्धरत देश की हालत इराक जैसी ही होती है.युद्ध की विभीषिका का चित्रण करने वाली मार्मिक कविता जिसमें आततायी मानवता को पूर्णतः भुला देते हैं.